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शनिवार, 14 मार्च 2026

बलात्कार के समर्थक





 पिछले दिनों देश के बहुचर्चित बलात्कारी, भाजपा कुलदीपक, कुलदीप सिंह सेंगर फिर से चर्चा में थे। अगर आप अपने आस-पास की थोड़ी भी जानकारी रखते हैं, तो आपको पता होगा कि वो चर्चा में इसलिए थे कि बलात्कार का आरोप सिद्ध होने के बाद उन्हें सज़ा हुई थी, और इसके अलावा पीड़िता के पिता की हत्या के संदर्भ में भी दस साल की सज़ा हुई थी। बलात्कार के आरोप में उन्हें सज़ा हो चुकी है, और ये सज़ा जो उन्हें दी गई है, वो पोक्सो के आरोप में दी गई है, यानी कोर्ट ने उन्हें नाबालिग से यौन दुष्कर्म का दोषी माना था। इसलिए सेंगर पिछले सात सालों से जेल में हैं। हालांकि उनका क्लाउट कम नहीं हुआ है। 


लेकिन चर्चा में सेंगर इसलिए नहीं है क्योंकि वो बलात्कारी है। इसलिए भी नहीं कि वो इन आरोपों के सिद्ध होने के बाद सज़ा काट रहा है। चर्चा में वो इसलिए भी नहीं है कि उसने कोई पश्चाताप किया है, या कोई माफी लायक काम किया है। चर्चा में वो इसलिए है कि कुछ महान लोग, कुछ कम महान लोग, और कुछ महानता की चाहत रखने वाले लोग उसके समर्थक हैं। 

देखिए, एक बात तो ये समझ लीजिए कि कुलदीप सिंह सेंगर की बेटी जो भी बयान दें, वो एक बेटी की तरफ से एक बाप के बचाव की बात है, और इसलिए उस पर यक़ीन करना, ना करना, उस बेटी के कांशस की बात है। जिनमें कोई भी किसी भी तरह की टिप्पणी ना ही करे तो बेहतर है। उस महिला ने, जो कुलदीप सिंह सेंगर की बेटी है, ना तो कुछ ग़लत किया है, ना अपराध किया है, और अगर वो अपने पिता को दोषी नहीं मानती तो ये उसका अपना फैसला है, वो अपने पिता को दोषी नहीं मानती, इसलिए वो हरसंभव प्रयास करेगी कि साबित करे कि उसके पिता दोषी नहीं हैं। इसलिए उसकी बेटी क्या करती है, क्या कहती है, क्यों कहती है पर किसी भी तरह की बात करना व्यर्थ है। एक बेटी से आप यही उम्मीद करते हो, आश्चर्य तब होता जब बेटी खुद भी अदालत का फैसला मानती, और अपने पिता को दोषी मानती और कुछ ऐसा करती जो आपको भी आश्चर्य में डालता। खैर, इसबात का यहीं पटाक्षेप करते हैं।

बात है ब्रजभूषण सरण की। जो कहते हैं कि वो हमेशा कुलदीप सिंह सेंगर का समर्थन करेंगे। 




बात है ओमप्रकाश राजभर की, जिन्हें पीड़िता पर हंसी आ रही है।




बात है दयाशंकर सिंह की, जो मानते हैं कि सेंगर को न्याय मिला है




और बात है इन मोहतरमा की




अब सवाल ये उठता है कि आखिर ये लोग समर्थन किस चीज़ का कर रहे हैं। अदालत ने कुलदीप सिंह सेंगर की सज़ा पर कोई सवाल नहीं उठाया है, ना उन्होने इस विषय में किसी तर्क को विचारणीय माना है। अदालत दिसंबर 2019 में कुलदीप सिंह सेंगर को भारतीय दंड संहिता यानी आई पी सी के बलात्कार के मामले के प्रावधान और बच्चे-बच्चियों के यौन शोषण से सुरक्षा के कानून पॉक्सो में एग्रेवेटेड पेनिटेटिव सैक्सुअल असॉल्ट यानी गंभीर यौन हिंसा के प्रावधान के तहत उम्र कै़द की सज़ा दी गई थी। 

इसका मतलब ये हुआ कि अदालत ने अब भी जब सेंगर की सज़ा को निलंबित किया तो ये नहीं कहा कि उन पर आरोप ग़लत हैं। कोर्ट ने ये नहीं कहा कि उनकी सज़ा ग़लत थी या है। अब यहां इस बात पर भी ध्यान देना ज़रूरी है कि अपराधी को कोर्ट में किसी भी तरह की अपील का अधिकार है, और यहां अपराधी ने ये अपील की थी कि उन्हें जो सज़ा मिली थी वो कानूनन ज्यादा थी। कोर्ट ने इसी तकनीकी नुक्ते पर विचार किया और उनकी सज़ा को निलंबित किया ताकि उसकी सही सज़ा तय की जा सके। 

इसका मतलब ये हुआ कि कोर्ट ने अपराध को कम नहीं आंका, कोर्ट ने ये नहीं कहा कि उसने अपराध नहीं किया। तब संेगर के समर्थक आखिर किस बात पर सेंगर का सपोर्ट कर रहे हैं। 

ब्रजभूषण की बाइट
अब आप इसे समझिए, ये व्यक्ति कह रहा है कि वो सेंगर का समर्थन करता है। अब क्योंकि ये सिद्ध हो चुका है कि सेंगर बलात्कारी है, और एक नाबालिग लड़की से बलात्कार के आरोप के सिद्ध हो जाने के बाद सज़ा काट रहा है तो इसका सीधा मतलब ये हुआ कि ब्रजभूष्ण सरण, बलात्कार का समर्थक है, या कोर्ट का विरोधी है। दोनो ही मामलों में क्या इस नैतिक पोजीशन के बाद उसका भारतीय लोकतंत्र का किसी भी तरह का सदस्य होना संभव है। कोई संविधान जानने वाले मित्र इस बारे में प्रकाश डालें तो बेहतर होगा। दूसरी तरफ क्या किसी व्यक्ति द्वारा बलात्कार के विषय में बलात्कारी का इस तरह समर्थन करने वाले के प्रति उसकी पार्टी का क्या रुख होना चाहिए ये वो पार्टी तय करे।

अब आते हैं, ओमप्रकाश राजभर की बात पर। 

ये एक अजीब बात है कि लड़की के उन्नाव रहने की बात पर इन्हें हंसी आ रही है। ये शायद किसी तरह के शॉक में हैं और समझ नहीं पा रहे हैं कि कोर्ट द्वारा बलात्कारी कुलदीप सिंह सेंगर को लड़की के घर से दूर रहने का आदेश, लड़की की सुरक्षा के लिए है। यानी कोर्ट मानता है कि कुलदीप सिंह सेंगर लड़की की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं, और इसलिए उन्हें ये निर्देश मिला है  िकवे लड़की से दूर रहें। ऐसे में लड़की की आवाजाही पर, या आज़ादी पर कोई पाबंदी नहीं है, और वो कहीं भी आ जा सकती है। अब कोई राजभर जी को समझाए कि कोर्ट का ये आदेश इस देश के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देने वालों के मुहं पर तमाचा है, कि वो एक लड़की को बचा नहीं पा रहे हैं, और उसके लिए कोर्ट को आदेश देना पड़ रहा है।

तीसरे और बड़े वाले हैं, जो सज़ा के इस निलंबन को ही न्याय मान बैठे हैं। 

दयाशंकर की बाइट

कोई दयाशंकर जी को जाकर समझाए कि दयाशंकर जी, कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की सज़ा माफ़ नहीं की है। वो बलात्कारी ही है, कोर्ट ने सिर्फ ये कहा है कि अगर उसने विधायक रहते हुए बलात्कार किया था तो क्या उसे लोक सेवक माना जाएगा या नहीं, इस विषय पर विचार करना है। यानी कोर्ट की नज़र में, कानून की नज़र में वो बलात्कारी ही है, इसलिए अगर आप उसका समर्थन करते हैं तो आप बलात्कार का ही समर्थन कर रहे हैं। अब जनता को फैसला करना है कि वो बलात्कार का समर्थन करने वाले व्यक्ति को कैसे देखती है। 

सबसे बड़ा झटका इन त्रेहन जी के समर्थन से लगा। जो जाने किस दिमागी परेशानी की हालत में बलात्कार का समर्थन करने पहंुच गई हैं। जनाब कोई तो इन्हें बताए कि कोर्ट अब भी कुलदीप सिंह सेंगर को बलात्कारी ही मानता है, और उसकी जमानत का विरोध इसलिए हो रहा है कि जनता मानती है कि अगर वो जेल से बाहर आया तो पीड़िता की जान को खतरा है। इसलिए कोर्ट से जनता की अपील थी कि जमानत ना दी जाए। कोर्ट ने अपनी सज़ा में कह दिया कि वो गुनहगार है, यानी बलात्कारी है, हत्यारा है। अब आप बलात्कार और हत्या का समर्थन कर रही हैं। 

खैर, मूर्खता की कोई सीमा नहीं होती। लेकिन वर्तमान सत्ता में जहां गुंडई ही सत्ता से नजदीकी का एकमात्र पैमाना बन जाए तो त्रेहन मैडम क्या करें? उनकी भी मजबूरी है। 

