लेकिन चर्चा में सेंगर इसलिए नहीं है क्योंकि वो बलात्कारी है। इसलिए भी नहीं कि वो इन आरोपों के सिद्ध होने के बाद सज़ा काट रहा है। चर्चा में वो इसलिए भी नहीं है कि उसने कोई पश्चाताप किया है, या कोई माफी लायक काम किया है। चर्चा में वो इसलिए है कि कुछ महान लोग, कुछ कम महान लोग, और कुछ महानता की चाहत रखने वाले लोग उसके समर्थक हैं।
देखिए, एक बात तो ये समझ लीजिए कि कुलदीप सिंह सेंगर की बेटी जो भी बयान दें, वो एक बेटी की तरफ से एक बाप के बचाव की बात है, और इसलिए उस पर यक़ीन करना, ना करना, उस बेटी के कांशस की बात है। जिनमें कोई भी किसी भी तरह की टिप्पणी ना ही करे तो बेहतर है। उस महिला ने, जो कुलदीप सिंह सेंगर की बेटी है, ना तो कुछ ग़लत किया है, ना अपराध किया है, और अगर वो अपने पिता को दोषी नहीं मानती तो ये उसका अपना फैसला है, वो अपने पिता को दोषी नहीं मानती, इसलिए वो हरसंभव प्रयास करेगी कि साबित करे कि उसके पिता दोषी नहीं हैं। इसलिए उसकी बेटी क्या करती है, क्या कहती है, क्यों कहती है पर किसी भी तरह की बात करना व्यर्थ है। एक बेटी से आप यही उम्मीद करते हो, आश्चर्य तब होता जब बेटी खुद भी अदालत का फैसला मानती, और अपने पिता को दोषी मानती और कुछ ऐसा करती जो आपको भी आश्चर्य में डालता। खैर, इसबात का यहीं पटाक्षेप करते हैं।
बात है ब्रजभूषण सरण की। जो कहते हैं कि वो हमेशा कुलदीप सिंह सेंगर का समर्थन करेंगे।
बात है ओमप्रकाश राजभर की, जिन्हें पीड़िता पर हंसी आ रही है।
बात है दयाशंकर सिंह की, जो मानते हैं कि सेंगर को न्याय मिला है
और बात है इन मोहतरमा की
अब सवाल ये उठता है कि आखिर ये लोग समर्थन किस चीज़ का कर रहे हैं। अदालत ने कुलदीप सिंह सेंगर की सज़ा पर कोई सवाल नहीं उठाया है, ना उन्होने इस विषय में किसी तर्क को विचारणीय माना है। अदालत दिसंबर 2019 में कुलदीप सिंह सेंगर को भारतीय दंड संहिता यानी आई पी सी के बलात्कार के मामले के प्रावधान और बच्चे-बच्चियों के यौन शोषण से सुरक्षा के कानून पॉक्सो में एग्रेवेटेड पेनिटेटिव सैक्सुअल असॉल्ट यानी गंभीर यौन हिंसा के प्रावधान के तहत उम्र कै़द की सज़ा दी गई थी।
इसका मतलब ये हुआ कि अदालत ने अब भी जब सेंगर की सज़ा को निलंबित किया तो ये नहीं कहा कि उन पर आरोप ग़लत हैं। कोर्ट ने ये नहीं कहा कि उनकी सज़ा ग़लत थी या है। अब यहां इस बात पर भी ध्यान देना ज़रूरी है कि अपराधी को कोर्ट में किसी भी तरह की अपील का अधिकार है, और यहां अपराधी ने ये अपील की थी कि उन्हें जो सज़ा मिली थी वो कानूनन ज्यादा थी। कोर्ट ने इसी तकनीकी नुक्ते पर विचार किया और उनकी सज़ा को निलंबित किया ताकि उसकी सही सज़ा तय की जा सके।
इसका मतलब ये हुआ कि कोर्ट ने अपराध को कम नहीं आंका, कोर्ट ने ये नहीं कहा कि उसने अपराध नहीं किया। तब संेगर के समर्थक आखिर किस बात पर सेंगर का सपोर्ट कर रहे हैं।
