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बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

वनतारा - सुप्रीम कोर्ट का समझो इशारा






 पिछले दिनों अखबार की एक खबर पर मेरी नज़र अटक गई। खबर क्या थी, कतई लोकतंत्र का जलवा दिख रहा था। हुआ यूं कि एक प्राइवेट चिड़ियाघर बनाया था, एक राजा टाइप आदमी ने अपने राजकुमार टाइप बेटे के लिए, बेटा क्या है, कतई आने वाली नस्लों के लिए एक मिसाल है। अब जो मैं कह रहा हूं वो फैक्ट नहीं हैं, मेरा इमेजिनेशन है। क्या हुआ होगा, बेटे ने कहा होगा - पप्पा, मुझे अपना चिड़ियाघर बनाना है, जिसमें बहुत सारे जानवर हों, जिसमें जंगल हो.....



पप्पा ने कहा होगा - हां हां क्यों नहीं बेटा, ये पूरा देश तेरे सामने है, जो जमीन चाहिए चुन ले, मैं तेरे लिए दुनिया का सबसे बड़ा चिड़ियाघर बनाउंगा.....हा हा हा।
बस फिर क्या था। गुजरात के जामनगर के पास एक तीन हजार एकड़ जमीन चुन ली गई और राजा के बेटे ने अपने निजी चिड़ियाघर की तामीर की। फरवरी 2024 में इस निजी चिड़ियाघर की स्थापना हुई, जिसमें आम पब्लिक नहीं जा सकती, मतलब शायद जा सकती हो, लेकिन ऐसे ही नहीं जा सकती, जैसे सार्वजनिक चिड़ियाघर में जा सकती है, इसके लिए खास विज़िट बुक करनी होती है। तो हुआ यूं कि 2024 फरवरी से 2025 अगस्त तक इस चिड़ियाघर में पूरी दुनिया से कई जानवर मंगाए गए, तो अब वनतारा में 43 प्रजातियों के 2000 जानवर हैं। इनमें हाथी बहुत सारे हैं, चीते, सफेद बाघ, लीमूर, और तरह -तरह के ऐसे जानवर भी हैं जो विलुप्त प्राय प्रजाति के हैं, और अगर आपके घर वो मिल भी गए, तो आप पर भारी जुर्माना हो सकता है। पर राजा के लिए विशेष प्रावधान होता है, उन्होने तमाम सुविधाएं हासिल कीं, तमाम अनुमतियां हासिल कीं और अपना चिड़ियाघर बना दिया। 




यहां तक सब ठीक था, लेकिन खेल इसके बाद शुरु हुआ। राजकुमार कहीं भ्रमण पर थे, कि उन्हें मुर्गियां दिखाई दीं, ठीक राजकुमाराना अंदाज में उन्होने सारी मुर्गियां खरीद लीं, ये नहीं पता कि कि इसके बाद उन मुर्गियों का उन्होने क्या किया। खैर राजकुमार ने मुर्गियां खरीदीं, वरना वो ये भी कर सकते थे कि बिना दाम दिए मुर्गियां ले लेते, लेकिन ऐसा उन्होने नहीं किया और पुलिस और जनता ने चैन की सांस ली। लेकिन फिर उन्होने क्या किया, उन्होने एक हथिनी को, जो काफी सालों से कहीं मंदिर में रहती थी, उसे पकड़ मंगाया।


आपको समझना चाहिए राजाओं की, राजकुमारों की फितरत यही होती है। जिस चीज़ पर उनका दिल आ जाए, वो उसे उठा मंगवाते हैं, अब करते रहो चीख - पुकार, सुना इन हथिनी की देखभाल इतने सालों से करने वालों ने भी बहुत चीख- पुकार मचाई कि भाई ऐसा क्यों कर रहे हो। लेकिन राजकुमार को यूं लगा कि ये सब नाटक कर रहे हैं, राजकुमार ने कहा कि उन्हें सबसे ज्यादा जानवरों से प्यार है, यानी उनसे ज्यादा जानवरों से कोई प्यार नही ंकर सकता, इसलिए इस हथिनी को, या किसी भी जानवर को जिसे वो चाहें, पकड़ मंगाना चाहिए। 
लेकिन मुश्किल ये हुई कि ये समुदाय, जिसने उस हथिनी को पाला-पनासा था, उसकी चीख-पुकार, आग्रह आदि पर अखबारों की नज़र गई, कुछ टी वी चैनलों ने भी दिखाया, और खासतौर पर सोशल मीडिया में भर के इस पूरे प्रकरण पर कई-कई रिपोर्टस आ गईं। 


सिर्फ अखबार और न्यूज़ चैनलों की बात होती तो राजा खुद निपट लेते, क्योंकि भला राजा की बात कौन टाल सकता है, खुद महामानव भी सुना राजा के इशारे पर चलते हैं, कई जलकुकड़े, प्रगतिशील, वामी तो ये भी कहते सुने गए हैं कि असली मामला तो राजा साहब ही तय करते हैं, महामानव तो सिर्फ साइन करते हैं, लेकिन हम इन जलकुकड़ों की बातों पर यकीन नहीं करते, आप भी मत कीजिए। आप तो ये कहानी सुनिए। तो हुआ यूं कि सोशल-मीडिया साइटस् पर चैनलों पर प्लेटफार्मस् पर, इस मामले पर जो पूरी जनता की भावना थी, वो दिखाई देने लगी उस समुदाय के पक्ष में जिनसे हाथी छीन लिया गया था। तो राजा साहब ने खूब कोशिश की कि इस मामले को हाथी के भले का मामला बनाया जाए, लेकिन उसका कुछ खास फर्क नहीं पड़ा। क्योंकि राजा सब कुछ चला लें, यहां तक कि देश की सरकार और न्यायालयों तक को अपने इशारों पर चला लें, लेकिन जनता को तो अपने इशारों पर चला नहीं सकते। 


अब राजकुमार और राजा साहब को चिंता हुई कि कल को ऐसा कोई मामला हुआ जिसमें जनता उनके खिलाफ हो, और मामला बढ़ गया तो उनके खिलाफ जा सकता है। क्योंकि माइंड यू, वो भले ही राजा हैं, और ये भी सही है कि देश में उनकी ही सरकार चल रही है, लेकिन अब भी दिखावा लोकतंत्र का ही है, और दिखावे के लिए ही कानून के राज की चादर ओढ़नी ही पड़ती है। जनता का ये भरम तो बना ही रहना चाहिए कि देश की असली मालिक वही है, वरना, नेपाल तो आप सबने देखा ही है.....हमारे एक कवि थे, विद्रोही, कहते थे, कपिल भाई जनता जब मारती है तो गुस्से से नहीं मारती, सोच के मारती है, और गुस्से में चाहे कहीं भी लगे, सोच के वहीं मारा जाता है जहां असल हो। खैर साहब आप अपने विद्रोही को जाने दो, इस तरफ ध्यान दो। 
राजा को जब चिंता हो, तो सरकारें हिल जाती हैं, देश थम जाता है, कायनात सांस रोक लेती है। राजकुमार तो अपनी मुर्गियों और बकरियों में मगन था, लेकिन राजा के दायें हाथ ही पहली उंगली फड़क उठी थी। राजा ने फौरन भविष्य में किसी भी तरह की शिकायत से निपटने की एक योजना बनाई, और उसे आगे अरसाल किया। राजा के आदेश का पालन करने से कौन मना कर सकता था भला। इस देश में, सिर्फ एक ही ऐसी संस्था है जिसके आदेश का पालन ना करने पर आपको सीधा जेल हो सकती है, हो सकता है कि इस वीडियो के बाद मुझे भी जेल जाना पड़े, पर क्या करें आदत से मजबूर हैं। अब मुसीबत ये थी कि कोई शिकायत हो तो उस पर फैसला आए, बिना शिकायत कोर्ट फैसला कैसे सुनाए। मुसीबत इससे भी गहरी थी, कि अगर कोई बेवजह ही नकली शिकायत बनाई जाए, तो हो सकता है कि जनता उस शिकायत की ही सच्चाई को उजागर कर दे, तो भी मामला उल्टा जा सकता था। तो इसके लिए रास्ता कोई दूसरा अपनाना पड़ेगा। 




अब आया दूसरा रास्ता, दूसरा रास्ता ये बना कि बिना किसी शिकायत के खुद कोर्ट ने जो सबका माई-बाप है, उस कोर्ट ने खुद से इस मामले पर विचार किया, यानी स्वतःसंज्ञान लिया, जिसे लैटिन में सुओ मोट्टो कहते हैं। ध्यान रखने वाली बात ये है कि देश में एस आई आर चल रही थी, जिसका पूरा विपक्ष विरोध कर रहा था, सबसे उंची वाली कोर्ट ने उस पर स्वतः संज्ञान नहीं लिया, मणिपुर की हिंसा पर सबसे उंची वाली कोर्ट ने स्वतः संज्ञान नहीं लिया, बल्कि इस मामले में, खुद उस निजी चिड़ियाघर पर स्वतः संज्ञान लिया, कि भैया हम जांच करेंगे कि ये चिड़ियाघर कैसे चल रहा है, कहां से जानवर लाए गए हैं, और इसमें कोई घोटाला तो नहीं है। एक बार फिर बता दूं ऐसी कोई शिकायत नहीं हुई थी, बल्कि कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया गया था। अब किसकी मां ने सवा सेर सौंठ खाई कि सबसे उंची वाली कोर्ट से ये पूछे कि भैया मेरे, ओ सॉरी, माई-बाप जिसे इंग्लिश में माई लॉर्ड या योर ऑनर भी कहा जाता है, ये आपने सुओ मोट्टो लिया क्यूं, किसी की शामत आई है जो सबसे बड़ी वाली कोर्ट से ये पूछ लेगा। अबे जाओ। 