जो मजबूरी मुझे समझ नहीं आई, वो थी महामानव की चुप्पी, गृहमंत्री की चुप्पी, सवाल ये है कि भारत की एक लड़की, जिसका बलात्कार हुआ, जिसके बलात्कारी आपकी अपनी पार्टी से थे, जिसे बलात्कार के आरोप मे ंसज़ा मिली, जिसे उस लड़की के पिता की हत्या के आरोप मे ंसज़ा मिली। आप उस लड़की के समर्थन में एक शब्द नहीं बोल पाए। आप उस लड़की को ये आश्वासन तक ना दे पाए कि वो सुरक्षित है। आप एक बलात्कार पीड़ित लड़की को ये संदेश तक न दे पाए कि आप उसे सुरक्षा दे सकते हैं। क्या देश की जनता को महामानव से ये सवाल नहीं पूछना चाहिए कि आखिर वो कैसे बेटी बचाओ, का नारा दे सकते हैं, जब वो अपनी ही पार्टी के सदस्य द्वारा पीड़ित एक लड़की को सुरक्षा नहीं दे सकते। क्या उनमें ये नैतिक हिम्मत है कि वे अपनी पार्टी के सदस्यों को ये कह सकें कि अगर आप उस लड़की का समर्थन नहीं कर रहे तो कम से कम बलात्कारी का, बलात्कार का समर्थन न करें। याद रखिए महामानव चुप हैं, तो ये चुप्पी बलात्कार के समर्थन में मानी जाएगी। और ये इस बलात्कार के समर्थन से भी ज्यादा खतरनाक बात है। 


मुझे, पीड़िता के, भयाना के, तमाम स्त्रीवादी, प्रगतिशील संगठनों के, देश भर के नागरिकों के पीड़िता के समर्थन में शोर मचाने से बहुत फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि लोकतंत्र में ये जनता का अधिकार होता है कि यदि सत्ता का या न्यायालय का कोई फैसला उसे पसंद ना आए तो वो उसके खिलाफ सड़कों पर उतरे। यही लोकतंत्र होता है। मुझे देश की सत्ता की चुप्पी से फर्क पड़ता है, क्योंकि ये चुप्पी भारत की हर लड़की, हर महिला के लिए चेतावनी है कि तुम सुरक्षित नहीं हो, कि सत्ता की बुरी नज़र तुम पर है, कि ये सत्ता कभी भी तुम्हारे साथ कुछ भी बुरा कर सकती है। महामानव की चुप्पी तो यही कहती लगती है।

अब गंेद आपके यानी जनता के पाले में है। लोकतंत्र, न्याय, निष्पक्षता, और अधिकार तब तक सुरक्षित नहीं रह सकते जबतक जनता लगातार-लगातार विजिलेंट न रहे। 

चचा हमारे यानी ग़ालिब इस बारे में कह के गए हैं।

कहां खो गए मेरे हक़ हुजूर ए वाला 
ज़रा नज़र हटी कि चुरा लिए किसी ने
कोई उम्मीद बर नहीं आती, 
कोई सूरत नज़र नहीं आती। 

हताश थे अपने चचा शायद, उन्होने सोचा भी न होगा कि कभी उनके मुल्क को ये दिन देखना पड़ेगा कि चुने हुए प्रतिनिधि ज़िना का समर्थन करेंगे। पर ये बुरे दिन भी देखने ही थे। पर उम्मीद पे दुनिया कायम है, तो उम्मीद है कि 
वो सुबह कभी तो आएगी

शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

नेपाल भारत नहीं हो सकता।


 


 जनाबेमन, जब से नेपाल में नौजवानों ने उपद्रव मचाया, कुछ लोग इसे क्रांति भी कह रहे हैं, जेन ज़ी की क्रांति, खैर तो मेरा ख्याल है आठ तारीख को नेपाल में नौजवानो ने प्रदर्शन करना शुरु कर दिया था, और जल्द ही नेपाल की पार्लियामंेंटजिसे हिंदी में संसद कहते हैं, ना सिर्फ उस पर कब्ज़ा कर लिया बल्कि उसे आग लगा दी। प्रधानमंत्री को भागना पड़ा, इस्तीफा भी भाई ने भागते-भागते ही दिया सुना है। वित्त मंत्री को नंगा करके पीटा और सड़कों पर दौड़ा दिया। 



नेपाल भारत के पड़ोस में एक छोटा सा देश है, जहां ये सबकुछ हुआ, इससे पहले श्री लंका और बांग्लादेश में भी ऐसा ही कुछ हो चुका है। दोनो ही देशों में जनता ने प्रधान मंत्रियों को और अन्य मंत्रियों को दौड़ाया, मारा-पीटा है, तो अब भारत की अगल-बगल के तीन देशों में तो ये हो चुका है। तो भारत के कुछ विद्वान प्रगतिशीलों को लगने लगा कि क्या भारत में भी ऐसा कुछ हो सकता है। मेरा मानना है नहीं, बिल्कुल नहीं, कतई नहीं, ना ना ना। भारत में ये सब, या ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता। मैं आपको बताता हूं क्यों।


सबसे पहले तो साल 2014 में भारत पर पहली बार एक हिंदू राजा का राज्यारोहण, जिसे अंग्रेजी में कोरोनेशन कहते हैं हुआ था। 


अभी इस वीडियो में जो आपने सुना वही मैं हिंदी में कह रहा हूं, महामानव का कोरोनेशन यानी राज्याभिषेक हुआ था। तो विश्वगुरु, ब्रहमांडगुरु, नॉनबायोलोजिकल, महामानव भारत की राजगद्दी पर विराजमान हुए थे। याद रखिए नेपाल में इसका उल्टा हुआ था। नेपाल में राजा से उसकी ताकत छीन कर पार्लियामेंट बनाया गया था, जबकि भारत में संसद में ही महामानव का राज्याभिषेक हुआ था। ऐसे में आपको कैसे लगता है कि भारत में वो हो सकता है जो नेपाल में हुआ था। खैर आगे बढ़ते हैं। 


नेपाल के नौजवान, सुनते हैं, वहां के मंत्रियों के भ्रष्टाचार से बहुत परेशान थे। भारत में जबसे महामानव ने सत्ता संभाली है, एक भी भाजपा नेता के उपर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा है, बल्कि अगर किसी विदेशी व्यक्ति पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप लगा भी हो, तो उसने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की और उस पर से भ्रष्टाचार के हर आरोप हट गए हैं। यानी भारत में भ्रष्टाचार नहीं है, कतई साफ, स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार महामानव चला रहे हैं। बाकी जो थोड़ा बहुत भ्रष्टाचार है, वो सब विपक्ष के नेता कर रहे हैं, उन सबको एक - एक करके, किसी ना किसी बहाने से महामानव और डिप्टी महामानव जेल भेज रहे हैं, उनके इस काम में ईडी, सी बी आई, और न्यायालय उनकी मदद कर रहे हैं। ऐसे में जब भारत में कोई भ्रष्टाचार है ही नहीं तो फिर बताइए, नेपाल जैसी कोई चीज़ हो ही कैसे सकती है। यानी नहीं हो सकती, ऐसा मुझे विश्वास है। 


दूसरे, नेपाल में नौजवानों का आरोप है कि सारे नेता, जिनमें प्रधानमंत्री भी शामिल हैं, पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली हैं, बताइए, आपको भारत में कोई ऐसा लगता है, जो किसी पूंजीपति के इशारे पर काम करता हो। जबसे महमानव ने राजगद्दी संभाली है, भारत में तो तरह से रामराज्य आ गया है। यहां बाघ और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते हैं, बाघों को भारत में खास इसी काम के लिए अफ्रीका से मंगाया गया था, या शायद चीतों को मंगाया गया था, और बकरियों की कुर्बानी पर रोक लगा दी थी, ताकि वो एक ही घाट पर चीतों के साथ पानी पी सकें। मामले का लब्बो-लुबाब ये है कि भारत में भ्रष्टाचार नहीं है, पूरी दुनिया में है, अमेरिका, फ्रांस, रूस, चीन, सब देशों में भ्रष्टाचार है, भारत की विपक्षी पार्टियों मे ंतो भ्रष्टाचारी भरे हुए हैं, लेकिन महामानव की पार्टी में आप टॉर्च लेकर भी ढूंढोगे तो आपको कोई भ्रष्टाचारी नहीं मिलेगा, यही इस पार्टी की खासियत है, और इसलिए भारत में नेपाल जैसा कोई सिनेरियो बन ही नहीं सकता, ऐसा मुझे पूरा विश्वास है।


तीसरे कोर्ट यानी न्यायालय, यानी संविधान के रक्षा के लिए हमने ऐसी - ऐसी संस्थाएं खड़ी की हैं, जो कमाल की हैं। हमारे कोर्ट, हमारे जज, कभी सत्ता के साथ कोई जुगाड़ नहीं करते, हमारे न्यायाधीशों पर कभी करप्शन के आरोप नहीं लगे। यहां तो ऐसी समरसता है कि एक धर्मविशेष के भगवान को ही मुकद्मे में पार्टी बना दिया गया था, एक जज साहब ने तो बकायदा कहा था कि वे अपने ईश्वर का स्मरण करके सोए और जागकर उन्होने एक ऐतिहासिक फैसला लिख दिया था। ऐसे में आप समझ ही सकते हैं कि कैसे हमारी न्यायपालिका ने अपनी धर्मनिरपेक्षता बचा कर रखी हुई है। ऐसी बेदाग न्यायपालिका से भला किसी को शिकायत ही क्या हो सकती है। नेपाल में, श्री लंका में, और बांग्लादेश में भी न्यायपालिका का सत्ता से गठजोड़ था, जज अपने घरों पर नेताओं को, सत्ताधारी पार्टी को बुलाते थे, हमारे देश में ऐसा नहीं होता। जज अपनी दूरी बना कर रखते हैं, और किसी भी सत्ताधारी पार्टी के नेता से उनका कोई सामाजिक संबंध नहीं होता, इससे उनकी निष्पक्षता बनी रहती है। ऐसे में न्यायपालिका में जनता का विश्वास भी बना रहता है। जैसे हमारे यहां न्यायाधीश सत्ता द्वारा निर्दोष मामलों में सालों जेल में पड़े रहने वाले लोगों के पक्ष में अक्सर ही फैसला सुनाते रहते हैं, और इस तरह किसी भी तरह का राजनीतिक दुरुपयोग नहीं करने दिया जाता है। ना ही उन्हें अपने रिटायर होने के बाद किसी तरह का लोभ-लालच होता है, इसलिए वे पूरी तरह निष्पक्ष फैसला सुनाते हैं। हमारे देश में कभी ऐसा नहीं हुआ कि बिना मुकद्में के किसी को सालों जेल में रखा गया हो। 


