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सोमवार, 6 दिसंबर 2021

बक्सा



कहीं देखा है आपने? सुना है? रेषम के कामदार कपड़े से मढ़ा हुआ, सोने की तारों के काम वाला बक्सा। पुरानी जमींदारियों में शायद होता हो, राजा-महाराजाओं के जमाने में तो ज़रूर ही होता होगा। क्योंकि जब राजा और रानियां अपने जेवर और जवाहरात रखते होंगे तो उन्हे कहां रखते होंगे। जवाहरात संभालने के लिए बक्से को विषेष तो होना होगा ना। वैसे बक्से दिखते ही उनमें रखे माल की कीमत कल्पना में आ जाती है। ऐसे बक्से खाली भी हों तो उनकी कीमत बहुत होती होगी। क्यों? पर क्या ऐसे बक्सों की कीमत, फिर चाहे उनमें माल हो या ना हो, सबके लिए एक सी होती होगी ? इस लिहाज से सोचा जाए तो बताइए भला, राजाओं के लिए, रानियों के लिए, जवाहरात की कीमत होगी या उसके बक्से की? मुझे लगता है कि वो जवाहरात निकाल कर बक्से को फेंक दिया करते होंगे। मैं ने कई बार इसे अपनी कल्पना में देखा। रानी ने जवाहरात निकाले और बक्सा फेंक दिया, और उसके आगे देखा कि एक बहुत ही ग़रीब बच्चे ने वो बक्सा उठा लिया। वो ग़रीब बच्चा उस बक्से को अपने घर ले आया। उसकी मां ने उस कीमती, रेषम के कामदार कपड़े से मढ़े बक्से को बच्चे से ले लिया और उसे संभाल कर रख लिया। किसी के लिए वो बक्सा बेकाम था, किसी के लिए वो बक्सा ही बेषकीमती हो गया। 

आपके लिए क्या बेषकीमती या सिर्फ कीमती है, ये इस पर निर्भर करता है कि आपको क्या हासिल है। मुझे याद पड़ता है वो बक्सा जो जालीदार था। मेरी दादी उस पर ताला लगा कर रखती थी। और उस बक्से में रहता था, मक्खन, घी, गुड़, गोंद के लड्डू और शक्कर। ये सफेद वाली चीनी नहीं, जिसे आप शक्कर कहते हैं, वो गुड़ वाली शक्कर जो गर्मी में पिघल कर पानी हो जाती है। और आप यकीन मानिए मेरे लिए वो किसी भी जवाहरात से ज्यादा कीमती थी। मैं उसे चुराता था। यूं मैं घी, गुड़, लड्डू सबकुछ चुरा कर खा जाता था। लेकिन शक्कर मुझे विषेष प्रिय थी। मेरी दादी उस शक्कर को बचाती थी, छुपाती थी। और मैं उसे चुराता था, खाता था। दादी और पोते का यही खेल चलता था। 

चारों तरफ जाली वाला वो बक्सा दादी के कमरे में पीछे की तरफ रहता था, हो सकता है दादी उसमें पैसे भी रखती हो। मैं ने कभी ध्यान नहीं दिया। दादी को जब भी पैसे की जरूरत होती थी, वो एक छोटा सा बटुआ अपने घाघरे के कमरबंद से निकालती थी, कभी - कभी मैने दादी को तकिये के नीचे से भी पैसे निकालते देखा था, और कभी - कभी पैसा टांड पर भी होता था। हो सकता है कि वो लोहे  के जालीदार बक्से में भी पैसा रखती हो, पर मुझे कभी ख्याल ही नहीं आया कि वहां पैसा हो सकता है। लेकिन इस बात का मुझे पूरा यकीन था कि शक्कर सिर्फ और सिर्फ वहीं होती थी। लकड़ी का वो बक्सा जिसमें बीच में एक तल्ला लगा था, नीचे की तरफ कुछ सामान होता था और उपर की तरफ कुछ सामान होता था। मेरे मतलब का सामान उपर की तरफ होता था। मैं चुपके से चाबी उठाता था, बिना आवाज किए ताला खोलता था और चुपके से मुठ्ठी भर शक्कर निकालता था। अब मेरे एक हाथ की मुठ्ठी में शक्कर होती थी और ताला खुला होता था। मैं कच्चा चोर था। शक्कर मिल गई, काम खत्म। मैं बिना ताला बंद किए शक्कर लेकर भाग जाता था, और अपने हाथ से चाट-चाट कर शक्कर खाता रहता था। बक्से की कीमत मेरी निगाह में वही थी कि उसमें शक्कर थी। 

मेरे बचपन का वो हमसफर बहुत देर तक मेरे साथ रहा। मेरी निगाह कभी इस तरफ नहीं गई कि वो बक्सा बहुत पुराना था। उस बक्से की लकड़ी की रंगत मेरी नज़र में कभी नहीं आई। मैने कभी नहीं सोचा कि उस बक्से की लंबाई - चैड़ाई क्या है, उसकी जाली गंदी है या साफ है। जब दादी ने पिता के घर से दूर फाॅर्म हाउस पर डेरा डाला तो मुझसे पूछा गया कि क्या मैं दादी के साथ रहना चाहूंगा। मैं ने फौरन हां कर दिया। पर सच तो ये है कि मैं दादी के पीछे, दादी के साथ नहीं गया था। मैं तो उस बक्से के पीछे गया था। जालीदार बक्से के पीछे, जिसमें शक्कर होती थी। मेरे लिए वो बक्सा बहुत कीमती था। बहुत कीमती। 


कुछ सालों बाद, जब मैं ने पढ़ाई पूरी कर ली, नौकरी करने लगा। अपना घर बना लिया। अकेले रहने लगा था। दादी कब की फौत हो चुकी थी। सभी को ये लगता था कि मैं दादी को बहुत प्यार करता था। उसके पीछे ये मामला भी था कि सब को लगता था कि मैं सबसे ज्यादा दादी के साथ रहा था इसलिए जाहिर है कि मैं सबसे उस से सबसे ज्यादा प्यार करता था। शायद इसीलिए एक दिन मुझे बुलाया गया और कहा गया कि ये देख ये बक्सा जो है, दादी का, ये तो बहुत दिनों से इस्तेमाल नहीं हो रहा है, तो सोच रहे हैं कि तुम इसे ले लो, रख लो, संभाल लो, और फिर धीरे से कहा, ” अगर चाहते हो तो?” अब कहानी को भावनात्मक बनाने के लिए मैं बहुत कुछ कह सकता हूं। कि कैसे मैने उस बक्से को बाहों में भर कर चूम लिया। कैसे मेरी आंखों के आगे बचपन की वो सारी यादें फिर से जिंदा हो गई जो उस बक्से और दादी के साथ जुड़ी थी। कि कैसे मैने दौड़ कर उसे उठा लिया और अपने कमरे में जाकर सजा दिया। लेकिन दरअसल हुआ यूं कि मैने उस मैले, गंदे, चीकट बक्से को देखा। वो बक्सा जिसके पीछे किसी जमाने में मैं ने घर छोड़ दिया था। वो बक्सा जिसके साथ मेरी बचपन की यादें जुड़ी थीं। वो बक्सा जिसने मुझे शक्कर दी थी। फिर बिना कुछ सोचे जवाब दिया, ”मुझे नहीं चाहिए, जो मर्जी कीजिए इसका। ” और पलट कर वापिस अपने घर चला गया। 


बुधवार, 1 दिसंबर 2021

दिन का भूत - रात का भूत

 




बात उन दिनों की है जब मैं दुनियावी मामलों को समझने लगा था। सुबह जल्दी उठने की आदत वहीं से लगी है। मैं बहुत सुबह, यानी सूरज निकलने से भी पहले उठता था। बहुत सारे काम करने के बाद, जिनका जिक्र मैं यहां नहीं करना चाहता, नहाता - धोता था और फिर ध्यान के लिए बैठता था। उन दिनों बहुत सारे धर्म-ग्रन्थों को पढ़ डाला था। मत्स्य पुराण, षिव पुराण, ब्रम्ह पुराण, रामायण, गीता और भी ना जाने क्या - क्या। उन्ही दिनों कुंडलिनी जागरण का चस्का लगा। त्राटक करता था और ध्यान में ऐसी गहरी आस्था थी मेरी कि लगता था जैसे बस देहरी पर पहुंच गया हूं, बस एक कदम बाकी है। खै़र कहानी ये नहीं है। ये तो कहानी की पृष्ठभूमि है, क्योंकि इसे जाने बिना आपको समझ नहीं आएगा कि मैं इतना घनघोर आस्तिक अचानक नास्तिक क्यूं बन गया। 
तो हुआ कुछ यूं कि यही दिन थे जब मैं रात को देर से घर आया करता था। मेरे घर के रास्ते में, यानी घर तक पहुंचने वाली गली सुनसान थी, मेन रोड के पास ही थी, लेकिन कुछ इस तरह थी कि मेन रोड़ छोड़ने के बाद ही सुनसान, घुप्प अंधेरी सड़क पर पांव पड़ते थे। अब इस गली के मैने कई किस्से कई लोगों से सुन रखे थे। कुछ को म्यूनिसिपैलिटी के नलके पर भूत बैठा दिखा था, किसी को गली में आते या जाते हुए भूत दिखा था, और कुछ को तो उनकी बैठक में भूत का अहसास हुआ था। जी नहीं, जिन लोगों को भूत दिखे थे, उन्हें मैं नहीं जानता, कभी मिला भी नहीं। बस उनके किस्से लोगों की जुबानी सुने थे। जिन्हे भूत का अहसास हुआ था उन्हें मैं जानता था। अब मामला ये था कि जिन्हे मैं जानता नहीं था, उन्होने भूत देखा था, और जिन्हे मैं जानता था, उन्होनेे भूत नहीं देखा था। 
अब यहां आपसे एक सवाल है, जिसका जवाब मुझे नहीं चाहिए। आप खुद ही खुद से सवाल कीजिए और उसका जवाब खुद को दे लीजिए। अगर खुदा नहीं होता, ”यानी ईष्वर नहीं होता” - तो क्या भूत का असतित्व संभव होता? भई जिस तरह की पारलौकिक, या अलौकिक शक्ति भूत की बताते हैं, वो बिना ईष्वरीय शक्ति के तो संभव नहीं लगती। या इसे इस तरह मान लें कि भूत में यकीन आप तभी कर सकते हैं जब आपका ईष्वर में यकीन हो। यदि ईष्वर में यकीन नहीं होगा तो भूत में भी यकीन नहीं होगा। ये तर्क की बात है और इसमें आस्था की कोई जगह या जरूरत नहीं है। माफ कीजिएगा, ये मेरा खुद से सवाल का जवाब है। अब क्योंकि कहानी मेरी है तो मैने अपना जवाब आपको दे दिया है। आपका अगर कोई जवाब है तो उसे अपने पास रखिए। 
ये सवाल - जवाब तो खैर जाने दीजिए। बात भूत की हो रही थी - और मामला उन दिनों का था जब मैं घनघोर आस्तिक था, खूब वेद-पुराण तक पढ़ता था, श्लोक - मंत्र रटे हुए थे, संस्कृत में पारंगत था, हनुमान चालिसा कंठस्थ थी, दुर्गा और शक्ति के श्लोक याद थे और उन्हीं के सहारे खुद को अलौकिक मानव बनाने के चक्कर में था। मेरा यकीन मानिए मैने हठयोग तक किया। यानी सर्दियों में बिना कुछ पहने रात को पानी में खड़े रह कर - षिव स्त्रोत का पाठ और गर्मियों में तपते सूरज के नीचे चारों तरफ आग जला कर घ्यान का अभ्यास। मैं पूर्ण ब्रहम्चारी था, हस्तमैथुन नहीं करता था, वीर्य को तेज का कारण मानता था, और इसे धर्म के प्रति अपने त्याग और तपस्या का एक महान अध्याय मानता था। अब ऐसे महान तपस्वी का भला भूत क्या बिगाड़ेगा।
तो दोस्तों, सर्दियों का समय था और मैं अपने दोस्तों पर, अपने तप और ज्ञान का रौब झाड़ कर, ”वो मुझे महापंडित कहते थे, कुछ गुरुजी या ऋषि भी कहते थे” वापस घर जा रहा था। रास्ता वही, जो मैने पहले बताया, सुनसान, घटाटोप अंधेरा। करीबन एक किलोमीटर का रास्ता। एक तरफ दीवार, दूसरी तरफ झाड़ और पेड़, थोड़ आगे जाने पर गली के दो हिस्से हो जाते हैं, एक दांयी तरफ दूसरा सीधा। वहीं पर लगा है म्यूनिसिपैलिटी का नल। वो नल जिससे सारे मुहल्ले वाले पानी भरते हैं। मैं ने देखा कि कोई उस नल की थेगली पर बैठा है - या बैठी है। मेरा मन थोड़ा लरजा। ध्यान से देखा तो लगा कि वो बैठी है, उसका बदन हिल रहा है। मेरा कदम लड़खड़ाया और चाल धीमी हो गई, या रुक गई। मैं आगे नहीं जाना चाहता था, लेकिन घर जाने का यही एक रास्ता था। मैंने आंखे सिकोड़ कर ध्यान से देखा, देखना चाहा। सफेद साड़ी थी, बदन हिल रहा था। मैने और ध्यान से देखा। बदन हिल रहा था, जैसे वो रो रही हो। लेकिन कोई आवाज़ नहीं थी। नैनी को भी ऐसी ही बुढ़िया रोती मिली थी। मेरा दिल एक बार फिर लरज़ा और फिर भीगे हुए कुत्ते की तरह कूं-कूं करने लगा। मुझे सारे श्लोक भूल गए, दुर्गा शप्तसती भूल गई, हनुमान चालिसा....हां, भूत पिसाच निकट नहीं आवै - महावीर जब नाम सुनावै.....बस यही याद रहा। इसके आगे नहीं, इसके पीछे नहीं। बस भूत - पिसाच निकट नहीं आवै - महावीर जब नाम सुनावै...। बस यही, बार -बार यही। और ये भी स्वर में नहीं, मन में। मन में यही बार - बार दुहराते हुए मैं आगे बढ़ा। बढ़ता रहा, शायद इस उम्मीद में कि जब तक मैं उसके पास पहुंचूंगा वो गायब हो जाएगी, कोई और भी आ जाएगा। भूत के सामने भगवान भले भाग जाए, इंसान का बड़ा सहारा होता है। क्योंकि अब तक भूतों की जो भी कहानी सुनी थी, उसमें भूत हमेषा अकेले इंसान को ही पकड़ते हैं, भूतों को एक से ज्यादा इंसान होने से डर लगता है। 
कोई नहीं आया, ना कोई गया। भूत - पिसाच निकट नहीं आवै - महावीर जब नाम सुनावै के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा था। सर्दी की उस रात मेरी बगल में पसीना आ गया, जो मुझे महसूस हो रहा था। मैं धीरे-धीरे वहां पहुंच रहा था जहां वो बुढ़िया भूतनी बैठी थी, नल की थड़ी पर, रो रही थी। मेरे बदन का रोयां-रोयां पुकार रहा था कि आगे नहीं जाना, पीछे जाओ, लेकिन कोई अद्भुत शक्ति मुझे उसकी तरफ खींच रही थी, ”मतलब घर की तरफ” पीछे जाने का कोई तर्क नहीं था। घर तो जाना ही था, डर ने पैर जड़ कर दिए थे, या यही डर था जो मुझे आगे खींच रहा था। हे भगवान, अब क्या होगा। क्या होगा - हे भगवान। मेरी सांसे भी फंस कर आ रही थी, बहुत धीमे - बहुत धीमे। मैं दांयी तरफ हो गया, बिल्कुल झाडों के करीब, ताकि उससे दूर - दूर रहते हुए अपने घर की तरफ मुड़ जाउं। मैं उसके बिल्कुल करीब पहुंच चुका था। मेरे करीब पहुंचते ही वो उठी, मेरे दिल ने जवाब दे दिया। पैर पानी हो गए, और मैं बैठ गया। 

थोड़ी देर बार होष आया तो वो गायब हो चुकी थी। मैं ज़मीन पर पड़ा था। मैने खुद को संभाला। खड़ा हुआ और कांपते पैरों से घर की तरफ बढ़ चला। मेरा दिल धाड़ - धाड़ करके बज रहा था। मैने एक भूतनी देखी थी, भूतनी - जो गायब हो गई थी। भूत या भूतनियां अक्सर गायब हो जाते हैं। मिल कर गायब हो जाना ही उनका मुख्य काम है। या हो सकता है कि वो - महावीर का नाम सुन के गायब हो गई हो। 

दूसरे दिन मुझसे ध्यान नहीं लग सका। जैसे ही आंख बंद करता था, मुझे वो नल की थेगली पर बैठी दिखाई देती थी, उसका बदन हिल रहा था। लेकिन फिर मेरा अनुभव मेरे दिमाग के हिसाब से आगे बढ़ने लगा, मेरी बंद आंखों से वो दिखने लगा जो मेरी खुली आंखों ने नहीं देखा था। वो उठी थी, उसकी लाल अंगारों जैसी आंखें थीं, जिनसे खुन के आंसूू टपक रहे थे। वो सच में रो रही थी। फिर मुझे देख कर वो मुस्कुराई और गायब हो गई। भूत या भूतनियां अक्सर गायब हो जाते हैं। मिल कर गायब हो जाना ही उनका मुख्य काम है।