अब होता है असली खेल शुरु, सबसे उंची वाली कोर्ट के स्वतः संज्ञान लेने के फौरन बाद एक विशेष जांच समिति यानी एस आई टी बना दी गई, इसमें तीन जज, दो नौकरशाहों को जमा किया गया, और उन्होने अपना काम शुरु कर दिया। इस टीम में कोई पर्यावरणविद नहीं था, कोई जानवरों का विशेषज्ञ नहीं था, कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था, जो जानवरों का डॉक्टर आदि हो, बस वो लोग थे, जो फैसला कर सकते थे। जजों और नौकरशाहो के शाही मिश्रण से बनी इस विशेष जांच टीम ने आनन-फानन यानी तुरत-फुरत अपनी जांच शुरु की, और सोलह दिन से भी कम समय में सारे जानवरों के आने की जांच कर ली, पूरा चिड़ियाघर घूम लिया, जानवरों से बातचीत करके उनकी सेहत आदि के बारे में भी पता लगा लिया और फट से अपनी रिपोर्ट तैयार कर दी।


शानदार रिपोर्ट है, आपके पास समय हो तो आप पढ़ लीजिएगा, मैं तो आपको इस शानदार रिपोर्ट के बारे में यही बता सकता हूं कि टीम ने कहा है कि सब कुछ चंगा है, बल्कि दुनिया में सबसे बेहतर है, सारे जानवर खुश हैं, तंदुरुस्त हैं, भला हो कि ये नहीं लिखा कि किसी जानवर ने इस टीम का हाथ पकड़ कर ये कह दिया हो कि भाई लोग हमारी तो मौज हो गई, इस चिड़ियाघर में आने के बाद। खैर कुल मिलाकर इस टीम को बुरा या ग़ैरकानूनी तो कुछ मिलना नहीं था, ना ही मिला, बल्कि जो भी मिला सब श्रेष्ठतम मिला, अंग्रेजी में बेस्टम बेस्ट। लेकिन असली मामला इस रिपोर्ट का तो था नहीं, असली मामला है इस रिपोर्ट के साथ नत्थी सबसे बड़ी वाली कोर्ट के फैसले का, जिसके अनुसार, अब से, इस राजा और राजकुमार के इस चिड़ियाघर के खिलाफ कोई शिकायत नही ंकर सकता, अगर करेगा, तो उस शिकायत को एंटरटेन नहीं किया जाएगा। मेरा ख्याल है ये भी नहीं लिखा है कि राजा या राजकुमार के इस चिड़ियाघर के बारे में कोई शिकायत करने वाले, या उसके बारे में लिखने वाले, या सोचने वाले को भी देशद्रोही, आतंकवादी, या मानवता का दुश्मन करार दिया जाएगा और मौके पर ही गोली मारने के आदेश दे दिए जाएंगे। पर ये तो हमारे लोकतंत्र की शान है कि सोलह दिन में एक 3000 एकड़ में फैले चिड़ियाघर की जांच भी हो गई, और उस पर आइंदा भविष्य में किसी भी शिकायत पर बैन भी लग गया।


अब राजकुमार फ्री हैं, कहीं से भी किसी भी जानवर को पकड़ लेने के लिए, किसी भी जानवर को अपने चिड़ियाघर में ले आने के लिए, उन्हें जैसा मर्जी टीट करने के लिए। भई राजा का अधिकार हुआ ये तो, आप साधारण जन उसमें हस्तक्षेप क्यों करना चाहते हो भला। देशद्रोही हो आप, जो राजा के खिलाफ बोलेगा, उसे देशद्रोही ही तो माना जाएगा भुला। 

हो सकता है आंइदा कुछ दिनों बाद राजकुमार का दिल चाहे कि वो जानवरों के साथ आदमियों को भी चिड़ियाघर में रखना चाहता है, तो वो ऐसा भी कर लेगा, आप क्या कर लोगे, क्योंकि सबसे बड़ी वाली अदालत ने कह दिया है कि भैया कोई शिकायत आप नही ंकर सकते। इस बीच पिछले पांच सालों से कुछ लोग जेलों में पड़े हैं, जिनकी बेल की सुनवाई इसी बड़ी अदालत ने इसलिए नहीं की, कि उसे कुछ समय चाहिए था। सही बात है, इस लोकतांत्रिक देश की अदालत के पास राजकुमार के चिड़ियाघर के लिए स्वतःसंज्ञान था, इंसानों के लिए, खासतौर पर सोचने वाले इंसानों के लिए समय नहीं है। 

चलिए, जिसकी जितनी लिखी है उतना ही जिएगा, जब तक इंसान मरें ना, तब तक वैसे भी किसी को क्या समझ में आता है, स्टेन स्वामी एक स्टा के लिए तड़पते रहे, स्वतःसंज्ञान ना हुआ, 90 प्रतिशत विकलांग प्रोफेसर के लिए कोई स्वतः संज्ञान न हुआ, राजकुमार का भला हो, जिसके चिड़ियाघर को इतना स्वतःसंज्ञान मिला। हमें आगे भी सबसे बड़ी वाले कोर्ट से इसी तरह के इंसाफ की उम्मीद है। क्योंकि उम्मीद पे दुनिया कायम है।

चचा हमारे, ग़ालिब जो थे, कह गए हैं, कि 

तू आदम है इसलिए मारा ही जाएगा
कुत्ता होता राजा का तो केक खाता
सड़ेगा जेल में बिना टरायल के
क्योंकि तुझ से चुप नहीं रहा जाता

अब क्या कहें, ग़ालिब के जमाने तक माई लॉर्ड और योर ऑनर कहलाने वाले ब्लू कॉलर जज आ चुके थे देश में, उन्ही को देख कर शायद चचा ग़ालिब ने ये शेर लिखा होगा। उनका तो पता था कि ग़रीब इंडियनों का खून पिएंगे, अब का पता नहीं। बाकी आपकी खैर रहे, ना हो तो वहीं चले जाइए, निजी चिड़ियाघर में, हो सकता है बच जाएं। वरना क्या पता कब राजा या राजकुमार की नज़र आप पर भी पड़ जाए। 

सोमवार, 15 सितंबर 2025

महामानव की दुनिया - महामानव का आयोग

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दोस्तों जब से राहुल गांधी के चुनाव चोरी के आरोपों पर केचुआ ने प्रेस कांन्फ्रेंस की है, तमाम तथाकथित प्रगतिशील और वामपंथी, कांग्रेसी और उनके साथी-सपाड़े, चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की धज्जियां उड़ाने में लगे हैं, हालांकि इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। आज मैं इसी पर बात करूंगा। लेकिन उससे पहले मैं अपने महामानव का स्तुतिगान करना चाहता हूं। वे जिन्हें ईश्वर ने भेजा है, बेवजह भेजा है, लेकिन भेजा है। जिनका पूरी दुनिया में डंका बज रहा है, हालांकि उसकी भी कोई ज़रूरत नहीं थी, लेकिन खैर बज रहा है, डंका। और नोबेल पुरस्कार तो वो ले ही लेते, अगर उनके परम मित्र, डोलांड इस दौड़ में उनसे आगे ना होते। 

आप लोग यूं ही, यानी बेमतलब महामानव को कुछ - कुछ कहते रहते हो, लेकिन अगर आप गौर से देखें तो उनके जैसा महामानव, यानी सुपरमैन मिलना मुश्किल ही नहीं असंभव है। याद कीजिए ऑपरेशन सिंदूर के वक्त, जिस दिन उनके परम् मित्र डोलांड ने सीज़फायर की घोषणा की, और महामानव ने तड़प कर उसी क्षण सीज़फायर कर दिया। 



लेकिन अपने दोस्त डोलांड का नाम तक नहीं लिया। राहुल गांधी समेत विपक्ष के तमाम नेता उन्हें उकसाते रहे, बार - बार ताने देते रहे, लेकिन महामानव ने एक बार झूठे मुहं भी डोलांड का नाम नहीं लिया। राहुल गांधी ने बार - बार कहा, कि डोलांड ने 12 बार फिर 18 बार फिर 25 बार सार्वजनिक रूप से ये कह दिया है कि भारत-पाकिस्तान के बीच सीज़फायर उसने करवाया है। इसके बावजूद इतने आरोप अपनी छप्पन इंच की छाती पर झेलने के बावजूद, महामानव ने अपनी वफादारी नहीं छोड़ी, और अपने मित्र डोलांड का नाम अपने होंठो पर नहीं आने दिया।


विपक्ष ने जब ये दांव चला कि आप नाम मत लीजिए, संसद एक साथ मिल कर डोलांड की भर्त्सना करे, तब भी, मितरों, अपनी दोस्ती की लाज रखी महामानव ने, और भारतीय संसद में ऐसा नहीं होने दिया। 


दोस्ती के इतिहास में आपको कई कहानियां मिल जाएंगी, लेकिन ऐसी अद्भुत कहानी की मिसाल ढूंढे नही मिलेगी जब एक दोस्त ने अपने मित्र की लाज रखने के लिए पूरे देश की इज्जत की ऐसी -तैसी कर दी हो। हमारे महामानव ने दोस्ती की वो मिसाल पेश की है, जिसके उपर उपन्यास लिखे जाएंगे, कहानियां लिखी जाएंगी, गीत गाए जाएंगे। जब देश की इन घटनाओं को कलमबद्ध किया जाएगा तो महामानव का नाम लिखा जाएगा, जिसने अपनी दोस्ती के उपर देश की, सेना की भद् पिटवाना मंजूर किया, लेकिन दोस्ती की लाज रख ली। ऐसे महामानव को, डोलांड मित्र को, कोटी-कोटी प्रणाम।