इतनी सारी खूबियां होने के चलते हमारा देश नेपाल जैसी हालत होने से बचा हुआ है, और बचा रहेगा, ऐसा मुझे विश्वास है।

अब आते हैं, राजनीतिक भ्रष्टाचार पर। सुना बांग्लादेश में चुनाव आयोग ने सत्तापक्ष को सत्ता में बने रहने के लिए चुनावों में ही गड़बड़ कर दी थी। यानी आप वोट किसी को भी दो, जीतना उसी को था, जिसे चुनाव आयोग चाहता था। हो सकता है कि नेपाल में भी ऐसा हुआ हो। लेकिन हमारे देश यानी भारत में ऐसा होना संभव ही नहीं है, यहां का चुनाव आयुक्त जो महिलाओं की निजता का इतना ख्याल रखता है कि वोटिंग की वीडियो को रिलीज़ नहीं करता, यहां तक कि वोटिंग का डाटा तक रिलीज़ नहीं करता, बल्कि उसके दुरुपयोग की आशंका के चलते उसे अपनी साइट तक पर नहीं डालता और इस तरह चुनाव की, लोकतंत्र की मर्यादा को बचाकर रखता है। हां कुछ लोग हैं, जो चुनाव आयोग पर धंाधली का आरोप लगात हैं, लेकिन ये लोग ठीक लोग नहीं हैं, इसलिए इनकी तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि चुनाव आयोग ने तो चेतावनी भी दी थी इन्हें। तो ऐसे में मेरे दोस्तों, भारत में नेपाल जैसे हालात नहीं हो सकते, क्योंकि चुनाव आयोग, स्वतंत्र, निष्पक्ष और जवाबदेह है। ऐसा मुझे विश्वास है। 


अब आते हैं, नौजवानों के असंतोष की। तो इसमें एक बात तो ये है कि ये नौजवान आजकल बहुत असंतोष में जी रहे हैं। मुझे तो इनकी मांगे ही समझ नहीं आती। पहले तो ये कहते हैं कि हमें पढ़ाई करनी है। अब इतने सारे लोगों की पढ़ाई की व्यवस्था तो हो नहीं सकती, इसलिए सरकार कांवड़ यात्रा को व अन्य धार्मिक कार्यों का प्रचार करती है, धार्मिक बाबाओं की ऐसी लंबी कतार है कि क्या कहने, इन्हें संसद में बुलाकर इनका सम्मान किया जाता है। इसमें एक थंबरूल ये है जो बाबा जितना मूर्ख होगा, उसे उतना ही बड़ा सम्मान दिया जाता है। खैर इससे एक तो बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ती है, दूसरे पढ़ाई की जिम्मेदारी से सरकार मुक्त हो जाती है। दूसरा असंतोष है सरकारी नौकरियों में कमी की, तो भई हमारे महामानव ने आते ही कहा था कि यारों पकोड़े बेचना भी रोजगार है, साइकिल का पंचर लगाना, रेल में चना-चबैना बेचना भी रोजगार है, तो इस तरह सरकार देश में करोड़ों बल्कि अरबों रोजगार दे चुकी है, दूसरे आपके पेपर लीक का मनोविज्ञान समझना होगा। देखिए जब कोई पेपर लीक होता है, तो वो बुरा नहीं होता, उसका फायदा ये होता है कि बच्चों में ये आशा बनी रहती है कि चलो इस बार लीक हुआ है, यानी एक अटेम्पट अभी और दिया जा सकता है।



ऐसे में हमारे देश में नौजवान असंतुष्ट हो ही नहीं सकते। ये जो आप नौजवानों को पुलिस से पिटता हुआ देखते हो, ये सब विपक्ष की चाल है, और हमारे नौजवान भी ये जानते हैं, इसलिए ये कभी नेपाल जैसे हालात यहां नहीं आने देंगे। ऐसा मुझे विश्वास है। 

हमारे देश में महिलाओं का बड़ा सम्मान होता है। इस मामले मे ंतो हमारे विश्वगुरु महामानव ने ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसका मुकाबला पूरी दुनिया में कोई नही ंकर सकता। हमारे देश में एक ढोंगी संत बना हुआ था, जिस पर बलात्कार का आरोप सिद्ध हुआ है, वो जेल में पड़ा हुआ है, इसमें कोई ढील नहीं है, दूसरा एक मंत्री था, उसे भी जेल में डाला गया है, तीसरा हालांकि बाहर आया है, पर इसके लिए कोई दबाव किसी पर नहीं था, वो तो खुद पीड़िता ने शिकायत वापस ले ली, वरना.....खैर हमारे देश में बढ़िया सिस्टम है, जिसमें रेप होने पर शिकायत होती है, फिर शिकायतकर्ता खुद शिकायत वापस ले लेती है, जिस पर रेप का आरोप हो, अगर वो सत्ताधारी पार्टी में हो तो उसका समर्थन किया जाता है, ताकि किसी के दिल में कोई शक-शुबह हो तो वो संभल जाए, और आइंदा ऐसी कोई शिकायत सामने ना आ सके। और इसलिए हमारे देश में नेपाल जैसा कुछ होने के चांसेज़ माइनस में हैं, ऐसा मुझे पूरा विश्वास है। 

ऐसे में मेरे दोस्तों, जब हमारे देश में सबकुछ इतना बढ़िया-बढ़िया चल रहा है तो मुझे नहीं लगता कि आने वाले किसी भी समय में भारत में नेपाल जैसे हालत बन सकते हैं। महामानव जिन्हें पूरी दुनिया के नेता अपना नेता मानते हैं, जो पूरी दुनिया की कई-कई यात्राएं कर चुके हैं, जिनके एक इशारे पर युद्ध रुक जाते हैं, वे इस देश के महान, नॉनबायोलॉजिकल पी एम बने रहेंगे, और इसमें चुनाव आयोग उनकी पूरी मदद करेगा। ऐसे में इस देश में नेपाल नहीं हो सकता। बाकी सब चंगा सी। अपनी खैर मनाओ जी

चचा हमारे, यानी चचा ग़ालिब इस बारे में कह गए हैं, एक शेर, सुनिए और सिर धुनिए
कि

तू किसी और से पूछ नेपाल का हाल
मेरे मुल्क के हालात बहुत अच्छे हैं
यहां सब चंगा है, सब चंगा है
बस एक राजा है जो कि नंगा है


थोड़ा बहर इधर-उधर हो जाती है, ग़ालिब के शेरों की यही खूबसूरती है कि पहले मिसरे की बहर दूसरे से नहीं मिलती, खैर चचा की बातेें, चचा ही जानें, हमारा काम आप तक पहुंचाना था, पहुंचा दिया। पर ये तो आप भी मानोगे कि चचा को भी विश्वास था कि यहां नेपाल जैसा काम नहीं हो सकता। समझे कुछ।
बाकी चाहे जो हो, आप देखते रहिए मुझसे मिलते रहिए।

मंगलवार, 23 सितंबर 2025

महामानव का दुख: आम आदमी की आपदा



तो जनाब बारिश गजब बहुत हुई इस बार। ऐसा लग रहा था कि पिछले कुछ सालों की कसर निकाल रही है। पंजाब, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, बिहार, यू पी, हरियाणा, यानी सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा का उत्तरी भाग तो लगभग सारा का सारा डूब ही रहा है, सुना मुम्बई में भी पानी भर गया। भर गया तो भर गया, उसमें सरकार क्या कर सकती है जी। 



बारिश का होना भगवान की मर्जी है, सड़कों पर पानी भरना भगवान की मर्जी है, बाढ़ आना भगवान की मर्जी है, बाढ़ में घर बह जाना भगवान की मर्जी है। लोगों को इतना समझ नहीं आता कि भगवान की मर्जी के आगे किसी की नहीं चलती। ये तो चाहते हैं कि सरकार भगवान के कामों में हस्तक्षेप करने लगे और सरकार है कि धर्म को बचाने में, भगवान को बचाने में लगी हुई है। जिसकी जितनी लिखी है उससे ज्यादा तो वो जी नहीं सकता, अब इसके लिए सरकार को दोष क्यों देना भाई। 



यही पंजाब के लोग हैं जिन्होने आम आदमी पार्टी की सरकार बनाई है, अब ये चाहते हैं कि केन्द्र सरकार इनकी मदद करे। क्यों करे भई, आप एक बात तो समझ लीजिए, जो महामानव की सरकार बनाएगा, वहीं डबल इंजन या टिपल इंजन की सरकार चलेगी, वरना एक इंजन की सरकार तो महामानव नहीं चलाएंगे। आप समझ लीजिए, नहीं चलाएंगे मतलब नहीं चलाएंगे। एक इंजन से रेल नहीं चलती आप सरकार चलाने की बात कर रहे हैं, साल 2014 से अब तक आप ही बताइए, कहीं भी आपने सुना है कि कहीं सिंगल इंजन की सरकार सही से काम कर पा रही हो। जहां भी कोई ढंग का काम हो रहा है वो सिर्फ डबल इंजन की सरकार कर रही है, कहीं-कहीं जहां किसी रीजनल पार्टी से समझौता करना पड़ता है वहां हो सकता है कि इंजन तीन हों, सरकार का पता नहीं। जब किसान अंादोलन हुआ था, तो इन्हीं पंजाब के लोगों ने पूरे एक साल या उससे भी ज्यादा तक महामानव को परेशान रखा था और तब मजबूरी में, शायद पहली बार महामानव को अपने एक दो नहीं, बल्कि पूरे तीन कानून वापस लेने पड़े थे। कितनी किरकिरी हुई होगी सोचिए ज़रा दोस्त के सामने महामानव की। दोस्त ने कहा होगा, क्या यार, तू इतना भी नही ंकर पाया मेरे लिए कि सारे देश के किसानों को मेरा गुलाम बना दे। और महामानव को थूक गटक के चुप रह जाना पड़ा होगा। और अब तुम लोग किस मुहं से महामानव से चाहते हो कि केन्द्र सरकार तुम्हारी आफत के समय, इस आपदा के समय तुम्हारी मदद करें। 