मंगलवार, 20 जून 2017

किसी जमाने की बात



किसी जमाने की बात बताता हूं। जब भी कोई पुरानी बात करनी हो तो ”किसी जमाने की बात है” कह कर बात शुरु करने से लोगों पर यथोचित प्रभाव पड़ता है। क्योंकि जिस जमाने की बात कही जा रही है, वो ये जमाना नहीं है, ऐसा लोग मान लेते हैं। यूं जब बात मानने मनाने की हो रही हो तो कुछ भी माना जा सकता है। खैर मैं आपको किसी जमाने की बात बता रहा था। तो बात उस जमाने की है जब एक रुपये में पूरा परिवार पूरे महीने खाना खा सकता था, आम आदमी पैट्रोल के बारे में जानता ही नहीं था इसलिए उसके सस्ते या महंगे होने से उसे कोई खास फर्क नहीं पड़ता था। संतरा संतरे के ही सीज़न में मिलता था और आम सिर्फ गर्मियों में पाया जाता था, बोतल वाले रस का आम का रस कहने की कोई हिम्मत भी नहीं कर सकता था। वो जमाना ही कुछ और था, जमना बहती थी, मतलब दिखता था कि बह रही है, उसके पास जाने पर बदबू नहीं आती थी, और जाहिर है इसलिए उसकी सफाई का कोई अभियान या सरकारी कार्यक्रम भी नहीं चलता था, तो उसकी वजह से नेताओं की कमाई भी नहीं होती थी। गंगा काफी साफ थी, हालांकि उसमें पाप धोने तब भी दुनिया भर के लोग जाते थे, लेकिन उसे साफ करने की कसम खाकर कोई साध्वी मरने का प्रण नहीं करती थी। ज़रूरत ही नहीं थी। 
तो जमाना यूं था और जमाने में रहने वाले यूं थे कि सुबह-सुबह उठ जाते थे और पजामा पहने-पहने ही दातून करते हुए टहलने चले जाते थे। ग़ुरबत तब भी थी ही, लेकिन भूख से लोग या तो नहीं मरते थे या फिर बहुत कम लोग मरते थे, यानी लोगों को पेट भर खाने को मिल जाता था। उस वक्त मरने की वजहें दूसरी हुआ करती थीं, हैजा, चेचक या प्लेग, ऐसी बिमारियां थीं जिनसे लोग मर जाया करते थे। हालांकि मरने के लिए इससे छोटी बिमारियां भी काम में लाई जाती थीं, लेकिन उनसे मरने वाले लोगों की तादाद कम होती थी, और लोगों के मरने की इस कमी में डॉक्टर या दवाइयों का कोई हाथ नहीं होता था, लोग अक्सर इसलिए जिंदा रह जाते थे कि चलो इस बिमारी से इतने मर लिए अब हम अगली बिमारी में मरेंगे, इसमें नहीं। सरकार इन बिमारियों के लिए कुछ करती नहीं थी, एक तो इसलिए कि वो कुछ कर ही नहीं सकती थी, जब तक बिमारी के लिए कुछ करने के हुक्म को विदेश से मंगाया जाता था, तब तक जिनको मरना होता था, वो मर चुके होते थे और जिनको अगली बिमारी का इंतजार करना होता था वो जिंदा होते थे। बिमारी अपना हिसाब-किताब करके खत्म हो चुकी होती थी। 
उसी जमाने में जब चमनलाल ने पहली बार लीलावती को देखा तो उसकी सांस जैसे रुक सी गई। परेशन मत होइए सिर्फ मुहावरा है, सांस रुक सी गई मतलब एक लम्हे के लिए सकते में आ गया बेचारा। सकते की हालत में यूं नहीं कि लीलावती बहुत खूबसूरत थी, बल्कि इसलिए कि उसने इससे पहले कभी किसी लड़की का उघाड़ा कंधा नहीं देखा था, किसी का तो क्या अपनी बीवी का भी नहीं देखा था, जिसके साथ उसकी जोड़ी सीधे भगवान के घर से बन कर आई थी। गौना नहीं हुआ था, कंधा छोड़िए, ठीक से नाक तक नहीं देख पाया था चमनलाल अपनी बहू की। तो जब चमनलाल ने लीलावती का उघाड़ा कंधा देखा तो, जैसा कि मैने बताया, ”उसकी सांस जैसे रुक सी गई”। किसी मनोवैज्ञानिक से पूछिएगा कि ऐसा क्यों हुआ तो वो आपको इसके दर्जनों सही और गलत कारण बता देगा, लेकिन मैं सही बात बताउं तो बात यूं थी कि चमनलाल ने जबसे कोकशास्त्र की एक पैसे वाली किताब पढ़ी थी तभी से वो सम्भोग कैसे करें, पर अंग्रेजी कैसे पढ़ें से ज्यादा ध्यान देने लगे थे। लीलावती के उघाड़े कंधे से उनके कोकशास्त्रीय ज्ञान की सरिता में कलकल थोड़ा ज्यादा जोर से होने लगी थी। आज की ज़बान में बंदा फ्रस्ट्रेटिड था। 
चमनलाल के बाप, उस जमाने में बाप को बाप ही कहा जाता था, ये पापा और डैडी बहुत बाद में शुरु हुआ, वैसे कुछ लोग बाप को बाबूजी जैसे घटिया और बहुउपयोगी सम्बोधन से भी बुलाते थे, लेकिन वैसे लोगों की तादाद कम थी। तो चमनलाल के बाप रौशनलाल सरकारी डाकिया थे और ज्यादा अनुपात में सिफारिश और कम अनुपात में भाग्य की वजह से उसी शहर में पोस्ट ऑफिस में थे, जिसमें रहते थे। वरना डाकियों को तो जंगलों, दूर-दराज के गांवों में डाल दिया जाता था। डाकिया होने की वजह से उन्हे पूरे शहर में चिठ्ठियां पहुंचानी होती थी, और चिठ्ठियां पहुंचाने के लिए उन्हे बड़े साहबों के बंगलों पर भी जाना होता था, जहां कुत्ते और चौकीदार उन्हे दरवाज़े से अंदर तक नहीं घुसने देते थे। उनकी बहुत इच्छा होती थी कि वो उन बंगलों के अंदर तक जाएं, लेकिन ऐसा करने का कोई रास्ता नहीं था। फिर कुछ सालों के बाद, शायद बारह या पंद्रह सालों के बाद उन्होने खुद बंगलों के अंदर जाने की इच्छा छोड़ दी। अब उनकी इच्छा या सपना कह लीजिए, अक्सर बाप लोग अपनी इच्छाओं को अपना सपना कहकर बेटों के गले में डालते हैं। तो चमनलाल के बाप रौशनलाल का सपना ये था कि उनका बेटा यानी चमनलाल, जो कि इकलौता था, बाकी उसके सात भाई और दो बहने हैजा, माता, और अन्य बिमारियों की भेंट चढ़ चुके थे, बड़ी पढ़ाई करे और इसके बाद सरकारी अफसर बने, फिर घूस खाए और फिर इतना बड़ा बंगला बनाए, और फिर वो उसमें बैठें, और फिर कोई डाकिया आए और उनका कुत्ता या चौकीदार उसे अंदर घुसने से रोके। इस पूरे स्वपन प्रकरण में वो सिर्फ एक ही चीज़ पर थोड़ा बहुत असमंजस में थे, कि रोकने वाला चौकीदार हो या कुत्ता। कुत्ता उन्होने आज तक पाला नहीं था, उनका पाला सिर्फ गलियों के आवारा कुत्तों से हुआ था, जो बंगलों पर ही नहीं, बाकी गलियों में भी उनकी जान के दुश्मन थे। लेकिन चौकीदारों से उनका पाला सिर्फ इन बंगलों पर ही पड़ता था, अब वो कुत्तों की फौज खड़ी करके सारे शहर में तो दौड़ा नहीं सकते थे, इसलिए वो जब अपने बेटे चमनलाल के बंगले में होने का सपना लेते थे तो उसमें चौकीदार ही देखते थे, कुत्ता यदा-कदा ही उस सपने में दाखिल होता था। इसीलिए चमनलाल के उपर ये बोझ था कि वो पढ़ाई पूरी करे, जिसके लिए वो दिन-रात लगा रहता था, इसीलिए उसकी शादी होने के बावजूद, उसका गौना नहीं किया गया था, जबकि उसकी उमर के लड़के दो-तीन बच्चों के बाप तक बन चुके थे। खुद चमनलाल के ससुर दो-तीन बार दबाव बना चुके थे, दहेज बढ़ाने का लालच तक दे चुके थे। लेकिन रौशनलाल नही माने। 
और फिर यूं हुआ कि चमनलाल ने लीलावती का उघाड़ा कंधा देख लिया। अब ये बात उस जमाने के भी एक हिस्से की बात है, जिसमें चमनलाल कॉलेज के दूसरे साल की पढ़ाई कर रहा था। अब ये भी भाग्य की बात थी, या पिंडी वाले पीर बाबा की भस्म का चमत्कार था कि चमनलाल पढ़ाई में अच्छा था, जहां ज्यादातर लड़के कॉलेज के हर साल में दो या तीन साल लगाकर पास होते थे, वहीं चमनलाल ने एक साल में एक ही साल की पढ़ाई की और अब पास होने वाला था। ”पिंडी वाले पीर बाबा की भस्म रौशनलाल की मां ने चमनलाल की मां को तब चटाई थी जब चमनलाल पेट में था।” 
अब यहां ये बताना भी लाजिमी है कि आखिर ये नौबत क्योंकर आ गई कि चमनलाल को लीलावती का उघाड़ा कंधा दिखाई दिया, तो जनाब ये जानने के लिए हमें उस जमाने की, उस सुबह के पांच बजे से किस्सा शुरु करना पड़ेगा, जबकि लोग पजामा पहन कर दातून करते हुए टहलने जाते थे। चमनलाल जो पढ़ाई में तेज़ थे, अच्छे बच्चों की अच्छी आदतें भी अपने पास रखते थे, जैसे सुबह उठना, टहलने जाना, चाय ना पीना, बीड़ी ना पीना, आदि आदि। तो सुबह पांच बजे आदत के अनुसार चमनलाल उठे, और बाहर निकल कर लोटे में रखे पानी से कुल्ला किया, इसके बाद दरवाजे के नीम से दातुन तोड़ने के लिए छत पर चले गए। उन्हे आंगन का छोटा नीम पसंद नहीं था, उसमें कड़वाहट थोड़ी कम थी जो कि चमनलाल जी की निगाह में नीम की कमी थी। उनके हिसाब से जिस नीम में कड़वाहट कम होगी उस नीम में तो औषधीय गुण भी कम होंगे, तो ऐसे नीम से दातुन करने का क्या फायदा। इसी कायदे से वो उन मास्टरों को बेकार मानते थे जो अपने शार्गिदों को मारते नहीं थे, जो ना मारे वो मास्टर आखिर क्या पढ़ाएगा। ऐसा उनका मानना था। बस इसीलिए वो दरवाजे वाले बड़े नीम की दातुन करते थे, जिसके लिए छत पर जाना जरूरी होता था क्योंकि उसकी पतली टहनियां थोड़ी उपर की तरफ थीं, और पेड़ पर चढ़ने वाली बदमाशी चमनलाल ने कभी की नहीं थी। 
दूसरी तरफ लीलावती जो लाला भागमल की बेटी थी, या यूं कहें कि जो लाला भगमल की चौथी बेटी थी, उस दिन सोने के लिए छत पर आई थी, क्योंकि घर पर दरसपुर वाले फूफा जी के घरवाले आए हुए थे। जब रिश्तेदार घर पर आएं हों तो घर के कमरों को उनके इस्तेमाल में दे दिया जाता है, ये बात हम सभी को मालूम है, अब शायद ऐसा नहीं होता। अब यूं होता है कि रिश्तेदार या तो आता नहीं, या उसे समय से चलता कर दिया जाता है, ताकि आपको तकलीफ ना हो। पर ये बात उस जमाने की है जब रिश्तेदारों की तीमारदारी के लिए तकलीफ लेना लोग अच्छाई मानते थे। दरसपुर वाले फूफा जी से भागमल जी की बनती थी, और फूफाजी के बारे में ये मशहूर था कि वो बड़े अच्छे-अच्छे रिश्ते लगाते थे, इसलिए चार बेटियों के बाप भागमल जी को फूफा जी के लिए पूरा घर ही दे देना बहुत मामूली सी बात थी। इस वजह से लीलावती उस दिन छत के उपर सो रही, सोने को उसके साथ उसकी तीनो बहने, मां, दादी और घर की नौकरानी रंगीली भी उसके साथ ही सोई थी, लेकिन मामला क्योंकि लीलावती का है, इसलिए यहां सिर्फ उसका जिक्र किया जाएगा। तो लीलावती उपर छत पर सो रही थी। 
रात रसोई निपटाते हुए बहुत देर हो गई थी। अपनी बहनों में सबसे बड़ी होने की वजह से रसोई की आधी-पौनी जिम्मेदारी लीलावती की होती थी, उसकी बहने स्कूलनुमा इमारत में जाती थीं, इसलिए वो रसोई का सारा काम नहीं करती थी, जबकि रंगीली का काम यही था कि वो लीलावती को रसोई का पूरा काम सिखा दे। घर में रिश्तेदार आए हों तो रसोई का काम बढ़ ही जाता है, लीलावती ने सबके खाने के बाद, रसोई का काम निपटाने के बाद, सफाई करने के बाद, साथ में खाना खाया, ये भी उसकी विवाहोपरांत ट्रेनिंग का हिस्सा था, पत्नि को पूरे परिवार के बाद खाना खाना चाहिए। खाना खाने के बाद जब वो और रंगीली अपना बिस्तर लेकर उपर पहुंचे तो उसकी दादी, मां, बहने सो चुकी थीं, उसे भीत के पास जगह मिली जहां उसने अपना गद्दा बिछाया और उस पर पड़ गई। ये बात उस जमाने की है जब लड़कियों को बचपन से ही बता दिया जाता था कि एक उमर में आकर उनका ब्याह हो जाना है, और वहीं रहना है जिस घर जाना है। ये स्त्रीवाद उस समय तक मध्यवर्ग में कम से कम नहीं आया था, और इसलिए लड़कियां हर चीज़ को अपना भाग्य समझ कर खुशी से मान लेती थीं। लीलावती गद्दे पर पड़ते ही सो गई। तीन साढ़े तीन बजे के करीब उसे ठंड लगी तो उसकी नींद खुल गई। उसे लगा कि उसे चादर ले आनी चाहिए थी। दिन गर्मियों और सर्दियों के बीच के थे और शाम तक मौसम खुशगवार रहता था, इससे पहले वो नीचे कमरे में सोती थीं, इसलिए पता नहीं चलता था, उपर सोने में लगा कि ठंड है। थोड़ी देर तो वो दंात दबाए लेटी रहीं, लेकिन ठंड का मामला यूं होता कि एक बार लगना शुरु हो तो फिर वो बढ़ती जाती है, कम नहीं होती। वो बिस्तर पर बैठ गई, नीचे जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी, चारों तरफ अंधेरा था, और छिपकली की आवाज़ भी आ रही थी। गली के नीम की पत्तियां हवा से हिल रही थीं और शायद इसी वजह से उसे ठंड भी लग रही थी। कुछ देर तक ऐसे ही बैठे रहने के बाद वो उठ खड़ी हुई और भीत के पास चकर लगाने लगी, दो तीन चक्कर उसने झिझकते हुए काटे, फिर शरीर में थोड़ा गर्मी आई, और हिम्मत भी बढ़ी तो उसने और चक्कर लगाए। पूरब में सूरज निकलते हुए आसमान थोड़ा गंदला हो गया था। शहर की छतों से लाली नहीं दिखती, आमसान गंदला ही दिखता है। लीलावती की मां, दादी, बहने और रंगीली अभी सो ही रही थी, और लीलावती क्योंकि उठ चुकी थी, इसलिए उसे लगा कि उसे अब नीचे चले जाना चाहिए। वो अपना गद्दा उठाने के लिए झुकी तो उसकी कुर्ती पीछे को खिंच रही थी, एक तो वो पूरी रात सोई नहीं थी, दूसरे झुकने पर उसकी लूगड़ी जो उसने सिर पर रखी थी नीचे खिसक गई थी और अब ये कुर्ती पीछे खिंच रही थी। इस सबसे वो बहुत बुरी तरह झुंझलाई और उसने एक हाथ से कुर्ती का सिरा पकड़ कर झटके से नीचे खींचा। कुर्ती को शायद इतना तेज़ी से खींचे जाने की आदत नहीं थी, इसलिए उसके उपरले दो बटन टूट गए, और लीलावती का कंधा उघाड़ा हो गया। 
अब इधर का हाल सुन लीजिए। चमनलाल के बारे में ये आप जान ही चुके हैं कि वो अच्छी आदतों के मालिक थे, और सुबह उठ कर पजामा पहने-पहने दातुन करते हुए टहलने चले जाते थे, और इसलिए अपनी दातुन तोड़ने के लिए छत पर चढ़े थे। नीम की अच्छी सी दातुन तोड़ने के लालच में वो छत की भीत पर चढ़ लिए थे, और नीम की मोटी डाल की छोटी टहनियों के साथ छीना-झपटी कर रहे थे, अलग-अलग कोणों पर पैर जमाते हुए अपनी तरफ से थोड़ा खींच-तान करके सही सी दातुन देख रहे थे, कि उन्हे लीलावती की छत का नज़ारा दिखाई दिया। ना ना, उघाड़ा कंधा उन्होने बाद में देखा, पहले तो उन्हे यही दिखाई दिया कि लीलावती का पूरा जनाना परिवार, छत पर सो रहा है, और खुद लीलावती नहीं सो रही थी। उनकी छत और भागमल जी की छत के बीच एक गली थी, इसलिए ये तो मुमकिन नहीं था कि वो हर चीज़ सही से देख पाएं, तो भी इतना अंदाजा तो कोई भी लगा लेता है कि लीलावती भी वहीं कहीं लेटी थी, जो अब छत पर टहल रही थी। लीलावती, और चाहे जो कुछ भी हो, पर जवान थी, और जवानी में सब सुंदर होते हैं। खुद चमनलाल इसकी जीती-जागती मिसाल थे, अच्छा अगर इस मसल से काम ना चले तो अपने घरों के पुराने फोटो देखने शुरु कर दीजिए, हर कोई अपनी जवानी की फोटो में फिल्म का हीरो या हिरोइन लगता/लगती है। तो लीलावती की जवानी और हालिया हासिल कोकशास्त्रीय मजे के चलते एक बार भगामल जी की छत की तरफ भटकी निगाह, को चमनलाल ने फिर से व्यवस्थित नहीं किया और उनके जनाना की तरफ ही देखते रहे, जिनमें से एक नग जाग रहा था। लीलावती को हालांकि चमनलाल नहीं दिखे थे, वरना वो कम से कम बैठ ही जाती, हो सकता है लेट जाती, या ये भी हो सकता है कि नीचे चली जाती। खैर, उसने चमनलाल को नहीं देखा और चमनलाल थे कि उसे ही घूरे जा रहे थे। तभी वो रजाई उठाने और कुर्ती खींचने वाला वाकिया हुआ था। 
चमनलाल के दिमाग में वो कंधा ऐसे खुब गया जैसे कद्दू में तीर, ”हम दिल में तीर के कायल नहीं हैं” हालांकि कंधा मुलायम और गोल होता है और वो दिमाग में खुब नहीं सकता, लेकिन आप इसे भी मुहावरा समझ कर मान लीजिए। वैसे आप ये भी मान सकते हैं कि उस जमाने में हो सकता है कि ऐसा ही होता हो। जो भी हो, चमनलाल, अपने दिमाग से उस कंधे का ना निकाल पाए, उसके बाद चमनलाल ने जब भी किताब खोली उन्हे वो कंधा ही दिखाई दिया, रात को सपनो में कंधा, सुबह आसमान में कंधा, खाने की थाली में कंधा, नदी के पानी में कंधा, लीलावती का वो कंधा चमनलाल का वजूद बन गया। 
रौशनलाल जी ने उसके बाद पिण्डी वाले पीर बाबा की मन्नत भी पूरी कर दी, और दूसरे पीर-फकीरों को भी दिखाया, यहां तक कि रिश्तेदारों की भलमनसाहत वाली सलाहों को अनदेखा करते हुए डॉक्टर तक को दिखा मारा। लेकिन चमनलाल ना बोले, ना बोले, वो तो फटी-फटी आंखों से सामने ताकते रहे, क्योंकि उनके दिमाग पर कंधा सवार था। किसी ने सलाह दी की गौना करा दो, सब ठीक हो जाएगा। हो सकता है हो भी जाता, सेक्सुअल फ्रस्टेªशन से उपजा पागलपन, सेक्स से हो सकता है ठीक हो जाता। लेकिन समधी जी ने बात की नानी मार दी। बाप थे बेटी के, दुश्मन थोड़े ही थे कि कुएं में डाल देते, साफ मना कर दिया, कहां तो दहेज बढ़ाने पर राजी थे, कहां दहेज ना लेने की शर्त पर भी ना माने। चमनलाल, बाप के सपनो को लात मारते हुए लीलावती के उघाड़े कंधे के सपने लेते रहे, और उनके बाप रोते रहे। 
इधर लीलावती को, जिसकी वजह से एक अच्छा-भला आदमी पागल हो गया था, इस पूरे सीन के बारे में कुछ पता ही नहीं था। ना तो उसने उस दिन चमनलाल का छत पर देखा और ना ही उसे अपने उघाड़े कंधे के बारे में कुछ नाजायज़ लगा था, सही भी है, लड़के लड़कियों के हाथों की उंगलियां छू लेने पर कांप जाते हैं, हो सकता है लड़कियों को लड़कों की छुअन से ऐसा ही होता हो, लेकिन अपने ही हाथ, आंख, नाक मुंह पर तो कोई खुद नहीं मर-मिटता ना? तो अपना उघाड़ा कंधा उसके लिए मामूली बात थी, और वो खुद उसे एक मामूली बात की तरह भूल भी गई थी। फिर उसके दरसपुर वाले फूफा जी ने उसका रिश्ता, दरसपुर के ही गोपीचंद जी के बड़े बेटे निहालचंद के साथ लगा दिया था, जिसे किरासिन का लाइसेंस मिला था, और उसे नई दुकान के लिए पैसे की ज़रूरत थी, जो भागमल जी ने बिना संकोच पूरी कर दी थी। लीलावती अपने मायके में अपनी परिणती प्राप्त कर ससुराल के सपने ले रही थीं, उन्हे ये नहीं पता था कि उनके घर के बहुत ही पास कोई उनके, माफ कीजिएगा, उनके उघाड़े कंधे के सपने ले रहा है। 
फिर एक दिन चमनलाल उसी मुंडेर से गिर कर मर गए जिस पर से वो दातुन तोड़ रहे थे, और जहां उन्होने लीलावती का उघाड़ा कंधा देखा था। अब इसे आप कहानी का चमत्कारिक अंत कह लीजिए, या कोइन्सीडेंस कह लीजिए, जिस समय चमनलाल भागमल जी की छत की तरफ देखते हुए पैर फिसलने की वजह से गिर कर मर रहे थे, ठीक उसी वक्त लीलावती की भांवरे पड़ रही थी। 