खैर, ये तो पुरानी बात थी, लेकिन महामानव की महानता को दर्शाने का इससे अच्छा उदाहरण हमें नहीं लगता कि कोई और मिल सकता है। अब आते हैं आज के मुद्दे पर। तो केचुआ के तीनों आयुक्त बैठे और उन्होने प्रेस कांन्फ्रेंस की। हालांकि बोलना सिर्फ ज्ञानेश कुमार जी की जिम्मेवारी थी, तो वही बोले, और उन्होने, माफ कीजिएगा, प्वाइंट बाय प्वाइंट हर सवाल का जवाब दिया।


तथाकथित प्रगतिशीलों को, वामपंथियों को, और उनके संगी-साथियों को यही बात नागवार गुज़री, कि ज्ञानेश कुमार ने अपने ज्ञान का विस्तार करते हुए, हर आरोप का, हर सवाल का ऐसा खूबसूरत जवाब दिया कि सुनने वाले, और बाद में सुनने वाले तो हक्के -बक्के रह ही गए, बल्कि उनके जवाबों ने ऐसा समां बांधा कि अब तक लोग सदमें में हैं। उनके इस एक घंटा पच्चीस मिनट के बोलने को अगर मैं एक सबक का रूप देना चाहूं तो, महामानव प्रेस कांफ्रेंस के सबक से सीख कर अपने उपर से वो आरोप हटा सकते हैं कि उन्होने अपने तीन कार्यकालांे में कभी कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है। 


प्रेस कान्फ्रेंस के शुरु होने से लेकर प्रेस कांफ्रेंस के खत्म होने तक ज्ञानेश कुमार जी ने केचुआ के लगभग सारे कानूनों को खोल कर सामने रख दिया, केचुआ में कितने लोग काम करते हैं, केचुआ किन नियमों को मानता है, नियम क्या हैं, शर्तें क्या हैं, केचुआ के क्या अधिकार हैं। उन्होने केचुआ की सारी, अच्छा सारी नहीं तो मान लीजिए कि ज्यादातर नियमावली और कानून को जनता के सामने रखा। और बहुत बढ़िया तरीके से रखा, सवाल - जवाब से पहले उनके इस वक्तव्य का वोट चोरी के या चुनाव में धंाधली के आरोपों के जवाब की नींव तैयार करना था। उन्होने चुनाव आयोग की तुलना मां से करते हुए कहा कि सारी पार्टियां चुनाव आयोग से ही निकली हैं, इसलिए चुनाव आयोग किसी एक पार्टी के साथ पक्षपात नहीं करता, बल्कि उसके लिए सारी पार्टियां समकक्ष होती हैं। इस तरह केचुआ ने खुद को मां बना दिया, अब सिर्फ बाप की ज़रूरत थी वो भी शायद पूरी हो चुकी है। इस तरह उन्होने सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को, राजनीतिक पार्टियों को अपना बेटा बना लिया। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि किसी राजनीतिक विश्लेषक की ये हिम्मत नहीं हुई कि वो ज्ञानेश कुमार जी की इस अनॉलॉजी का खंडन कर सकें। केचुआ और ज्ञानेश कुमार जी का ज्ञान कमाल का है।


इसके बाद शुरु हुआ सवाल और जवाब का एक ऐसा दौर जो सदियों नही ंतो कम से कम दशकों तक तो याद रखा ही जाएगा। हम आपकी सुविधा के लिए इन सवालों और जवाबों को अपनी सुविधानुसार आपके सामने रखते हैं, ताकि आपको समझ में आए कि केचुआ महान से शिकायत क्यों नहीं करनी चाहिए। 
सवाल था, वोटर लिस्ट में गड़बड़ी क्यों है?
ज्ञानेश कुमार जी का कहना था, कि ये गड़बड़ी सिर्फ सामान्य ही नहीं है बल्कि जानबूझ कर की गई है, क्योंकि हमारा जो जी चाहेगा, करेंगे। हालांकि उन्होने सीधे-सीधे ये नहीं कहा, लेकिन उनकी बात का लब्बो लुबाब यही था। 


उनसे पूछा गया कि सर जी, ये लोग, जो विपक्षी नेता इत्यादी हैं, इत्ते समय से गुहार लगा रहे हैं कि इन्हें सीसीटीवी की फुटेज दे दी जाए, लेकिन आप ऐसा नहीं कर रहे हैं। प्लीज़ दे दीजिए ना फुटेज, बेचारों का भला होगा। 
लेकिन ज्ञानेश कुमार ने साफ कह दिया कि देश की मां-बेटियों की वीडियो को इस तरह नहीं दिया जाएगा। क्योंकि केचुआ सिर्फ चुनाव ही नहीं करवाता, वो इज्जत का रखवाला है। देखिए इस देश में दो ही लोग महिलाओं की इज्जत की इस तरह रक्षा करते हैं, एक हमारे महामानव, जिन्होने बेटी बचाओ वाला नारा दिया था। गुजरात में एक लड़की का पीछा करवाने वाली वारदात अगर छोड़ दी जाए तो, वो मां-बेटियों की इज्जत के रखवाले हैं। इसीलिए उन्होने ऑपरेशन सिंदूर नाम रखा था। और दूसरे केचुआ के न भूतो ना भविष्यति आयुक्त ज्ञानेश कुमार जी। इसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और काबिल-ए-ग़ौर बात ये है कि मां-बहनो-बेटियों की वीडियोग्राफी तो करवाई जाती है, लेकिन वो वीडियो सार्वजनिक नहीं की जाती, क्योंकि इज्जत का सवाल है। अगर इज्जत का सवाल नहीं होता, तो बेशक ये वीडियो दे दी जाती, लेकिन क्या पता राहुल गांधी, और बाकी विपक्षी दल उस वीडियो का क्या करें, जिनमें मां-बहु-बहन-बेटियां आदि वोट देने के लिए लाइन में खड़ी हैं। बिल्कुल सही बात है, महिलाएं वोट करने के लिए लाइन में खड़ी हों ये तो शर्म की बात है, जो शर्म की बात है, उसे सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। 


उनसे पूछा गया कि बिहार में एस आई आर की इतनी हड़बड़ी क्यों थी, तो उन्होने बताया कि इलैक्टोरल रिवीज़न चुनाव होने से पहले होता है, बाद में नहीं होता। इसलिए उन्होने चुनाव से पहले बिहार में एस आई आर करवा दिया है। हड़बड़ी वाली बात वो गोल कर गए, जैसा कि जाहिर है करना ही चाहिए। इसी तरह ठाकुर अनुराग वाले सवाल पर उनसे ज्यादा कहते कुछ ना बना तो वो चुप रहे। जैसा कि किसी भी ज्ञानवान व्यक्ति से उम्मीद की जाती है। भई इस सवाल का जवाब उन्हें लिख कर नहीं दिया गया था, इसलिए उन्होने इसका जवाब नहीं दिया। 

हां, राहुल गांधी को वहीं की वहीं, एक और धमकी जारी कर दी। ऐसा करने से केचुआ के हक़ - अधिकार की रक्षा उन्होने की, जैसा कि उनसे उम्मीद की जाती है। केचुआ के मुख्य आयुक्त ने एक नई रवायत भी शुरु की, कि वो किसी को भी धमकी दे सकते हैं, अगर उनसे कोई सवाल पूछेगा तो उसे सीधे धमकी दी जाएगी। इस तरह उन्होने केचुआ की रक्षा की, याद रखिएगा, महामानव रक्षति रक्षितः, यानी जो महामानव को बचाएगा, महामानव उसे बचाएंगे। लेकिन यहां ज्ञानेश कुमार जी की दाद देनी पड़ेगी, उन्होने सीधे उन पत्रकारों को नहीं धमकाया जो उनसे सवाल कर रहे थे, इन पत्रकारों को भी केचुआ अध्यक्ष ज्ञानेश कुमार जी की इस दरियादिली पर उन्हें साधुवाद देना चाहिए।


राहुल गांधी ने हालांकि केचुआ पर बड़े-बड़े आरोप लगाए थे, जिनमें मतदाता संख्या से ज्यादा मतदान होने, एक ही व्यक्ति के नाम कई एपिक कार्ड होने, यानी एक ही व्यक्ति द्वारा कई बार वोट डालने, एक ही पते पर कई लोगों के वोट रजिस्टर होने जैसे कई घातक आरोप लगाए थे। लेकिन दाद देनी पड़ेगी, कि इतने सबूतों के साथ लगाए गए इन आरोपों के जवाब हमारे महान केचुआ के महान मुख्य आयुक्त ने बिना डरे दिए। उन्होने सीधे तौर पर बता दिया कि ये आरोप दरअसल मतदाताओं पर लगाया गया है, चुनाव आयोग पर नहीं, हालांकि राहुल गांधी बार-बार ये दोहरा रहे हैं कि धांधली चुनाव आयोग ने की है, लेकिन आप इसे इस तरह समझिए, राहुल गांधी कह रहे हैं कि असल में चुनाव में मतदाता वोट नही ंकर रहे, बल्कि चुनाव आयोग जिसे चाहे वो वोट कर रहा है। ज्ञानेश कुमार जी ने इसी तर्क को ज़रा और एक्सटेंड कर लिया और कहा कि आप जिस पर आरोप लगा रहे हैं, वो मतदाता है, चाहे फर्जी ही हो, और क्योंकि वोट तो हमने ही किया है इसलिए हम मतदाता चाहे वो असली हो या फर्जी उसपर आरोप नहीं लगने देंगे। नहीं समझे, चलिए एक बार फिर कोशिश करता हूं। राहुल गांधी ने कहा कि अगर सही मतदाता वोट करते तो भाजपा सत्ता में नहीं आती, यानी चुनाव आयोग ने फर्जी वोटिंग करवा कर भाजपा को जिताया है। चुनाव आयोग ने माना की क्योंकि आपके हिसाब से हम ही वोटर हैं, तो आपके आरोप भी हमारे यानी मतदाताओ के खिलाफ हैं, इसलिए हम आपको धमकी देते हैं। आया समझ में। ये होता है असली जवाब। तुम केचुआ पर आरोप लगाओगे तो केचुआ उसे सीधे मतदाताओं पर आरोप मानेगा। अब करो बाबू क्या कर लोगे। 