ब्रजभूषण की बाइट
अब आप इसे समझिए, ये व्यक्ति कह रहा है कि वो सेंगर का समर्थन करता है। अब क्योंकि ये सिद्ध हो चुका है कि सेंगर बलात्कारी है, और एक नाबालिग लड़की से बलात्कार के आरोप के सिद्ध हो जाने के बाद सज़ा काट रहा है तो इसका सीधा मतलब ये हुआ कि ब्रजभूष्ण सरण, बलात्कार का समर्थक है, या कोर्ट का विरोधी है। दोनो ही मामलों में क्या इस नैतिक पोजीशन के बाद उसका भारतीय लोकतंत्र का किसी भी तरह का सदस्य होना संभव है। कोई संविधान जानने वाले मित्र इस बारे में प्रकाश डालें तो बेहतर होगा। दूसरी तरफ क्या किसी व्यक्ति द्वारा बलात्कार के विषय में बलात्कारी का इस तरह समर्थन करने वाले के प्रति उसकी पार्टी का क्या रुख होना चाहिए ये वो पार्टी तय करे।
अब आते हैं, ओमप्रकाश राजभर की बात पर।
ये एक अजीब बात है कि लड़की के उन्नाव रहने की बात पर इन्हें हंसी आ रही है। ये शायद किसी तरह के शॉक में हैं और समझ नहीं पा रहे हैं कि कोर्ट द्वारा बलात्कारी कुलदीप सिंह सेंगर को लड़की के घर से दूर रहने का आदेश, लड़की की सुरक्षा के लिए है। यानी कोर्ट मानता है कि कुलदीप सिंह सेंगर लड़की की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं, और इसलिए उन्हें ये निर्देश मिला है िकवे लड़की से दूर रहें। ऐसे में लड़की की आवाजाही पर, या आज़ादी पर कोई पाबंदी नहीं है, और वो कहीं भी आ जा सकती है। अब कोई राजभर जी को समझाए कि कोर्ट का ये आदेश इस देश के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देने वालों के मुहं पर तमाचा है, कि वो एक लड़की को बचा नहीं पा रहे हैं, और उसके लिए कोर्ट को आदेश देना पड़ रहा है।
तीसरे और बड़े वाले हैं, जो सज़ा के इस निलंबन को ही न्याय मान बैठे हैं।
दयाशंकर की बाइट
कोई दयाशंकर जी को जाकर समझाए कि दयाशंकर जी, कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की सज़ा माफ़ नहीं की है। वो बलात्कारी ही है, कोर्ट ने सिर्फ ये कहा है कि अगर उसने विधायक रहते हुए बलात्कार किया था तो क्या उसे लोक सेवक माना जाएगा या नहीं, इस विषय पर विचार करना है। यानी कोर्ट की नज़र में, कानून की नज़र में वो बलात्कारी ही है, इसलिए अगर आप उसका समर्थन करते हैं तो आप बलात्कार का ही समर्थन कर रहे हैं। अब जनता को फैसला करना है कि वो बलात्कार का समर्थन करने वाले व्यक्ति को कैसे देखती है।
सबसे बड़ा झटका इन त्रेहन जी के समर्थन से लगा। जो जाने किस दिमागी परेशानी की हालत में बलात्कार का समर्थन करने पहंुच गई हैं। जनाब कोई तो इन्हें बताए कि कोर्ट अब भी कुलदीप सिंह सेंगर को बलात्कारी ही मानता है, और उसकी जमानत का विरोध इसलिए हो रहा है कि जनता मानती है कि अगर वो जेल से बाहर आया तो पीड़िता की जान को खतरा है। इसलिए कोर्ट से जनता की अपील थी कि जमानत ना दी जाए। कोर्ट ने अपनी सज़ा में कह दिया कि वो गुनहगार है, यानी बलात्कारी है, हत्यारा है। अब आप बलात्कार और हत्या का समर्थन कर रही हैं।
