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गुरुवार, 20 मार्च 2025

गज़ल

 

जो गुज़री है दिल पे वही जानते हैं

कहां हम ये सारा जहां जानते हैं


तुम्हें तो पता हैं मेरे दिल की बातें

कहां हम तुम्हारा पता जानते हैं


जो सबसे बड़ी है, सजा मेरी जाना 

वही दिल गुजरी, जहां जानते हैं


अभी तो मुकम्मल नहीं है सफर ये

अभी हम नहीं रास्ता जानते हैं


ढ़ले शाम तेरा ख्यालों में आना

ये आदत है तेरी, हम हां जानते हैं


बहुत हो चुकी हैं, मुरव्वत की बातें

ये तेरा हुनर है, सभी जानते हैं


मैं कह तो रहा हूं, कपिल दिल की बातें

मगर वो कहां, कब ये दिल जानते हैं







मुहब्बत बनी रहे, सिलसिला जरूरी है

सही पहचान के लिए फासला जरूरी है


शर्म आंखों में ही दिख जाती है मगर

आपके मामले में ये मामला जरूरी है


उम्मीद के भरोसे बैठेंगे भला कब तक

मरना है के जीना ये फैसला जरूरी है




आसमां फिर से सराबोर हुआ

हर तरफ मरहबा का शोर हुआ


उसकी यादों के सदके जीते हैं

वो जो अपना था, कोई और हुआ


हमें गुमा तो नहीं था खुदी का

मिल गए खाक में ये तौर हुआ


सुना है हंसते हैं अब हम पर

कब हमारा किसी पे जोर हुआ


वो गिरा, वो गिरा, वो गिरा कहके

तेरी महफिल में ज़रा शोर हुआ


इश्क के रास्ते मुश्किल हैं बहुत 

कदम पक्के थे पे दिल चोर हुआ


यही दस्तूर है दुनिया का कपिल

वक्त बदला, वक्त कमजोर हुआ 






किसी सफर की तरह जिंदगी नहीं होती
कि इसमें राह नहीं, मंजिलें नहीं होती

ग़म तेरा ले चले, आंखों में आग ले के चले
अब तो जन्नत की भी कोई खुशी नहीं होती

मुझ को रहता है तेरी वफा का शक हमदम
मेरे दिल को क्यूं तसल्ली कभी नहीं होती

रगांे में खून नहीं, इश्क दौड़ता सा लगे
और तुम कहते हो यूं आशिकी नहीं होती

सभी ने छोड़ दिया, सबकी अपनी मंजिल थी
हमीं को जाने क्यूं आसूदगी नहीं होती

बस तेरा नाम, तेरा नाम, तेरा नाम बाकी
दिल से अब कुछ और दुआ नहीं होती

आंख भर कारवां को देखा जाते हुए
धूल पर नाम की ताबीर पर नहीं होती

बुरी होती है कपिल दिल की लगी
दिल लगाने से बुरी नहीं होती


मंगलवार, 4 जनवरी 2022

अब आई है बारी अपनी

 



सदियां गुजरीं अँधेरे में 

सिर नीचे करके लोग जिए 
अब सूरज लाल उगा देखो 
अब आई है बारी अपनी 

कभी ईश्वर था, कभी राजा था 
कभी धर्म रहा, कभी पैसा रहा 
इंसान उठा है अब देखो 
अब आई है बारी अपनी 

कभी नीले रंग का खून रहा 
फिर खून सफ़ेद भी हुआ किया 
अब रंग खून का लाल यहाँ 
अब आई है बारी अपनी 

कभी तलवारों ने राज किया 
कभी तख़्त पे बैठा धर्मगुरु 
फिर धनवानों का दौर आया 
अब आई है बारी अपनी 

कभी चाँद रहा था झंडे पर 
कभी सूरज, शेर और सांप रहा 
अब हंसिया हथौड़ा आया है 
अब आई है बारी अपनी 

वो सुबह आ गयी है देखो 
जिसके गाने तुम गाते थे 
जिसकी धुन में तुम मरते थे 
जिसके लिए तुम जीते जाते थे 

वो लाल सुबह, जब दुनिया की 
हर चीज़ पे अपना हक होगा 
वो इंक़लाब का दिन जब 
दुनिया का हर ज़र्रा अपना होगा 