बुधवार, 17 अगस्त 2016

मौत का ठिकाना



मौत का ठिकाना

जिस दिन उसे कत्ल होना था, उसे पता नहीं था कि वो उसकी जिंदगी का आखिरी दिन है, जैसे अमूमन किसी का पता नहीं होता कि वो उनकी जिंदगी का आखिरी दिन है। हालांकि मैने एक ऐसे इंसान के बारे में भी सुना है जिसे अपनी मौत के बारे में पूरी तरह पता था, जिसने बताया था कि वो किस दिन, किस जगह, और किस तरह मरेगा, यहां तक कि उसे ये तक पता था कि उसे मारने वाले उसके शरीर पर कहां-कहां वार करेंगे, और जब वो मरा तो उस पर शक करने वालों ने साफ देखा कि वो बिल्कुल वैसे मरा था, या कत्ल किया गया था जैसा कि उसने बताया था। दुनिया के जिस हिस्से में मैं रहता हूं, वहां याद के बहुत लंबे दायरे में मैने कोई स्वाभाविक या प्राकृतिक मौत नहीं देखी। जिसे भी मरते देखा कत्ल होते ही देखा, या सुना है। यहां तक की, प्राचीन भैंरों मंदिर वाले बाबाजी, जिनका जोरू ना जाता भगवान से नाता वाला हिसाब-किताब था, जिनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी, यहां तक कि वो किसी से दान-दक्षिणा तक नहीं मांगते थे, एक दिन उसी प्राचीन मंदिर की उससे भी प्राचीन मूर्ति वाले चबूतरे के पीछे मरे पड़े मिले थे, जिसने भी उन्हे मारा था, बहुत नफासत से लोहे का सुंआ उनके दिल के आर-पार कर दिया था। मरे तो शायद वो आराम से ही थे, क्योंकि उनकी लाश बहुत आराम से लेटी हुई थी, दांत बाहर की तरफ निकले हुए दिखाई दे रहे थे और कहीं से भी खून निकला नहीं दिख रहा था। 
हमारे यहां पुलिस का फेरा इतना ज्यादा लगता है कि पुलिस वालों ने गांव के बाहर की तरफ एक स्थाई चौकी ही बना ली है, हालांकि वहां रहता कोई नहीं, दिन भर कुत्ते आराम करते हैं, और रात में वो सारे गांव के चरसी-भंगेड़ियों का अड्डा बन जाता है। जब पुलिस वालों ने वहां नई चौकी बनाई थी तब पहले-पहल वहां बड़ी गहमा-गहमी रही थी। रोज़ दो पुलिस वाले मय बंदूक और कारतूस वहां बैठते-सोते थे। गांववालों ने उनकी खूब आव-भगत भी की, किसी घर से उनके लिए बढ़िया मलाईदार दूध जाता था, कहीं से ताजे मक्खन के साथ परांठे जाते थे, और रोज़ चाय का जुगाड़ होता था। लेकिन एक दिन जब खुद एक पुलिस वाले की लाश सुबह-सुबह खेत की मेड़ पर मिली, जहां वो शायद दिसा-मैदान के लिए गया था। तो पुलिस वालों की वो चौकी वीरान हो गई। हालांकि मारने वाले को शायद पता नहीं था कि मकतूल पुलिस वाला था, क्योंकि वो दिसा-मैदान के लिए वर्दी पहन कर नहीं गया था। पुलिस वालों ने उस कत्ल के बाद, बड़ी हाय-तौबा मचाई, गांव के लगभग सारे पहचाने हुए कातिल और गुंडे-बदमाश पकड़ लिए गए, यहां तक कि नीमपागल नसेरू तक को पुलिस पकड़ कर ले गई। कुल 39 लोग पकड़े गए थे। हालांकि गांव के लोगों को पुलिस की पकड़ की आदत थी, लेकिन एक साथ इतने लोग बस तब ही पकड़े गए थे जब वो पुलिस वाला कत्ल हुआ था। खैर पुलिस को कभी पता नहीं चला कि आखिर उस पुलिस वाले को किसने मारा था और क्यों मारा था, और अंततः पुरानी रंजिश का मामला बता कर, नामालूम कातिलों के नाम रिपोर्ट में लिख कर मामले का बंद कर दिया गया। वो सारे लोग जिन्हे पुलिस ने छोड़ दिया था, वापस गांव आ गए, सिवाए गिरिजा के जिसे गांव वाले धांधू कहते थे। 
गिरिजा कोई कातिल था भी नहीं, वो तो हल्ले में पकड़ में गया था, वरना कोई समझदार इंसान एक नज़र उसे देख कर कह सकता था कि उसने जिंदगी में कत्ल तो क्या किया होगा, किसी को जोर से डांटा तक नहीं होगा। और अगर डांटा भी होगा तो उसकी डांट का कोई असर किसी पर पड़ा होगा इसमें संदेह ही होगा। गिरिजा के बाप के पास कोई चार-पांच बीघे की खेती थी, जैसे गांव में और सबके पास थी, किसी के पास थोड़ी कम थी और किसी के पास थोड़ी ज्यादा थी। पूरे गांव में एक लगातार चलने वाली रार थी जिसमें हर कोई दूसरे की जमीन पर काबिज़ होने के मौके की तलाश में रहता था। गांव में हर कोई, हर किसी से किसी ना किसी तरह संबंधित था, और हर किसी के पास कहानी थी कि किसी जमाने में जब पुरखे यहां आए थे तो जमीन का कितना हिस्सा उसके पुरखे के हिस्से में आया था और कैसे किसी दूसरे के पुरखे ने धोखे से वो हिस्सा उससे छीन लिया था। अब इस पीढ़ी का ये फर्ज था कि कैसे ना कैसे जमीन का वो हिस्सा वापिस लिया जाए, तभी उस पुरखे की आत्मा को चैन मिलेगा जिससे धोखे से ये जमीन हथिया ली गई थी। जिनके पास जमीन नहीं थी, उनकी कहानी इससे जुदा नहीं थी, और अगर उनके पास कहानी नहीं थी तो भी वो किसी ना किसी पार्टी का हिस्सा तो ज़रूर थे। 
खै़र, गिरिजा के बाप के पास जो चार-पांच बीघे जमीन थी, उसके पीछे भी यही किस्सा था, और उसके रिश्तेदार, जो उसके चाचा-ताउ थे, उस जमीन को अपने हिस्से में देखना चाहते थे। खुद गिरिजा का बाप अपने भाइयों की जमीन कब्जे में करना चाहता था। जब गिरिजा का बाप अपने छोटे भाई के साथ बैठता था तो अपने बड़े भाई को धोखा देने के मंसूबे बनाता था और जब बड़े भाई के साथ बैठता तो छोटे को रास्ते से हटाने के सपने देखता था। यकीनन जब बड़ा भाई और छोटा भाई, यानी गिरिजा के ताउ और चाचा साथ बैठते होंगे तो वो गिरिजा के बाप को रास्ते से हटाने के सपने देखते होंगे। आखिरकार गिरिजा के ताउ या चाचा का दांव लग गया और एक दिन गिरिजा के बाप की टूटी-फूटी लाश, अड़सी बाग के किनारे पर मिली, पता नहीं वो वहां क्या करने गया था। पर कहा जाता है ना कि जिसकी जहां आई होती है, वो वहीं जाकर मरता है। गिरिजा का बाप सिर्फ गिरिजा का ही बाप नहीं था, वो गनेस, ज्ञान और गुड्डो यानी कमला का भी बाप था। इनमें गनेस बहुत तेज़ था, हालांकि वो गिरिजा और ज्ञान दोनो से छोटा था, लेकिन लाठी चलाने में, किसी का सर फोड़ देने में, और बात-बेबात पर गाली देने में उसे महारत हासिल थी। ज्ञान इन मामलों में उससे थोड़ा कम पड़ता था और इस कमी को उछल कर और बहुत शोर मचाकर पूरा किया करता था। और गिरिजा इन मामलों में बिल्कुल निकम्मा था। इतना निकम्मा था कि रोज़ स्कूल जाता था, और अव्वल आता था। 
तो गिरिजा के बाप के मरने के बाद जब चाचा ने अपनी जमीन की मेढ़ को बढ़ाने की जुगत की, तो गनेस और ज्ञान दोनो ही मरने-मारने पर उतारू हो गए। चाचा के पास लाठी चलाने वाले हाथों की कमी थी इसलिए उसे पीछे हटना पड़ा, इधर जब ताउ ने जोर मारा तो एक के बदले दो चोटें मिलीं। हुआ यूं कि ताउ ने रात की रात अपनी जमीन की मेंढ़ जो गिरिजा के बाप की जमीन की मेढ़ से मिली हुई थीं तोड़ डालीं और सुबह चार लोग यानी ताउ खुद और उसके तीन बेटे जमीन पर पहुंच कर लगे मेढ़ बनाने। इधर जैसे ही ज्ञान को पता चला तो वो गनेस और गिरिजा को लेकर खेत पहुंच गया और उसने वहां वो रौला काटा, कि बिना सिर फुटौवल के ही ना सिर्फ ताउ को पीछे हटना पड़ा बल्कि अपनी जमीन का कुछ हिस्सा भी गंवाना पड़ा। क्योंकि किसी वजह से उस दिन गांव में पुलिस का फेरा लगा हुआ था, और ऐसे में कोई फौजदारी संभव नहीं थी, और ज्ञान का शोर ऐसा था कि ताउ को लेने के देने पड़ सकते थे। हालांकि गांवो में अक्सर ऐसी रारा निपटाने के लिए पटवारी की बही पर भरोसा किया जाता है। लेकिन गांव के लोग पटवारी के पास जाना बंद कर चुके थे, क्योंकि गांव का पटवारी जिसके पास गांव की एक-एक इंच जमीन का हिसाब होता था, उसकी बन आती थी। हालांकि सारे गांव को पता था कि पटवारी की बही उसी के लिए सही, जिसकी जेब भारी होगी, लेकिन सारे उसके आगे-पीछे चक्कर काटते थे, और उसकी बही में काटा-पीटी करवाते थे। कटवाते-लिखवाते उसकी बही ऐसी हो गई थी जिसमें रकबे के नंबर दिखते ही नहीं थे बल्कि सिर्फ आड़ी-तिरछी लकीरें दिखती थीं। और आखिर इसका हल गांववालों ने ये निकाला कि कोई पटवारी की बही पर यकीन ही नहीं करता था, अपनी लाठी पर भरोसा करता था। 
खैर, ताउ और चाचा ने अपनी हार का बदला यूं निकाला कि पहले एक दिन गनेस अपने ही खेत में पाया गया, उसका भेजा बाहर बिखरा हुआ था, और फिर एक दिन ज्ञान को भी खेत में ही गंडासे से काट डाला गया। गिरिजा की मां ने तबसे गिरिजा का बाहर निकलना ही बंद कर दिया। जब गांव की पुलिस चौकी वाले पुलिस वाले का कत्ल हुआ और उसके हल्ले में धर-पकड़ शुरू हुई तो गिरिजा को भी पकड़ लिया गया, क्योंकि पकड़ करने वालों में एक पुलिसिया ऐसा भी था जिसने गिरजिा को ताउ के साथ हुए झगड़े में देखा था, और उसे लगा कि वो भी कत्ल करने की सिफत रखता है। तो इस तरह गिरिजा पकड़ा गया और बाकी 38 लोगों के साथ बंद कर दिया गया। जब पुलिस वाले के कत्ल का केस बंद हुआ ओर पुलिसवालों ने गांव वालों एक-एक, दो-दो करके रिश्वत के साथ छोड़ना शुरु किया तो गिरिजा के घर में रिश्वत देने वाला कोई नहीं बचा था। उसकी मां थी जिसे ये भी नहीं पता था कि उसे कहां जाना है, किसे रिश्वत देनी है। इसलिए वो छूटने वालों में सबसे आखिर था, लेकिन किसी को नहीं पता कि वो कैसे छूटा, कहां गया, क्योंकि छूटने के बाद वो गांव तो नहीं आया और गांव वालों को काफी देर तक यही लगता रहा कि वो जेल में ही बंद है। पुलिस वालों की इस फितरत से इस दुनिया का हर शरीफ आदमी या सिर्फ आदमी वाकिफ है ही, कि अगर वो किसी को पकड़ लें तो फिर उस पर किसी ना किसी किस्म का इल्जाम लगा कर एक पंथ दो काज करते हैं, एक तो किसी केस को हल करने का तमगा हासिल करते हैं, दूसरे अपना रौब यानी ”जेल में सड़ा दूंगा...” वाला रौब कायम रखते हैं। तो कुल मिलाकर जब गिरिजा छूटा तो गांव में किसी को नहीं पता था कि वो जेल से छूट चुका है। 
जेल में गिरिजा को सोचने का बहुत समय था, उसके गांव वाले तरह-तरह की बातें करते थे, और वो चुप उनकी बातें सुनता था। पकड़े जाने वालों में उसका ताउ और उसके तीनों बेटे भी थे, जो निगाहों में ही उस पर भाले-बर्छियां बरसाते थे। बाकी गांववाले भी थोड़े दूर के और थोड़े करीब के उसके रिश्तेदार ही थे। इनकी बातों को सुनकर, जिनमें ज्यादातर बातें, इसकी जमीन और उसकी जमीन से संबंधित होती थी, उसकी समझ में ये आया कि गांव जाकर वो एक ही हालत में रह सकता है, कि या तो वो अपने में ये माद्दा पैदा करे कि हर वक्त किसी ना किसी की जमीन पर काबिज होने के बारे में सोचे या फिर अपनी जमीन छोड़ दे और गांव भी छोड़ दे। और जब जमीन छोड़नी ही ठहरी तो गांव जाने का फायदा क्या हुआ। इसलिए जब वो जेल से छूटा तो गांव जाने की बजाय उल्टी तरफ चल पड़ा और शहर जाकर नौकरी करने लगा। पहले तो उसने एक बिल्डिंग में गार्ड की नौकरी की, फिर उसने ड्राइविंग सीख ली और एक कोठी में ड्राइवर लग गया। ना उसने कभी गांव जाने के बारे में सोचा और ना ही गांव में ऐसा कुछ था जो उसे वापस जाने के लिए सोचने के बारे में उकसाता। 
शहर में वो पहले एक खोली किराए पर लेकर रहता था जिसमें उसके साथ तीन और लोग रहते थे। फिर जब वो ड्राइवर हो गया तो उसे कोठी में ही एक कमरा मिल गया और वो वहां खानसामा के साथ रहने लगा। धीरे-धीरे उसे ये जिंदगी रास आने लगी और वो इसमें खुश रहने लगा। जब गांव में था तो स्कूल में अच्छे नंबर लाता था और मास्टरों का कहना था कि वो कुछ ना कुछ बन कर दिखाएगा। इधर कोठी के मालिकों की बेटी ने, जिसे वो रोज़ कॉलेज छोड़ने जाता था और फिर शाम को क्लब लेकर जाया करता था और भी कई जगह ले जाया करता था, उसमें दिलचस्पी लेना शुरु किया। जहीन तो वो था ही, साथ ही शक्ल सूरत से भी ठीक था। काफी दिन शहर में रहने की वजह से शहर की बोली और अंदाज़ भी सीख गया था। इसलिए उसमें और कोठी के मालिकों की बेटी में दोस्ती हो गई। कोठी के मालिक की बेटी ने उसमें और दिलचस्पी दिखाई तो उसे भी उसकी दोस्ती रास आई और उसने आगे की पढ़ाई शुरु कर दी। चार-पांच साल जो उसने उस कोठी में बिताए, उसमें उसने पहले 12वीं पूरी की, और फिर ग्रेजुएशन किया, ग्रेजुएशन के बाद उसकी दोस्त यानी कोठी के मालिक की बेटी के कहने पर कोठी मालिक ने उसे अपनी ही कंपनी में ज़रा बेहतर पद पर नौकरी दे दी। और यूं उसकी जिंदगी की गाड़ी पटरी पर आ गई, बल्कि उसे तो ये भी लगने लगा कि उसके मास्टर जो उसके बारे में कहते थे वो सही कहते थे कि आखिर वो कुछ बन कर ही दिखाएगा। नौकरी करते-करते उसने कुछ पैसे जोड़ लिए, पहले कोठी में ही रहता था, फिर किराए का घर ले लिया, और फिर वो शहर में ही चल रही कई सस्ते घर और, आसान किस्तों वाले घर के सपने देखने लगा। 
जिंदगी ठीक ही चल रही थी और कोई बड़ी बात नहीं थी कि वो शहर में कुछ बन के दिखा देता। पर उसे तो कत्ल होना था, और वो भी उस गांव में जिसमें लोग कत्ल होते थे। अपनी ही कंपनी में उसे सुधा मिली, जो शहर की ही पली-बढ़ी लड़की थी। शहर के ज्यादातर लोगों की तरह उसके पिताजी, कई साल पहले, जब वो बहुत छोटी थी, शहर में आकर बस गए थे, और किराए के घर में रहते थे। सुधा बहुत ठीक-ठाक सी लड़की थी, अपनी सीमा और मेयार जानती थी, जैसे ग्रेजुएशन करने के बाद उसने आगे पढ़ने के बारे में सोचा ही नहीं था, उसे पता था कि उसे हर हाल में अपने बुढौती की तरफ बढ़ते बाप की मदद करनी है, किसी तरह अपने भाई को पढ़ाना है यानी कुल मिलाकर परिवार पालना है। उसकी योजना बहुत सीधी-सादी थी और उसमें किसी बदलाव की गुंजाइश नहीं थी। इस योजना के चलते उसे बहुत इधर-उधर तांक-झांक नहीं करनी थी, घर से ऑफिस आना था और ऑफिस से सीधे घर जाना था। लेकिन ऐसा हो तो नहीं सकता था, आखिर वो गिरिजा एक ही ऑफिस में काम करते थे, पहले नज़रें मिलीं, फिर वो एक दूसरे को अच्छे लगने लगे और आखिरकार, दोनो में प्यार हो गया। जो कि बहुत स्वाभाविक भी था, क्योंकि एक लड़का था, दूसरी लड़की थी, दोनो उस उम्र में थे, जिसमें प्यार बुखार की तरह होता है, जिसके पीछे कोई तर्क नहीं होता। इस बुखार को, यानी प्यार को उतरने में बहुत देर भी नहीं लगती, चाहे आप कोई दवा करो या ना करो, लेकिन अक्सर लोग बुखार के लिए दवाइयां लेते हैं, डॉक्टर के पास जाते हैं। डॉक्टर की दवा से बुखार चाहे ना उतरे लेकिन आपको संतोष हो जाता है कि आपने अपनी तरफ से कोशिश की। लेकिन इस बुखार को कई लोग स्थाई भी कर लेते हैं, जिसे हमारे यहां शादी कहा जाता है। सच तो ये है कि इस मुल्क में प्यार कम और शादी के लिए प्यार का जुगाड़ ज्यादा होता है। हर लड़की चाहती है कि जिस लड़के को मै पसंद करूं वो शादी कर ले, और हर लड़का चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा लड़कियां मुझे पसंद करें लेकिन शादी कोई ना करे, हालांकि दिखाता वो ऐसा ही है कि वो घर से निकला ही ये निश्चय करके है कि जो लड़की उसे पसंद कर रही है, वो उससे ही शादी करेगा, और शादी के अलावा कुछ नहीं करेगा। अगर लड़की समझदार हो तो वो और कुछ करने के लिए शादी का इंतजार करती है, वरना लड़का शादी के अलावा सब कुछ करता है और फिर निकल भागने का जुगाड़ करता है। 
शहर में पली-बढ़ी सुधा इस मामले में कुछ अपनी सहेलियों से सीख चुकी थी और कुछ उसे अपना भी इल्म था, जैसे ज्ञानी लोग खुद भी बहुत कुछ सीख जाते हैं, उपर से गिरिजा कुछ उस किस्म का नहीं था, और उसे बहुत कुछ पता नहीं था, लड़कियों के बारे में, कुल मिलाकर चार लड़कियों से उसकी करीब से जान-पहचान हुई थी, एक उसकी मां, दूसरी उसकी बहन, तीसरी उसकी इकलौती दोस्त कोठ मालिक की लड़की और चौथी सुधा। तो प्यार जब और कुछ करने की हद तक पहुंचा तो सुधा ने शादी की बात की और गिरिजा ने फौरन हां कर दी। यहां से असल बात शुरु होती है। असल में बात है जड़ की, लोग जहां से भी होते हैं, अपनी जड़ों का कुछ हिस्सा अपने साथ लेकर चलते हैं। गांव से इसलिए भाग आए कि गांव में रीति-रिवाजों के बहुत पचड़े होते हैं, और आप परेशान हो गए थे। शहर में जब तक रह रहे थे, कोई रीति-रिवाज़ नहीं माना, यानी वो किया जिसकी सुविधा हुई। जनेउ गायब, दिन में एक टाइम नहाना हो जाए काफी है, हर हफ्ते बीवी के साथ सिनेमा में फिल्म देखने जाएंगे, और वो सारे काम करेंगे कि अगर गांव या जाति के लोगों को पता चल जाए तो आपकी ऐसी की तैसी कर दें, लेकिन जैसे ही शादी की बात आएगी, गांव, जाति, समाज की सारी आड़ी-तिरछी बातें याद आ जाती हैं। जैसे जाति-समाज घर की छत पर ही बैठा हुआ है तो देखने लगा कि आप क्या और कैसे कर रहे हो। खैर सुधा के पिता ने जिनका अब भी घर पर कुछ हक था, साफ शब्दों में कह दिया कि लड़के के घर-परिवार से मिले बिना ये रिश्ता नहीं होने वाला। वैसे मेरा मानना ये है कि उसके पिता चाहते ही नहीं थे कि सुधा की शादी हो, आखिर शादी हो जाती, तो उनका अपना क्या होता। जब गिरिजा ने उन्हे बताया कि उसकी वापस गांव जाने की कोई इच्छा नहीं है, और गांव में उसकी मां है, और तीन-चार बीघा खेत है, तो वो रिश्ते के लिए राज़ी हुए लेकिन इस शर्त के साथ कि वो गांव जाए और अपनी मां को साथ लेकर आए। यूं गिरिजा की मौत उसे गांव लेकर आई। क्योंकि जिसकी जहां आई होती है, वो वहीं जाकर मरता है। 
गांव में ये खबर लोगों को बहुत देर बाद मिली कि गिरिजा जेल से छूट गया है लेकिन गांव वापस नहीं आया है। गांव के पेशेवर मुखबिर, यानी वो जिसे पुलिस वाले गुप्त सूत्र कहते हैं, ने ही गांव वालों को बताया कि गिरिजा को तो जेल से छूटे तीन साल हो चुके हैं, और वो गांव वापस नहीं आया। इन तीन सालों तक गिरिजा के ताउ और चाचा ने बहुत सब्र किया था, उसकी जमीन को थोड़ा-थोड़ा ही दबाया था, लेकिन जब उन्हे लगा कि गिरिजा नहीं आने वाला तब तो पूरा खेत खुल्ला खेल फरुर्खाबादी था। बस एक ही अड़चन थी, गिरिजा की बहन कमला और उसकी मां, जिसका हल ये निकाला गया कि ताउ और चाचा ने कमला का ब्याह एक दुहाजू से करवा दिया, जिसने दहेज में तीन लाख रुपये दिए, जिसमें से कमला की मां को ईमानदारी से एक लाख रुपया दिया गया, और बाकी एक-एक लाख रुपये और जमीन का आधा-आधा हिस्सा दोनो भाईयों के हिस्से आया। गिरिजा की मां ने वो रुपया बैंक में रख दिया, और अपने जेवर गहने बेचकर, पति की कमाई के साथ सबकुछ बैंक में रख दिया और उसका ब्याज खाते हुए अपने आखिरी दिन गिनने लगी। उसे ये यकीन हो चुका था कि उसका सबसे बड़ा बेटा यानी गिरिजा भी कत्ल हो चुका है, जिसकी खबर तक उसे नहीं दी गई है। ऐसे में छह साल बाद जब गिरिजा खुद गांव पंहुचा तो उसकी मां को पहले तो यकीन ही नहीं हुआ, और उसके बाद यकीन हुआ तो खुल कर यकीन हुआ। 
यकीन गिरिजा के ताउ और चाचा को भी पूरा हुआ कि गिरिजा वापिस आ गया है। अब उन्हे चिंता हुई कि वो अपनी जमीन वापस मांगेगा, या लड़कर लेगा, उपर से तुर्रा ये कि वो जब आया तो कोट-पैंट पहन कर आया था, लगता था कि पैसा-वैसा कमा कर आया है। और जिसके पास पैसा उसके पास पटवारी और पुलिस दोनो का दबाव होना ही होना था। ताउ चाचा की नींद हराम हुई, और एक बार फिर दोनो में, अपने भतीजे यानी गिरिजा, यानी एक दुश्मन के खिलाफ मंसूबे बनने लगे। इन बातों से बेखबर गिरिजा, थोड़ा पुराने दिनों की यादों में खोने लगा था, वो खेतों में घूमता था, गांव को देखता था। उसने अपनी मां से अपनी शादी की बात नहीं की थी, हालंाकि वो ज्यादातर बातें बता चुका था, और चाहता था कि मां को शादी की बात के लिए थोड़ा सा तैयार कर ले, इसलिए कुछ दिन गांव में ठहरा हुआ था। सुधा को बताकर आया था कि उसे कम से कम दस दिन लगेंगे। उसे गांव खेत घूमने का उसके ताउ चाचा ने दूसरा ही मतलब निकाला, उन्हे लगा कि वो अपनी जमीन की पैमाइश कर रहा है, और जल्दी ही अपना दंाव चलेगा। 
गिरिजा को वापस जाना था क्योंकि वो ऑफिस से दस ही दिन की छुट्टी लेकर निकला था और ग्यारहवें दिन उसे ऑफिस में हाजिर होना ही था, करीब एक हफ्ते के इंतजार के बाद आखिर आठवें दिन रात को खाना खाते हुए उसने अपनी मां को अपनी शादी का किस्सा बताया और उससे अपने साथ शहर चलने के लिए कहा। उसकी मां जिसका अपना वैसे ही गांव में कोई नहीं था उसके साथ चलने को तैयार हो गई और दोनो ने मिलकर अपने-अपने मंसूबे भी बना लिए, दूसरे दिन सुबह उसकी मां खुश थी, वो खुद भी खुश था। उसकी मां ने उसका पंसदीदा काले चने की घुटी हुई सब्जी और परांठे का नाश्ता बनाया जो उसने जी भर कर खाया और फिर यूं घूमने के लिए निकलने के लिए उठा। उसकी मां ने उसे छाछ का गिलास दिया, जो वो पड़ोस से मांग कर लाई थी, और उसे पता था कि गिरिजा को भुने हुए जीरे वाली छाछ बहुत पसंद थी। गिरिजा ने खूब चाव से छाछ पी और पी अपना दाहिना हाथ मंुह पर फेरा जहां छाछ का गीलापन लग गया था। फिर उसने गिलास का दरवाजे के पास वाली छोटी अल्मारी पर रखा और मुड़कर बाहर निकल गया। उसकी मां को उसका यही आखिरी रूप याद रहा। उस रात गिरिजा वापस नहीं आया और दूसरे दिन दो पुलिस वाले एक गोबर ढोने वाली बैलगाड़ी पर उसकी लाश लादकर शिनाख्त के लिए उसके घर लाए । उसकी कटी-फटी लाश वहीं अड़सी बाग के किनारे मिली थी जहां उसके बाप की लाश मिली थी। किसी को पता नहीं था कि वो अड़सी बाग क्या करने गया था, लेकिन कहा जाता है जिसकी जहां आई होती है, वो वहीं जाकर मरता है। 