मेरा हमेशा से ये मानना रहा है दोस्तों कि केचुआ एक पवित्र संस्था है। अब मुझे ये भी यकीन हो गया है कि केचुआ, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञानी, संस्था है। इसलिए मैं केचुआ के इन जवाबों से पूरी तरह मुतमइन हो गया हूं। इससे ज्यादा जवाबों की आशा करना बेकार है। बाकी आपकी मर्ज़ी।

बाकी केचुआ को लेकर चचा ने बहुत मज़ेदार शेर कहा है। सुनेंगे?
तो सुनिए
तेरी आंखों में धूल झोंक कर मैं वो करूंगा जो दिल चाहे
महामानव का सिर पे हाथ है मेरे, मै वो करूंगा जो दिल चाहे

वो किसी से नहीं डरते, बस धमकी देते हैं, आप डरिए क्योंकि आप केंचुआ नहीं हैं, और ना ही आपके सिर पर किसी का हाथ है। मेरी मानिए सरेंडर कर दीजिए, जैसे महामानव ने किया है। बाकी आपकी मर्जी। 
नमस्कार

शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

तेरी शिकायत मेरे ठेंगे से




नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। देखिए ये लोग मान नहीं रहे हैं, बिल्कुल नहीं मान रहे हैं। अरे ऐसी भी क्या दादागिरी है भई। सरकार के प्रवक्ता लगातार टी वी चैनलों पर बता रहे हैं, चीख-चीख कर बता रहे हैं कि चुनाव आयोग पर ग़लत आरोप लगाए जा रहे हैं, वोटों में कोई गड़बड़ी नहीं है, और ये जो राहुल गांधी कर रहे हैं, वो सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वो हार गए हैं। 



आप भी जानते है जो हार जाता है वही वोटिंग की गड़बड़ी का राग अलापता है, आपने कभी किसी भाजपा नेता को देखा है लोकतंत्र की गुहार लगाते हुए। क्योंकि भाजपा जीती है, इसलिए वो नहीं चिल्ला रही है, बाकी जो हार गए हैं, वो चिल्ला रहे हैं। 



योगेन्द्र यादव ने एस आई आर वाले मामले में दो लोगों को ले जाकर कोर्ट में ही खड़ा कर दिया, कि देखो माई-बाप ये लोग जो असल में जिंदा हैं, उन्हें एस आई आर में मृत घोषित कर दिया गया है। दोस्त मेरे, ये भारत है, यहां इंसान नहीं माना जाता, कागज़ माना जाता है, अरे भई जब एस आई आर में उन्हें मृत माना गया है, तो फिर हम उनकी बात का यकीन क्यों करेंगे। माई लॉर्ड ये लोग जो कह रहे हैं कि ये जिंदा हैं, क्या सबूत है इसका कि ये जिंदा हैं, क्योंकि चुनाव आयोग की एस आई आर तो कह रही है कि ये मर चुके हैं। ऐसे तो कल को कोई भी कोर्ट में आके कहने लगेगा कि वो जिंदा है जबकि सरकारी कागज़ों में वो मरा हुआ होगा। 



इस बीच आप गौर कीजिएगा कि राहुल गांधी ने कसम अभी तक नहीं खाई है। खाओ मां कसम, फिर कहो कि तुम जो कह रहे हो, या आरोप लगा रहे हो, वो सही हैं। मैं बताउं ये जो राहुल गांधी ने वोटर लिस्ट दिखाई है वो इलैक्शन कमीशन की है ही नहीं, ये इन्होने खुद ही बना ली है और फिर उसे लोगों का दिखा दिया है। और इसीलिए मजबूरन के चु आ को अपनी साइट से वोटर लिस्ट ही हटानी पड़ी है। ना रहेगी साइट पर लिस्ट ना होगी उसकी जांच और ना लगेगा आरोप। अब कल्लो जो कन्ना ए। 



वाराणसी में जब मादी ने चुनाव लड़ा था तो जितने लोगों ने वोट डाले उससे ज्यादा वोट निकले। इसमें ऐसी क्या दिक्कत है भाई, वोट कम होते तो कोई मामला बनता भी, वोट ज्यादा होने से क्या प्रॉब्लम है जी। राहुल कह रहे हैं कि वोट कटे हैं, ये सज्जन बोल रहे हैं कि वोट बढ़ गए हैं। बताइए, किस की बात मानें? 


और भैये सवाल ये है ही नहीं कि केचुआ ने अपनी वेबसाइट पर वोटर लिस्ट लगाई या नहीं, आप मुझे यूं बताइए कि कौन सा कानून कहता है कि केचुआ को वोटर लिस्ट किस फॉर्मेट में साइट पर लगानी है? बताइए, केचुआ कानून के हिसाब से काम करे या फिर तुम्हारी जानकारी के लिए काम करे। केचुआ का काम चुनाव करवाना है, किसे वोट देने का अधिकार है, किसे नहीं, ये केचुआ तय करेगा। तुम कौन होते हो ये कहने वाले कि हमारा नाम कट गया, नहीं हो तुम अलिजिबल, नहीं देने देंगे तुम्हे वोट। कल्लो क्या कल्लोगे। अबे जाओ, लेकर आ गए आधार, ये आधार पासपोर्ट बनाने के काम आएगा, वोट डालने के काम नहीं आएगा। अब से वोट के दिन जब जाओगे तो जमीन के कागज़ या फिर दादा का जन्म प्रमाण पत्र लेकर जाना होगा, वरना वोट नहीं दे पाओगे तुम। कल्लो क्या कल्लोगे। 


मेरे हिसाब से तो सुधीजन, ग़रीब आदमी को वोट का अधिकार देना ही नहीं चाहिए। बढ़िया ये रहे कि जिन लोगों की वजह से ये देश दुनिया की चौथी सबसे बड़ी इकॉनामी बना है, उन्हें ही सरकार चुनने का अधिकार होना चाहिए। 


देखिए मेरा सीधा सादा हिसाब है, ग़रीबों को अक्सर पता नहीं होता कि उनकी भलाई किसमें है। अक्सर सरकार को पुलिस लगानी पड़ती है ये समझाने के लिए कि जनता की भलाई किसमें है। कृषि कानूनों के वक्त क्या हुआ था, सरकार ने किसानों की भलाई के लिए तीन कानून बनाए, उन्हें बकायदा बिना बहस के ध्वनि मत से संसद में पास करवा दिया था। लेकिन इन किसानों को समझ ही नहीं आया कि ये बिल उनके फायदे के लिए हैं। उतर गए धरना प्रदर्शन करने। अब बताइए, इत्ती पुलिस लगानी पड़ी, इत्ती गोलियां, लाठियां, मुकद्में इन लोगों पर लगाने पड़े, लगभग 700 किसानों को मार देना पड़ा, लेकिन इन्हें समझ नहीं आया कि सरकार इनकी भलाई करने की सोच रही है। आखिर में सरकार को दया आ गई, कि अब इससे ज्यादा लोगों को नहीं मारना चाहिए, क्योंकि महामानव को तो कुत्ते का पिल्ला भी अगर मर जाए तो दुख होता है, तो 700 किसानों के मरने का दुख तो होना ही था। इसलिए सरकार ने वो बिल जो किसानों की भलाई के लिए बनाए थे वापस ले लिए। 


अब जब केचुआ, इसी जनता की भलाई के लिए बिहार में एस आई आर करवा रहा है, तो भी लोगों को दिक्कत हो रही है। सुना इसके लिए भी लोगों पर एफ आई आर हो रही है, बताइए, इन नालायकों को ये समझ में नहीं आता कि सरकार इनकी भलाई के लिए ही एस आई आर करवा रही है। माफ कीजिएगा, ग़़लती हो गई, मेरा मतलब था केचुआ इनकी भलाई के लिए एस आई आर करवा रहा है। अब एस आई आर से इन लोगों का भला होगा, ये लोगों को समझ नहीं आ रहा है, इन्हें लगता कि वोट देना जनता का अधिकार है, अरे भोले लोगों, यानी भारत की जनता, कभी था वोट देना तुम्हारा अधिकार, अब केचुआ जिसे चाहेगा, सिर्फ वही चुनाव लड़ेगा, सिर्फ वही वोट देगा जिसे चुनाव आयोग वोट देने देगा। और अभी तो बिहार में हो रहा है, अब सारे देश में होगा। तुम लोग जाते रहो, सुप्रीम कोर्ट, उसने तो साफ कह दिया कि भैये निर्देश ले लो, सुझाव ले लो, बाकी चाहे जितने सबूत ले आओ, होगा वही जो केचुआ चाहेगा। 