जब अपनी मेहनत के साथी 
हम सब खुद ही मालिक होंगे 
तो उठ जाओ, आगे आओ 


अब आई है बारी अपनी

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

कुछ गज़लों जैसा

 


सच या कोई बहाना होगा

दिल को ये समझाना होगा

वफा की बातें कौन करे 

बेवफा!! सारा जमाना होगा

शाम हुई तो घर को लौटे

सुबह को फिर से जाना होगा

कुछ सिक्कों की खातिर बेचा

खुद को ”कपिल” कमाना होगा






मेरे सपनों का ये कहना है
मुझे अभी और जिंदा रहना है

किसके इजलास में पेषी होगी
जहां मुझे अपना बयान कहना है

सब खामोष हैं यादों के रफीक़
ग़म को अभी और जिंदा रहना है



सुबह निकली दिन हुआ है देखिए
क्या हुआ, कैसे हुआ, बस देखिए

नये पत्ते मचल करके खिल गए
झर गए पत्ते पुराने देखिए

आज फिर से ये यकीं आया मुझे
ख्वाब पूरे हो रहेंगे, देखिए

हर घड़ी का हम करें कैसे हिसाब
बेसबब बीता है जीवन देखिए

बोल के जो कुछ नहीं समझा सके
चुप में कैसे समझ लेंगे, देखिए

मैं वही हूं कुछ भी तो बदला नहीं
आपको दिखता हूं कैसा देखिए

अब भी सूनी राह को तकते हैं हम
आ ही जाए क्या पता वो, देखिए



सारी दुनिया गोल-मोल है
हर सच में, सच बहुत पोल है

तन्हा दिल, दुनिया की बातें
क्या समझे, क्या तौल- मोल है।

आपकी हस्ती बहुत बड़ी है
मेरे कद में बहुत झोल है।




दर्द का दिल से क्या रिष्ता है
हवा समंदर बादल पानी





आसमान के आंसू थाम लो
चलो फिर उसका नाम लो

बहुत गहरे से सदा उठेगी
ज़रा मगर सब्र से काम लो




रात तारों की चादर पे सो जाएगी
जब भी हमें तेरी याद आएगी

चांद फिर बाद-ए-सबा से पूछेगा
कहां जाती है, लौट के कब आएगी

हवा दरख्तों की चोटयों पर चढ़ी
उतरेगी हरसू पसर जाएगी

ख्वाब आखों में कब तक रहेंगे भला
मेरी उम्मीद सबको नज़र आएगी

मुझको इतना यकीं तो है मेरा जां
आएगी, आएगी, तू ज़रूर आएगी



जिन रस्तों पर चले थे हमतुम
वो रस्ते गुमनाम रहे

दिल तो साफ था लेकिन मुझ पर 
कई सौ-सौ इल्जाम रहे 
दुनिया वालों को समझा दो
अपने काम से काम रहे

जिन सपनों की नींव बनाई
अब उनके भी दाम रहे

हाथों में तकदीर थी मेरी
हाथ मगर बेकाम रहे

उनसे कुछ उम्मीद बची थी
पर वो भी गुमनाम रहे







हम जो हरदम मुकद्दर से लड़ते हुए
तेरे दर पे किसी दम खड़े हो गए
ये भी माना कहीं रौशनी थी मगर
अपने साये ही हमसे बड़े हो गए
सूरज निकला नहीं सांझ होने को है
हो गया रास्ता जिंदगी का बड़ा
चांद की राह मुश्किल बहुत है मगर
रात के बुत किनारों पे ही सो गए
हमने माना वफा की है आदत हमें
तुमसे उम्मीद थी बावफा तुम भी हो
हम तो अपनी निभाते रहे उम्र भर
तुम कहीं से कहीं पर खड़े हो गए