जब हिमाचल, उत्तराखंड और पंजाब में बाढ़ अपनी तबाही मचा रही थी, तब महामानव बिहार बंद का आवाह्न कर रहे थे, और ये ठीक भी था, महामानव की मां को बिहार के ही एक लड़के ने गाली दी थी। इसके लिए पूरे बिहार को सबक सिखाना जरूरी था, किसी माई के लाल में ये हिम्मत कैसे हो कि वो महामानव को कुछ कह सके। पूरे देश के सभी चैनलों पर महामानव की मां की गाली की बातें हों रही थीं। हर कोई ये जानना चाहता था कि किसी कि इतनी हिम्मत हो कैसे गई? बताइए तो। अब जाहिर है ऐसे में जब इतना भावनात्मक मुद्दा सामने हो तो इन चैनलों के पास इतना समय तो नहीं ही होगा कि वो पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड में आपदा प्रभावित लोगों को दिखा सके। वहां बाढ़ से हुई तबाही दिखा सके, उनकी मदद के लिए सरकारी प्रवक्ताओं से सवाल पूछ सके। महामानव को अपनी मां की गाली से इतना दुख हुआ कि वो भावनात्मक रूप से परेशान हो गए, और इसीलिए रो दिए, महामानव का रोना था कि उनके सारे डिप्टी महामानव रो दिए, सारे चैनलों के एंकर रो दिए, ये रोआ राटा ही हर चैनल का एकमात्र कार्यक्रम बन गया। और इस तरह बाढ़ की आपदा की जो खबरें चलानी चाहिए थीं, उनकी जगह महामानव का रोना दिखाया गया, बिहार बंद दिखाया गया, और भी वो सब कुछ किया गया जो महामानव की भावनाओं को शंात करने के लिए किया जा सकता था।



अब आप मुझे बताइए कि अगर महामानव परेशान हों, तो गोदी चैनलों को क्या कर्तव्य है, यही ना कि वो महामानव की भावनाओं के लिए कुछ करे, उनके बारे में अच्छी - अच्छी बातें कहे, उनके दुश्मनों को बुरी - बुरी बातें कहे। या कि देश में चल रही बाढ़ की आपदा पर बात करे, अरे ये भारत की जनता है, हर सीजन इसका यही काम है, गर्मी बढ़ी मर गए, बाढ़ आई मर गए, बिमारी हो गई मर गए, कुछ भूख से मर गए, कुछ ने आत्महत्या कर ली, जो इन सबसे नहीं मरे, वो दंगों में मर गए। अब महामानव का क्या यही काम रह गया कि वो इन मुसीबतज़दा लोगों की चिंता करते रहें। महामानव को और बहुत काम हैं। 



इधर सुना पंजाब में एक कुत्ता बाढ़ग्रस्त इलाके में लोगों की मदद करता पाया गया। बढ़िया कुत्ता है, सुना जब लोग राहत सामग्री लेकर जाते थे, तो बाढ़ में डूबे रास्तों पर ये कुत्ता इनकी मदद करता था, इनके आगे-आगे चलता था। बढ़िया कुत्ता है, मदद कर रहा है। इसे पता है जब आपदा आती है तो ये नहीं देखा जाता कि किसने तुम्हें रोटी दी थी, किसने गाली दी थी, किसने पत्थर मारा था। मुझे लगता है कि इस कुत्ते की समझ यही थी कि आपदा आने पर लोगों की मदद करना चाहिए। बढ़िया कुत्ता है। आपदा में काम आ रहा है, आपदा प्रभावित लोगों के लिए काम कर रहा है। 




खैर हम बात कर रहे थे कि इस बार बारिश की, जो बहुत ज़ोर से हुई लेकिन आपने देखा होगा, कि दिल्ली के किसी भी हिस्से में पानी नहीं भरा। जब से रेखा जी गुप्ता की सरकार आई है, देश की राजधानी में तीन इंजनों वाली सरकार चल रही है। कहां पहले रोज़ लेफ्टिनेंट गर्वनर को दिल्ली सरकार को हड़काना पड़ता था, जब से तीन इंजन वाली सरकार आई है, गर्वनर साहब बिल्कुल चुप हैं, क्योंकि दिल्ली में पानी नहीं भरा। कोई समस्या ही नहीं है दिल्ली में, पानी की निकासी की सुंदर व्यवस्था हो गई है, सड़कों के गड्ढे भर दिए गए हैं। नदियां साफ हो गई हैं, रेखा जी गुप्ता और लेफ्टिनेंट गर्वनर साहब ने खुद करवाई हैं। तो जहां पूरा देश बाढ़ से जूझ रहा है वहीं दिल्ली में इतना पानी गिरने के बावजूद कोई समस्या नहीं है। ये कमाल तीन इंजनों का कमाल है भई वाह। 



एक बात यहां जो मेरी नज़र में आई और किसी की नज़र इस पर नहीं गई, वो है राहत सामग्री जिहाद, या इसे हयूमैनिटी जिहाद भी कह सकते हैं। महाराष्ट में मस्जिदों के दरवाजे खोल दिए गए और राहत सामग्री बांटी, दिल्ली में भी ये लोग यही काम कर रहे हैं। मैं महामानव से अपील करता हूं कि वो या उनका कोई डिप्टी, या प्रोस्पेक्टिव महामानव कहीं किसी मंच से ये मानवता जिहाद जो ये लोग फैला रहे हैं, उसका भी जिक्र कर दे, और इन्हें सबक सिखा दे। अरे भई ये लोग यू पी एस सी जिहाद के बाद अब पूरे देश में राहत सामग्री बांटकर मानवता जिहाद फैला रहे हैं, इन्हें महामानव कभी माफ नहीं करेंगे। 



रेखा जी गुप्ता जैसे डबल या टिपल इंजन की सरकार चलाने वाले अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी महामानव से बहुत कुछ सीखा है, अब हम सीधे-सीधे पुरानी सरकारों पर सारी मुश्किलों का ठीकरा फोड़ सकते हैं, और अपनी जिम्मेदारियों से साफ बच सकते हैं। बस इस सोशल मीडिया पर किसी तरह लगाम लगानी पड़ेगी। ये सोशल मीडिया पर जिस तरह के वीडियो आ जाते हैं, उससे दिल्ली की, व अन्य राज्यों में भाजपा सरकारों की छवि खराब होती है, इससे देश की छवि खराब होती है। मुझे लगता है किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को किसी भी केस में एक टिप्पणी ये भी कर ही देनी चाहिए कि अगर कोई व्यक्ति किसी आपदा की, या सरकार की नाकामी की, या भ्रष्टाचार की, या सरकारी दमन की, लूट की कोई फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करेगा, या सरकार से कोई सवाल पूछेगा, या मान लीजिए अपने तईं कुछ भला या अच्छा करता दिखेगा, जैसे बाढ़ के समय लोगों के लिए बचाव या राहत का काम करता मिलेगा, तो उसे टू इंडियन यानी सच्चा भारतीय नहीं माना जाएगा, और उसे बिना किसी टायल के पांच-सात साल के जेल में डाला जाएगा, वो भी बिना जमानत। ये लोग तभी सुधरेंगे।


मेरा तो ये मानना है दोस्तों कि, इतने सालों बाद जो इतनी बारिश आई, इससे कुछ अच्छा या बुरा नहीं हुआ। हमारे यहां पानी भरने के लिए इतनी ज्यादा बारिश की जरूरत है ही नहीं। हमने खुद ही ऐसे-ऐसे काम किए हैं कि धराली-थराली में, हिमाचल में, जम्मू में, पहाड़ टूटने में मदद की है, हां कुछ लोग ऐसे पगलेट भी हैं, जो इसका विरोध करते हैं, और ऐसी आपदाओं के लिए सचेत भी करते हैं। जैसे ये साहब हैं, सुना इनके उपर ऐसी ही पहाड़ों को नुक्सान ना पहुंचाने वाली याचिका पर इन्हें पांच हजार का जुर्माना लगा था, और अब तक कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं महाशय। हुंह, हिमालय बचाने निकले थे। और दिल्ली, गुड़गांव और मुम्बई का क्या है ना भाई लोग, कि लोगों का ेअब आदत पड़ चुकी है। बस अब ये सरकार जो आई है, जिसकेे आते ही दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर बिल्कुल साइलेंट हो गए हैं, वही चमत्कार करेगी, इसका भरोसा रखिए। 

बाकी जो है सो हइए है। हां, आपसे अगर बन पड़े तो आर एस एस के कार्यकर्ता मत बनिए, बल्कि आपदा प्रभावित इलाकों के लिए जितना भी बन पड़े मदद जरूर कीजिए, जैसा कि लोग कर रहे हैं। 
चचा ग़ालिब ने बड़े ग़मगीन होकर एक शेर लिखा था, 


ये बाढ़ पंजाब की, ये लैंड स्लाइड हरियाणा की
ग़ालिब के दिल पे चोट लगाती हैं क्या कहें
सब देश में चिल्लाते हैं, आफत में पड़े लोग
शर्म तुझको मगर आती नहीं है, क्या कहें

हेटर्स कहेंगे कि भाई, ग़ालिब के जमाने में पंजाब और हरियाणा कहां था, अरे मेरे मितरों, महामानव की नज़रों से देखोगे तो इससे भी बड़े-बड़े चमत्कार दिखेंगे। समझे क्या
अभी तो फौरन से ये करो कि राहत कार्यों में मदद करो, और इस अपील को शेयर करो। बाकी बातें बाद में
ठीक है। नमस्ते।