खैर, मैं अपनी बात पर आता हूं। मेरा कहना ये है कि, एक तो इस देश से आम चुनाव बंद करवा देना चाहिए। बड़ा पैसा खर्च होता है, और इन लोग को सेट करने के चक्कर में बड़ी घपलेबाजी होती है। उपर से ये लोग उनको नहीं चुनते, जिन्हें केचुआ चाहता है, इसलिए केचुआ को तरह-तरह के काम करने पड़ते हैं, जैसे एस आई आर करवानी पड़ती है, एक ही घर में 800 लोगों का रजिस्टेशन करना पड़ता है, कहीं वोट काटने पड़ते हैं, कहीं वोट जोड़ने पड़ते हैं बल्कि आसान ये होगा कि एक कॉकस बनाया जाए, जिसमें देश के सबसे बड़े उद्योगपति हों, ब्यूरोक्रेट हों, जज हों, ये सब लोग हों। ये सब लोग बैठें और फिर सरकार बनाने की इच्छुक पार्टियां अपना आवेदन इन लोगों के सामने रखें, और फिर ये सब उद्योगपति, ब्यूरोक्रेट, जज आदि मिलकर सरकार बना दें। चुनाव आयोग इस बैठक का आयोजन करे, और इस दिन खाने-पीने का, पीने पर विशेष जोर के साथ इंतजाम करे। खूब उत्सव का माहौल हो, और इस तरह मतदान को महोत्सव बनाया जाए। उसके बाद कुछ परेड-वरेड आदि भी हो सकता है। अरे यार ये लोग समझदार लोग हैं, ये जानते हैं कि जनता की भलाई किसमें है। जनता नहीं जानती कि उसकी भलाई किसमें है। देखिए जनता की भलाई के लिए, जिसे आप देश की भलाई भी कह सकते हैं, कुछ बलिदान तो देना ही होता है। इस बार ये बलिदान लोकतंत्र का हो, तो भी क्या हुज्जत है जनाब। लोकतंत्र का क्या है, कल नहीं था, आज है, कल नहीं होगा। असली मामला राजगद्दी का है, सत्ता का है। कुछ लोग राजा बनें, कुछ लोग जज बनें, कुछ लोग आयोगों के अध्यक्ष बनें। जनता को तो वही रहना है जो वो थी, कल भी ग़रीब मजदूर किसान थी, आज भी ग़रीब मजदूर किसान है, और कल भी ग़रीब मजदूर किसान ही रहेगी। 


और सबसे बड़ी बात ये है कि वोट देना एक प्रिविलेज है, तो पहले जनता ये साबित करे कि वो इस प्रिविलेज के लायक है, फिर उसे वोट करने मिलेगा। मैं क्या कहता हूं, खुद ही से केचुआ को लिख कर भेज दो कि भैया आप लोग मेरा वोट काटें इससे पहले मैं ही वोट करने का अपना अधिकार आपको सौंपता हूं, वैसे भी मेरे वोट करने से तो सरकार बनने से रही, सरकार तो उसी की बनेगी जिसकी आप चाहेंगे, तो इसलिए आप ही मेरा वोट भी डाल लीजिए, कम से कम चोरी जैसा पाप करने से तो बचेंगे। 


और आखिरी बार कह रहा हूं, ये वोट चोरी, वोट फ्रॉड वाले नारों से सावधान रहिए, और मंदिर - मस्जिद में अपना ध्यान लगाइए, देश विश्वगुरु बस बनने ही वाला है। बस एक बार देश विश्वगुरु बन जाए, फिर देखना, गर्दा उड़ेगा, पूरी दुनिया में गरदा। 


अरे हां, ग़ालिब का लोकतंत्र की डिमाइस पर यानी फौत पर एक शेर है, गजब शेर है, गौर से सुनिएगा, और समझ ना आए तो केचुआ को लेटर देकर मतलब पूछ लीजिएगा। तो शेर कुछ यूंह ै


ये वोट की जो तूने बात छेड़ी ग़ालिब 

एक तीर सा इस दिल को लगा के हाय

हम करेंगे अपने दिल को लगा जो अच्छा

लोकतंत्र का क्या है सुसरा, मरता है तो मर जाए


बाकी वोट के अधिकार को छोड़िए, अपनी खैर मनाइए। चुनाव आ रहा है, जीतना उसी को है जिसे केचुआ चाहेगा। मेरी मानिए इस बार छुट्टी में ज़रा बाहर घूम आइए। वोट तो पड़ ही जाना है। 

बाकी लोकतंत्र को याद कीजिए, जब तक रहा, अच्छा ही रहा बेचारा। 

नमस्कार। 



मंगलवार, 12 अगस्त 2025

राहुल के आरोपों का पर्दाफाश




नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने हूं। पता नहीं क्या हुआ भाई, पिछले तीन दिनों से पूरे देश में वोट चोरी, वोट फ्रॉड जैसी बातें ही सुन रहा हू, और आप हैं कि राहुल गांधी पर यकीन किए बैठे हैं। इस देश में पहली बार कोई ऐसा ईश्वरीय अवतार, गद्दी पर बैठा है, और इन्हें यकीन ही नहीं हो रहा। राहुल गांधी ने एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रंेस करके वोट की चोरी का इल्जाम लगाया, जो लगाया तो केचुआ, मेरा मतलब केन्द्रीय चुनाव आयोग पर है, लेकिन उनके असल निशाने पर महामानव हैं। वो बार - बार कह रहे हैं कि महामानव वोट चोरी करके प्रधानमंत्री बने हैं। 



इन्हें क्या पता, इस देश में चुनाव हो ही इसलिए रहे हैं कि जनता महामानव को चुन सके। वरना महामानव को कोई वोटों की ज़रूरत है, अरे उनका तो जन्म ही महामानव, ब्रह्मांड गुरु, डोलांड टरम्प से तू-तड़ाक वाली दोस्ती रखने ओर अंततः भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए हुआ है। 



आज अपने इस वीडियो में हम राहुल गांधी द्वारा किए जा रहे दावों की पड़ताल करेंगे और उन्हें एक-एक करके झूठा साबित करेंगे। इस वीडियो को पूरा देखेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि महामानव और केचुआ यानी केन्द्रीय चुनाव आयोग को बदनाम करने के लिए राहुल गांधी ने कैसे ये जाल बिछाया है। कैसे ये साजिश की है, एक अवतार को बदनाम करने की, और मुझे यकीन है कि इस वीडियो के अंत तक आपको यकीन हो जाएगा कि महामानव और केचुआ, मेरा मतलब केन्द्रीय चुनाव आयोग पूरी तरह पाक साफ है, पवित्र है और उस पर कोई इल्जाम नहीं लगाया जा सकता। 



पहली बात तो ये दोस्तों कि राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर जो आरोप लगाए हैं वो चुनाव हारने के बाद लगाए हैं। तो इसको समझने से पहले आप मुझे एक बात बताइए, जब 1947 में देश को आजादी मिली थी, तो हमारे देश के दो टुकड़े किसने करवाए थे। नेहरु अगर उस समय ये ग़लती नहीं करते तो आज हमारे सिर पर हमारा दुश्मन पाकिस्तान ना बैठा होता, और भारत सच में अखंड भारत होता। और मैं आपको ये भी बताना चाहता हूं दोस्तों कि ये जो बार-बार, इंदिरा गांधी को ये श्रेय दिया जाता है कि उन्होने पाकिस्तान के दो टुकड़े करवाए, तो मुझे ये बताइए कि अगर नेहरु ने भारत के दो टुकड़े नहीं करवाए होते तो बांग्लादेश बनता ही नहीं, बल्कि वो भी भारत का हिस्सा होता, हिंदुस्तान के दो टुकड़े करने के लिए नेहरु को देश कभी माफ नहीं करेगा। पहले ये कांग्रेस उसका जवाब तो दे, क्योंकि सवाल तो हमारे पास भी बहुत सारे हैं। राहुल गांधी ने आज तक, ध्यान रखना दोस्तों, आप चाहें तो जितना मर्जी इंटरनेट देख लें, आज तक राहुल गांधी ने इस बात का जवाब नहीं दिया है कि नेहरु ने भारत के दो टुकड़े क्यों करवाए। अगर सरदार पटेल पहले प्रधानमंत्री बनते तो ये बंटवारा नहीं होता। पहले राहुल गांधी इसका जवाब दें, फिर वो किसी से सवाल पूछें। समझें।



दोस्तों, राहुल गांधी ने इतने सारे कागज़ों में से कुछ ही नाम छांट कर निकाले हैं, जिनमें से एक आदित्य श्रीवास्तव हैं, जिन्होने कई जगह वोटिंग की है, ऐसे ही बहुत सारे नाम हैं, जिन पर राहुल गांधी ने आरोप लगाया है। मैं आपसे कह रहा हूं कि आपको इसे समझना पड़ेगा, कांग्रेस का जो गोरखधंधा है इसे पूरी तरह समझना पड़ेगा। राहुल गांधी ने ये आरोप लगाने से पहले कोई शपथ नहीं ली, ना ही कोई कसम खाई है, बिना कसम खाए आप चुनाव आयोग पर ऐसा आरोप लगा ही कैसे सकते हैं। चुनाव आयोग एक पवित्र संस्था है, ये संस्था नियमों की पवित्रता बनाए रखते हुए काम करती है। केचुआ, अरे केचुआ मतलब केन्द्रीय चुनाव आयोग बार-बार कह रहा है कि राहुल गांधी शपथ लें यानी कसम खाएं और फिर आरोप लगाएं। दोस्तों आप इस गेम को समझिए। इस देश में सनातन की पवित्रता को लगातार खतरा है, लगातार सनातन पर हमला हो रहा है, और हिंदुओं की सदियों पुरानी विरासत को संस्कृति को लगातार नष्ट करने की कोशिश की जा रही है। और ये हमला कांग्रेस कर रही है, कांग्रेस तो चाहती है कि इस देश से सनातन खत्म हो जाए। लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे। 