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

कन्दूसा




सारी दुनिया बदल गई, लेकिन मंगत भाई की दुकान ना बदली। वही लकड़ी के बक्से जिनमें तमाम रोज़मर्रा की चीजें भरी हुई थीं, पीछे पुरानी लकड़ी के शेल्फों पर परचून का सामान, और एक छोटे कमरे में बोरियों में राशन......मंगत भाई की दुकान पर जाते ही लगता था जैसे 60 का दशक वापस आ गया हो। 
पतले-सूखे से मंगत भाई खुद भी 60 के दशक के लगते थे, चौड़ी मोहरी वाला सफेद पजामा, पैरों में जूतियां, जिन्हे वो अपने लकड़ी के बक्सों के पास ही उतार देते थे, उपर पेट पर जेब वाली गंजी, और उसके उपर अगर कभी ज़रूरत हुई तो लठ्ठे की कमीज़। ना उनके पहनावे में कोई बदलाव आया, ना उनके घर में, और ना उनके अंदाज़ में। 
उनकी दुकान सुबह 5 बजे खुलती थी, लकड़ी के भारी दरवाज़े, जिनमें लोहे के कुंडे लगे हुए थे, पुराने चार दरवाजों वाले इस दरवाजे को फोल्ड करके, वो चौखट को छूकर अपने माथे से हाथ लगाते थे और फिर अपनी गद्दी पर बैठ जाते थे। दुकान के दरवाजे़ के बाद बस इतनी ही जगह फर्श बचता था जहां दो लोग सहूलियत के साथ खड़े हो सकें, उसके बाद लकड़ी के बक्से शुरु हो जाते थे, जिनका ढक्कन उपर खुलता था, चौड़े वर्गाकार बक्सों में कुछ-कुछ सामान भरा हुआ था, जिसे ज़रूरत पर खोल कर मंगत भाई खरीदार को देते थे। बक्से भारी थे, हालांकि मंगत भाई हल्के थे, लेकिन तो भी उनका वज़न उठा रहे थे, इसलिए माना जाता था कि मजबूत थे। पीछे शेल्फ था जिस पर बच्चों के लिए टॉफियां, बिस्कुट, और बाकी रैपर वाला छोटा सामान रखा होता था, वहीं बीड़ी-सिगरेट और माचिसें भी होती थीं। दुकान के अंदर एक दरवाजा था जो एक कमरे में खुलता था, जिसमें मंगत भाई राशन का सामान रखते थे। सुबह पांच बजे से 12 बजे तक वो दुकान पर रहते थे, इसके बाद दुकान बंद करके घर चले जाते थे, इसके बाद वो चार बजे के करीब वापस दुकान खोलते थे जो रात नौ बजे तक चलती थी। इसके बाद वो घर चले जाते थे।
उनका घर भी 40 के दशक का बना हुआ ऐसा घर था, जिसके अंदर घुसने पर ही पता चलता था कि इमारतें बनाने के मामले में भी दुनिया कितनी बदल गई है। घर का मुख्य दरवाज़ा एक गैलरी में खुलता था, जो आगे जाकर आंगन बन जाती थी, सामने बरांडा था जो चार खंभों पर टिका हुआ था, उसके बाद एक कमरा था, जो घर का सबसे बड़ा कमरा था और मंगत भाई का कमरा था, इससे पहले वो मंगत भाई के पिताजी का कमरा था, इसके बाद एक और कमरा था जिसमें बाकी पूरा परिवार रहता था, घर के दांयी तरफ एक सीढ़ी थी जो उपर वाली मंजिल पर जाती थी, वहां 6 या सात कमरे बने हुए थे, और बिल्कुल कोने पर, जहां से गली दिखाई देती थी एक बाथरूम और लैट्रिन बनी हुई थी, जिसको देखने से साफ पता चलता था कि ये नई बनी हुई है। पूरे इलाके में मंगत भाई ही थे जिन्होने सुबह-सुबह लोटा लेकर जाना सबसे बाद में बंद किया था, और वो भी तब, जब उन्हे किराएदारों का टोटा सिर्फ इसलिए पड़ने लगा कि उनके घर में लैट्रिन नहीं थी। तो पहले किराएदारों के लिए लैट्रिन बनी और फिर जब खुद उनके परिवार के लोग भी वही लैट्रिन इस्तेमाल करने लगे और इसपर घर में रोज़ विवाद होने लगा, तो उन्हे मजबूर होकर नीचे के लिए भी लैट्रिन बनवानी पड़ी। हालांकि लैट्रिन बनने के काफी दिनो बाद तक वो खुद पाखाने के लिए पास की रेलवे लाइन पर जाते रहे थे, लेकिन आखिरकार उन्होने भी इस आधुनिकता के सामने हथियार डाल दिए और अब वो घर की लैट्रिन में ही जाते थे। कई बार उन्होने शिकायत की कि उन्हे घर में बदबू आने लगी है, जिसका इलाज ऐसे हुआ कि जो भी लैट्रिन इस्तेमाल करता था, वो उसमें बाल्टी भर के पानी डालता था। लेकिन शहर में पानी की कमी होने के चलते आखिर ये इलाज भी कुछ ही साल चल पाया। अब मंगत भाई को बदबू नहीं सताती, आदत हो गई है। 
पूरे महल्ले में कहीं कोई मौत हो, तो वहां मंगत भाई की मौजूदगी ज़रूरी होती थी। वो चिता, अर्थी का सारा काम ऐसे जानते थे, जैसे पंडित शादी-वादी का काम जानते हों। कहां से कफन लाना है से लेकर, कौन से समय अर्थी को उठाना है, इस काम में उनकी महारत इतनी ज्यादा थी कि पंडित तक कुछ काम करने से पहले उनसे आंखों की आंखो सहमति मांगता था। जब किसी के घर कोई मौत होती थी तो सबसे पहले मंगत भाई को सूचित किया जाता था और वो अपनी दुकान बंद करके वहां जाते थे, इसके अलावा कभी समय से पहले या समय के बाद उनकी दुकान बंद नहीं होती थी। अगर कभी उनकी दुकान बेसमय बंद हो तो मुहल्ले के लोग-बाग समझ जाते थे कि किसी के घर में मौत हुई होगी। कहने वाले तो ये भी कहते थे कि इसके अलावा उन्होने अपनी शादी के समय भी अपनी दुकान कभी बेसमय बंद नहीं की थी। 
मंगत भाई की दुकान के ठीक सामने मंदिर था, मंदिर क्या था, यूं समझ लीजिए मुहल्ले के भंगेड़ियों, शराबियों, का अड्डा था, अब ये शराबी, भंगेड़ी या नशाखोर वो वाले नहीं थे, जिन्हे आप अक्सर सड़कों पर पड़े देखते हैं, गंदगी से सराबोर नशे में होश खोए, देखते हो, ये मुहल्ले के इज्जतदार घरानों की उंची नाक वाले मां-बाप के नौनिहाल थे, जो शायद इसलिए कि उन्हे कुछ करने की ज़रूरत क्या है, कि तहत नशा किए रहते रहते थे और मंदिर के भीतर पेड़ के नीचे, छाया में आराम किया करते थे। इन लोगों का काम था कि सुबह एक नियत समय पर नशा करना और फिर पूरे दिन उसे नशे के खुमार के उतरने का इंतजार करना, ताकि शाम तक जब खुमार उतरे तो नशे की दूसरी डोज़ ली जा सके। इस मंदिर में कोई पुजारी नहीं था, आमतौर पर पुजारी उन्ही मंदिरों में होते हैं, जिनमें कमाई का ज़रिया हो, यानी कुछ चढ़ावा-भेंट पूजा हो, कुछ यजमान हों जो अपने घरों के मुंडन, कुंडन संस्कारों में मंदिरों के पुजारियों को बुलाएं, लेकिन इस मंदिर में जो मंगत भाई के घर के सामने था, कोई पुजारी नहीं था, जाहिर है, इसीलिए इसमें ना सुबह की आरती होती थी ना शाम की, बस एक मंगत भाई थे जो पूरे नियम से सुबह चार बजे जागने के बाद, नहा-धोकर दुकान खोलने से पहले इसमें दिया जलाते थे, एक तरफ एक टूटा-फूटा मंदिर जैसा था, फिर चौड़ा आंगन था, जिसमें एक पेड़ था, कौन पेड़ था ये याद नहीं, पर उसका बहुत बड़ा सा सीमेंट का चबूतरा था, और ठीक उसके सामने एक खुला कमरा था, जिसमें दो खंभे थे और दरवाजा कोई नहीं था। मंगत भाई दुकान खोलने से पहले और दुकान बंद करने के बाद उसमें नियम से दिया जलाते थे, और उनके परिवार वाले उनके इसी काम के चलते इस मंदिर पर अपना हक मानकर अपने घर के कभी-कभी होने वाले छोटे-मोटे आयोजन इसी मंदिर में कर लिया करते थे। मुहल्ले के लोगों को कभी इस बात से एतराज भी नहीं हुआ। बल्कि जब किसी को ज़रूरत होती थी, तब वो पहले मंगत भाई से पूछता था, उनकी राय लेता था, और उस दिन नशेड़ियों को वहां से भगाने और मंदिर की साफ-सफाई के लिए मंगत भाई की मदद भी लिया करता था। 
वो मंदिर, मुहल्ले के हर मंदिर की तरह, खुद के प्राचीन होने का दावा करता था, और दिखने में लगता भी काफी प्राचीन ही था। उस मंदिर का इतिहास किसी को पता नहीं था, जाने कब मंगत भाई ने उसमें दिया जलाना शुरु किया, फिर वो उनका नियम बना, लेकिन कई साल बीतते-ना-बीतते उस मंदिर का नाम मंगत भाई वाला मंदिर पड़ गया। पहले जाने उस मंदिर का क्या नाम रहा होगा, लेकिन अब अगर किसी को रास्ता बताना हो तो कहा जाता था कि मंगत भाई वाले मंदिर के थोड़ा आगे एक गली होगी, या मंगत भाई वाले मंदिर से पहले वाले मोड़ पर.....यूं उस मंदिर को मुहल्ले में मंगत भाई वाला मंदिर कहा जाने लगा। 
अब इस कहानी का तीसरा हिस्सा था, मंगत भाई का बड़ा बेटा। जैसा कि हर खानदान का होता है, मंगत भाई का भी ऐसा ही ये बेटा था। परले सिरे का कामचोर और निकम्मा, मंगत भाई की तरह सूखा, जैसे कसम लेकर पैदा हुआ हो कि मंगत भाई की कद-काठी निकालेगा, और मंगत भाई की ही तरह उसकी आवाज़ भी थी। महल्ले के सभी शरीफ खानदानों की तरह उसे भी बहुत बचपन से भांग की आदत लग गई थी, जो उसके जवान होते होते, कई और नशीले रास्तों से गुज़रती हुई, अब बड़े-बड़े नशों तक जा पहुंची थी। मंगत भाई वाले मंदिर के और नशेड़ियों की तरह उसका शगल भी यही था कि वो सुबह अपनी पहली डोज़ लिया करता था और फिर दिन भर चबूतरे पर पड़ा रहा करता था, फिर शाम को नशा उतरने पर नियम से अपना दूसरा डोज़ लिया करता था और फिर मंदिर में ही रात होती थी। घर सामने ही था, इसलिए खाना कभी कोई उसे वहीं दे जाता था, या फिर वो खुद लहराता हुआ घर जाता था और खाना खाकर वापिस मंदिर आ जाता था। 
यूं ही करते-करते कई साल बीत गए, अच्छा मान लीजिए कई ना हों, लेकिन कुछ साल तो बीत ही गए। अब हर मुहल्ले की ये परिपाटी होती है कि अगर कोई काम लगातार हो तो लोग उसे परंपरा मान लेते हैं। इस तरह ये भी परंपरा सी ही हो गई कि मंगत भाई सुबह-शाम मंदिर में दिया जलाते थे और उनका भाई मंदिर का सदुपयोग करता था। ऐसे ही एक दिन मंगत भाई वाले मंदिर में मंगत भाई के बेटे का एक दूसरे नशेड़ी से झगड़ा हो गया। अब नशेड़ियों में झगड़ा हो जाना आम बात है, अक्सर होते रहते हैं, और क्योंकि ये झगड़े नशे के संदर्भ में होते हैं, इसलिए इनकी सुलह भी नशे के संदर्भ में ही होती है। यानी नशे में झगड़ा हुआ तो नशा उतरते ही सुलह हो गई, या सूफी में झगड़ा हुआ तो नशा करने के समय या नशे की हालत में सुलह हो गई। इसलिए इन झगड़ों पर कोई ध्यान नहीं देता। लेकिन ये झगड़ा थोड़ा मानीखेज़ बन गया, क्योंकि इस झगड़े में पीपल के पेड़ वाले मंदिर के ट्रस्ट के मैनेजर का बेटा और मंगत भाई का बेटा शामिल था, और सबसे बड़ी बात ये कि झगड़े के दौरान मंगत भाई के बेटे ने ट्रस्ट के मैनेजर के बेटे को यूं कह दिया कि, ”आज के बाद मेरे मंदिर में दिख मत जइयो.......” इस छोटे से जुमले ने मुहल्ले में आग लगा दी, बल्कि इस छोटे से जुमले के ”मेरे मंदिर” वाले हिस्से से मुहल्ले वालों के कान खड़े हो गए। 
आखिर ये मंगत भाई वाला मंदिर मंगत भाई का कबसे हो गया। ये तो प्राचीन मंदिर था, किसी को पता नहीं था कि ये मंदिर किसने बनाया, किसकी मिल्कीयत थी और आखिर कब बना। मंगत भाई ने जाहिर था अपने बेटे से नाराज़ होते हुए भी उसका ही पक्ष लिया, और ट्रस्ट के मैनेजर ने अपने बेटे का पक्ष लिया, लेकिन ट्रस्ट के मैनेजर का पलड़ा भारी था, क्योंकि एक तो उसके पास किराएदार ज्यादा थे, दूसरे उसने कई साल स्मगलिंग का काम करके काफी पैसा कमाया था और तीसरे पीपल के पेड़ वाला मंदिर खूब चलता था, जिसमें पास की रईस कॉलोनी वाले भक्त भी आते थे, और चढ़ावे का बाकायदा बंटवारा होता था, जिसमें से पुजारी को उसकी तनख्वाह देने के बाद भी महीने का कुछ लाख रुपये बचता था। तो मुहल्ले में दबी ज़ुबान ये बातें चलने लगी कि किसी तरह मंगत भाई के चंगुल से मंदिर को छुड़वाया जाए। 