क्या बुरा किया

 तुमने कहा, हमने मान लिया

कहो तो, क्या बुरा किया


यूं भी ये जां तेरी ही है

ले ली, तो क्या बुरा किया


दिल छोड़ो, बेकार की बातें हैं

इसे तोड़ा, तो क्या बुरा किया


ये हार जीत कौन जानेगा

खोया पाया, तो क्या बुरा किया


आपकी हर अदा क़ातिल है 

मर गए हम, तो क्या बुरा किया


अब क्या देखना बाकी है



हार भी देख ली, और जीत को भी देख लिया

जिंदा नारों की तपिष, खुषबुएं, चारों सिम्त

ग़में दौरा, ख्वाहिषों की परवाज़

हाकिम को आज़मा के देख लिया


तुम आए ना आए, कोई रंज नहीं

हौंसला एक और जंग लड़ने का 

मेरे हर दिल अजीज़ साथी

तेरी आवाज़ मेरे साथ रही


मैने चाहा था किसी और वक्त

खेतों में जाउं, हंसू गाउं

सुब्ह फसलों को पानी लगाते हुए

गीली मिट्टी की ताज़ा गंध में 

बह जाउं

फैल जाउं हर दाने में, बस जाउं


पहाड़ों से समन्दर तक

जंगलों से मैदानो तक

गूंजती है लाखों आवाज़ें

इन्हीं आवाजों में मेरी 

आवाज़ भी शामिल है

तेरी आंखों में मेरे आसूं

तेरे होठों पे जज़्बा है मेरी हंसी


लड़के जीते हैं एक मंजिल

रास्ता और बाकी है अभी

चलना देखा है मैने खेतों का

फस्लों का, खून का, उम्रों का

अब क्या देखना बाकी है।


गुरुवार, 31 मार्च 2016

जुगाड़


बहुत सोचा, और सोचने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि जो लोग, मुझे पढ़ते हैं, चाहे कोई भी हों, उन्हे मेरे इन जुगाड़ों से भी रू-ब-रू होना चाहिए। हो सकता है आपको अच्छे लगें, हो सकता है आपको अच्छे ना लगें। लेकिन स्वाद तो देख ही लीजिए।
जिन लोगों के लिए लिखा है उनसे ये कहना है कि, अरे भाई औरों को भी पढ़ने दो।



1
कभी यूं ही, ज़रा सा, बेफिकर होकर, बता मुझको
रहे काबू में दिल, तो दिल की फिर बातें नहीं होती

रहेगा हां जमाना सामने अपने कयामत तक
जमाने की जोें सोचें तो अपनी बाते नहीं होती

सभी तो चुप रहे, और चुप जिए, और चुप रहा बाकी
तेरी चुप लाख चाहे, चुप से पर, बातें नहीं होती

वो बोले थे कि नज़रों की यां है जुबां कुछ और
तू मेरी मान, कि आंखों से पर बातें नहीं होती


2
हंसी झूठ, नज़र झूठ, कहा झूठ, सुना झूठ
अदा झूठ, वफा झूठ, तेरी बातों में बसा झूठ

छुपा झूठ को तू चाहे जिस भी पर्दे में
बनेगा पर नहीं वो सच, जो है असल में झूठ

खुदी में सोच, खुदी में बोल, खुदी से बहस भी कर ले
जो सबके सामने आएगा, तो होगा बस यही वो झूठ

कभी अपनी नज़र से देख, तू अपने ही फसाने को
तेरी हर बात नकली है, तेरा हर गाम है बस झूठ


3
रहे दुनिया, मिटे दुनिया हमें क्या फर्क पड़ता है
तू चाहे कुछ भी सोचे पर, हमें क्या फर्क पड़ता है।

सुनहरा हो कि काला हो, फिजां का रंग जैसा हो
ये तेरा रंग हो ना हो, हमें क्या फर्क पड़ता है।

कब किसके काम रुकते हैं, हमारे वां ना होने से
तेरा फिर कुछ भी हो यारा, हमें क्या फर्क पड़ता है।

ना तेरा है, ना मेरा है, किसी का फर्ज हो तो हो
तू अपना मान ले इसको, हमें क्या फर्क पड़ता है।

ये दुनिया यूं भी फानी है, ये दो पल की उम्र है ना
कभी भी छोड़ दें दुनिया, हमें क्या फर्क पड़ता है।

4
नींद क्यूं रात भर नहीं आती

रात की उम्र कटी
फिर से सिरहाने बैठे
उंगलियां फिराते रहे, पेशानी पे
चांद आखों से गुज़र गया यूंही

रौशनी के कतरों को समेटते हुए
दिन के पैबंद लगे हाथों पर
जबसे रखे हैं मैने
वक्त के चंद सिक्के
महाजन बन गई है जिंदगी जैसे
कर्ज पे यादों का व्यौपार चलता है

हर सांस चुकता हुआ उधार है कोई
ब्याज में जाता है
मूल बाकी है, 
जिंदगी का अभी तलक सिर पे
मौत का एक दिन मुअययन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती

5
जो आए थे, वो जाएंगे, ये दुनिया का दस्तूर है जी
तुम बैठे ठाले सोचते हो, रह जाते तो अच्छा होता।

माना कि तुम्हे उम्मीदें थी, पर उनकी भी इच्छाएं हैं
अपनी इच्छा को अपने तक, रख लेते तो अच्छा होता।

जीवन में कब, किसको बतला, दोनो मुकम्मल जहां मिले
दूजा छोड़ो, एक अपना ही रख लेते तो अच्छा होता।

बुधवार, 4 मार्च 2015

कपिल की कुंडलियां

कैसे हंसे नंद के लाला, कैसे छाने भंग

होली का तो हो गया, सब मौसम बदरंग
सब मौसम बदरंग, बजट कुछ ऐसा लाए
जूता छोड़ सभी चीजों के दाम बढ़ाए
महंगी में जनता के मुंह से छिना निवाला
अब बोलो भई, कैसे हंसे नंद के लाला

चित्र गूगल साभार


होली है इस बार की, एक रंग का खेल
बेशर्मी के रंग से, खेल सके तो खेल
खेल सके तो खेल, हमें तो यही दिखाया 
साहेब, औ’ भक्तों के भाग्य की यही है माया
शर्म को खाया, ओढ़ा, सूरत उससे धो ली
बेशर्मी से सराबोर, इस बार की होली

काला धन आया नहीं, सस्ता हुआ ना तेल

रोनी सूरत लेके होली, खेल सके तो खेल
खेल सके तो खेल, पड़ेगी जेब पे भारी
बिन रंगो के होली की कर ले तैयारी
जन की खुशियों पर जुमलों का लग गया ताला
अभी तलक ना आया सुसरा कोेई धन काला
चित्र गूगल साभार
छप्पन इंची छाती वाले नेता जी के भाग
जनता रोये ज़ार-ज़ार और धनिक गा रहे फाग
धनिक गा रहे फाग, लूट का मौका आया
लूट्यौ जो भी लूट सको, मोदी की माया
मरते हैं खेतों में अन्न उगाने वाले
राज कर रहे छप्पन इंची छाती वाले

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

चुनाव आ गया



लो चुनाव आ गया

तरह-तरह के रंग सजे
नए बने गाने
आकाश ताक रहा
जाने अनजाने
रेडुआ पर, टीवी पर
प्रचार की बहार है
लोक-लुभाने नारों की 
बयार है

खाने के पैकेट हैं
पूड़ी है सब्जी है
एक मिठाई है
गजब का मौसम है
सारे मेरे भाई हैं
सबको मुझसे प्यार है
गले लगे दोस्तों की तरह
पीठ थपथपाते हैं
मुस्कुराते हैं
हाथ जोड़ते हैं
कान में फुसफुसाते हैं

सब अच्छे हैं
सब सच्चे हैं
सब पवित्र हैं
सब सेवक हैं
सबकी निगाह में प्रेम है
सबकी बांहे खुली हुई हैं

मुद्दतों भूखा रहा हूं मैं
कभी अधपेट
कभी पानी पीकर गुजारा किया है
अभी कुछ दिनों से खुश हूं
क्योंकि
कई महीनो बाद
आज पेटभर खाया है

चुनाव आया है।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

सच





सच के कई चेहरे होते हैं, मेरे दोस्त.....

तुम्हारा सच, 
झूठ कहने, सुनने और समझने की आज़ादी देता है
सच कहने, करने से रोकता है
खूबसूरती को हर उस जगह तलाशता है
जहां
अशक्त देहों की परछाइयां झलकती हैं
जहां 
बेदम, बेकस, लाचार इच्छाओं की लाश
सुलगती रहती है ताउम्र
जहां
हर इंसान को 
किसी दूसरे इंसान का हक मारने का 
”हक” दिया जाता है
जहां भूख
महज़ एक एडवेंचर होता है

मेरा सच
हर दरार से
हर सेंध से
हर जबान से
तडप कर निकलता है
निकलने के लिए तड़पता है

तुम्हारा सच
कई आयामों वाला
कई रास्तों वाला 
कई सूरतों वाला होता है
जिसकी खूबसूरती
अखबारों के मुखपृष्ठ से झांकती है
टीवी की स्क्रीन पर दिखाई देती है
रेडियो के एफ एम चैनलों में हंसती है
जिसका हर रेशा
दूसरे से अलग होता है