राहुल गांधी ने अपनी इस प्रेस कांन्फ्रेंस में बड़े जोर-शोर से प्रेजेंटेशन में ये बताया कि कई लोगों के नाम गायब कर दिए गए हैं। दोस्तों आपको याद नहीं होगा, लेकिन इस देश में औरंगजेब ने हिंदुओं पर बहुत अत्याचार किए हैं, अरे वो तो कई मन जनेउ जलाए बिना नाश्ता तक नहीं करता था। उस समय इस भारत-भू पर हिंदुओं ने बहुत अत्याचार सहा है। औरंगजेब को ये कांग्रेस बुरा राजा नहीं मानती दोस्तों, आज तक इन्होेने इतिहास की किताबों में औरंगजेब को एक क्रूर बादशाह नहीं बताया है, औरंगजेब तो छोड़िए इन्होने तो अकबर को महान बताया है, कांग्रेस के समय में हमारे स्कूलों में बच्चों को अकबर द ग्रेट यानी अकबर महान के बारे में पढ़ाया जाता था। इस देश के बच्चों को हिंदु संस्कृति की जगह मुगलों का इतिहास पढ़ाया जाता था। जबसे मोदी जी की सरकार आई है, हमने अब्दुल को टाइट किया है, दोस्तों ये याद रखिएगा। पहले राहुल गांधी इसका जवाब दे ंतब उन्हें अपने सवाल पूछने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी। 


राहुल गांधी जब भी केचुआ पर उंगली उठाते हैं, यानी आरोप लगाते हैं, तो भारत की महान संस्कृति का, सनातन का अपमान करते हैं, हिंदुओं की भावनाओं का अपमान करते हैं, और मैं आज जिम्मेदारी से ये कहना चाहता हूं कि इसके लिए उनके खिलाफ मानहानि का या कोई और मुकद्मा दायर किया जाएगा। मुझे पूरा यकीन है कि जज हमारा ही पक्ष लेंगे और राहुल गांधी को जेल भेज देंगे, देश निकाला दे देंगे। खैर राहुल गांधी कह रहे हैं कि एक ही घर में, एक कमरे के मकान में कई - कई लोगों का रजिस्टरेशन है। दोस्तों इसका जवाब भी मैं आपको जरूर दूंगा दोस्तों। ये एक ग़रीब देश है। मतलब ये ठीक है कि हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, और महामानव, विश्वगुरु, अवतारी, नॉन बॉयोलॉजिकल मोदी जी के नेतृत्व मे ंहम जल्द ही तीसरी, फिर दूसरी और फिर पहली अर्थव्यवस्था बनने वाले हैं, लेकिन साथ में ये भी सच है कि नेहरु की ग़लतियों के चलते बहुत सारे लोगों के पास रहने के लिए घर नहीं हैं। इसलिए इस देश में बहुत सारे लोग एक ही घर में रहते हैं। 



ये जो घर महामानव ने बनाए और उनकी चाबियां दी थीं, ये घर यू पी में बने थे, लेकिन राहुल गांधी जो आरोप लगा रहे हैं, वहां अभी महामानव ने नए घर बनवा कर उनकी चाबियां नहीं दी थीं, इसलिए एक ही कमरे के मकान में 800 लोगों को रहना पड़ रहा था। लेकिन इसमें गलती किसकी थी। यही लोग हैं जो महामानव को महान काम करने से रोकते हैं, और फिर जब महामानव ये सब उपलब्धि हासिल कर लेते हैं तो उन पर आरोप लगाते हैं। हमारे महामानव ने अकेले यू पी में एक करोड़ तेरह लाख मकान बना दिए हैं, लेकिन राहुल गांधी को तो अपने आरोपों से मतलब है। 


अगर ये 5 करोड़ घर बन गए होते तो राहुल गांधी को ये आरोप लगाने का मौका नहीं मिलता, लेकिन महामानव की इस योजना में भी राहुल गांधी ने रोड़ा अटका दिया। सरकार से हर कदम पर सवाल करने वाले राहुल ये बताएं कि उनके पास इस बात का क्या जवाब है। 

दोस्तों, बहुत सारे लोग ये भी सवाल उठा रहे हैं कि जब राहुल गांधी ने आरोप चुनाव आयोग पर लगाया है तो फिर उनका जवाब भाजपा क्यों दे रही है। दोस्तों मुझे एक बात बताइए, केचुआ यानी केन्द्रीय चुनाव आयोग कहां का है, भारत का, भाजपा कहां की है, भारत की, और देश में सरकार किसकी है, महामानव की, तो इसका सीधा सा मतलब है कि इस देश की हर संस्था महामानव की संस्था है और अगर राहुल गांधी केचुआ पर आरोप लगाते हैं तो वो सीधा महामानव पर आरोप लगा रहे हैं। इस देश की सारी संस्थाएं महामानव की संस्थाएं हैं, और अगर उन पर कोई आरोप लगाएगा तो उसे भाजपा कड़ा जवाब देगी। 


मुझे पूरा यकीन है राहुल गांधी ने केचुआ मेरा मतलब केन्द्रीय चुनावा अयोग पर जो आरोप लगाए हैं, उसके जवाब आपको मिल ही गए होंगे। जो इस देश से प्यार करेगा, सनातन से प्यार करेगा, हिंदु हितों की रक्षा करेगा, वो कभी भी चुनाव आयोग पर ऐसे सबूतों के साथ आरोप नहीं लगाएगा दोस्तों। तो मेरी आपसे गुजारिश है कि इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए ताकि राहुल गांधी और उनके दोस्तो को कड़ा जवाब दिया जा सके। 


ग़ालिब नेहरू की ग़लती को जानते थे, वे राहुल गांधी की ग़लती को भी जानते थे, इसलिए उन्होने लिखा था।