इधर मंगत भाई को भी आभास हो गया था कि मंदिर उनके हाथ से छीन लिए जाने की तैयारियां हो रही हैं, इसलिए उन्होने भी अपनी ओर से कुछ काम शुरु कर दिए। जिसमें अपनी तरफ से थोड़ा पैसा लगाकर मंदिर के भीतर वाले मंदिर की मरम्मत कराई, उसमें एक साफ-सुथरी मूर्ति रखी और दिया जलाने के अलावा उसमें नियम से आरती करने लगे। मंगलवार को प्रसाद भी बांटने लगे। इस तरह के कामों के अलावा मंदिर भी साफ-सफाई भी की गई, और यूं कुछ दिन कटे। मंगत भाई ने एक दिन चबूतरे के उपर, पेड़ के नीचे एक कलश रखवाया जिसे उन्होने किसी तरह जुगाड़ा था। इसके नीचे चबूतरे पर उन्होने एक पत्थर चिनवाया, जिस पर लिखा था, प्राचीन सनातन धर्म मंदिर पर इस कन्दूसे की स्थापना श्री मंगत राम शर्मा, पुत्र श्री जगतलाल शर्मा, ने करवाई। उनके दादा ने इस मंदिर की स्थापना में भरपूर सहायता की थी। इस कन्दूसे की स्थापना और पत्थर की चिनाई कुछ ऐसे समय की गई कि एक दिन वो अचानक मुहल्ले वालों को दिखा। अब कही गई बात को हवा में उड़ाना आसान है, लेकिन ये बात तो पत्थर पर खुद गई थी, इसका तोड़ मुश्किल था। 
ट्रस्ट के मैनेजर को अब अपना दांव खेलना था, तो उन्होने, अपनी विशेषज्ञता के मुताबिक चार दानवीर जमा किए और मंदिर के भीतर एक और मंदिर बनाने का चंदा उगाह लिया। आखिरकार मंदिर के दिन फिरे और मंदिर में भक्त लोगों का जमावड़ा शुरु हुआ। भक्तों में महिलाएं थीं, और फिर पेड़ पर धागा बांधकर अपने ब्याह की कामना करने वाली कुमारी लड़कियां भी थीं, इसलिए मंदिर से नशेड़ियों का निषेध हो गया। मैनेजर साहब ने बाकायदा महीने में एक बार मंदिर में भजन-कीर्तन का कार्यक्रम भी चालू करवा दिया, ताकि सनद रहे। लेकिन उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद मंदिर का नाम मंगत भाई वाला मंदिर ही रहा। 
फिर एक दिन लोगों को दिखा कि मंगत भाई का बड़ा लड़का सुबह-सवेरे पीली धोती और कुर्ता पहने, माथे पर टीका लगाए मंदिर में आरती कर रहा है। यूं एक और परंपरा बनी कि मंगत भाई वाले मंदिर का वो स्वघोषित पुजारी हो गया। हालांकि उसने नशे की लत नहीं छोड़ी लेकिन मंदिर की सुबह-शाम की आरती के समय वो बिल्कुल धोया हुआ लगता था। पता नहीं आरती करना उसने कहां से सीखा लेकिन ठीक-ठाक करता था क्योंकि किसी को उससे एतराज़ भी नहीं था। बाकी अपना नशा पानी वो अखाड़े में करता था जो मंगत भाई वाले मंदिर से निकाले जाने के बाद नशेड़ियों का नया ठिकाना था। इस बीच उसने एक काम ये शुरु कर दिया था कि वो मुहल्ले वालों को बीच रास्ते में रोक लेता था और फिर उनसे मंदिर के नाम पर हर महीने कुछ चंदा नियत करने का वादा लिया करता था। वो उन्हे कसमें दिलाता था, मां की, बाप की, खानदान की, मंदिर की, भगवान की और फिर अपनी......और किसी से 100 किसी से 500 आदि नियत करवा ही लेता था। 
इधर ट्रस्ट के मैनेजर घात लगाए बैठे थे कि कौन मौका निकले कि वो मंदिर पर अपना दावा ठोंक सकें। अपने तमाम हथियारों के साथ वो मैदान में कूदने को तैयार बैठे थे। एक मंदिर से उन्हे काफी कमाई थी, अगर दूसरा मंदिर भी हाथ आ जाए तो सोने पर सुहागा। तो कुल मिलाकर दोनो तरफ से दांवपेंच लग रहे थे। मंगत भाई बच्चों को मुफ्त टाफियां देकर उन्हे मंदिर में आरती के समय भीड़ लगाने को उकसाते थे, और मैनेजर अपनी गोटियां चलते हुए मंदिर का इतिहास खोदने में लगे हुए थे। मुहल्ले के लोगों के बीच कभी ये कहानी उठती थी कि किसी पहुंचे हुए महंत ने इस मंदिर को बनवाया था, और इसका जिम्मा मुहल्ले के लोगों पर छोड़ा था, और कभी ये कहानी होती थी कि मंगत भाई के दादा ने इस मंदिर को बनवाने में जी-जान लगा दी थी, इसीलिए मंगत भाई को इस मंदिर का इतना ख्याल रहता है। मंदिर के लिए एक तरह से मुहल्ले में शीत युद्ध छिड़ा हुआ था, जिसमें एक तरफ सूखे-पिचके मंगत भाई थे और दूसरी तरफ एक मंदिर के ट्रस्ट के मैनेजर साहब थे। और मुहल्ले के लोग ध्यान लगाए देख रहे थे कि आखिर ये मंदिर किसके हाथ जाएगा। मुहल्ले के लोग ना तो मंगत भाई के साथ थे और ना ही मैनेजर साहब के, वो क्या है कि मैनेजर साहब ने स्मगलिंग से काफी पैसा कमाया, उस पैसे से मुहल्ले में इज्जत कमाई और उस कमाई से पीपल वाले मंदिर के ट्रस्ट की मैनेजरी कमाई, और अब वो काफी कमा रहे थे। दिन भर पीपल वाले मंदिर के सामने वाले बाग में बैठे हुए दांत कुरेदते रहते थे और हर आने-जाने वाले को रौब दिखाते थे। यूं कोई उन्हे कुछ कह नहीं सकता था, लेकिन सब उनकी बुराई करते थे। सबको लगता था कि आखिर स्मगलिंग से पैसा इन्होने ही क्यूं कमाया, हमने क्यंू ना कमाया, मंदिर की कमाई इनके घर क्यूं जाती है, हमारे घर क्यूं नहीं जाती। और इस क्यूं नहीं की जड़ से नैतिकता और संस्कार का फूल निकलता था जो कहता था कि बताओ, एक स्मगलर मंदिर के ट्रस्ट का मैनेजर, या बताओ, मंदिर के चढ़ावे की कमाई से घर चला रहे हैं। धर्म, नैतिकता और संस्कार का ये फूल अपनी बेबसी की देहरी पर चढ़ता था इसलिए कोई ऐसा खुलकर नहीं कहता था। 
तो कुल मिलाकर मंदिर के लिए खींचतान चल रही थी और इसमें पलड़ा मंगत भाई का भारी था, क्योंकि अब उनका बेटा ना सिर्फ आरती करता था, बल्कि पूजा-पाठ भी कर रहा था, और धीरे-धीरे मुहल्ले के पीपल मंदिर वाले ग्राहक भी टूट कर इस मंदिर पर आ रहे थे। उनके से ज्यादातर ऐसे थे, जिन्हे पीपल मंदिर पर उतनी इज्जत नहीं मिलती थी जितनी पड़ोस की रईस कॉलोनी के ग्राहकों को मिलती थी। जबकि मंगत भाई वाले मंदिर में तो यही रईस थे, इसलिए इनकी खूब इज्जत होती थी। पीपल मंदिर पर भंडारा होता था तो पूरे दिन चलता था, जबकि मंगत भाई वाले मंदिर को भंडारा सिर्फ दो घंटे का होता था। लेकिन यहां भंडारा होता था तो मुहल्ले वालों का अधिकार होता था, जबकि पीपल मंदिर पर उन्हे लाइन में लगना होता था, बल्कि कभी-कभी तो धक्का भी पड़ जाता था। 
मैनेजर साहब ये सब समझ रहे थे, और उनकी समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करें। आखिर उन्हे एक तरकीब सूझी। दिवाली के समय उन्होेेने बिना किसी से पूछे-ताछे, मंदिर की रंगाई-पुताई के लिए लोग भेज दिए। मंगत भाई दुकान पर बैठे थे कि लोग आए और मंदिर की जांच-पड़ताल करने लगे, मंदिर की ऐसी नाप-जोख देखकर मंगत भाई दुकान से उतरे और मंदिर पर पहुंच कर उनसे पूछ-ताछ करने लगे। इस पूछताछ के बीच ना जाने क्या हुआ कि वो जोर-जोर से चिल्लाने लगे और उनके और मजदूरों के बीच हाथापाई सी होने लगी। अब पतले सूखे मंगत भाई और काम करने वाले जोरदार मजदूर, हमले की शुरुआत जरूर मंगत भाई ने की, लेकिन अपना बचाव करने वाले मजदूरों के एक-दो हाथ पड़ते ही वो लुढ़क गए। ऐसे मामलों में मुहल्ला फौरन जमा हो जाता है, सो हो गया, मंगत भाई को मंदिर के भीतर पेड़ के चबूतरे पर लिटाया गया और उनके मंुह पर पानी के छींटे मारे गए। उन्हे होश में लाने की भरपूर कोशिश की गई, आखिरकार वो होश में आए। सारे वाकये को सुन कर उस जगह पर मुहल्ले की भीड़ ने ट्रस्ट के मैनेजर को जीभरकर कोसा, और मंगत भाई की तरह से आवाज़ लगाई। तब तक खबर ट्रस्ट के मैनेजर तक और मंगतभाई के बेटे तक भी पहुंच ही गई थी। संयोग ये कि दोनो मंदिर एक ही समय पर पहंुचे, मंगत भाई के बेटे ने, जो शायद नशे में था, आव देखा ना ताव और मैनेजर के उपर हमला कर दिया, हालांकि बाद में कहने वालों का ये मानना है कि हमला मैनेजर ने किया था, लेकिन मैनेजर का बयान था कि हमला मंगत भाई के बेटे ने किया। 
हश्र जो होना था वही हुआ, मंगत भाई का सूखा-साखा बेटा, मैनेजर की कुहनी लगने से वहीं ढेर हो गया। अब तो मुहल्ले का रुख पूरी तरह से मंगत भाई के पक्ष में हो गया, पुलिस बुलाने की धमकियां हुई, बल्कि किसी ने पुलिस को बुला भी लिया। वो तो मैनेजर साहब के संबंध थे पुलिस थाने में कि उन्होने फौरन मामला सुलझा लिया और पुलिस झगड़े में पहुंच कर अपनी उपस्थिती दर्ज कराने से बच गई। लेकिन मैनेजर साहब फंस गए थे, वो रह रह कर मुहल्ले वालों को यकीन दिला रहे थे कि उनका कोई गलत इरादा नहीं था और सिर्फ धर्म के लिए कुछ भी कर जाने की अपनी फितरत के चलते ही उन्होने दिवाली के समय मंदिर की रंगाई के बारे में सोचा था। लेकिन उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि इसके लिए उन्होेने मंगत भाई से क्यूं नहीं पूछा। मंगत भाई रह-रह कर मंदिर के लिए अपनी बरसों की सेवा, जिसे वो बचपन से की गई सेवा कह रहे थे, का हवाला दे रहे थे, अपने होनहार और मंदिर को समर्पित बेटे की बलाएं ले रहे थे और बेटे को कुछ होने की सूरत में मैनेजर को जान से मार कर मंदिर की चौखट पर मर जाने की कसमें खा रहे थे। 
तभी उनके बेटे को होश आ गया। हो कुछ यूं रहा था कि मैनेजर उठ कर जाने की कोशिश कर रहे थे, जाहिर है वो इस सब सांसत से अपना पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रहे थे, और मंगत भाई थे जो मौके की नज़ाकत को समझे बैठे थे और उसी वक्त ये फैसला कर लेना चाहते थे कि मंदिर पर मैनेजर कभी कब्जा जमाने की कोशिश ना करें। और मुहल्ले वाले अपने शोर-गुल में लगे हुए थे, ना उन्हे इस बात की फिक्र थी कि मंदिर किसके पास जाता है, और  ना इस बात की, कि मंगत भाई और उनके बेटे का क्या होता है। उन्हे बस मजा आ रहा था। मैनेजर ने मंगत भाई के कंधे पर हाथ रखा और उन्हे एक तरफ को खींचने लगा, पहले तो मंगत भाई ने विरोध प्रकट किया, लेकिन आखिरकार वो उसके साथ खिंचते हुए चले गए। दोनो में कुछ देर कुछ बात हुई और फिर जब वो वापस आए तो मुहल्ले वालों के मनोरंजन का साधन खत्म हो चुका था। 
इसके बाद वाले दिन से आज तक, मंगत भाई की दुकान नहीं खुली। वो दुकान जो साठ साल पुरानी लगती थी, अब बंद हो चुकी है। वैसे भी कम ही चलती थी, क्योंकि उसके मुकाबले और बहुत सी दुकाने खुल चुकी थीं। पीपल वाले मंदिर के ट्रस्ट के मैनेजर इस मंदिर के बोर्ड के सदस्य बन गए हैं, मैनेजर मंगत भाई हैं। 
अब मंगत भाई और उनका बेटा मंदिर का काम संभाल रहे हैं। उन्होने मंदिर में एक पुजारी रख छोड़ा है, कुछ 20-21 साल का एक लड़का है, जिसे जाने कहां से ये कह कर लाया गया है कि खानदानी पुजारी है, और सबकुछ बहुत पवित्रता से करता है। मंदिर का नाम अब भी  मंगत भाई वाला मंदिर ही है, हालांकि बाहर लगे बोर्ड पर ये ”प्राचीन” सनातन धर्म मंदिर है, लेकिन मुहल्ले वाले इसे अब भी मंगत भाई वाला मंदिर के नाम से ही जानते हैं। मंगत भाई वही सुबह चार बजे उठते हैं, लेकिन अब वो अपनी पुरानी दुकान पर नहीं बैठते, उन्होने अपनी नई दुकान संभाल ली है, उन्हे यकीन है कि उनकी पुरानी दुकान जिससे उनके बेटे की गृहस्थी चलने की कोई उम्मीद नहीं थी, ये नई दुकान उसकी गृहस्थी भी चला देगी।  