सोमवार, 22 सितंबर 2025

नया टैक्स - नया रिश्ता





 पिछले दिनों काफी कुछ हो गुज़रा है जनाब। हालांकि बड़े विद्वान लोग कह गए हैं कि हर बात पर तब्सरा करना ज़रूरी नहीं होता। तो भी आदत से मजबूर लोग क्या करें, बताइए। हम लोगों के लिए चुप बैठ पाना तो बहुत मुश्किल है साहब। राहुल गांधी ने बिहार में जो वोट अधिकार यात्रा निकाली, उसे मीडिया चैनलों ने दिखाया ही नहीं, लेकिन सोशल मीडिया में खूब वायरल हुआ साहब,
हर जगह की यात्रा हर जगह की भीड़ और हर जगह ”वोट चोर- गद्दी छोड़” का नारा। भई सही बताएं हमको तो उससे बहुत ज्यादा दुख हुआ, महामानव की आंखों में आंसू आ गए, जो उन्होने जब्त कर लिए, और फिर सही समय देख कर उन आसुंओं का सही सदुपयोग किया। बड़े लोगों की यही पहचान होती है कि वो अपने दुख को भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर ले जाएं। खैर दूसरी तरफ कोई भाई साहब वोट अधिकार यात्रा की रैली के बाद मंच पर चढ़ कर गाली-गुफ्तार कर आए। देखिए भाई मैं गाली-गलौज के सख्त खिलाफ हूं, इसलिए मुझे इस पर ऐतराज है, कोई भी, किसी को भी, किसी भी तरह की गाली दे इससे मुझे सख्त ऐतराज होता है।

सही किया कि भाजपा के नेताओं ने बिहार बंद किया, जनता को भी करना चाहिए था। महामानव के आवाह्न पर, उनके रोने पर, भाजपा के नेताओं ने बहुत भरोसा किया, सुना काफी जगहों पर भाजपा के नेता उतरे भी, और उन्होने बिहार की जनता को इधर-उधर जाने से रोका भी, लेकिन अफसोस की बिहार की जनता ने महामानव का साथ नहीं दिया। 
बिहार में बंद पर जनता को परेशान करते भाजपा नेता वीडियो
खैर मेरा मानना है कि ये सब किया-धरा भाकपा माले के नेताओं का है, दरअसल ये दीपाकंर भट्टाचार्य जो हैं, 


ये बहुत वबाल काटे हैं जी, राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा के शुरु होने से पहले ही ये साहब वोट चोर- गद्दी छोड़ का नारा लगा दिए, जनता इस नारे को लपक ली, और आज पूरे देश में सबकी जबान पर ये नारा चढ़ गया। सबसे पहले तो इन्हें ही ठीक करना होगा, तब ना महामानव के आसुओं पर जनता का ध्यान जाएगा। दूसरे मेरा मानना है कि महामानव जब चीन में थे, तो पुतिन और जी शिनपिंग के साथ हंस रहे थे, बहुत बड़े ठहाके वाला हंसी हंस रहे थे। 

अब उनके चेलों-चपाटों ने वो वीडियो खूब वायरल कर दी थी, कि देखो हमारे विश्वगुरु के साथ दुनिया के बडे़-बड़े नेता हंसते हैं। अब दिक्कत ये है कि एक तरफ आपकी यूं दांत दिखाकर हंसती हुई फोटो है दूसरी तरफ आपकी यूं रोते हुए वीडियो आ जाती है। 



इसका नुक्सान ये होता है कि जनता को समझ नहीं आता कि आप असल में हंस रहे हैं या रो रहे हैं। 

भई भारी मिस्टेक हो गया। ये ए एन आई वाले भारी गड़बड़ कर दे रहे हैं आजकल, इन्हें ठीक से समझाना पड़ेगा। 
पर आज का हमारा वीडियो इस मुद्दे पर हइये नहीं। मां वाले मुद्दे पर बहुत सारे लोग वीडियो बना चुके हैं, और हमारा मानना है कि जिस बारे में विद्वान लोग बात कर चुके हों उस बारे में ज्यादा बोलना -बतलाना नहीं चाहिए। हम तो आज आपके साथ महामानव के नए मास्टर स्टोक पर बात करने आए हैं। जिसके नाम के पहले ही जी लगा हुआ है। जी हां, वही है भारत भू का महान, रामराज्य, विश्वगुरु वाला टैक्स यानी जी एस टी। 

जी एस टी को कुछ लोग ग़लत-सलत नामों से पुकारते हैं, कुछ लोग इसे गब्बर सिंह टैक्स बोलते हैं, कुछ गोबर सड़ा टैक्स बोलते हैं, आज हम आपको बताते हैं कि जी एस टी का असली नाम असल में गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स यानी वस्तु एंव सेवा कर है। ये टैक्स भारत की जनता से वसूलने का जो कारण बताया गया था वो ये था कि जो तमाम अप्रत्यक्ष कर लोगों से वसूले जा रहे हैं, उन्हें खत्म कर दिया जाए और टैक्स को सरल और आसान बनाया जाए, ताकि देने वाला और लेने वाला, दोनो ही इसे आसानी से समझें और जनता को भी समझने में आसानी हो। कहते हैं कि ये अब तक भारत का सबसे बड़ा अप्रत्यक्ष कर सुधार था। इसीलिए इसे गुडस् एंड सर्विसेज टैक्स कहा गया, यानी ये कर वस्तुओं और सेवाओं पर लगाया जाता है। 

तो साहेब हुआ यूं कि जी एस टी की वजह से जनता बहुत यानी काफी परेशान थी, चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था। किसी को समझ ही नहीं आता था कि आखिर कौन सा जी एस टी कहां पर आयद होगा, कौन सा फॉर्म भरना पड़ेगा। मुझे तो आजतक समझ नहीं आया कि आखिर ये है क्या बला, कुछ दिन तो भाई कोशिश की, कि इसे समझ लिया जाए, लेकिन फिर थकहार कर अपने अकाउंटेंट के हवाले छोड़ दिया। अब हर महीने अकाउंटेंट को एक निश्चित रकम सिर्फ इसलिए देनी पड़ती है ताकि वो निल जी एस टी जमा कराता रहे, क्योंकि धंधा तो मैने जैसा बताया ही है पहले ही ठप्प पड़ा हुआ है, अपनी गाड़ी तो उम्मीद के भरोसे चल रही है जनाब। कभी आएगा काम तो टैक्स भी जमा कर ही देंगे। 
अच्छी बात ये रही कि महामानव की सरकार ने आम जनता की इस परेशानी को समझा, देर में समझा लेकिन समझा, और इस मुश्किल सवाल का हल ये निकाला कि अब जी एस टी को, जैसा कि बताया जा रहा है, कि अब जी एस टी को, मेरा मतलब सरकार ने जो हल निकाला है वो है कि जनता के लिए आसान बनाने के लिए जी एस टी को......
माफ कीजिएगा, समझ ही नहीं आया कि इस वाक्य को पूरा कैसे किया जाए। दरअसल जब जनता को जूते खाने की आदत पड़ जाए तो उसे मिठाई की आदत नहीं डालनी चाहिए। शासन का ये महत्वपूर्ण सूत्र आधुनिक चाणक्य की चाणक्य नीति से निकला हुआ बताते हैं। लेकिन महामानव जनता के शुभचिंतक हैं, इसलिए वे चिंता करते हैं कि जनता का शुभ कैसे हो रहा है। शुभचिंता शब्द से आप विचलित ना हों, शुभचिंतक का मतलब भी दरअसल बिल्कुल वैसा नहीं है जैसा कि बोलने सुनने से समझ में आता है। शुभचिंतक का आधुनिक मतलब है वो व्यक्ति जिसको आपके शुभ से चिंता हो जाती हो, वही शुभचिंतक होता है। महामानव और आधुनिक चाणक्य नीति का सारतत्व ये निकला कि कोई ऐसा हल निकाला जाए जी एस टी की समस्या का कि लाठी भी टूट जाए और सांप भी जस का तस रहे। तो उसका जो हल निकाला गया वो ये कि जी एस टी में कुछ नामों और शब्दों का बदलाव किया गया है। अब देखिए नामों और शब्दों के बदलाव का ही सारा खेला है, आप चाहे जो भी कहिए, इलाहाबाद प्रयागराज हो गया, चारों तरफ खुशहाली ही खुशहाली हो गई, इसी तरह फैजाबाद को अयोध्या करने से कैसा चमत्कार हुआ बताते हैं, इसी तरह जी एस टी में अगर कुछ नामों को बदल दिया जाए तो जनता में खुशी की लहर दौड़ जाएगी, ऐसा बताते हैं। 
लेकिन ये जनता वाकई बहुत बुरी है। बाज़ार उपर जाने का नाम नहीं ले रहा, और जनता ने इस नये जी एस टी का, वैसा स्वागत नहीं किया, जैसे की उम्मीद थी। मेरा ख्याल है इसे नये वाले जी एस टी को ही एक नया नाम दे देना चाहिए, कहना ये चाहिए कि पुराना जी एस टी खराब था, इसलिए उसे बदलकर हम एक नया सिस्टम ला रहे हैं, जो आज से पहले की सरकारों ने सोचा भी नहीं था। जैसे इसे आर आर टी यानी रामराज्य टैक्स कह देते। ऐसा करने से एक ही तीर से कई सारे शिकार किए जा सकते थे। 
जैसे कहा जा सकता था कि सत्तर सालों में पहली बार - चमत्कार ऐसा महान कर नहीं लाया गया था, जैसा महामानव ले आए हैं। 
जैसे ये नेहरु ने ग़लती की थी कि भारत में जी एस टी नहीं था, इसलिए उस ग़लती को ऐसे सुधारा गया है कि आर आर टी यानी रामराज्य टैक्स लाया गया है। 
जैसे सनातन की आस्था सिर्फ आर आर टी यानी रामराज्य टैक्स ही बचा सकता है। 
जैसे हिंदू खतरे में है। 
जैसे घुसपैठिए आए हुए हैं। 
जैसे अर्बन नक्सल नहीं चाहता कि भारत महान बने, विश्वगुरु बने, इसलिए आर आर टी यानी रामराज्य टैक्स लाना जरूरी था। 
जैसे जिनके पास घर नहीं होते, उनका पता जीरो नंबर होता है। 
निर्मला सीतारमण मैं प्याज नहीं खाती जी। 
और अगर फिर भी काम ना बने तो
मोदी का वीडियो, मुझे गालियां दी गईं। 
महामानव की मां और जी एस टी 2.0