जो भी ग़लत हुआ है, नेहरु की ही ग़लती थी

केचुआ पे आरोप, अब मत लगा तू राहुल

राष्टप्रेम के आगे हम, सब कुछ को भूल जाएं

जैसे भी चाहे आएं, मोदी ही मोदी आएं


जय केचुआ, जय महामानव, नमो नमो



मंगलवार, 21 जुलाई 2015

घोटालों का यथार्थ



किसी भी वस्तु का यथार्थ जानने का सबसे अच्छा तरीका है उसका विश्लेषण कर लिया जाए। यानी उसके इतिहास, वर्तमान और भविष्य की समीक्षा की जाए। उसे परिभाषित किया जाए और इस तरह ये पता लगाने की कोशिश की जाए कि आखिर वो है क्या। तो सवाल ये है कि घोटला आखिर क्या है? क्या होता है? कहां रहता है? समय-समय पर होता है या इसके घटित होने में कोई निरंतरता है? क्या ये बुरा होता है जैसा कि सामान्य धारणा है या फिर अच्छा होता है, जैसा कि इससे लाभ उठाने वाले लोग मानते हैं। या यूं भी हो सकता है कि ये निरपेक्ष हो, जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी, वाली कहावत के अनुरूप। 
मानता हूं कि मसला पेचीदा है, लेकिन इतना भी पेचीदा नहीं है। बस थोड़ा सा नज़रिए को सत्यान्वेषी बनाना होगा, जैसे ब्योमकेश बख्शी ने किया। तो सबसे पहले ये जानते हैं कि आखिर घोटाला शुरु कहां से हुआ होगा। क्या कबीलाई युग में घोटाला होता होगा, क्या सामंतवादी युग में घोटाला होता होगा, क्या औपनिवेशिक काल में घोटाला होता होगा। या फिर ये घोटाला 15 अगस्त 1947 को पैदा हुआ जो अब इतना बड़ा हो गया है कि हर सरकारी दफ्तर, राजभवन, कोर्टाआदि में पाया जाने लगा है। 
इसके लिए सबसे पहले तो घोटाले की परिभाषा बनानी पड़ेगी, और अगर पहले से कोई परिभाषा मौजूद है तो उस पर ध्यान देना होगा। मुझे याद नहीं पड़ता कि घोटाले पर पहले किसी ने इतने विस्तार से सोचा है, कि उसकी परिभाषा आदि के बारे में लिखा हो। ये सही है कि लोग कई घोटालों के बारे में लिख चुके हैं, कैसे हुआ, यानी प्रक्रिया क्या थी, किसने लाभ उठाया, यानी ये प्रक्रिया किसने चलाई थी, और इसमें किनकी जाने गईं। ये मरने वाले अक्सर वो होते हैं, जो घोटालों की सीमाओं पर या उनसे बाहर होते हैं। अक्सर घोटाले करने वालों का तो बाल भी बांका नहीं होता। उदाहरण आपके पूरे इतिहास में बिखरे पड़े हैं। 
तो पहला सवाल पहले, घोटाले की परिभाषा क्या है, अगर है तो, और अगर नहीं है तो क्या हो सकती है। तो यकीन मानिए घोटाले की अभी तक कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है, ये अभी तक अनाथ शब्द है। तो घोटाले की परिभाषा क्या हो सकती है, क्या यूं कह सकते हैं कि, ”वो चोरी जिसमें शासन और प्रशासन की सीनाजोरी हो, जिसमें अहंकारपूर्ण रहस्य हो, जिसमें अबोध निडरता हो, और मैं सबका बाप हूं किस्म की गैरकानूनियत हो”। हो सकता है कि इसमें आप कुछ और जोड़ना चाहें, लेकिन परिभाषा जितनी छोटी हो उतनी ही अच्छी होती है। अब ज़रा इस परिभाषा पर गौर करें, इसमें चोरी है जिसमें शासन और प्रशान है, अहंकार है, रहस्य है, निडरता है, और गैरकानूनीयत है। 
इन सब बातों पर गौर करेंगे तो आप घोटाले का विश्लेषण करने के नज़दीक पहुंच जाएंगे। देखिए भारत में घोटाले की शुरुआत मानी जाती है तब से जब राजा-रानियों का अंत हो गया, अंग्रेजी हुकूमत के दौरान ये सैमी राजा-रानी हुआ करते थे, इसलिए उस वक्त हुकूमत करने वाले यानी अंग्रेज और राजा-रानी दोनो ही घोटाला करते थे, लेकिन 1947 के बाद घोटालों की पूरी जिम्मेदारी नेताओं ने, प्रशासकों ने अपने हाथ में ले ली और राजा-रानियों को इस जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। 
आप पूछ सकते हैं कि क्या उससे पहले घोटाला नहीं होता था, जनाब, उससे पहले राजा-रानियों की हुकूमत चलती थी, जब सारा राज उनके बाप का होता था, या कम से कम माना जाता था। ऐसे में अपने माल में से कुछ भी, कभी भी ले लेना, चोरी, डाका या घोटाला तो नहीं का जा सकता ना। अंग्रेजी हुकूमत ने घोटालों को स्थापित करने की दिशा जो सबसे महत्वपूर्ण काम किया वो ये कि हुकूमत प्रशासकों के हाथ में आ गई, ये प्रशासक राजा नहीं थे, ना हो सकते थे, अब भारत की लूट का जो हिस्सा इंग्लैंड की रानी के नाम पर गया, उसे आप घोटाला नहीं कह सकते, क्योंकि रानी का मानना ये था कि भारत उसके बाप का है। लेकिन उसके दूरस्थ प्रशासकों ने जो भी चोरियां की, यानी भारत का माल जो वो चोरी-चुपके अपने साथ ले गए और जिसे उन्होने रानी के मालखाने में जमा नहीं करवाया, वो घोटाला ही था। इन प्रशासकों के ऐसा करने में गैरकानूनियत थी, क्योंकि अगर रानी को पता चल जाता तो शायद उनका सिर कलम कर दिया जाता, या जेल हो जाती, लेकिन इस लूट को वो जिस निडरता अहंकार और सीनाजोरी के साथ करते थे, वो इस लूट को घोटाला बनाता है। 
दूसरी तरफ अंग्रेजी प्रशासकों की दया पर राजा-रानी बने हुए भारतीयों ने, इन्हीं अंग्रेजों से छुपा कर जिस माल की चोरी की, डाका डाला वो घोटाला ही था, क्योंेिक अंग्रेजों की हुकूमत में, ये राजा जो भी कमाते थे, वो अप्रत्यक्ष तौर पर रानी की संपत्ति माना जाता था। इन राजा-रानियों की इस लूट में भी, घोटाले की परिभाषा के अनुसार वो सबकुछ था, जो घोटाले के मूलतत्व होते हैं, जैसे प्रशासन और शासन सत्ता की भागीदारी, निडरता, गैरकानूनियत, और अहंकार भी था। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान गांधी के पसंदीदा बिड़ला आदि ने भी घोटाले किए और खूब किए। 
1947 के बाद सबसे पहले जिस चीज़ का राष्ट्रीयकरण हुआ वो घोटाला ही था। अंग्रेजों के जाने के बाद असल में प्रशासकों ने ये मान लिया कि अंग्रेजों की हुकूमत नाम के लिए बेशक लोकतंत्र हो चुकी है, लेकिन असल में तो सब उनके नाम हो चुका है। इसलिए उन्होने पूरे अहंकार, निडरता और शासन की मिलीभगत से जी भर के लूट-पाट की। इन प्रशासकों और शासकों ने मिलकर इतने घोटाले किए हैं कि अगर गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे ज्यादा घोटालों की बात हो तो इस देश का जिक्र जरूर आएगा। अफसोस बस यही है कि इनमें से ज्यादातर घोटाले पकड़े नहीं गए, और पकड़े गए तो संचार साधनों के अभाव में ज्यादा चर्चित नहीं हुए, जो चर्चित हुए उन्हे दबा दिया गया, और जिन्हे दबाया नहीं जा सका उनमें कुछ एक छोटे-मोटे लोगों की बलि देकर मुक्ति पा ली गई। 
घोटालों के इतिहास के बाद हमें घोटालों के आधुनिक रूपों की बात करनी चाहिए। आज देश के भिन्न हिस्सों में विभिन्न आकार-प्रकार, मिजाज़, रंग-रूप आदि के घोटाले हो रहे हैं। कुछ मिनी साइज़ घोटाले होते हैं, कुछ व्यापमं टाइप मेगा साइज़ घोटाले होते हैं, कुछ मीडियम साइज़ के घोटाले भी होते हैं, जिन्हे लोग पिछले साल की दिसंबर की ठंड की तरह भूल जाते हैं और बस कभी-कभी इस घोटाले के चक्कर में उसे याद कर लेते हैं। यूं लोग मेगा घोटालों को भी भूल जाते हैं, जैसे 3जी, कोलगेट, जैसे घोटालों को अब कौन याद रखता है। अपने आकार-प्रकार के हिसाब से और इसमें आपकी इन्वोल्वमेंट के हिसाब से ही इसका हिसाब भी चुकता होता है। यानी अगर आपने एक मेगा घोटाले में कुछ हजार-पांच सौ का हिस्सा पाया है, तो समझिए कि घोटाले के उजागर होने पर आप लम्बे नप सकते हैं, जान से जा सकते हैं, जबकि अगर आपने कुछ सौ करोड़ कमाए हैं तो खुद पुलिस, प्रशासन, सत्ता, न्यायपालिका आपके बचाव में, मानवधिकार, मानवीयता, आदि की ढाल लेकर खड़े हो जाएंगे और आपका बाल भी बांका ना होगा। 
आधुनिक भारत में घोटालों ने बहुत विकास किया है, देश के हर हिस्से में, ”जैसा कि मैने पहले कहा” घोटाला पनप रहा है, पनपाया जा रहा है। कुछ लोग खुलेआम, 56 इंची छाती फुलाकर घोटाला करते हैं, कुछ घोटालों को मक्खी की तरह उड़ा देते हैं, कुछ लोग दबे-छुपे घोटाले करते हैं, तो कुछ लोग हर घोटाले को संरक्षण देने की अपनी फीस लेते हैं। कुछ लोग सिर्फ घोटाले की स्कीम बनाते हैं और उसकी फीस लेते हैं। यहां तो अच्छे-खासे पेशेवर घोटालेबाज़ हैं और कोई मुजायका नहीं कि कुछ दिनो बाद विश्वविद्यालयों में घोटाला विभाग हो, और घोटाले का बाकायदा व्यावयासिक प्रशिक्षण दिया जाए, जिनमें सफल घोटालाबाज़ों को प्रोफेसर आदि बनाया जा सकता है। 
घोटाले का इतना विश्लेषण करने के बाद कुछ बातें साफ हो जाती हैं।
घोटाले थे, हैं और रहेंगे। 
घोटाले सरकारी और प्रशासकीय होते हैं। ”जनता ने आज तक कोई घोटाला नहीं किया, इसलिए कि इसके लिए जो साधन-संसाधन दरकार होते हैं वो जनता के पास होते ही नहीं हैं”
सरकारी और प्रशासकीय चरित्र होने के चलते घोटाले में लिप्त किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कभी कोई कार्यवाही नहीं होती, ना हो सकती है।
घोटाले में लिप्त छोटी मछली हमेशा मारी जाती है। ”चाहे उसे जेल हो, या जान से हाथ धोना पड़े, इसके भी तमाम उदाहरण घोटाले के इतिहास में भरे पड़े हैं।”
अंतिम बात मैं घोटालों के प्रति सकारात्मक रुख दिखाते हुए कहना चाहता हूं, 
जैसा कि मैने अपने निबंध में पहले ही साबित कर दिया है कि घोटाले तभी संभव हैं जब राज जनता का हो, यानी लोकतंत्र हो, जैसा कि ये है, जो चल रहा है। अरे भई, अगर लोकतंत्र की जगह राजशाही हुई तो घोटाले को घोटाला नहीं कहा जा सकेगा। इसलिए घोटाले की सकारात्मकता इसी में है कि घोटाला इसलिए है क्योंकि लोकतंत्र है, जिसमें सभी घोटाला कर रहे हैं, चाहे वो समाजवादी हों, या दलित वाले हों, चाहे कटट्र राष्ट्रवादी हों या कांग्रेसी हों, कुल मिलाकर घोटाले का होना ही लोकतंत्र के होने को साबित करता है। इसलिए अगर आप इस लोकतंत्र का बचाना चाहते हैं तो घोटालों को बचाए रखिए, क्योंकि लोकतंत्र का एकमात्र मीटर घोटाला है। यही घोटाले का यर्थाथ है, यही घोटाले की सार्थकता है। 