मेरे सच की
जुबान काट दी जाती है
आवाज़ दबा दी जाती है
सुरों को गोलियों के शोर में दबा दिया जाता है
और फिर मेरे सच की लाश को
”मास ग्रेव” बना दिया जाता है
ताकि कोई पहचान भी न सके।

तुम्हारा सच
बहुत साधन सम्पन्न है
बहुत धनवान है
बहुत शिक्षित और शालीन है

मेरे सच के पास
सिवाय हाथों के 
और कुछ नहीं है
सिवाय हिम्मत के
और कुछ नहीं है
सिवाय अपने अहसास के 
और कोई ज्ञान नहीं है

तुम्हारे कई सच हैं मेरे दोस्त
तुम्हारे पास कई रास्ते हैं
मेरा एक ही सच है 
एक ही रास्ता है
सच का रास्ता.....


सोमवार, 13 मई 2013

कपिल की मुकरियां - १



कपिल की मुकरियां 

१ 
जो मन आये वो कह जाये 
छवि में मंद मंद मुस्काए 
डांट सुने बन बिल्ली भीगी 
क्या सखी साजन न सखी दिग्गी 


२ 
मौन रहे या बोले हल्का 
दिल का घुन्ना, भोला शकल का 
संत भाव से करता शोषण 
क्या सखी साजन ना मनमोहन 


३ 
तन का उजला मन का काला 
मुस्काते मन को हर डाला 
माँ रोये हो जाता व्याकुल 
क्या सखी साजन न सखी राहुल 


४ 
हाथ हथेली  के गुण गावे 
उलटी सीधी बात सुनावे 
तन से भारी, ज़ेहन से खुक्कल 
क्या सखी साजन न सखी सिब्बल 


५ 
नयन खुमारी, अंटा दाबे 
ऊंघते सोते काज चलावे 
मन है व्यसनी देह कुंवारी 
क्या सखी साजन, न अटल बिहारी 


६ 
नाम देव का, काम पशु का 
लहू से राज की फसल सींचता 
मासूमो की कब्रें खोदी 
क्या सखी साजन, ना सखी मोदी 


७ 
पल में सज्जन, पल में गुंडा
हाथ चलाकी लुंडम लुंडा 
जहर डुबोकर बोले बानी 
क्या सखी साजन, ना अडवाणी 
 
८ 
लूटमार करता सहकारी 
खुद को कहता नेता भारी 
मोटा जैसे भैंस चरी 
क्या सखी साजन, ना गडकरी 

१० 
करे कुशासन कहे सुशासन 
झूठ भरे सब देवे भासन 
लगे तीन कहता है तीस 
क्या सखी साजन, नहीं नितीश 
११ 

जुल्फ उड़ा रह रह मुस्काता 
बिन बोले भी रह नहीं पाता 
सब कहें चुप वो बोले ज़रूर 
क्या सखी साजन न सखी थरूर 
१२ 
वोट का मुस्लिम, वोट का हिन्दू
बाकी उल्टे चाँद का बिंदु 
रक्खे गुंडागर्दी कायम 
क्या सखी साजन नहीं मुलायम 
१३
पहले खुद और बाद समाज 
ऐसे लाता समाजबाद 
जोड़ तोड़ सत्ता पर कायम 
क्या सखी साजन नहीं मुलायम 

१४

चारा चोर और बेहद घाघ 
अपनी ढफली अपना राग 
दिखे जोकर पर बहुत है चालू 
क्या सखी साजन ना सखी लालू 

१५

धुर उजले वो पहने वसन
धन क्रीडा में रत तन मन 
पैसे वालों का मन भावन 
क्या सखी साजन न पलनिअप्पम (चिदंबरम)

१६ 

जिसको चाहे उसको मारे 
सी एम् पी एम् डर से कांपें 
नकली मंत्री असली गुंडा 
क्या सखी साजन नहीं राजा कुंडा 

 १७

अमरीकी वो बीन बजाय 
लाखों का पैखाना जाए 
खर्च के अरबों गिनता एक 
 क्या सखी साजन नहीं मोंटेक 
 १८ 
झूठ कहे बेशर्मी साधे 
दब के भकोसे, दब दे पादे 
अपनी धुन में रहे मगन 
क्या सखी साजन न सखी रमन 

१९
उजले कपडे, दिल है खोटा 
चम्पू जुल्फ़ें, चश्मा मोटा 
ठगी के खेल का महारथी 
क्या सखी साजन नहीं सखी पी. 