बुधवार, 15 जून 2016

हरामी


आसमान बादलों से भरा हुआ था, सुबह से लग रहा था कि बारिश होगी। उमस ऐसी गजब थी कि कमीज़ के बटन बंद करने से पहले वो पूरी भीग जाती थी। उसने एक बार पर्दा उठाकर खिड़क से बाहर झांका, और फिर पर्दा पूरा खोल दिया। हवा नहीं चल रही थी, फिर भी बंद कमरे से तो खुला कमरा अच्छा ही होता, चाहे कहने को ही सही.....
पिछले 7 साल से वो दिल्ली में था, और उसे खुद कभी इतनी गर्मी नहीं लगी थी जितनी इस साल लग रही थी। जाने मौसम को क्या हो गया था, मौसम विभाग लगातार बारिश की भविष्यवाणी कर रहा था और बारिश लगातार मौसम विभाग को और साथ-साथ लोगों को धोखा देती आ रही थी। पिछले एक हफ्ते से मौसम का ये हाल था कि कभी लगता था बारिश हुई कि हुई, और फिर ऐसी कड़क धूप होती थी कि तौबा भली.....और धूप ही हो, कम से कम हवा तो चले, बादल हो जाते थे तो हवा चलनी भी बंद हो जाती थी और पसीने के मारे बुरा हाल हो जाता था। 
आज तो उसे अपने कपड़ों का ज्यादा ध्यान रखना था, आज उसकी जिंदगी का एक बहुत महत्वपूर्ण फैसला होना था, आज वो मिताली के घर जा रहा था, उसके मां-पिता से मिलने। मिताली से वो तीन साल पहले मिला था, एक कॉन्फ्रेंस के सिलसिले में वो और मिताली साथ ही पूना गए थे, वहीं परिचय हुआ और चार दिन की कॉन्फ्रेंस में दोनो को ही समझ में आ गया कि दोनो एक दूसरे को पसंद करते हैं। वापस आकर लगा ही नहीं कि रिश्ता कायम करने के लिए कुछ खास करना होगा। दोनो ऐसे एक दूसरे से मिलने लगे जैसे बरसों से जानते हों। ऑफिस से निकलना, मिताली के साथ घूमना, छुट्टी के दिन मिताली के साथ घूमना, या फिर मिताली यहां आ जाती थी, उसके कमरे पर। जो अब थोड़ा-थोड़ा घर लगने लगा था। वो फितरत से ही थोड़ा लापरवाह था, कौन से कपड़े पहनने हैं, क्या खाना है, इसकी उसने कभी परवाह नहीं की। ना ज़रूरत थी ना सलाहियत, और जब सलाहियत हो गई तो आदत गहरी पैठ चुकी थी। 
छ साल का था जब उसकी मां की मौत हुई थी, उसे वो दिन वैसा का वैसा याद है। रोया नहीं था वो, उसे पता ही नहीं था कि मां की मौत से उसकी जिंदगी पर क्या फर्क पड़ने वाला है। घर में रिश्तेदारों और पड़ोसियों की भीड़ जमा था और उसकी मां नीचे एक लकड़ी की सीढ़ी पर सफेद चादर ओढ़ कर लेटी थी, हालांकि उसे पता था कि मां को चादर मुंह पर लेकर लेटना पसंद नहीं है, वो कहना भी चाहता था कि मुंह से चादर हटा दो, लेकिन आसपास इतने सारे बड़े लोग थे कि उसने चुप रहना ही ठीक समझा। लोग आते थे और बड़े अजीब तरीके से उसके सिर पर या गाल पर हाथ फेरते थे, फिर चले जाते थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ऐसा क्या हो गया। उसने फिर नीचे देखा तो अपने पिता को सिर झुकाए बैठे देखा। 
बहुत गुस्से वाले थे पिता, सब जानते थे कि पिता को अगर गुस्सा आ गया तो वो किसी को नहीं बख्शते, उसने खुद कभी पिता को चिल्लाते या किसी को मारते नहीं देखा था, पर उसे उनसे बहुत डर लगता था। वो बहुत बड़े थे, बहुत बड़े, और उनका चेहरा भी बहुत कठोर था, जब वो आंख तरेर कर उसकी तरफ देखते थे तो उसके औसान ख़ता हो जाते थे। लेकिन ये भी सच है कि उसके पिता ने कभी उसे मारा नहीं था, कभी नहीं। 
उसे कभी पता नहीं चला कि मां के साथ उन लोगों ने क्या किया, हालांकि बाद में उसे समझ में आ ही गया, कि मां की चिता जला दी गई होगी, लेकिन उसे ये भी याद है कि उस समय, यानी जब मां की मौत हुई थी, तो उसके बाद काफी समय तक वो लोगों की बातचीत चुपचाप इसलिए सुनता था कि उसे पता चल जाए कि आखिर मां के साथ क्या किया गया है। लेकिन उसे बहुत देर तक पता नहीं चला था और आखिरकार वो भूल गया कि उसे जानना है कि उसकी मां के साथ क्या हुआ। 
बहुत दिनो तक घर में चुप्पी रही, पिता शाम को घर आते थे और बिना कुछ कहे-सुने अपने कमरे में चले जाते थे। दूर के रिश्ते की एक दीदी उसे सुबह तैयार करके स्कूल भेजती थीं, और जब वो स्कूल से घर वापस आता था तो उसे खाना देती थीं। कुछ दिनों बाद दीदी चली गईं, और उसे उसकी दादी के पास गांव भेज दिया गया। जब वो गांव से वापस आया तो घर बिल्कुल बदला हुआ था। पूरे घर में चहल-पहल थी। घर में तीन बच्चे थे, तीनो उससे बड़े थे, बहुत बड़े। उसे ऐसा लगा कि वो गलती से किसी और घर में आ गया हो। घर तो वही था बस बदल गया था, सबकुछ बदल गया था। पहले पिता सुबह सोते हुए दिखते थे, अब नहीं थे, रात को आते हुए दिखते थे, अब नहीं दिखते थे। हां, एक और महिला घर में थीं, जिन्होने सारे घर को संभाला हुआ था।
जब वो गांव से वापस आया तो उन्होने उसे अपने पास बुलाया और कहा, ”अब से मैं तुम्हारी मां हूं...... समझे....”
समझा तो वो कुछ नहीं, लेकिन उसे इतना समझ आ ही गया था कि उसकी मां अब नहीं आने वाली। उसने बिना कुछ सोचे-समझे सिर हिलाया और उस महिला को मां कहा। कुछ दिनो बाद उसे समझ में आया कि वो बच्चे जिन्हे उसने गांव से वापस आने पर अपने घर में देखा था, असल में उसके भाई-बहन थे, जिन्हे उसने उससे पहले कभी नहीं देखा था। मां, भाई-बहन, और उसके बाद कई ऐसे लोग उसने देखे जो पहले कभी नहीं देखे थे, जैसे मामा, सब उसे बदरी मामा कहते थे, उसके भाई-बहन बदरी मामा के आने पर बहुत खुश होते थे, और वो बच्चों के साथ खुश हो जाया करता था। हालांकि मामा और भी थे, लेकिन बदरी कुछ खास था, क्योंकि वो महीने में कम से कम तीन बार आता था, और तीन दिन से पहले वापस नहीं जाता था, कभी-कभी तो ज्यादा भी......
पहले तो घर में हुए इन बदलावों से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा, और फिर जब फर्क पड़ा तो जर्बदस्त पड़ा। उसे धीरे-धीरे लगने लगा कि ये जो महिला है, जिसे वो मां कहता है, असल में उसकी मां नहीं है, ये उसके भाई-बहन की मां है। क्योंकि वो उन्हे ही प्यार करती है, उन्ही की बात सुनती है, उन्ही का काम करती है। अपने कपड़े उसे खुद धोने होते थे, जो कि उसकी मां ने उसे साफ कह दिया था, वो खुद रसोई में जाकर खाना नहीं ले सकता था, क्योंकि उसकी मां ने उसे साफ मना कर दिया था। पहले वो खाने के बाद जाली वाली अल्मारी से गुड़ लेकर खाया करता था, उसे अच्छा लगता था। अब नहीं, अब जाली वाली अल्मारी में ताला लगा होता था, और वैसे भी उसे रसोई में जाने की मनाही हो गई थी। उसके भाई बहन शाम को दूध पीते थे, लेकिन उसे दूध नहीं दिया जाता था। और भी ऐसी कई बातें थीं, जिनसे उसे यूं कोई ऐतराज़ नहीं था, क्योंकि उसे पता ही नहीं था कि ऐसा क्यूं है, बस उसे यही बुरा लगता था कि उसे उसके भाई-बहनों से अलग व्यवहार मिल रहा है। व्यवहार का ये अलगाव उसे अपनी मां की लगभग हर बात में देखने को मिला, और पिता, वो पहले ही उससे बात नहीं करते थे, वो सिर्फ पिता को देखता था, और अब तो वो दिखना भी बंद हो गए थे, बस कभी-कभी उनकी झलक मिल जाती थी। 
अब वो खेलता नहीं था, क्योंकि जब भी वो खेलता था, कुछ ना कुछ ऐसा हो जाता था कि उसकी मां को उसे डांटना या मारना पड़ता था। हालांकि उसे समझ में आता था कि उससे गलती हुई है, बुरा उसे ये लगता था कि उसके सामने उसके भाई-बहनों को कभी डांट तक नहीं पड़ती थी। स्कूल से आकर वो हाथ मुहं धोता था और खाने का इंतजार करता था, अक्सर उसकी मां उसे सबसे उपर वाले कमरे में, जहां वो अब रात को सोता था खुद खाना दे जाती थी, लेकिन कभी-कभी मां भूल भी जाती थी, तब उसे बहुत देर तक इंतजार करना होता था, क्योंकि एक बार जब वो थोड़ी सी देर इंतजार करके मां से खाना मांगने चला गया था, तो उसकी मां ने उसे ये कहते हुए मारा था कि उसे थोड़ी सी देर का सबर नहीं था। वो मार से डरता नहीं था, बस उसे बुरा लगता था।
वो स्कूल से आकर सबसे पहले अपना होमवर्क पूरा करता था, क्योंकि करने को और कुछ था ही नहीं....इसके बाद वो अपने कपड़े धोता था, क्योंकि दूसरे दिन पहन कर जाने के लिए कपड़ों का होना ज़रूरी था, और स्कूल में ड्रेस पहन कर ना जाने पर टीचर भी सज़ा देते थे। अपने सारे काम, अपना खुद का ध्यान रखना उसकी आदत में इतनी सहजता से आ गए थे, कि जब तक उसकी उम्र कुछ समझने लायक हुई, और उसने ये समझा कि असल में वो महिला जिसे वो अपनी मां कहता है, वो उसकी मां नहीं है, तब तक उसे इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता था कि कोई उसकी मां है या नहीं, पिता है या नहीं, भाई-बहन हैं या नहीं। 
वो करीब 11 साल का था, जब उसके पिता मरे। उनका एक्सीडेंट हुआ, ऑफिस से वापस आते हुए, उनके स्कूटर को किसी कार ने टक्कर मार दी थी। दृश्य वही था, बस चेहरे बदले हुए थे, उसके पिता नीचे आंगन में लकड़ी की सीढ़ी, अब वो जानता था कि उसे अर्थी कहते हैं, पर लेटे थे, उनके उपर सफेद चादर थी, लेकिन उसे नहीं पता था कि पिता को सफेद चादर से मुंह ढंक कर सोने में कोई समस्य है या नहीं.......इस बार वो पिता की अर्थी के साथ शमशान घाट तक गया था, और जब उसके बड़े भाई ने चिता को आग दी तो उसे ये याद आ रहा था कि उसकी मां की चिता भी इसी तरह जली होगी, और उसके दिमाग में ख्याल आया कि आखिर उसकी मां की चिता को किसने आग लगाई होगी, क्योंकि उस समय तो उसका ये वाला बड़ा भाई वहां नहीं था। 
पिता के बाद घर में जिंदगी बहुत मुश्किल हो गई थी, उसकी मां ने उस पर ध्यान देना बिल्कुल बंद कर दिया था, घर में बदरी मामा, स्थाई रूप से रहने लगा था, और अब उसके भाई-बहन उसे मारते भी थे, मां भी मारती थीं, और बदरी मामा भी मारते थे। वो उसे गालियां देते थे, बार-बार उसे घर से निकल जाने के लिए कहते थे, और अक्सर उसे हरामी कहते थे। इतना ज्यादा कि उसका घर का नाम ही हरामी पड़ गया था। उसे पता था कि हरामी गाली होती है, लेकिन ये गाली बाकी गालियों से अलग थी, क्योंकि इसे उसने पहली बार अपने लिए, अपने घर में सुना था, और किसी से पूछा भी नहीं था कि आखिर इसका क्या मतलब होता है। उसे बहुत बाद में समझ आया कि जब कोई बिना शादी किए बच्चे पैदा करता है तो बच्चे को हरामी कहते हैं, इसलिए कि शादी नहीं हुई थी। जब उसे ये बाद पता चली तब उसे बहुत सी बातें नहीं पता थीं, जैसे ये कि शादी क्या होती है और कैसे होती है। जैसे ये कि बच्चे कैसे और क्यों पैदा किए जाते हैं, और भी कई बातें, जो उसे याद भी नहीं हैं, और जिनकी तरफ उसने बाद में कोई ध्यान भी नहीं दिया। खैर, इसी तरह पिटते-घिसटते उसने दो साल निकाल दिए, और आखिरकार उसकी मां और मामा के सब्र का पैमाना एक दिन छलक ही गया। 
मामा उसे लेकर घर से निकला, मामा के पास एक बैग था, और उसके पास अपने स्कूल बैग के अलावा अपने बड़े भाई का स्कूल बैग था, जिसमें उसके कपड़े थे। मामा उसे लेकर ट्रेन में चढ़ा और जाने कहां ले गया, उस शहर में मामा ने उसे शाम तक इधर से उधर घुमाया और आखिरकार एक ऑफिस में ले जाकर छोड़ दिया। उसके बाद से उसे अपना मामा आज तक नहीं दिखा। उसे बाद में पता चला कि उसका मामा उसे अनाथालय में छोड़ गया है, ऑफिस वालों ने उसे देखा, उससे काफी कुछ पूछने की कोशिश की, पहले तो वो इसलिए चुप रहा कि अगर उसने कुछ बोला जो बदरी मामा को पसंद ना आया तो बदरी मामा उसे मारेगा, और फिर जब उसे ये समझ आ गया कि बदरी मामा अब नहीं आने वाला, तो इसलिए नहीं बोला कि जो लोग उसे अपनी मर्जी से छोड़ गए हैं, उनका पता बताने से आखिर होगा भी क्या? 
और तबसे वो अनाथालय में ही रह गया, अच्छी जगह थी। आज उम्र के इस पड़ाव पर आने के बाद उसे लगता है कि अगर कुछ खामियों को छोड़ दिया जाए तो अनाथालय उसके अपने घर से अच्छा ही था। वहां समय से खाना मिलता था, सबको एक जैसा खाना मिलता था, कभी-कभी किसी दयालु इंसान के चलते बढ़िया खाना भी मिलता था, अनाथालय वालों को उसने अपना नाम विपिन गुलाटी बताया था, जो असल में उसके स्कूल में, उसकी ही क्लास में पढ़ने वाले एक लड़के का नाम था। फिर यही उसका असली नाम बन गया, विपिन गुलाटी, और उसका पुराना नाम, गौरव, खत्म हो गया, अब तो वो खुद भी भूल गया कि उसका नाम गौरव था। वैसे भी अब बचपन की यादें रखे रहना बेवकूफी ही है। उसे अपनी मां की याद नहीं आती, ना ही पिता की, अजीब बात है कि उसे अपनी नई मां अच्छी तरह याद है, और बदरी मामा, भाई-बहनों को वो अलबत्ता भूल चुका है। 
अनाथालय में उसने 12वीं तक पढ़ाई की, पढ़ाई में वो तेज़ था, इसलिए उन्होने ही उसकी स्कॉलरशिप का इंतजाम करवा दिया, उसने अपने कॉलेज की पढ़ाई खत्म ही, एक जॉब पकड़ी और अब वो पढ़ाई भी कर रहा है और जॉब भी कर रहा है। जॉब अच्छी है, उसे पसंद है। अनाथालय के जीवन की वो कई बुरी कहानियां सुन चुका है, खुद उसके जीवन में ऐसा कुछ बुरा नहीं हुआ। बहुत बचपन में ही उसे समझ में आ गया था, कि बुरा वो होता है जो ना हो, जो हो जाए उसे बुरा कहने, और समझने से खुद को बुरा लगने के अलावा कुछ नहीं होता, इसलिए उसे अपना जीवन कुछ खास बुरा नहीं लगा था। जो एक बात उसे बुरी लगती थी, और जिसका उसने पूरी जिंदगी विरोध किया था, वो ये कि कुछ दिनो के बाद अनाथालय में भी उसे हरामी सुनना पड़ा था, उसने विरोध किया था, लेकिन असल में वहां, लगभग हर दूसरे-तीसरे बच्चे को ये गाली, अक्सर सुनाई जाती थी। उसने जब भी ये गाली सुनी तब इसका विरोध किया, हालांकि उस समय उस बच्चे की बात कौन मानता, और फिर जब एक बार ये तय हो गया कि वो सीधा बच्चा है और पढ़ाई में तेज़ है तो उसे वैसे भी हरामी सुनाई देना बंद हो गया। 
उसकी कुल जिंदगी की जमापूंजी ये थी कि वो आज अपने पैरों पर खड़ा था, और खुद के लिए कमा रहा था, उसकी जिंदगी में एक लड़की थी जिसे वो पसंद करता था और आज उसके घर उसके परिवार वालों से मिलने जा रहा था, जहां उसे मिताली से अपने रिश्ते की बात शुरु करना थी। ये उसकी ही ज़िद थी कि मिताली उससे शादी करे तो घर वालों की मर्ज़ी से करे। अपने जीवन में उसने ना जाने कितने ऐसे बच्चे देखे थे जो किसी ना किसी की लव मैरिज का नतीजा थे, और अब अनाथालय में जी रहे थे। 
मिताली उसे समझा चुकी थी कि उसे परिवार वाले शादी के लिए नहीं मानेंगे और वो उससे वैसे ही शादी के लिए तैयार थी। समझदार लड़की थी और बहुत खोल के समझा चुकी थी कि वो और मिताली मिल कर इतना कमा रहे थे कि जिंदगी आराम से चल सकती थी, अगर परिवार वालें चाहें तो उनकी शादी में शरीक हो सकते हैं, लेकिन अपने रीति-रिवाज़ छोड़ कर, खुद मिताली अपने को नास्तिक कहती थी, और वो तो बहुत पहले ही नास्तिक हो गया था, हालांकि अनाथालय में हर रोज़ सुबह प्रार्थना उसे ही गानी पड़ती थी। लेकिन वो नहीं माना, उसे लगता था कि शादी हो तो घरवालों की मर्जी से हो ताकि बाद में बच्चा हो तो उसे कोई परेशानी ना हो। उसने अपने बारे में मिताली को सबकुछ बता दिया था। 
उसने फ्रिज खोल कर बोतल निकाली और गटागट आधी बोतल पानी पी गया। अचानक ठंडी हवा का झोंका आया। पास कहीं बारिश शुरु हो चुकी थी, उसने घड़ी की तरफ देखा, उसे अब निकल जाना चाहिए, उसे मिताली को गांधी पार्क से पिक करना था। 
मिताली का घर वैसा ही था जैसा मिताली ने उसे बताया था। नये ढंग का घर था जिसमें दीवारों से ज्यादा खिड़कियां थीं और बैठने की जगह से ज्यादा दिखाने की चीजें थीं। वो मिताली के परिवार से मिला, अच्छे लोग थे, चाय-नाश्ते के दौरान पहले उसने उन्हे बताया कि वो कौन है और कहां नौकरी करता है और फिर ये बताया कि वो और मिताली दोस्त हैं और इस रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहते हैं और इसके लिए उनकी मंजूरी चाहिए। मिताली के मां-पिता को इस बातचीत से किसी तरह का आश्चर्य नहीं हुआ, जिसकी वजह शायद ये थी कि वो पहले ही उन्हे उसके बारे में बता चुकी थी। हालांकि उन्होने कोई पक्का जवाब नहीं दिया, लेकिन उनके व्यवहार से उसे ऐसा लगा जैसे सब ठीक ही होगा। करीब डेढ़ घंटे बाद वो वहां से निकला, और अभी सड़क पर पहुंचा ही था कि उसे याद आया कि वो अपना रेनकोट भूल आया है। 
जब वो वापस मिताली के घर पहुंचा तो उसने उसके पिता की आवाज़ सुनी, वो कह रहे थे, ”मुझे और किसी चीज़ से कोई ऐतराज़ नहीं है, सिर्फ ये कि वो लड़का......बास्टर्ड है......” शायद मिताली को पता लग गया था कि दरवाजे पर कोई है। उसने दरवाज़ा खोला तो उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था, बहुत अर्से बाद उसने ये गाली दोबारा सुनी थी, जो कभी उसका नाम हुआ करती थी। बहुत मुश्किल से जब्त करके उसने बताया कि वो अपना रेनकोट भूल गया है, जो पास ही पड़ा था, उसने थोड़ा सा आगे बढ़कर रेनकोट उठाया और वहां से निकल गया। 
सड़क पर पहंुचते-पहुंचते उसकी आंखों में आसूं आ गए थे, वो जीवन भर नहीं रोया था, जब मां मरी, जब पिता मरे, जब वो अनाथालय गया, कभी नहीं......आज जाने क्यूं उसकी आंखों में आसूं आ गए। उसने रेनकोट कंधे पर रखा और अपनी आंखे पोंछी। जाने क्यूं उसका मन हुआ कि वो पीछे मुड़कर एक बार मिताली के घर को देखे। वो पीछे मुड़ा तो मिताली आ रही थी। वो रुक गया, वो शायद माफी मांगे या ऐसा ही कुछ कहे, खुद का भरसक संयत बनाए रखने की कोशिश करते हुए वो रुका रहा। 
”क्या हम तुम्हारे घर रह सकते हैं.....मैं अब इस घर में नहीं रहना चाहती......” मिताली ने उसका हाथ पकड़ लिया। एक अजीब सी गर्मी उसके  जिस्म में भर गई। अब उसे मिताली के पिता पर, अपने मां-पिता पर और पूरी दुनिया पर गुस्सा नहीं आ रहा था। वो मिताली का हाथ पकड़े-पकड़े आगे बढ़ गया। 