खैर, मूर्खता की कोई सीमा नहीं होती। लेकिन वर्तमान सत्ता में जहां गुंडई ही सत्ता से नजदीकी का एकमात्र पैमाना बन जाए तो त्रेहन मैडम क्या करें? उनकी भी मजबूरी है।
जो मजबूरी मुझे समझ नहीं आई, वो थी महामानव की चुप्पी, गृहमंत्री की चुप्पी, सवाल ये है कि भारत की एक लड़की, जिसका बलात्कार हुआ, जिसके बलात्कारी आपकी अपनी पार्टी से थे, जिसे बलात्कार के आरोप मे ंसज़ा मिली, जिसे उस लड़की के पिता की हत्या के आरोप मे ंसज़ा मिली। आप उस लड़की के समर्थन में एक शब्द नहीं बोल पाए। आप उस लड़की को ये आश्वासन तक ना दे पाए कि वो सुरक्षित है। आप एक बलात्कार पीड़ित लड़की को ये संदेश तक न दे पाए कि आप उसे सुरक्षा दे सकते हैं। क्या देश की जनता को महामानव से ये सवाल नहीं पूछना चाहिए कि आखिर वो कैसे बेटी बचाओ, का नारा दे सकते हैं, जब वो अपनी ही पार्टी के सदस्य द्वारा पीड़ित एक लड़की को सुरक्षा नहीं दे सकते। क्या उनमें ये नैतिक हिम्मत है कि वे अपनी पार्टी के सदस्यों को ये कह सकें कि अगर आप उस लड़की का समर्थन नहीं कर रहे तो कम से कम बलात्कारी का, बलात्कार का समर्थन न करें। याद रखिए महामानव चुप हैं, तो ये चुप्पी बलात्कार के समर्थन में मानी जाएगी। और ये इस बलात्कार के समर्थन से भी ज्यादा खतरनाक बात है।
मुझे, पीड़िता के, भयाना के, तमाम स्त्रीवादी, प्रगतिशील संगठनों के, देश भर के नागरिकों के पीड़िता के समर्थन में शोर मचाने से बहुत फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि लोकतंत्र में ये जनता का अधिकार होता है कि यदि सत्ता का या न्यायालय का कोई फैसला उसे पसंद ना आए तो वो उसके खिलाफ सड़कों पर उतरे। यही लोकतंत्र होता है। मुझे देश की सत्ता की चुप्पी से फर्क पड़ता है, क्योंकि ये चुप्पी भारत की हर लड़की, हर महिला के लिए चेतावनी है कि तुम सुरक्षित नहीं हो, कि सत्ता की बुरी नज़र तुम पर है, कि ये सत्ता कभी भी तुम्हारे साथ कुछ भी बुरा कर सकती है। महामानव की चुप्पी तो यही कहती लगती है।
अब गंेद आपके यानी जनता के पाले में है। लोकतंत्र, न्याय, निष्पक्षता, और अधिकार तब तक सुरक्षित नहीं रह सकते जबतक जनता लगातार-लगातार विजिलेंट न रहे।
चचा हमारे यानी ग़ालिब इस बारे में कह के गए हैं।
कहां खो गए मेरे हक़ हुजूर ए वाला
ज़रा नज़र हटी कि चुरा लिए किसी ने
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
हताश थे अपने चचा शायद, उन्होने सोचा भी न होगा कि कभी उनके मुल्क को ये दिन देखना पड़ेगा कि चुने हुए प्रतिनिधि ज़िना का समर्थन करेंगे। पर ये बुरे दिन भी देखने ही थे। पर उम्मीद पे दुनिया कायम है, तो उम्मीद है कि
वो सुबह कभी तो आएगी