२० 
अँधा हो रेवड़ियाँ बांटे 
बेटा बेटी मस्ती काटें 
चाल चले उलटी सीधी 
क्या सखी साजन नहीं करूणानिधि 

२१  

कुछ न देखे कुछ न दिखावे 
खुद न चले पर राज चलावे 
करे राज जाने किस विधि 
क्या सखी साजन नहीं करूणानिधि 


२२  
बिना हाड़ की जीभ हिलाए
सब कर्मन को शुद्ध बताए
आका खुश जनता बेचारी
क्या सखी साजन ना मनीष तिवारी
२३ 

बिना ज़रुरत बड़ की हांके 
काम होय तो बगलें झांके 
वो ना आवे किसी के काम 
क्या सखी साजन नहीं जयराम 
२४ 
आँखों में से धूर्तता झांके 
हरदम इधर उधर की हांके 
कोई ना लागे उसके साथ 
क्या सखी साजन नहीं राजनाथ 

२५ 
तन बुद्धा मन बिल्कुल शुद्धा
पद पूजक, पावक ओ प्रबुद्धा
जब तब मन हो जावे चंचल
क्या सखी साजन ना सखी बंसल

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

पत्थरों के खेल न्यारें





पत्थरों के खेल न्यारें

एक उपर एक चढ़ते
अनगढ़ी दीवार गढ़ते
दो बनाते पार दुनिया
कुछ छुपाते, सब दिखाते
पत्थरों के खेल न्यारें

चमकते हैं, दमकते हैं
हर बदन पर महकते हैं
खून आलूदा कभी हैं
आग में भी दहकते हैं
पत्थरों के खेल न्यारें

कभी दिल के संग मिलते
फूल के साये मे पलते
तोड़ते हैं कभी शीशा
बर्तनों में कभी ढ़लते
पत्थरों के खेल न्यारें


मन्दिरों में, मस्जिदों में
और सभी पूजाघरों में
पत्थरों पर सिर टिका है
चाहे पूजा हो या सिजदा
पत्थरों के खेल न्यारे

हर सड़क पर लगे हैं ये
हर महल में सजे हैं ये
हाथ में इतिहास के ये
हर कदम पर जमे हैं ये
पत्थरों के खेल न्यारे

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

कोई पूछे तो बता देना


कोई पूछे तो बता देना



कोई पूछे तो बता देना

कि मै फिर लौटुंगा........

मैं फिर लौटुंगा


कि जब सूरज

अपनी बेपनाह उदासी को छोड़ कर

....मेरे संग चल देने को 

तैयार होगा.....


कि जब सभी दरख्त

अपनी हवाओं के साथ 

मेरे गीतों को

उड़ा ले चलेंगे.....

कि जब सारी दुनिया की अवाम

सिर उठा कर चलेगी.


जब इस दुनिया के लोग

किसी और दुनिया के सुखों का

ख्वाब देखना

बंद कर देंगे.....

जब हर इक दाने पर 

अस्ल में खाने वालों के

नाम लिखे होंगे

जब इस दुनिया के हर जर्रे पर 

इसी दुनिया के बेनाम

बाशिदंों की मिल्कीयत होगी.....


तब मैं लौटुंगा....

....तब मैं लौटुंगा जरूर.....

क्योंकि मुझे लौटना ही होगा.....

क्योंकि मुझे इस दुनिया से बहुत प्यार है।

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

नई भाषा



चित्र गूगल साभार
अब बोलेंगे हम नई भाषा

नफरत, युद्धों और मार-काट
के शब्द नहीं होंगे जिसमे
बहसें तो होंगी उसमें पर
झगड़े-रगड़े ना हों जिसमें
जो बात करे अपने मन की
जिससे अपनापन लगता हो
अब बोलेंगे हम नई भाषा

जो व्याकरणों के द्वंदजाल में
भावों की ना काट करे
जो दमित भावना भरी खाल में
मानव की ना बांट करे
जो अपनी, अपने जैसी हो
जिससे मन मिल जाएं सबके
अब बोलेंगे हम नई भाषा