बुधवार, 8 जून 2016

पार्टिंग गिफ्ट



बैग का क्लैस्प बंद करते हुए वो घर से निकली, उसे याद आया कि उसने बाहर वाले गेट की चाबी तो अंदर भी छोड़ दी है। भुनभुनाते हुए वो फिर अंदर गई, और चाबी ढूंढने लगी, एक पल रुक कर सोचा कि पिछली रात चाबी कहां रखी थी, उसे फौरन याद आया कि चाबी, बाहर वाले पलंग पर ही रखी थी, जहां सारा सामान रखा होता है। उसे एक ही नज़र में दिख गई, उसने चाबी उठाई, चप्पल फिर से पहनी और बाहर निकल कर दरवाजा बंद कर दिया। 
मौसम अच्छा था, आसमान में बादल थे, और हवा चल रही थी। उसे ऐसा मौसम पसंद था, हवा चल रही हो, तो उसका बिगड़ा दिल भी खुश हो जाता है। वो तेज़ी से चलने लगी, तेज़ चलना उसकी आदत है, वो कभी धीरे नहीं चलती, हमेशा तेज़ कदम चलती है, पहले इसलिए तेज़ चलती थी क्योंकि उसे हर जगह पहुंचने की जल्दी होती थी, फिर तेज़ चलना आदत बन गया, और अब उसे पास काफी टाइम हो तो भी तेज़ ही चलती है। बाहर जाकर ऑटो पकड़ना था। ये दिल्ली शहर की सबसे बड़ी समस्या यही है कि ऑटो नहीं मिलता, मिलता है तो ऑटो वाला ठीक नहीं होता, मीटर खराब होता है, और अगर सब सही हो तो सड़कों पर ट्रैफिक इतना होता है कि सब कुछ ठीक होते हुए भी मूड खराब हो जाता है। 
बाहर निकल कर उसने इधर-उधर देखा, बताओ, रोज़ यहां पचीसों ऑटो खड़े होते हैं, और आज एक नहीं दिख रहा। पर मौसम अच्छा था, हवा अच्छी थी, उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। वो पैदल ही सड़क की तरफ चलने लगी, वहां से पक्का ऑटो मिल जाएगा। आज बहुत दिनों बाद ऑफिस से जल्दी घर पहुंची थी, और दोस्तों के साथ फिल्म का प्रोग्राम बना था। उसके कॉलेज के दोस्त, पहले फिल्म देखेंगे, फिर कहीं बाहर खाना खाएंगे और फिर वापस घर, वैसे भी कल संडे है और संडे का दिन वो ज्यादातर सोकर ही गुज़ारती है। 
सड़के मुहाने पर आकर वो खड़ी हो गई, कोई ना कोई ऑटो रुक ही जाएगा, उसने सोचा। पहले सोचा सिगरेट पी लिया जाए, लेकिन......बाहर सड़क पर सिगरेट पीना उसे ठीक नहीं लगा, अपने घर या ऑफिस में सिगरेट पी सकती है, दोस्तों के साथ रेस्टोरेंट में भी पी ही जा सकती है, लेकिन सड़क पर खुलेआम, ना कभी नहीं, वो बहुत झेल चुकी है। खुलेआम सिगरेट सिर्फ लड़के पी सकते हैं, उसका मूड फिर से खराब होने ही वाला था, कि हवा का एक झोंका चेहरे पर लगा और वो फिर से मुस्कुराने लगी। चलो कुछ नहीं, ऑटो में बैठ कर सिगरेट पी लेगी, ऑटो वाला कुछ भी सोचे उसे क्या फर्क पड़ता है। दिल्ली में इतने ऑटो हैं कि उसे लगता है कि अगर वो रोज़ दो ऑटो ले तो भी दोबारा एक ही ऑटो का नंबर नहीं आने वाला। 
वो ये सब सोच ही रही थी कि एक कार उसके पास आकर रुकी, अच्छी कार थी, उसे कारों का मेक और मॉडल कभी याद नहीं रहता, लेकिन ये शायद एस यू वी थी, उसकी तरफ वाला शीशा खुला, अंदर एक भली शक्ल वाला लड़का बैठा था। ”आगे कहीं जाना हो तो मैं छोड़ देता हूं......” उसने रुक कर एक पल सोचा, क्या ये ठीक होगा। यूं ही ऐसे ही किसी से लिफ्ट ले लेना। नहीं। उसने सिर हिलाया, और भरसक मुस्कुरा कर कहा, ना ना, अभी ऑटो आ जाएगा। 
”अरे मैने आपको कई बार यहीं खड़े देखा है, ऑटो के इंतजार में......आ जाइए” लड़के ने अधिकारपूर्वक दरवाज़ा खोल दिया। उसने एक मिनट के लिए सोचा, फिर ना जाने क्या सोचकर वो कार में बैठ गई, वैसे भी उसे आगे ही जाना था। 
”हाय मेरा नाम धीरज है......” लड़के ने कार आगे बढ़ाते हुए अपना हाथ आगे कर दिया। उसने हाथ मिलाया, ”मैं आरती....” लड़का अच्छा हैंडसम था। 
”यहीं कहीं रहती हैं आप....मैने कई बार आपको यहां ऑटो लेते देखा है....” लड़के ने कहा, ”मेरा रास्ता यही है, नोएडा में फैक्टरी है, इसलिए इसी रास्ते से जाता हूं....”कुछ सफाई सी देते हुए वो बोला।
वो उसे नहीं बताना चाहती थी कि वो कहां रहती है, जाने कौन है, कैसा है। ”हां यही पास में रहती हूं.....” उसने गोल-मटोल जवाब दिया, ऐसे लहजे में ताकि वो समझ जाए कि वो बताना नहीं चाहती कि वो कहां रहती है। 
धीरज मुस्कुराया, ”चलिए....ये तो बताइए कि कहां जाना है......उसमें तो कोई हर्ज़ नहीं ह ैना....”
वो मुस्कुराई, ”आगे जाना है, वली मार्केट वाली रेड लाइट तक.....वहां मेरे दोस्त इंतजार कर रहे हैं....”
”ओ....तो दोस्तों के साथ प्रोग्राम है.....बढ़िया.....करती क्या हैं आप....”
”प्रॉडक्ट डिजाइनर हूं.....” इससे ज्यादा इन्फॉर्मेशन नहीं.....उसके दिमाग ने उसे सतर्क किया.....
”ओह....डिजाइनर हैं.....हूं....अच्छा....क्या प्रोडक्ट डिजाइन करती हैं आप”
”कुछ नहीं....एक्चुअली, आई वर्क विद है कन्सल्टेन्सी फर्म....सो वी डिजाइन आइडियाज़.....आई मीन....वी प्रिपेयर द होल कॉन्सेप्ट टू एग्जीक्यूशन डीटेल ऑफ द प्रॉडक्ट टू बी लांच्ड......”
”वाओ.....”
पता नहीं वो कितना समझा था.....लेकिन चेहरे से इम्प्रेस दिख रहा था। पता नहीं उसने उसे क्यों ये सब बता दिया......खैर....उसे जहां उतरना था वो जगह पास ही थी....इसलिए वो निश्चिंत हो गई। 
”लीजिए......” उसने चौंक कर सामने देखा तो जर्बदस्त ट्रैफिक जाम दिखाई दिया। ”मैं यहीं उतर जाती हूं.....पास ही है अब तो.....”
”पास.....! अरे अभी करीब दो किलोमीटर दूर है.....अच्छा रुकिए....” धीरज ने कार थोड़ी सी बैक की और पास वाले मोड़ पर मुड़ गया। ”ये रास्ता खराब है, लेकिन वहां तक पहुंच ही जाएगा। कम से कम जाम से तो अच्छा है।” रास्ता अनजाना था, लेकिन अब उसे लगा कि कुछ कहना बेकार है।
और थोड़ी देर बाद वो वापस मेन रोड पर आ गए। 
”अच्छा....ये मोड़ पार करने के बाद, आपकी वाली सड़क आ जाएगी....मुझे यहीं मुड़ना है.....इज़ इट ओके....”
”या या....” उसने कहा। 
”अगर ऐतराज़ ना हो तो अपना नंबर दे दीजिए.....” धीरज ने कहा। उसने एक पल के लिए सोचा.....फिर जाने क्या सोच कर अपना नंबर दे दिया। वो कार का दरवाजा बंद करके थोड़ा आगे चली ही थी कि उसका फोन बजा। देखा तो कोई अनजाना नंबर था। उठाया तो पता चला धीरज ही है। 
”मैने सोचा कि आपके पास मेरा नंबर भी तो हो.....सेव कर लीजिए” 
”ओके....” उसने कहा। लेकिन नंबर सेव नहीं किया। वैसे भी क्या करना था सेव करके। वो मन ही मन मुस्कुराती हुई चलने लगी। दोस्त सामने ही खड़े थे, लगभग सारे पहुंच गए थे, बस उसका इंतजार था। फिर दोस्तों के साथ, मस्ती, मूवी, खाना फन और वो सबकुछ भूल गई। 
कुछ दिनो बाद वो फिर से सड़क पर खड़ी थी। इस बार दूसरी तरफ.....आज उसे ऑफिस जाना था, गर्मी ज्यादा थी और उसका मूड खराब था, सड़क पर ट्रैफिक सरक-सरक कर चल रहा था, और उसे आज भी घर के पास ऑटो नहीं मिला था। उपर से उठने में देर हो गई थी, और बॉस वैसे ही नाराज़ चल रहा था। उसका फोन बजा, उसने झल्लाते हुए बैग से फोन निकाला, अनजाना नंबर था, 
”हैलो....” उसने कहा। 
”मैं हूं धीरज.....आज इस तरफ ऑटो लेने के लिए खड़ी  हो.....”
उसे अचानक तो याद ही नहीं आया कि कौन धीरज, किसका धीरज.....फिर अचानक सब दिन की तरह साफ हो गया। पर इसने फोन कैसे कर लिया.....अरे उसने ही तो नंबर दिया था। चुप्पी मोबाइल के हिसाब से ज्यादा लंबी हो गई थी। 
”मेरा नंबर सेव नहीं किया था ना......बढ़िया”
”अरे वो बात नहीं है....लेकिन....”बढ़िया”
”अरे वो बात नहीं है....लेकिन....”
”अपने दांयी तरफ देखो......” उसने नज़र घुमाई तो उसी एस यू वी में धीरज हाथ हिला रहा था। थोड़ी ही देर में धीरज ने कार उसके बगल में रोक कर दरवाजा खोला।
”अरे मैं चली जाउंगी.....” उसने कहा।
लेकिन धीरज दरवाजा खोल चुका था। पीछे लोगों ने हॉर्न बजाना शुरु कर दिया था। वो कार में बैठ गई। 
”क्या बात है भई.....मैंने देखा कि तुम खड़ी हो तो.....”
”थैंक यू....” अब वो और क्या कहती, ये कि उसे पसंद नहीं था कि कोई अनाजाना आदमी उसे गाहे-बगाहे लिफ्ट दे। फिर ऑफिस के लिए देर हो रही थी, और गर्मी इतनी थी कि तौबा, कम से कम कार में एसी तो चल रहा था। उसने बैग से रुमाल निकाल कर माथे का पसीना पोंछा, और धीरज की तरफ देख कर मुस्कुराई। 
”कुछ नहीं....यूं ही....सोचा तुम तकलीफ......”
”क्या बेकार की बात करती हो.....तुम्हारे जैसी खूबसूरत लड़की....और तकलीफ” फिर वो हंसने लगा। वो भी हंस दी।  
कार धीरे-धीरे सरक रही थी, ट्रैफिक जाम बहुत ज्यादा था। लेकिन कम से कम ऑटो की आफत से तो बची हुई थी, आखिर डी एन डी आकर ट्रैफिक कुछ हल्का हुआ, लेकिन उन दोनो के बीच बातों का सिलसिला चल निकला था। ऐसे ही, हल्की-फुल्की बातें, लेकिन ऐसी बातें जिनसे एक दूसरे के बारे बहुत कुछ पता चलता है, जैसे वो दिल्ली का ही था, बहुत पहले पुरखे दिल्ली आए थे, और उसके पापा पहले सरकारी अफसर थे, फिर वी आर एस लेकर अपना बिजनेस शुरु कर दिया था, जो बहुत अच्छा चल रहा था, और अब तो बढ़ रहा था, जैसे वो अमेरिका से बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई करके आया हुआ था, और अब पूरे बिजनेस की जिम्मेदारी वही उठा रहा था, जैसे उसकी कोई गर्लफ्रेण्ड नहीं थी। इतना हैंडसम लड़का और कोई गर्लफ्रेंड ना हो, वो नहीं मानी, कम से कम मन में नहीं मानी। लेकिन ठीक था, क्या बुरा था, वैसे भी उसकी सारी दोस्त उसे ताना देती थीं कि उसका कोई ब्वायफ्रंेड नहीं है। 
और आखिर उसकी मंजिल आ गई, वो कार से उतर गई, इस बार उसने उतर कर उसके नंबर के साथ नाम भी सेव कर लिया। 
दिन गुज़रते गए और वो कभी ना कभी उससे मिलता रहा, कभी-कभी वो उसके इलाके में आता था तो दोनो कहीं कॉफी पीते थे, या खाना भी खा लेते थे, लेकिन ना उसने कभी पूछा, और ना कभी उनके बीच किसी तरह के रिश्ते की बात चली। और जब रिश्ता हुआ तो अचानक बिना कुछ सोचे समझे हुआ। बारिश हो रही थी, और उसकी कार कहीं बहुत दूर खड़ी थी, घर ज्यादा पास था, तो बिना सोचे वो उसे घर ले आई, घर में दोनो ने गीले कपड़े उतारे और बदन पोंछे, हालांकि धीरज लिए कपड़े नहीं थे लेकिन कुछ ना कुछ जुगाड़ हो गया, उसने चाय बनाई, चाय वो अक्सर अच्छी बनाती है, लेकिन धीरज चाय नहीं पीता था। और वो दोनो बैठ गए, कुछ देर बातें होती रहीं, फिर धीरज लेट गया, बारिश हो रही थी, और मौसम हल्का सर्द सा हो रहा था, जाने कब वो भी धीरज की बगल में लेट गई, और सब कुछ बहुत सहजता के साथ हो गया। 
इसके बाद लगभग सिलसिला ही बन गया, लगभग हर तीसरे-चौथे दिन धीरज उसके घर आ जाता था और फिर चला जाता था। ना उसने इसके आगे सोचा ना धीरज ने कभी इससे आगे की बात की। 
फिर एक दिन धीरज ने उसे अपने घर बुलाया, मम्मी-पापा कहीं बाहर गए हुए थे, वो उसके घर जाने के लिए बहुत उत्साहित थी। वो पहली बार धीरज के घर जा रही थी। घर क्या था, पूरी कोठी थी, बाहर गार्ड था, आलीशान महल जैसी कोठी। वो थोड़ा नर्वस थी, उसका अपना किराए का घर कईयों की तुलना में बहुत बड़ा था, लेकिन धीरज के घर के सामने तो......पर अपनी नर्वसनेस को अपने ही अंदर दबाते हुए वो धीरज के साथ उसके घर चली गई। धीरज ने उसे सारा घर दिखाया, अपना कमरा दिखाया और वो सब जो उसका था। फिर वही सब जो होना था, और आखिर में धीरज ने उसे सोने के ईयरिंग गिफ्ट किए। घर आई तो वो बहुत खुश थी, धीरज अच्छा खासा खूबसूरत आदमी था, ईमानदार था, वरना उसे अपने घर क्यूं ले जाता? उसे अचानक अपना भविष्य सुंदर लगने लगा। उस रात उसे बहुत अच्छी नींद आई। 
उसके बाद धीरज उसे नहीं मिला, उसने जब भी फोन किया, तो या तो फोन बिज़ी मिला या फिर धीरज ने फोन काट दिया। आखिर मन कड़ा करके वो धीरज के घर पहुंची, पहले तो यही समझ में नहीं आया कि क्या कहेगी, अगर धीरज के मम्मी-पापा हुए तो उन्हे क्या कहेगी। लेकिन चौकीदार ने कुछ नहीं कहा, जब उसने बताया कि वो धीरज से मिलने आई है तो चौकीदार ने गेट खोलकर उसे एक और नौकर के हवाले कर दिया। नौकर उसे आलीशान ड्राइंगरूम में बिठा दिया और फिर चला गया, कुछ देर बाद धीरज नीचे आया, उससे बहुत अच्छी तरह मिला, उसे समझ ही नहीं आया कि आखिर क्या हुआ। आखिरकार उसने पूछ ही लिया कि वो उससे बात क्यों नहीं कर रहा, मिल क्यों नहीं रहा। हंसते हुए धीरज ने कहा कि वो रिश्ते को आगे नहीं बढ़ाना चाहता, ये तो उसे तब भी समझ जाना चाहिए था जब धीरज ने उसे पिछली मुलाकात में पार्टिंग गिफ्ट दिया था, हालांकि वो चाहे तो वो उसकी और आर्थिक मदद कर सकता है। 
उसे समझ नहीं आया कि वो क्या कहे। सोने के वो ईयरिंग सामने ही पड़े थे, उसने उन्हे हाथ में उठा लिया, थोड़ी देर उन्हे अपनी उंगलियों में घुमाती रही, उसे जाने क्यों वो अपने से ज्यादा भारी लग रहे थे। उसने एक बार गौर से उन्हे देखा और फिर बाल्कनी में जाकर उन्हे बाहर फेंक दिया। 