कारण तो दोस्तों ये बताने के बहुत हो सकते थे कि आखिर ये जी एस टी क्यों लाया गया था, या उसमें अब बदलाव क्यों किया गया है। मेरा सिर्फ ये कहना है कि महामानव को पिछले दिनों बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ा है, अब पूरे देश में महामानव के खिलाफ माहौल बनता दिख रहा है। राहुल गांधी चैन की सांस नहीं लेने दे रहे हैं, तेजस्वी, ममता, अखिलेश, स्टालिन, पिनाराई, ने वैसे परेशान किया हुआ है, एक दोस्त था, वो भी धोखा दे गया। ऐसे में उन्हें और परेशान न किया जाए। अगर थोड़ा बहुत दिक्कत होती है तो मेरी देश की जनता से अपील है कि झेल लो यार। क्या ही जाता है, इतने दिनों जो जी एस टी जाता था, वो भी तुम्हारी जेब से जाता था, अब जो जा रहा है वो भी तुम्हारी जेब से जा रहा है, आगे जो जाएगा वो भी तुम्हारी ही जेब से जाएगा। तो इसमें इतना रोने गाने की क्या बात है। 
जनता बहुत अहसानफरामोश हो गई है दोस्तों, महामानव को उनके महान कामों का वैसा सिला नहीं मिल रहा है, जैसा छ सौ करोड़ जनता से उम्मीद थी। खैर, जी एस टी टू प्वाइंट ओ अब आ ही गया है, तो टैक्स भरिए और महामानव के लिए तालियां बजाइए, बाकी आपकी मर्जी।

चचा हमारे ग़ालिब चचा, एक शेर कह गए हैं जी एस टी पर, सुनिए, शायद आपकी भी आंखें खुल जाएं। 

हर किसी की किस्मत नहीं होता जी एस टी ग़ालिब
ये वो बला है जो बिन बुलाए आ जाती है कसम से

ग़ालिब के जमाने में जो जी एस टी था, वो सीधा पी एम केयर फंड में जाता था, अब ऐसा नहीं होता, अब उसका सदुपयोग बिगड़ी हुई राज्य सरकारों से दुश्मनी निकालने के लिए किया जाता है। बाकी आपका और मेरा कोई माई-बाप नहीं है। जी एस टी भरिए और भरिए, और भरिए।अच्छी जनता बनिए। बाकी अगली बार मिलूंगा। नमस्ते। 


रविवार, 29 जून 2025

यादव कथावाचक और जाति व्यवस्था



दोस्तों, ये वीडियो शुरु करने से पहले एक स्वीकारोक्ति। मेरा जन्म एक ब्राहम्ण परिवार में हुआ है, हालांकि इस उपलब्धि को हासिल करने के लिए मैने अपनी तरफ से कुछ नहीं किया है, लेकिन इस उपलब्धि से मुझे बहुत जबरदस्त प्रिविलेज हासिल है। तो आज मैं अपने पूरे नाम के साथ आपके सामने हूं। मेरा नाम कपिल शर्मा है। अब सवाल ये है कि मैं आपको ये सब क्यूं बता रहा हूं। क्यूंकि मैं ब्राहम्ण हूं, लेकिन मैं जाति को नहीं मानता। 



दरअसल मेरा मानना ये है कि इस देश में जात-पात जो होती थी, वो अब नहीं होती। अब ये देश एक आधुनिक देश बन गया है, और पहले किसी जमाने में जाति के नाम पर जो अत्याचार होते थे, वो अब नहीं होते। अब कोई ब्राहम्ण है तो है, उसमें उसका क्या दोष, इसलिए जो मान लीजिए नीची जाति का है तो है, उसमें कोई क्या ही कर सकता है। ये जो है ना जाति की बात, ये तो वही लोग करते हैं, जो इससे फायदा उठाना चाहते हैं। अब देखो मुझे तो रिजर्वेशन नहीं मिलता, मैं ब्राहम्ण हूं, लेकिन बेचारा हूं, मेरा शोषण हो रहा है। हालंाकि मैं जाति नहीं मानता, लेकिन देखिए ये तो संस्कृति की बात है, इसलिए भारतीय संस्कृति के हिसाब से सबको अपनी जाति के हिसाब से ही रहना चाहिए। वरना..... मैं ब्राहम्ण हूं, लेकिन मैं जाति को नहीं मानता। खैर अभी कुछ देर पहले एक स्वामी जी की वीडियो देखी



इस वीडियो में स्वामी जी कह रहे हैं कि सार्वजनिक रूप से कथा सुनाने में शास्त्र की मार्यादा ये है कि ये सब जाति को कथा सुनाने का अधिकार केवल ब्राहम्ण को है। मैं इन महान ज्ञानी बाबा के इस तर्क से बिल्कुल सहमत हूं। भई जिस जाति का काम शास्त्रों में वर्णित है, वो काम उन्हीं जातियों को करना चाहिए। जैसे ब्राहम्ण को ये अधिकार है कि वो कथा सुनाए, और किसी अन्य जाति को ये अधिकार नहीं है कि वो कथा सुनाए, या बाबा जी के अनुसार सार्वजनिक रूप से ना सुनाए। यानी कथा सुनाना, पूजा करना, हवन करना आदि पर केवल ब्राहम्णों का अधिकार है। ब्राहम्णों के अलावा कोई और जाति यदि इन कामों को करती है तो ये शास्त्र सम्मत नहीं है, और काम तो भैया कुछ भी हो, शास्त्र सम्मत होना चाहिए। 



मेरी चिंता दूसरी है। मेरा सवाल ये है कि ये जो यादव जी का बाल उतारा गया, उस्तरे से, वो काम किसने किया था। कि अगर ये काम किसी ब्राहम्ण ने किया तो वो तो जातिच्युत हो गया। क्योंकि ब्राहम्ण बाल उतारने का काम नहीं कर सकता। 


मैं ब्राहम्ण हूं, लेकिन मैं जाति को नहीं मानता, पर ये वाले बाबा जी ही बताएं कि क्या ये सही नहीं है? माने शास्त्रों के हिसाब से तो ब्राहम्ण बाल नहीं उतार सकता, या बाबा जी बताएं उतार सकता है या नहीं। 

दूसरे बाबा जी कह रहे हैं कि कोई अपनी पहचान छुपा कर गया, तो उसकी रिपोर्ट पुलिस में करनी चाहिए, ना कि कानून को अपने हाथों में लेना चाहिए। 


अब इसमें भी हम बाबा जी का फुल टू फुल समर्थन करते हैं। पहले तो पहचान हो कि भीड़ में ये जो लोग दिख रहे हैं, कि वो ब्राहम्ण हैं भी कि नहीं। देखो भाई ये धर्म, जाति समाज, और वेद शास्त्रों की बात है, इसलिए किसी के ब्राहम्ण होने का प्रमाण ये नहीं हो सकता कि वो खुद ऐसा कह रहा है। या उसके आधार कार्ड में ये लिखा है कि वो ब्राहम्ण है, क्योंकि एक तो सरकार ने आज तक कोई जाति आधारित मर्दुमशुमारी यानी जनगणना नहीं करवाई है। दूसरे आधार कार्ड में जाति तो नहीं ही लिखी होती। और नाम के आगे सरनेम, या जातिसूचक नाम जो लिखा जाता है, वो तो खुद की ढोलक होती है। इसलिए लगे हाथ बाबा जी ही बताएं कि शरीर के कौन से हिस्से का कौन सा चिन्ह हो तो पता चलेगा कि कोई ब्राहम्ण है या क्षत्रिय है, या वैश्य है या शूद्र है। भई तमाम आदि - अनादि के ज्ञान का भंडार वो वेद और शास्त्र जिसे बाबाजी मानते हैं, उनमें पक्का ये कहीं ना कहीं लिखा होगा कि ब्राहम्ण होगा तो उसकी पहचान कैसे होगी। मैं स्वयं सिद्ध ब्राहम्णों के पक्ष में नहीं हूं, मुझको पक्का होना कि कोई कह रहा है कि वो ब्राहम्ण है तो उसको ब्राहम्ण होना। 

तीसरे कानून का क्या है जी, भारत के संविधान में कहीं लिखा ही नहीं है कि ब्राहम्ण कौन काम कर सकता है, और यादवों के लिए कौन से काम आरक्षित हैं। बताइए, ऐसा बेकार सा संविधान जो बाबा जी के शास्त्रों के हिसाब से लिखा ही नहीं गया। ये अम्बेडकरी संविधान सबको समान बनाने पर तुला हुआ है। और बाबा जी कह रहे हैं कि अगर कोई अपनी पहचान छुपा कर गया तो उसमें उसका दोष है। दरअसल भारतीय दंड संहिता जो पुरानी वाली थी, और भारतीय न्याय संहिता जो नई वाली है, उन दोनो में ही इम्पर्सनेशन यानी ग़लत पहचान बताना, जिसकी धारा का नंबर है 319, 242, 319, 204, 205, और 337 इनमें से कोई भी धारा यहां कारगर नहीं होती। इन धाराओं में जाति संबंधी मामला है ही नहीं, सब कानूनी मामला है, यानी कानूनी धोखा देना, खुद को सरकारी अधिकारी बताना, कानूनी कार्यवाही में धोखा देना। अब ये तो बाबा जी ही बता पाएंगे कि ये जो कथा हो रही थी, ये कौन सी कानूनी कार्यवाही थी। 