जो प्रश्न सुझाए कम, उत्तर हों
जिसके हर इक शब्द छुपे
जो बांधे ना रूढ़ी में, खुलते हों
जिसमें ये बंध सभी
जो प्रेम प्यार की बात करे
जो इंकलाब की बात करे
अब बोलेंगे हम नई भाषा

ना गाली हो, ना नीच शब्द
सम्मान भी हो, अभिमान भी हो
ना बड़ा कोई, ना छोटा हो
तफरीह भी हो, इमकान भी हो
सपनों को जो साकार करे
श्रम से मानव से प्यार करे
अब बोलेंगे हम वो भाषा

रविवार, 31 मार्च 2013

अब आई है बारी अपनी








अब आई है बारी अपनी 


सदियां गुजरीं अँधेरे में 
सिर नीचे करके लोग जिए 
अब सूरज लाल उगा देखो 
अब आई है बारी अपनी 

कभी ईश्वर था, कभी राजा था 
कभी धर्म रहा, कभी पैसा रहा 
इंसान उठा है अब देखो 
अब आई है बारी अपनी 

कभी नीले रंग का खून रहा 
फिर खून सफ़ेद भी हुआ किया 
अब रंग खून का लाल यहाँ 
अब आई है बारी अपनी 

कभी तलवारों ने राज किया 
कभी तख़्त पे बैठा धर्मगुरु 
फिर धनवानों का दौर आया 
अब आई है बारी अपनी 

कभी चाँद रहा था झंडे पर 
कभी सूरज, शेर और सांप रहा 
अब हंसिया हथौड़ा आया है 
अब आई है बारी अपनी 

वो सुबह आ गयी है देखो 
जिसके गाने तुम गाते थे 
जिसकी धुन में तुम मरते थे 
जिसके लिए तुम जीते जाते थे 
वो लाल सुबह, जब दुनिया की 
हर चीज़ पे अपना हक होगा 
वो इंक़लाब का दिन जब 
दुनिया का हर ज़र्रा अपना होगा 
जब अपनी मेहनत के साथी 
हम सब खुद ही मालिक होंगे 
तो उठ जाओ, आगे आओ 
अब आई है बारी अपनी


शुक्रवार, 22 मार्च 2013

इस बार बजट में ये आया है






भूखे पेटों पर टैक्स लगा है 
जनता को फिर से भरमाया है 
इस बार बजट में ये आया है


अमरीका की कंपनियों को 
हद सस्ता मजदूर मिलेगा 
शाम ढले हर कामगार को 
३२ रुपया दाम मिलेगा 
मजदूरों के हित की खातिर 
घास का दाम घटाया है 
इस बार बजट में ये आया है

मंतरियों को उड़न खटोला 
बिचौलियों को मिली दलाली 
जन का बोझा कम करने को 
पी डी एस की झोली खाली 
पैदल की सडकें छोटी हैं 
रेल का दाम बढाया है 
इस बार बजट में ये आया है

चिंतित हो मोबाइल खरीदो 
टॉक टाइम सस्ता है भैया 
खेत गाँव सरकार को दे दो 
छोड़ किसानी खेंचो रिक्शा 
पढना लिखना है बेमानी 
सरकार ने सबको समझाया है 
इस बार बजट में ये आया है


अगले साल है आम चुनाव 
देखें नाव लगे किस ठांव 
अभी बहुत कुछ करना है 
सरकार ज़रा जल्दी में है 
खुदरा में एफ डी आई आया 
"विकास" का परचम फहराया है 
इस बार बजट में ये आया है

जीने की एय्याशी छोड़ो 
क़तर ब्योंत की आदत डालो 
धीरे - धीरे मरना सीखो 
हमसे ना आशाएं पालो 
धनवानों के हिस्से पैसा 
संकट गरीब पर छाया है 
इस बार बजट में ये आया है

गुरुवार, 21 मार्च 2013


यही सवेरा ढूंढ रहा था...


बचपन से अपने यौवन तक 
साल साल, लम्हा दर लम्हा 
सूनी आँखों से तकता मै  
यही सवेरा ढूंढ रहा था।

होंठों पर श्रृंगार समेटे 
सतरंगी उजियार बिखेरे 
नयी उम्मीदें नए ख्वाब सा 
यही सवेरा ढूंढ रहा था।

भव्य स्वागत - भयानक स्वागत

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