सोमवार, 6 जुलाई 2015

व्यापमं हम ही हम


व्यापमं का ज़ोर बहुत ज्यादा नहीं हो गया? आप लोग तो ऐसे शोर मचा रहे हैं जैसे कोई पहाड़ टूट पड़ा हो। शवराज सिंह चौहान, जो मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री हैं, इस घोटाले की जांच में बढ़-चढ़ कर सहयोग कर रहे हैं। आप जाने क्यों हल्ला मचा रहे हो। आप ही कहो, क्या ये संभव है कि राज्य की सत्ता के सहयोग के बिना जांच में आने वाले हर नाम को दुनिया से रुखसत कर दिया जाए। सहयोग की कौन सी परिभाषा आपकी समझ में आती है भाई, आप तो पीछे पड़े हो इस मोदी सरकार के, आप ही बताओ, खांग्रेस ने क्या घोटाले नहीं किए थे, क्या उसके मंत्री दागी नहीं हैं, आपकों तो भाजपा की सरकार से खुन्नस है बस। 
ये ठीक है कि घोटाले होते हैं, लेकिन क्या घोटाले की इस कदर चर्चा करके देश का नाम मिट्टी में मिलाना ठीक है। हमें इन घोटालों का भण्डाफोड़ करने वालों पर सख्त कार्यवाही करनी चाहिए। मोदी जी इतनी कोशिश कर रहे हैं कि विदेशों में देश की छवि अच्छी बने और यहां विदेशी निवेश हो, लेकिन आप लोग घोटालों की चर्चा करके, और लगातार करके, इस देश की छवि को घूमिल कर रहे हैं। एक आदमी आखिर कितना कर सकता है। इस पवित्र देश की माटी में घोटाले सदियों से होते रहे हैं, लेकिन नैतिकता और इंसानियत का फर्ज है कि हम इन घोटालों के बारे में खुले में बात ना करें। सरकार की लीपापोती पर भरोसा रखें, आखिर सरकार चाहती है कि एक स्वच्छ भारत की तस्वीर दुनिया के सामने जाए, घोटालें हों तो भी उनकी खबर ना बने, खबर बने तो वो जल्दी दब जाए, जल्दी ना दबे तो उसमें कुछ साबित ना हो, कुछ साबित हो जाए तो उससे अपने लोगों को निकालने के लिए सरकार के पास पर्याप्त बहाने हों, बहाने ना भी हों तो हमें कौन रोक सकता है। इसलिए उन लोगों का जाना ज़रूरी है जो देश की इज्जत के साथ खिलवाड़ करते हैं। हमने तो इसीलिए लोकायुक्तों की नियुक्ति तक नही की, ताकि कोई घोटाला हो तो सामने ही ना आए, बाकी हम कोशिश कर रहे हैं कि देश के हर छोटे बड़े संस्थान में हमारे ही आदमी हों, इसके बाद हमारी कोशिश ये होगी कि कैग जैसी संस्थाओं को खत्म कर दिया जाए। आखिर ज़रूरत क्या है घोटालों को इतना उछालने की। शासन है, प्रशासन है तो घोटाला होता ही है, क्या पिछले 70 साल में कोई घोटाला नहीं हुआ था, तब तो किसी ने फेसबुक पर, ट्विटर पर इस तरह का कोई आंदोलन नहीं चलाया। 
देश की अस्मिता की रक्षा के लिए 44 या 250 क्या, 2,5,10 लाख लोगों की कुर्बानी देनी पड़े तो भी हम देंगे। लोगांे की मतलब जनता की, अपने खास लोगों को तो हम पद तक से ना हटाएंगे, आखिर हमारी सत्ता है, कर लो जो तुमसे बन पड़े। असल में घोटाले होने की दो वजहे हैं, एक तो ये कि कोई पैसा खाए और कोई बमय सबूत जनता को ये बता दे कि पैसा खाया गया है। ये अपराधिक कार्य है, नहीं पैसा खाना नहीं, जनता को बमय सबूत ये बता देना कि पैसा खाया गया है। घोटाले के होने के बाद होना ये चाहिए कि उसे दबा दिया जाए, आखिर जिन घोटालों के बारे में जनता को पता ही नहीं है, उनके बारे में तो कोई बात नहीं करता। उनमें लिप्त लोगों की जान पर तो कोई खतरा नहीं है। मेरा ये कहना है कि ये व्यापमं घोटाले में जिन लोगों की जान गई है उनमें जनता का ही हाथ है। ना आप लोग उन्हे गंभीरता से लेते, ना आप घोटाले की जांच की बात उठाते और ना उन लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता। अब कहिए, इस पूरे देश की जनता के, या मान लीजिए उन लोगों के हाथ खून से रंगे हैं, जिन्होने इस घोटाले की जांच की मांग उठाई। आखिर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री और बाकी मंत्री शपथ लेते हीे पवित्र जीव बन जाते हैं और उन पर उंगली उठाना तक संविधान के प्रति गहरा पाप होता है, हजारों लोगों की हत्या से ज्यादा बड़ा पाप, ऐसा पाप जिसकी कीमत या तो आपको जेल में जाकर चुकानी पड़ती है, या ये भी हो सकता है कि आपका एनकाउंटर कर दिया जाए, बाकी व्यापमं जैसे तरीके भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जिनमें हींग और फिटकरी लगे बिना रंग चोखा आता है। 
व्यापमं असल में कोई एकमात्र मामला नहीं है। इससे पहले हमने अपने संतों पर, अपने संगठनों पर लगे हुए दागों के खिलाफ इस तरीके को इस्तेमाल किया हुआ है, और नतीजा तसल्लीबख्श पाया है। हमारे परम-पूज्य आसाराम को देख लीजिए, उनके और उनके बेटे के खिलाफ जितने भी गवाह थे, सभी एक-एक करके दोज़ख-नशीन हो गए, और आखिरकार नारायण साईं को जमानत मिल गई। आप कहिए क्या आप प्रो. सांई बाबा को जमानत दिलवा पाए, वो तो जब हमें लगा कि अब हालत हमारे हाथ से बाहर हो गई है, तो हमने दे दी जमानत, वरना अदालत तो यही माने बैठी थी कि वो व्हील चेयर पर जिंदगी गुज़ारता इंसान कहीं भाग कर जंगल ना चला जाए, और वहां से नक्सली गतिविधियों को अंजाम ना देने लगे। अभी साध्वी प्रज्ञा और बाकी लोगों के नाम साफ करने के लिए भी यही मुहिम चल रही है, काफी समय से चल रही है, उनके खिलाफ जितने गवाह थे, वो सब या तो गायब हो गए हैं, या मारे गए हैं, और जो बाकी ऐसे सबूत हैं जिनकी जान नहीं ली जा सकती, उसे हमने एन आई ए के हवाले कर दिया है, वो उन सबूतों की जान वैसे ही निकाल लेगी। 
आपको समझ नहीं आता, ये सब इसलिए हो रहा है, किया जा रहा है ताकि भारत की छवि विदेशों में खराब ना हो। बताई, 2 जी, 3जी, कोयला घोटाला, प्रतिभूति घोटाला, ताबूत घोटाला आदि ने विदेशों में भारत की क्या छवि बनाई होगी, क्या आप चाहते हैं कि भारत की ऐसी ही छवि विदेशों में बनें? अगर आप ऐसा चाहते हैं तो आप पाकिस्तान जाकर रहिए, या अगर वहां नहीं जा सकते तो आपको जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है। बाकि हम आपसे ये वादा करते हैं कि भारत की स्वच्छ छवि को बरकरार रखा जाएगा, इसका ये मतलब नहीं है कि घोटाले नहीं होंगे, जो लोग पदों पर विराजे हैं, उन्हे खाने से कोई नहीं रोक सकता, और ये उनका अधिकार है, हमारा वादा ये है कि हम इन बातों को बाहर ही नहीं आने देंगे। मीडिया को हम या तो खरीद चुके हैं, या नेस्तनाबूद कर चुके हैं, घोटाले की जांच करने वाली संस्थाओं को बंद किया जा चुका है, या वहां हमारे अपने लोग बैठे हैं। उन जगहों पर जहां घोटाले किए जा सकते हैं, हम अपने लोगों बैठाने में जी - जान से लगे हुए हैं, और जल्दी ही ये काम भी पूरा कर लिया जाएगा। 
हमारी सबसे बड़ी दुश्मन ये जनता है, जो भक्त नहीं है, अगर ये आंख में पट्टी बांध ले और अन्धों की तरह हमारा अनुसरण करे, हमारी जय करे तो मामला आसान है, नही ंतो हमें इसका इलाज करना पड़ेगा। अभी हम ऐसा माहौल बना रहे हैं कि जनता में शामिल हर शख्स खौफ के साये में जिए, हर रोज़ अपने जिंदा होने की खुशी मनाए, और सिर्फ जीवित रहने को नियामत समझे, इसके साथ हम, शुद्धि कार्यक्रम भी चला रहे हैं, अभी छोटे-छोटे दंगे आयोजित किए जा रहे हैं, ये हमारे प्रयोग हैं, इनमें सफल होने पर बड़े दंगे भी कराए जाएंगे, बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी। इसीके साथ हम चुनावों की निरर्थकता और लोकतंत्र की अव्यवहारिकता आदि पर चर्चा और संवाद चला रहे हैं, ताकि आने वाले समय में ऐसा माहौल तैयार किया जा सके कि जब हम संविधान को खत्म करके तानाशाही लागू करें तो लोग तालियों से उसका स्वागत करें। 
अभी तो आपसे यही कहना है कि व्यापमं का नाम लेना बंद करें, वरना आपका नाम भी व्यापमं से जोड़ दिया जाएगा, फिर आपका जो होगा......वो तो आप जानते ही हैं।

भव्य स्वागत - भयानक स्वागत

 लीजिए आज आपके लिए एक आश्चर्यजनक कहानी लेकर आया हूं। एक देश में एक साधुवेशधारी राक्षस रहता था। साधुवेशधारी उस राक्षस के बहुत सारे राजनेता मि...