ग़ालिब ने कहा था बाज़ीचा ए अतफाल है दुनिया मेरे आगे, और ये जो बच्चों का खेल है, ये बार-बार खेला जाता है। बच्चों का ऐसा ही खेल हर यूनिवर्सिटी में हर साल होता है, पूरे देश में अलग-अलग समय पर, लेकिन हर यूनिवर्सिटी में खेला जाता है। कहीं-कहीं सरकार इस खेल पर रोक भी लगा देती है, क्योंकि सरकार का एक काम ये देखना और सुनिश्चित करना भी है कि कहीं विद्यार्थियों को गलत राजनीतिक संदेश और गलत राजनीतिक टेनिंग ना मिल जाए। जैसे जामिया मिल्लिया में कई सालों से चुनाव ना हुए, क्योंकि यहां सरकार को पूरा यकीन है कि वो राजनीतिक संदेश या टेनिंग नहीं मिल सकती जो सरकार चाहती है कि विद्यार्थियों को जिसे जामिया में तालिब-ए-इल्म कहा जाता है, मिले।
खैर साहब, दिल्ली में एक यूनिवर्सिटी है, क्या ही कहें, बहुत ही खराब यूनिवर्सिटी है। जे एन यू नाम है, पूरा नाम शायद जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी है। बढ़िया मजाक है, उधर महामानव हर रोज़ कोई ना कोई मुद्दा उठाकर जवाहरलाल नेहरु को मार ठोंसे दे रहे हैं, और इधर जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी उनके सपनों में आकर उन्हें डरा जाती है। तो मामला ये हुआ कि इसी मर्दुई यूनिवर्सिटी में एक बार फिर ये लाल सलाम वालों ने चारों सीटों पर कब्जा कर लिया।
ए बी वी पी के जवानों ने खूब हल्ला काटा चुनाव से पहले, वी सी, एडमिनिस्टेशन, सिक्योरिटी यहां तक कि पुलिस और सरकार ने भी ए बी वी पी के इन जवानों को खूब साथ दिया। लेकिन जाने कौन सा खेला चल रहा है यहां कि इत्ते तमाम तामझामों के बावजूद, इत्ती कोशिशों के बावजूद लाल झंडे वाले जीत गए।
ल्ेफ्ट की जेएन यू में जीत का वीडियो
वैसे कोई खास बात नहीं है, ये लोग थोड़ा - मोड़ा इधर-उधर से जीत भी लें, लेकिन असली पॉवर तो हमारे पास ही रहेगी। कुछ ही साल पहले की बात है, बाहर से कुछ लोग यूनिवर्सिटी में घुसे, खूब तोड़-फोड़ की, मारपीट की, गाली-गुफ्तार तो मान लीजिए छोटी-मोटी बात थी, और फिर निकल लिए। गलती ये हुई कि किसी-किसी के चेहरे का नकाब उतर गया, और वो पहचान लिए गए। लेकिन तब भी हमारी पॉवर में जो कुछ था, वो सब करके उन हमलावरों को बचा लिया गया। आज कोई उस घटना का नाम तक नहीं लेता।
तो असली पॉवर तो हमारे पास ही है। लेकिन अब ये बन गया है नाक का मामला, सच बात कहें, एक चाहत है, बड़े दिनों से दिल में दगड़-दगड़ हो रही है ये चाहत। चाहत ये है कि पहले इस युनिवर्सिटी पर कब्जा किया जाए और फिर इस यूनिवर्सिटी का नाम बदल दिया जाए। माने दीन दयाल उपाध्याय यूनिवर्सिटी या मान लीजिए गुरु गोलवलकर यूनिवर्सिटी कर दिया जाए। उपर से यूनिवर्सिटी दिल्ली की प्राइम लोकेशन पर बनी हुई है। इत्ती प्राइम लोकेशन पर ये एजुकेशन और रिसर्च के नाम पर कब्जा किया हुआ है। देखिए मैं एजुकेशन या रिसर्च का दुश्मन नहीं हूं। लेकिन यारों पढ़ाई का सबसे अच्छा तरीका महामानव ने आपको दिखाया ही ह ै।
पढ़ाई की जानी चाहिए ऐसे कि भरे मंच से बड़े गर्व के साथ कह सको कि मैने कोई पढ़ाई नहीं की है। या डिग्री के लिए कॉलेज जाने की जरूरत ही क्या है, जब आपको एंटायर सबजेक्ट की डिग्री ऐसे ही मिल सकती हो। खैर तो मेरा सिर्फ ये कहना है कि लोग-बाग घर बैठ कर पढ़ाई क्यों नहीं करते, ये जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी की ज़रूरत ही क्या है आखिर, जहां लोग-बाग बरसों बैठे रिसर्च करते रह सकते हैं, जबकि डिग्री तो हमारे महामानव के पास भी है।
तो सवाल ये है कि इस प्राइम लोकेशन वाली यूनिवर्सिटी का क्या किया जाना चाहिए। मेरा तो मानना है दोस्तों की जे एन यू को देश के कुछ बड़े सेठ लोगों को, जैसे अडानी या अंबानी को दे दिया जाना चाहिए। ये लोग जैसे एयरपोर्ट का ऑपरेशन देखते हैं, वैसे ही से लोग यूनिवर्सिटी का भी ऑपरेशन देख लेंगे। तो मान लीजिए यहां जो खाली जमीनें हैं, जंगल-फंगल हैं, उन्हें डेवलप किया जा सकता है, वहां कोरपोरेट ऑफिस खोले जा सकते हैं, कुछ होटल, या मॉल टाइप चीजें बनाई जा सकती हैं, जिनसे कुछ पैसा बनाया जा सकता है।