बताइए, अम्बेडकर ने ये कैसा संविधान बना दिया यार, जिसे ब्राहम्ण लोग बहुत कोशिश करने के बाद भी अपने शास्त्रों के हिसाब से ढाल नहीं पा रहे हैं। 




अम्बेडकर के जीते जी भी इन लोगों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा लिया, लेकिन अंबेडकर संविधान को ऐसा बना गए कि उसमें जातिगत भेदभाव के लिए जगह नहीं मिलती। इसीलिए तो आर एस एस ने भारतीय संविधान को मानने से ही इन्कार कर दिया था। 30 नवंबर 1949 के आर एस एस के मुखपत्र ऑर्गेनाइज़र के संपादकीय में लिखा था कि संविधान हिंदू सांस्कृतिक मूल्यों और मनुस्मृति से मेल नहीं खाता इसलिए वे इसे नहीं मानेंगे। इसलिए अपने आर एस एस के सहकार्यवाहक कह रहे हैं, और खुद भा ज पा के मंत्री कह रहे हैं कि अब संविधान बदलने का समय आ गया है। अब आप माने चाहे ना माने, ये संविधान तो भा ज पा वाले बदल कर रहेंगे, और इसकी जगह वो मनुस्मृति स्थापित करके रहेंगे। तब आएगा ब्राहम्णों का राज। हा हा हा। 




देखिए, संविधान चाहे जो भी कहता रहे, समानता-फमानता की फर्जी बातें करता रहे। ये जो दलित हैं, उन्हें तो अपनी औकात पता रहनी चाहिए, ये संविधान ने और फिर वोट के अधिकार ने इन्हें बहुत सर पर चढ़ा लिया है। हमारे यहां रोज़ ये जो दलित हैं, इन्हें इनकी सही जगह बताई जाती है। हर रोज खबर आती है कि कहीं किसी दलित के हाथ काट लिए, कहीं उसका सिर काट लिया, कहीं उसे खम्बे से बांध कर पीट दिया, कहीं उसके हाथ-पैर काट दिए, उसकी बेटी के साथ ज़िना किया, कहीं दलितों की शोभा यात्रा को रोक लिया, और फिर उन्हीं दलितों को गिरफ्तार कर लिया। हर हफ्ते दो हफ्ते में एक दो दलित बच्चियों का बलात्कार करके उन्हें मार के खेत में टांग देने की खबर भी आती ही रहती है। तो दलितों को अपनी सही जगह मालूम रहती है। 




बाबा जी से पूछें ज़रा ये सब भी शास्त्र सम्मत है क्या? और बाबा जी, ये जो बाबा बन के चुनाव लड़ रहे हैं, ये शास्त्र सम्मत है क्या? ये जो मठों के महंत हैं, जो मुख्यमंत्री बने हुए हैं, ये धर्म की ध्वजा को नुक्सान नहीं पहंुचा रहे हैं क्या? और एक छोटा सा सवाल और है बाबा जी, सुना रामायण के रचियता, वाल्मीकी, खुद भी ब्राहम्ण नहीं थे, तो रामायण जो उन्होने लिखी, वो तो सिर्फ अपने परिवार के लिए नहीं ही लिखी होगी। तो क्या उस रामायण का पाठ शास्त्र सम्मत होगा बाबा जी? 


असल में इतने सैंकड़ों सालों बाद भारत की गद्दी पर जो हिंदू राजा बैठा, तो ब्राहम्णों ने अपनी गाड़ियों पर ”प्राउड टू बी ब्राहम्ण” या ”प्राउड टू बी हिंदू” लिखवाना शुरु किया। अब ये जो उपलब्धि है ब्राहम्ण होना, जिस पर उन्हें गर्व है, वो गर्व किस चीज़ का है, ये समझ नहीं आता। ब्राहम्ण होने के लिए कोई परीक्षा होती, तो आज खुद को ब्राहम्ण कहने वाले 80 प्रतिशत को उसमें फेल हो जाना था। पर फिर भी दलितों का दमन करने में जो मज़ा है, उसका कोई जोड़ नहीं। और समय-समय पर ये काम करते ही रहते हैं, जिसमें पुलिस प्रशासन पूरी मुस्तैदी से अपना पूरा योगदान देता है। 

पर ये जो फुले, पेरियार, अंबेडकर, शाहू जी महाराज, और अन्य दलित अधिकारों के प्रण्ेाता रहे, उन्होने सब गड़बड़ कर दिया। 



अब ये दलित मनुस्मृति मानने से मना कर दे रहे हैं, बताइए, इनकी इतनी हिम्मत। ये लोग इतने शक्तिशाली हो गए हैं कि जब इन यादव जी का थोड़ा सा अपमान किया गया, वो भी सिर्फ इन्हें सबक सिखाने के लिए, इनके बाल मूंड दिए गए, इनके उपर पेशाब का छिड़काव किया गया, तो इनकी इतनी हिम्मत हो गई, कि इन्होने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई। बताइए, एक तो इन पर ये अहसान किया गया, कि इन्हें बस थोड़ा सा अपमान करके बक्श दिया गया, जान से नहीं मारा गया, और इस अहसान का बदला ये इस तरह चुका रहे हैं कि पुलिस में रिपोर्ट कर दिया। 

अब इस देश में ब्राहम्णों के लिए बहुत मुश्किल समय आ गया है। ये दलित रोज़ ब रोज़ ब्राहम्णों का अपमान कर रहे हैं। संसद में पहंुच जा रहे हैं, जज बन जा रहे हैं, और चिंता ये है कि आने वाले समय में अगर सच में जाति जनगणना हो गई, तो देश के ज्यादातर संसाधनों पर ये अपना हक़ मांगने लगेंगे। हो सकता है कि इसके बाद कोई सवर्ण प्रधानमंत्री ही ना बन पाए। सवर्णों को खासतौर पर ब्राहम्णों के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है, भाजपा ने बहुत कोशिश की, लेकिन अब तो वो भी घिरती नज़र आ रही है। बाबा जी, अब आप ही बताइए, क्या किया जाए। शास्त्र क्या कहते हैं। वेद क्या कहते हैं। अब तो कतई कलयुग आ गया, क्या ब्राहम्णों को दलितों के साथ, शूद्रों, और आदिवासियों के समकक्ष समझा जाएगा। हाय, हाय, ये क्या हो गया है, हाय हाय ये क्या हो रहा है। 



एक कवि हुए गोरख पांडे, कह गए कि



उसको रोटी-कपड़ा चाहिए

बस इतना ही नहीं

उसे न्याय भी चाहिए

इस पर से उसको सचमुच आजादी चाहिए

उसको फांसी दे दो

वो कहता है कि उसे हमेशा काम चाहिए

सिर्फ काम ही नहीं

काम का फल भी चाहिए

काम और फल पर बेरोक दखल भी चाहिए

उसको फांसी दे दो।

वो कहता है कोरा भाषण नहीं चाहिए

झूठे वादे हिंसक शासन नहीं चाहिए

भूखे नंगे लोगों की जलती छाती पर

नकली जंनतंत्री सिंहासन नहीं चाहिए

उसको फांसी दे दो

वो कहता ह ैअब वो सबके साथ चलेगा

वो शोषण पर टिकी व्यवस्था को बदलेगा

किसी विदेशी ताक़त से वो मिला हुआ है।

उसकी इस गद्दारी का फल तुरत मिलेगा

आओ देशभक्त जल्लादों

पूंजी के विश्वस्त पियादों

उसको फांसी दे दो।


ये जो जाति जणगणना की बात है, ये जो लोग इस देश में सबकी समान भागीदारी चाहते हैं, वे सब दरअसल ब्राहम्णों के सनातन अधिकार को खत्म कर देना चाहते हैं, वे समानता वाली व्यवस्था चाहते हैं, वो तो ये चाहते हैं कि ये देश, ऋषि मुनियों का ये देश, अपनी दलितों पर अत्याचार की सनातन व्यवस्था को छोड़ दे, आप ये समझ लो कि अगर राहुल गांधी की जिद पर जाति जनगणना हो गई, तो दोस्तों ये दलित फिर इस देश में अपना हिस्सा मांगेगे, और लिए बिना बाज नहीं आएंगे। असल में बाबा जी की, सारे ब्राहम्ण समाज की, और सर्वणों की यही सबसे बड़ी चिंता है। 


ग़ालिब मुझे इसीलिए पसंद हैं। खुद मिर्ज़ा थे, लेकिन इस मौके के लिए भी उन्होने एक शेर लिख मारा......