सोमवार, 16 मई 2016

मौत


समय सारे दुख भुला देता है। ये डायलॉग वो बचपन से लेकर अब तक ना जाने कितने लोगों के मुहं से कितनी ही बार सुन चुका था। ये समय सुसरा सबका ठेकेदार क्यों बना बैठा है? उसने जोर से सिगरेट का कश खींचते हुए सोचा। आखिर सभी लोग तो अपना दुख भुलाना नहीं चाहते होंगे, कुछ लोग याद भी करना चाहते होंगे। उसने सोचा। सिगरेट खत्म हो चुकी थी और वो टोटे को पीछे नाली में फेंक कर मुंडेर पर से उठ कर खड़ा हो गया। 


परशुराम ने चाय बना ली होगी, वो दादा के सामने सिगरेट नहीं पीता, हालांकि दादा को पता है कि वो सिगरेट पीता है। जब घर में होता है सिगरेट पीने के लिए यहीं आता है, नाले के पास सिगरेट वाले की दुकान पर, यहां चाय भी मिल जाती है। हालांकि उसे इस दुकान की चाय पसंद नहीं है, लेकिन चाय वो कैसी भी पी लेता है। पर आज परशुराम जल्दी आ गया था और अब तक उसने चाय बना ली होगी। परशुराम उसके दादा का ख्याल रखता था, जो अब करीब अस्सी बरस के हो चुके थे और उन्हे हर काम के लिए किसी की मदद दरकार थी। 
अरविंद के रिश्तेदारों में बस यही एक बचे थे जिनकी अरविंद को परवाह थी। वो सुबह उठकर उनके लिए पानी गरम करता था, फिर उन्हे नहलाता था, और फिर उन्हे तैयार करके बैठा देता था। इसी वजह से उसका रूटीन अच्छा हो गया था, पांच बजे उठना और फिर दादा को तैयार करके घूमने चले जाना, फिर आकर चाय बनाना, अखबार पढ़ना और ऑफिस की तैयारी करना। उसका ऑफिस घर से बहुत दूर नहीं था, और ना ही ऑफिस में समय की कोई पाबंदी थी, इसलिए उसे कोई खास परवाह नहीं थी कि वो कितने बजे घर से निकलता है, लेकिन दादा की वजह से उसे शाम के समय घर पर ही होना होता था, क्योंकि परशुराम पांच बजे के बाद घर पर नहीं रुकता था। वो ठीक नौ बजे आता था और पांच बजे चला जाता था, चाहे अरविंद तब तक घर पहंुचे या नहीं। 
एक बार ऑफिस की ही एक लड़की से उसका मुआश्का चल बैठा, उसे बहुत मज़ा आया। लेकिन जाहिर है, कोई नया इश्क करेगा तो समय मांगेगा, और वो पांच बजे के बाद ऑफिस तक में रुकने से कतराता था, तो लड़की के साथ बाहर घूमने कैसे जाता। लिहाजा उसका ये इश्क बहुत कम उम्र में ही फौत हो गया। उसे इसकी भी परवाह नहीं थी। उसकी लड़कियों में कुछ खास दिलचस्पी ही नहीं थी, दादा को दिखाई भी कम देता था और सुनाई भी कम देता था, इसलिए घर की प्राइवेसी में वो खुद को संतुष्ट रखता था। 
खाना खुद बनाता था और जैसा भी हो दादा चुपचाप खा लेते थे। काम ठीक था, सैलरी ठीक थी, और आगे का उसने कुछ सोचा नहीं था। जिंदगी चल रही थी जैसे सबकी चल रही थी, किसी की थोड़ा ज्यादा रुआब में तो किसी की थोड़ा कमतरी में। उसे अपनी जिंदगी से कुछ खास शिकायत नहीं थी, पिता ये घर छोड़ गए थे, बैंक बेलेंस भी छोड़ गए थे, और दादा के पास अपना भी कुछ रुपया था। बस यही था कि वो अकेला था, जो कभी-कभी उसे बुरा लगता था। ऐसे में वो किताबें पढ़ता था, लेकिन आखिर कोई किताबें भी कब तक पढ़ सकता था। 
परशुराम ने चाय बना रखी थी, जब वो घर में दाखिल हुआ तो परशुराम दादा को नाश्ता करवा रहा था। वो किचन में गया और अपने लिए एक गिलास चाय डाल लाया। आज उसे ऑफिस जल्दी जाना था, उसका एक प्रेजेंटेशन था, और ऐसे मौकों पर वो जल्दी जाना पसंद करता है। बाहर से कोई टीम आ रही थी जिसने उसके प्रापोज़ल पर ही काम उसकी कंपनी को देने की सहमती दी थी। कंपनी में उसके बॉस ने उसे इशारतन बताया था कि अगर कंपनी को ये प्रोजेक्ट मिल जाता है तो पहली बार वही इस प्रोजेक्ट को हेड करेगा और उसकी सैलरी भी बढ़ा दी जाएगी। हालांकि उसे सैलरी बढ़ने की उतनी खुशी नहीं थी, जितना इस बात का उत्साह था कि एक बार प्रोजेक्ट हेड हो जाने से उसके लिए और कई रास्ते खुल जाएंगे। 
वो तैयार हुआ और ऑफिस के लिए निकल पड़ा। ऑफिस में सिर्फ एलेक्स आया हुआ था, जिसने उसका बैग लिया और उसके कमरे में चला गया। उसकी आदत है कि वो ऑफिस में घुसते ही पहले एक कप चाय पीता है और उसके साथ सुट्टा लगाता है, फिर कोई काम करता है। अभी सबके आने में समय था, तब तक मैं कॉन्फ्रेंस रूम तैयार कर लूंगा, उसने सोचा। साढ़े बारह बजे टीम आ गई और उसका प्रेजेंटेशन चालू हुआ, दो बजे के करीब लंच की कॉल हुई और पौने तीन बजे वो फिर कॉन्फ्रेंस रूम में थे। प्रेजेंटेशन तो कुछ खास लंबी नहीं थी, लेकिन सवाल जवाब और बाकी चीजों में साढ़े चार बज गए। अब उसे घर जाना था, उसके बॉस को भी ये बात पता थी कि उसे घर जाना है, लेकिन टीम को भी छोड़ा नहीं जा सकता था। खैर पौने चार तक सब लोग चले गए, बॉस ने उसे बधाई दी और विश्वास दिलाया कि काम उन्हे ही मिलेगा और इस प्रोजेक्ट को वही हेड करेगा। 
वो सवा पांच बजे के करीब घर पहंुचा, तब तक परशुराम घर पर ही था। उसने घर पहंुच कर परशुराम को विदा किया, और थोड़ी देर दादा से बात करने के बाद बाहर वाले कमरे में आकर सोफे पर लेट गया। पता नहीं कब उसकी आंख लग गई, और मोबाइल की घंटी से उसकी आंख खुली। उसने पहले घड़ी की तरफ देखा, साढ़े सात, इस समय मुझे कौन फोन करेगा, उसका पहला ख्याल था। खैर फोन देखा तो किसी अंजान नंबर से फोन था। निवेदिता का फोन था, निवेदिता?? उसे समझ नहीं आया। फिर याद आया, टीम में एक लड़की थी, जिसने कुछ खास नहीं पूछा था। निवेदिता ने उसे बताया कि काम उन्हीं को दिया जा रहा है, और उसके ऑफिस से उसे इस प्रोजेक्ट का कोऑर्डिनेटर बनाया गया है। ”बहुत अच्छे....” उसने कहा। तय हुआ कि कल निवेदिता उसके ऑफिस आ जाएगी और फिर जो फॉर्मेलिटीस बाकी बची हैं, पूरी कर ली जाएंगी। 
उसने फोन काट कर खाने की तैयारी की, दादा को खाना खिलाया और फिर खुद भी खाया, और फिर ”लव इन द टाइम ऑफ कौलेरा” लेकर सोने चला गया। यही तो उसकी जिंदगी थी। 
..........
दूसरे दिन उसके ऑफिस में उससे पहले निवेदिता पहुंची हुई थी। वो उसे अपने कमरे में लेकर गया, और फिर उसे वहीं बैठा छोड़ कर बाहर आ गया, ऐलेक्स ने उसकी चाय रखी हुई थी, वो वहीं बाहर बैठ कर चाय और सिगरेट पीने लगा। थोड़ी देर में निवेदिता भी चाय का कप हाथ में थामें बाहर आ गई। ”मुझे भी एक सिगरेट मिलेगा” उसने सहज भाव से पूछा। अरविंद ने सिगरेट का पैकेट निवेदिता की तरफ बढ़ा दिया। निवेदिता ने बिल्कुल पेशेवर स्मोकर्स की तरह सिगरेट सुलगाया और कश खींचा। थोड़ी देर बाद वो दोनो उठ कर अरविंद के कमरे में आ गए और दोनो ने अपना काम शुरु कर दिया। प्रोजेक्ट कुछ खास मुश्किल नहीं था, और निवेदिता भी अपने काम में माहिर थी, इसलिए दोनो को ही साथ काम करने में मजा आने लगा था। शाम तक उसने काफी काम निपटा दिया था, अब बस प्रोजेक्ट को एग्जीक्यूशन पर जाना था। उस शाम वो निवेदिता के साथ ही ऑफिस से निकला और उसे ऑटो पकड़ा कर उसने घर का रुख किया। उसे पता नहीं क्यों कुछ अलग-अलग सा लग रहा था, कुछ तो फर्क था। आज वो आस-पास से बेपरवाह नहीं था, घर के पास वाले मैदान में खेलते बच्चे उसे दिखाई दिए, बसें, कारें, साइकिल पर जाते लोग, उसे सब िदखाई दे रहे थे, और अपने घर के आस-पास के पेड़ भी उसे दिखाई दिए। कमाल है, आज ऐसा क्या हो गया, उसने सोचा। और फिर जाने क्या सोचकर मुस्कुरा दिया। फिर उसे अपनी उस मुस्कुराहट पर गुस्सा आया, लेकिन वो अपने मूड में गुस्सा पैवस्त नहीं कर पाया। 
घर पहुंच कर उसने दादा से बात की, पर आज की बातों में भी फर्क था, जिसे शायद दाद ने भी महसूस किया, क्योंकि वो भी मुस्कुरा रहे थे। फिर वो किचन में गया और अपने और दादा के लिए बढ़िया चाय तैयार की। आज चाय भी बहुत अच्छी बनी थी। फिर उसने खाना बनाने के बारे में सोचा। वो बहुत सादा खाना बनाता है, क्योंकि किचन का काम तो उसे ही करना पड़ेगा। लेकिन आज उसने दाल भी बनाई और सब्जी भी, थोड़ा सलाद भी काटा, और फिर दादा को खाना देकर, मजे से खाना खाया। हालांकि पढ़ना उसे पसंद था, लेकिन आज कुछ पढ़ने का मन नहीं कर रहा था, वो दादा को कहकर बाहर निकल गया। आज उसका मार्केट में घूमने का मन था, शॉपिंग वो संडे को ही कर चुका था, लेकिन आज उसका घूमने का मन था। थोड़ी देर वो यूं ही गलियों में घूमता रहा, और फिर थक कर वापस आ गया। दादा सो चुके थे, वो भी अपने बिस्तर पर गया और लेट गया। 
................

उसने और निवेदिता ने पांच महीने में प्रोजेक्ट खत्म कर दिया। इस बीच वो दोनो बहुत अच्छे दोस्त बन चुके थे। निवेदिता जानती थी कि वो शाम को घर जाता है, जो उसकी मजबूरी है। इसलिए वो कभी बाहर साथ घूमने तो नहीं गए, लेकिन अक्सर लंच दोनो ऑफिस से बाहर ही करते थे। निवेदिता खास अच्छी लड़की थी, बहुत इंटेलिजेंट, अपने काम में माहिर और बिंदास। 
वो निवेदिता के साथ अच्छा महसूस करता था, वो निवेदिता के बाद अच्छा महसूस करता था। वो निवेदिता के साथ रहना चाहता था। निवेदिता भी इशारतन ये जता चुकी थी कि वो उसे पसंद करती है। ”घर चलोगी मेरे....?” उसने पूछा। ”ऑफिस के बाद.....ज़रूर.....क्या खिलाओगे.....?” निवेदिता ने पूछा। ”बोलो क्या खाओगी?” उसने फौरन सवाल दागा। फिर खुद ही बोला, ”पास की दुकान में समोसे बहुत बढ़िया बनते हैं.....खाओगी?” ”हां....क्यूं नहीं....फिर तुम चाय भी तो पिलाओगे, जिसकी तुम इतनी बड़क मारते हो....” ”हां हां, क्यों नहीं.....”
शाम को वो दोनो उसके घर की तरफ चले, उसने घर जाकर पहले परशुराम को रिलीव किया, और दादा को निवेदिता से मिलवाया। वो थोड़ा सा आशंकित था कि जाने निवेदिता क्या सोचेगी। लेकिन निवेदिता तो दादा से ऐसे बात करने लगी जैसे ना जाने कबसे उन्हे जानती हो। ”तुम दादा के साथ बात करो, मैं समोसे लेकर आता हूं.....” वो मार्केट गया और पांच समोसे ले आया। घर आकर देखा तो निवेदिता उसकी किताबों का रैक देख रही थी। ”बहुत पढ़ते हो यार.....” ”हां.....वो ऐसे ही.....चाय बना रहा हूं” वो किचेन में घुस गया। थोड़ी देर बाद निवेदिता भी किचेन में आ गई। वो थोड़ा नर्वस था, आज तक उसकी किचेन में कोई लड़की नहीं आई थी। निवेदिता थोड़ा उचक कर कबर्ड पर बैठ गई, और अपने आप, लिफाफे में से निकाल कर समोसा खाने लगी। उसने समोसों को तस्तरी में डाल दिया और फिर चाय ढालने लगा। चाय लेकर वो बाहर आ गया, दोनो ने बातें करते हुए चाय खत्म की, और फिर थोड़ी देर और बात की। ”सिगरेट पिएं.....” अचानक निवेदिता ने पूछा। उसने एक बार दादा के कमरे की तरफ देखा। फिर थोड़ा संकोच में कहा, ”पीछे की तरफ चलकर पीते हैं......दादा हैं ना.....” वो दोनो बाहर आ गए। दोनो ने एक ही सिगरेट पिया और थोड़ी देर वहीं बैठकर बातें करने लगे। ”चलो.....अब मुझे जाना होगा, वरना देर हो जाएगी तो......” निवेदिता उठते हुए बोली। वो भी उठ गया। निवेदिता ने अपना बैग उठाया और दरवाजे की तरफ बढ़ी, वो निवेदिता के बिल्कुल पीछे था। दरवाजे के पास जाकर निवेदिता घूमी और उसे गले लगा लिया। वो अचकचा गया.......लेकिन उसे अच्छा लगा, और उसके हाथ निवेदिता की पीठ पर जाकर टिक गए। बहुत सुखद अहसास था। निवेदिता ने दरवाजा खोला और चली गई। 
उसे पूरी रात नींद नहीं आई। क्या हुआ, क्या हो सकता था, क्या हो सकता है? जैसे सवाल पूरी रात उसके दिमाग में घूमते रहे, और वो आंख फाड़े छत को देखता रहा। सुबह के तीन बजे उसे नींद आई और उठने में साढ़े सात बज गए। जब उठा तो जल्दी से दादा के कमरे की तरफ गया। दादा जाग चुके थे, और शायद उसे आवाज़ लगा कर थक चुके थे। खैर उसने दादा को किसी तरह शांत किया और फिर उन्हे नहलाया। फिर जल्दी से चाय बनाई, पूरा रुटीन खराब हो चुका था। जब तक वो सारे काम निबटाता तब तक परशुराम आ गया था, वो जल्दी से तैयार होकर ऑफिस चला गया। 
ऑफिस में निवेदिता के व्यवहार में कोई फर्क नहीं था। वो तो बिल्कुल ऐसे बात कर रही थी जैसे कल कुछ हुआ ही ना हो। और इधर वो था, जिसके रोम-रोम से ये आवाज़ आ रही थी कि उसकी जिंदगी बदल चुकी है। वो काम खत्म कर चुके थे, आज निवेदिता का उसके ऑफिस में आखिरी दिन था। अब अगर उसे निवेदिता को मिलना हो तो उसके ऑफिस जाना पड़ेगा। यानी अपने ऑफिस के बाद, जो संभव नहीं था, क्योंकि उसे अपने दादा की देखभाल करना थी, जिसके लिए उसे हर हाल में पांच बजे घर पहुंचना था। दिन खत्म हुआ, सब लोग ऑफिस से जाने लगे, निवेदिता ने सबाके बाय कहा, फिर ऑफिस में सबके सामने उसके गले लगी, और उसे स्पेशली थैंक्स कहा और चली गई। 
अब कुछ नहीं हो सकता। जिंदगी वैसी ही चलेगी, जैसी अब तक चल रही थी। वो घर जाते हुए सोच रहा था। आज उसका ध्यान पास के मैदान में खेल रहे बच्चों की तरफ नहीं गया, ना उसे पेड़ दिखाई दिए, ना बसें, ना मार्केट। घर में उसने बुझे मन से परशुराम को रिलीव किया, और दादा के साथ जाकर बैठ गया। वो कोई बात नहीं कर पाया। मन बुझा हुआ था। जब दादा के कमरे से बाहर निकला, तो सोफे पर बैठ कर उसने बिना सोचे सिगरेट निकाला और सुलगा लिया। दो कश लेने के बाद उसे ध्यान आया कि वो घर पे था, जहां दादा भी थे। उसने सिर हिलाया और सिगरेट को सुबह के चाय के गिलास में डाल दिया। सिगरेट बुझ गई। अस्सी साल के हो गए.....ये दादा को मौत क्येां नहीं आती। उसने सोचा और खाना बनाने के लिए उठ गया। 

भव्य स्वागत - भयानक स्वागत

 लीजिए आज आपके लिए एक आश्चर्यजनक कहानी लेकर आया हूं। एक देश में एक साधुवेशधारी राक्षस रहता था। साधुवेशधारी उस राक्षस के बहुत सारे राजनेता मि...