सपने तो बहुत हैं यार हमारे, लेकिन ये लाल झंडे वाले डरावने सपने की तरह बैठे हुए हैं हमारी इच्छाओं पर। जैसे दिल्ली यूनिवर्सिटी पर कब्जा करते ही हमने दिखा दिया कि हमारे बाहुबली नेता अध्यापकों के साथ किस तरह का संस्कारवत् व्यवहार करते हैं।
हम चाहते हैं कि एक किस्म का डर का माहौल रहे, यूनिवर्सिटीज़ में देश भर की, अब जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी में क्या होता है, मैं आपको अंदर की बात बताता हूं। अजी मैने खुद अपनी आंखों से देखा है, ये जो टीचर हैं, ये स्टूडेंट की इज्जत करते हैं, और स्टूडेंट टीचर्स की इज्जत करते हैं, बताइए, ऐसा होगा तो यूनिवर्सिटी की पॉलिटिक्स कैसे चलेगी साहब। ये लेफ्ट ने बहुत सालों से अपनी मनमानी चलाई हुई है जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी में, यहां चुनाव से पहले डिबेट होती है भाई, मैं ने खुद अपनी आंखों से देखा है। देश -विदेश की, हक़-अधिकार की बातें चलती हैं इस यूनिवर्सिटी में, लड़कियां खुलेआम घूमती हैं, देश की संस्कृति का बट्टा लगा रखा है। अरे यार यूनिवर्सिटी है, कोई ढिशुम-ढांय वाली फिल्म दिखाओ, अश्लील गाने गाओ, दारू पार्टी करो, लड़कियों को छेड़ो, लेकिन नहीं, इस यूनिवर्सिटी का मिज़ाज तो भाई साहब अब एक ही चीज़ से ठीक हो सकता है। अब यहां संघ की शाखा लगानी ही पड़ेगी, जहां सुबह-सुबह विद्यार्थियों को डंडा चलाना सिखाया जाएगा, अरे किसी के सर फोड़ने के काम तो आएगा। ये क्या कि किताबें खोलकर बैठे हैं, थीसिस लिखी जा रही है, बहसें हो रही हैं, और केाई किसी को सिर नहीं फोड़ रहा। केरल का उदाहरण लीजिए जहां एक युवा ने संघ में अपने शोषण के चलते आत्महत्या कर ली, लेकिन संस्कार को नहीं छोड़ा, जे एन यू में किसी को छेड़ भी दो तो लोग हल्ला काट देते हैं।
ना भई ना, ऐसा नहीं चलने दिया जा सकता।
दिक्कत ये है कि तमाम तरह के बहाने बनाए जा चुके हैं, इस यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों को बिना किसी कारण जेल भेजा जा चुका है,
इसे बदनाम किया जा चुका है।
पूरा सिस्टम चेंज करने की कोशिश भी की जा चुकी है। लेकिन ये मरदूद जे एन यू प्राण नहीं छोड़ता। अब इस बार तो इसने किया ये कि एक तरफ तो चारों सीटें लेफ्ट जीता, और उसमें भी तीन सीटों पर तो लड़कियां जीती हैं, ना भई, इसे अब और बढ़ने नहीं दिया जा सकता। महामानव को चाहिए कि जल्द से जल्द कोई मुकद्मा या आरोप जे एन यू के खिलाफ खड़ा करें, जैसे यही कह दें कि नेहरु ने जे एन यू से 120 रु. का गबन किया, या उनकी डिग्री जो थी वो फर्जी थी, इसलिए अब जे एन यू को खत्म किया जाएगा। वैसे भी हवा से लेकर पानी तक, और पाकिस्तान से लेकर राष्टगान तक, नेहरु पर हर तरह का आरोप लगाया जा चुका है। तो यही आरोप लगा कर जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी को खत्म करें, या तब तक बंद कर दें, जब तक वहां संघ की रोज छः बार नियमित शाखा ना लगने लगे, छः बार इसलिए कि मुसलमाल पांच बार नमाज़ पढ़ते हैं तो संघ को दिन में कम से कम छ बार शाखा लगानी चाहिए। हमारा काम था बताना सो बता चुके, आगे जैसा महामानव चाहें।
बाकी चचा हमारे, ग़ालिब जे एन यू तो ना देखा उन्होने, लेकिन सुना है एक दफा जाकिर हुसैन कॉलेज की तरफ गए थे जब उसे दिल्ली कॉलेज कहा जाता था। खैर पढ़ाया नहीं उन्होने वहां पर, पर जे एन यू के बारे में बिनदेखे ही उन्होने शेर कह मारा....सुनिए
जे एन यू का जो जिक्र किया तूने हमनशीं
इक तीर मेरे सीने में मारा के हाय हाय
जे एन यू नहीं जाउंगा तब तक मैं मितरों
जब तक रोज़ उसमें शाखा ना लग जाए
संस्कार की खान, नैतिकता की दुकान, हिंदुत्व की आन-बान-शान आर एस एस की शाखा जे एन यू में लगा दो, ताकि आने वाले समयों मे ंजे एन यू में ए बी वी पी की जीत सुनिश्चित की जा सके। बाकी जब शाखाएं लगनी शुरु हो जाएंगी, तब तक के लिए नमस्ते।
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