सुनिए ज़रा ध्यान से


बरहमन कौन है ये कैसे पता चलता है

ग़ालिब को संस्कृत नहीं आती थी इसलिए ब्राहम्ण को बरहमन कहते थे। 


बरहमन कौन है ये कैसे पता चलता है

ज़रा सा ऐंठ कर चलते हैं, उन्हें मुगालता है।


बाकी जात को बेशक मत मानिए, पर अपनी जाति पर गर्व करते रहिए। यही सच्चा असली और शुद्ध देसी घी वाली प्रगतिशीलता है। जातिवाद से मुकाबला तभी हो सकता है, जब नीची जातियां सवर्ण जातियों की प्रभुता को स्वीकार कर लें। अगर आपको भी अपनी जाति पर गर्व है, और आप भी ये मानते हैं कि भारत में जातिवाद नहीं है, तो आप भी प्रगतिशीलता की उच्चावस्था को स्वीकार कर चुके हैं। बाकी जो है वो हैये है। 

नमस्कार। 



गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

भय और नफ़रत के खिलाफ संगवारी


भय और नफ़रत के खिलाफ संगवारी

कल यानी 28 तारीख को डूटा ने दिनेश सिंह के वीसी पद से हटने यानी जाने के मौके पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस आयोजन का नाम ”गुड रिडन्स् डे” रखा गया। इस आयोजन में संगवारी को क्रांतिकारी गीत पेश करने के लिए आमंत्रित किया गया। संगवारी का हर उस संस्था से जो लोकतांत्रिक हितों और जन अधिकारों के संघर्ष में शामिल है, बहुत ही इंकलाबी रिश्ता कायम है। हम डूटा के कई कार्यक्रमों में पहले भी गए हैं, और डूटा के लोग हमारे कार्यक्रमों को बहुत पसंद करते हैं, इसलिए समय-समय पर हमें बुलाते भी रहते हैं। इसी तरह दिल्ली के अन्य संगठन भी संघर्ष के मौकों पर, संगवारी को अपने कार्यक्रमों में आमंतत्रत करते हैं। दिल्ली में जन संस्कृति से जुड़े ज्यादातर लोग जानते हैं कि संगवारी एक निश्चित राजनीतिक विचारधारा से जुड़ा हुआ सांस्कृतिक समूह है, हम हर हालत में जहालत का, फिरकापरस्ती का, पूंजीवाद का, विरोध करते हैं। हम जनता के अधिकारों के पैरोकार हैं, जनता की ताकत पर भरोसा करते हैं, और जनता के लिए, जनता के साथ, जनता से ही सीखे हुए गीत गाते हैं, नाटक करते हैं। संगवारी गैर सरकारी, स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए काम नहीं करता, कार्यक्रम नहीं देता और ना ही किसी कोरपोरेट, कंपनी, सरकार आदि से पैसा लेता है। इसीलिए संगवारी भव्य कार्यक्रम नहीं करता, और अपने संघर्ष के साथियों के सहयोगअपने कार्यक्रमों का आयोजन व अन्य काम करता है। हमारे साथी, जैसे डूटा के सदस्य ये भी जानते हैं, कि संगवारी किस किस्म के गीत गाता है और कार्यक्रम करता है। तो जब संगवारी को डूटा की तरफ से कार्यक्रम में शिरकत का निमंत्रण मिला तो सगवारी ने उत्साह के साथ अपनी मंजूरी दी और नियत समय पर, निश्चित जगह यानी आटर््स फैकल्टी के गेट पर पहुंच गया। 

कार्यक्रम की शुरुआत में नंदिता नारायण जी ने कार्यक्रम का परिचय दिया और संगवारी को अपने गीत पेश करते हुए कार्यक्रम की शुरुआत करने को कहा। संगवारी ने अपने तौर पर कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए, वी सी के जाने को सभी के लिए अच्छा बताते हुए हबीब जालिब की गज़ल ”मै नहीं मानता, मै नहीं जानता” पेश की। इसके बाद देश में नफरत और भय के, असहिष्णुता के और असहमति के दमन के खिलाफ, अपनी बात रखते हुए केरल हाउस पर बीफ ढूंढने के लिए पुलिस की रेड के बारे में बात रखते हुए कहा कि, ”मोदी अब पुलिस वालों को मेटल डिटेक्टर की जगह बीफ डिटेक्टर देने वाले हैं, इसलिए अपने-अपने टिफिन बचा कर रखें।” इसके बाद हमने गाना गाया, ”ये क्यों हो रहा है, जो ना होना था, हमारे दौर में....”

इस गाने के खत्म होते ही नंदिता जी जो पास ही बैठी थीं, फौरन उठीं और हमसे कहा कि आप एजेंडा पर ही रहें, इससे अलग ना हों। हमें लगा कि वे शायद ये कह रही हैं कि अब हम दो गीतों के बाद वक्ताओं को समय दें। क्योंकि ये तो हम सोच ही नहीं सकते थे कि हमें इन गीतों को गाने से मना किया जाएगा। खैर हम पूरी टीम अपनी जगह आकर बैठने लगे। तभी एक महिला और दो पुरुष मेरे करीब आकर चिल्लाने लगे कि, ”तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ये सब बोलने की.....” मेरा जवाब था, ”कि मैने कुछ गलत तो नहीं कहा, जो भी कहा सच कहा” उनका कहना था कि, ैसच हो कि नहीं, ये हम नहीं बोलने देंगे।” और मैं लगातार यही कहता रहा कि जो सच है वो तो मैं कहूंगा और उसे कहने से मुझे कोई नहीं रोक सकता। दूसरे मैने कहा कि मैं एक सांस्कृतिक टीम लेकर आया हूं, इसलिए हम तो वही गाने गाएंगे जो हम गाते हैं, वही बात करेंगे जो हम करते हैं। 

इस बहस को अभी थोड़ी ही देर हुई थी कि आभा जी भी वहां आ गई, उन्होने मुझे कहा कि अगर यहां ये मुद्दा बन गया, तो वो असल मुद्दे जिनके लिए इस कार्यक्रम को आयोजन किया गया है, वो रह जाएंगे और इन लोगों का मकसद भी यही है। उनकी बात समझते हुए, और दूसरे उन्होने ही संगवारी को आमंत्रित किया था। मैने अंतिम तौर पर अपनी बात रखी कि मैंने जो कहा वो सच था, और सच मैं कहूंगा ही, लेकिन अब मैं आपसे ”जो लड़ने पर आमादा थे” कोई बात नहीं करूंगा क्योंकि बात तो आप करना चाहते ही नहीं हैं। 

तभी वहां नंदिता जी भी आ गईं, और उन्होनेे भी यही कहा कि डूटा के इस आयोजन में भाजपा के लोग भी हैं, इसलिए हम नाम नहीं ले सकते थे। लड़ाई को आमादा चिल्लाने वाले एक आदमी से उन्होने ये भी कहा कि इसीलिए हमें रोक दिया गया है, इसलिए इस तरह तमाशा ना करें, आयोजन को मुद्दे पर रहने दें। लेकिन नंदिता जी की इस बात को उस आदमी पर कोई असर नहीं पड़ा, और वो एक चबूतरे पर चढ़ कर मेरे खिलाफ धमकियां जारी करता रहा। मैने अपनी टीम की ओर देखा, और उन्हे शांति से बैठकर आयोजन में शामिल रहने को कहा। मेरी टीम बैठ गई थी। इधर पीछे की तरफ वो आदमी रह-रह कर मेरे लिए धमकियां जारी कर रहा था। मैं शांति से बैठा हुआ था, और मेरी टीम मुझे देख रही थी। मैं वहां जिन लोगों के आमंत्रण पर गया था, उन्होने मुझसे इस विवाद को खत्म करने की गुजारिश की थी, इसलिए मैने इसके बाद बात तक नहीं की, और चुपचाप धमकियां और गालियां सुनता रहा। 

नंदिता जी ने माइक से कहा कि, "ये हाल है आपका कि आप असहमति के दो लफ्ज़ नहीं सुन सकते। और हम यहां ये आयोजन ही इस अधिकार के लिए कर रहे हैं कि हमें कम से कम बोलने की आज़ादी तो दी जाए।" 

खैर वो आदमी लगातार कुछ ना कुछ बकता रहा। और हम कुछ देर बाद वहां से चले आए। कार्यक्रम में हम शिरकत कर ही चुके थे, और वहां बैठने का कोई और मकसद नहीं था। 

इस पूरे प्रकरण से जो दो चीजें साफ होती हैं। पहली तो ये कि असहिष्णुता और डर का जो माहौल बनाया जा रहा है, वो इस कदर है कि शिक्षण संस्थानों तक में किसी को कुछ भी बोलने की आज़ादी नहीं है। ये असहमति के गला घोंटने की राजनीति है जो आपको खड़े तक होने का, मुंह तक खोलने का मौका नहीं देना चाहती। दिल्ली विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर इस तरह के लंपट और बदमाश, लोग चिल्ला-चिल्ला कर धमकियां जारी कर रहे हैं, और पुलिस वहां खड़ी हुई देख रही है। सब मुंह बाए देख रहे हैं। उस बदमाश को, गुंडे को चुप कराने की कोशिश कर रहे हैं। 

हालांकि नंदिता जी ने उसे चुप रहने को कहा, लेकिन मेरा कहना है कि ऐसे कार्यक्रम में जहां आप एक तानाशाह वीसी के जाने की खुशी जताते हुए अपने अधिकारों की लड़ाई को तेज़ करने बात कर रहे हैं, क्या देश के तानाशाह, देश में फासीवाद, देश में भय और नफरत के माहौल के खिलाफ बोलने वाले को सिर्फ इसलिए मना कर देंगे कि कहीं उसी फासीवादी पार्टी के लोग कार्यक्रम छोड़ कर ना चले जाएं। 

दूसरे ये कि इस देश का माहौल इस कदर हो गया है, कि अब आपको मुहं खोलने के लिए भी जान जोखिम में डालना होगी। इस कदर वहशत है, इस कदर डर है, कि कोई कहीं गाना गाएगा, नाटक करेगा, लिखेगा, बोलेगा तो उसे मारने की धमकी दी जाएगी और मार डाला जाएगा। इसलिए अगर इंसान की तरह जीने की शर्त ये है कि संघर्ष किया जाए, या मर जाया जाए, तो हम जीने के लिए, संघर्ष के लिए  तैयार हैं।  

वापस आते हुए, मैने अपनी टीम से पूछा कि आज की इस घटना से उन्होने क्या सीखा। टीम की एक सदस्य ने कहा, ”वो लोग कितना डरे हुए हैं, कि आपके सच बताने तक पर ऐसे भड़क रहे हैं। ये उनके डर को दिखाता है, ये बताता है कि वो लोग जनता से इतना डरे हुए हैं कि वो बात करने से कांप जाते हैं।” संगवारी हर संघर्ष में जनता के साथ है, जनता के साथ रहेगा, और हर तरह के फासीवादी खतरे, फिरकापरस्ती, शोषण और अत्याचार के खिलाफ लगातार काम करता रहेगा। गीत गाता रहेगा, नाटक करता रहेगा। 
इंकलाब जिंदाबाद

भव्य स्वागत - भयानक स्वागत

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