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गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

जब मैं घर से भागा था।

 




नमस्कार। मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। दोस्तों ये कोई बात ना हुई कि देश में कोई नॉनबायोलॉजिकल, ईश्वरीय अवतार पैदा हो, बचपन में चमत्कार करे, किशोरावस्था में चाय बेचे, घर छोड़े, और बुर्जुगियत में छप्पन इंची छाती के साथ इतिहास में पहली बार देश की डोरबाग अपनी कलाई पर बांध ले और लोगबाग उस चमत्कारिक मोड़ का नाम तक न लें जिसने इस देश के इतिहास का बदल कर रख दिया। देश का क्या कहें दुनिया का इतिहास बदल कर रख दिया। हालांकि कई लोगों ने इस बदले हुए इतिहास को अपने शब्दों में बयां करने की कोशिश की है।





ये सारी बातें उस वक्त की हैं जब महामानव स्वयंसिद्ध हो चुके थे, यानी खुद ही तीसमारखां बन चुके थे। उनके अपने शब्दों में कहें तो



मेरा फोटोजेनिक है


मुझे ईश्वर ने भेजा है




मै पहला ऐसा प्रधान मंत्री हूं

मेरा सिर्फ ये कहना है कि खुद ही खुद को बयां करता है, महामानव क्या क्यां करता हैं। आप मेरी तरफ ध्यान रखिए। मेरा कहना है कि एक साधारण मगरमच्छ पकड़ने वाले से नॉनबायोलॉजिकल महामानव के इस सफर में वो एक मोड़ कौन सा था, जिसने इस पूरी दास्तान को ही बदल दिया। वो मोड़ था जब महामानव ने घर छोड़ा।

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जब भी दुनिया में घर छोड़ने वालों की बात होगी, तो ये वाला घरछुड़ाव अन्य सभी घर छोड़ने वालों पर भारी पड़ेगा। क्योंकि महत्वपूर्ण ये नहीं है कि महामानव ने घर छोड़ने के बाद क्या किया। महत्वपूर्ण ये है कि महामानव ने घर छोड़ा, घर छोड़ना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि महामानव ने सिर्फ घर नहीं छोड़ा, घर के साथ जुड़ी बाकी चीजें भी छोड़ दीं।



दोस्तों जब व्यक्ति घर छोड़ता है तो क्या घर भी व्यक्ति को छोड़ देता है। इसका जवाब दर्शन में मिलेगा या आध्यात्म में मिलेगा। दरअसल घर को अक्सर माया कहा गया है, मोह और माया। घर से मोह होता है, क्योंकि घर माया होता है, इसलिए हे बालक घर छोड़ के जाने वाले को भगौड़ा नहीं कहते, भागौड़ा उसे कहा जाता है जो घर से भागा हो, भागने और छोड़ने में बहुत सूक्ष्म अंतर होता है, ये वही अंतर होता है, जिसे ओंकारा फिलिम में सैफ अली खान यानी लंगड़ा त्यागी ने रज्जू यानी दीपक डोबरियाल को समझाया था। यानी धागे के इंगे घर छोडने वाला होता है, और उंगे घर से भागने वाला होता है। और जो धागा हैंच लो तो कौण है भागने वाला और कौण है घर छोड़ने वाला। 




तो करोड़ रुपये का प्रसन ये है भक्तों कि महामानव ने घर छोड़ा था, या घर से भागे थे। ये मेरा स्टेटमेंट नहीं है, ये दरअसल करोड़ रुपये का प्रसन है, जिसके जवाब पर करोड़ रुपये नहीं मिलने वाले हैं। इसलिए आपको ये करोड़ रुपये जीतने का मौका न देते हुए आज इसी प्रसन पर विचार करेंगे। कि घर से भागने में और घर छोड़ने में क्या फरक होता हैगा।

घर से भागने वाला दरअसल सरम से, चोरी से, और कभी -कभी अपराध बोध से भी घर से भागता है। भई इसमें विद्वानों के मत भिन्न हैं, कोई कहता है कि अगर परिवार के हितों के खिलाफ कोई काम करो तो घर से भागना पड़ता है, किसी का कहना है कि यदि परिवार की जमा-जोत को चुरा कर जुए में, शराबखोरी में, या ऐसे ही किसी चरित्रहीन काम में गवां दो तो भी घर से भागना पड़ता है, एक और मंझे हुए विद्वान ने कहा कि यदि बीवी से ना बनती हो, या बीवी रखनेे की सकत ना हो तो भी आमतौर पर व्यक्ति घर से भाग जाता है।

क्या आपने कभी ऐसी कोई अफवाह सुनी है कि कोई घर से भागते हुए अपनी बेचारी, ग़रीब, मां के गहने लेकर भागा था, और उसने वो गहने चुरा कर बेच दिए थे। क्यों बेच दिए थे, किसे बेच दिए थे, कहां बेच दिए थे, और कितने में बेचे थे, जैसे सवाल बेकार हैं, क्योंकि ये उस व्यक्ति का निजी मामला था और है, और हम यहां निजी मामलों पर विचार नही ंकर रहे हैं। हम सिर्फ घर से भागने पर विचार कर रहे हैं। 

पर बात फिर घूम-फिर कर वहीं आ जाती है। क्या ये व्यक्ति वो है जिसकी बात हम नही ंकर रहे हैं, हैरी पॉटर वाली किताब की तरह, यू नो हू, की बात कर रहे हैं। उसके अधिकार में सारी काली शक्तियां हैं, वो डार्क आर्टस् का स्वामी है, जो खुद को ईश्वर बनाने पर तुला हुआ है। यानी घर से भागने वाला अपनी पत्नि को छोड़ कर भागता है, यानी उससे शादी करता है और फिर बिना उसे तलाक दिए, बहुत ही कायराना तरीके से उसे छोड़ कर घर से ही भाग जाता है ताकि उसे घर की जिम्मेदारियों का सामना ना करना पड़े। अपनी कायरता छिपाने के लिए यू नो हू किसी को बताता भी नहीं कि उसकी एक ब्याहता बीवी है, जिसे वो बेशर्मी से छोड़ आया है। खैर ये भी किसी का बहुत ही निजी मामला हो सकता है और हमें कोई चाव नहीं है किसी की निजी ज़िंदगी के बखिए उधेड़ने की और इसलिए हम इस पर बात न ही करें तो अच्छा है। 

इसके अलावा, जुआ खेलने, चोरी करने, या कोई और काम करने के भी कोई रिकॉर्ड न मिलें हों तो उनके बारे में बात करने का भी कोई औचित्य नहीं है। हालांकि घर से भागने वाले अक्सर यही सब करने के बाद, या करते हुए घर छोड़ते हैं। और ठीक इसी वजह से वो इसी तरह की प्रवृति में लिप्त होते हैं। जैसे सब कुछ चोरी करना, सबकुछ बेच देना, बेशर्मी से झूठ बोलना, आत्ममुग्धता और आत्मप्रशंसा की प्रवृति भी ऐसे लोगों में देखी जाती है। यदि आप ऐसे किसी व्यक्ति से मिलें तो सावधान रहें, ये बहुत ही चतुर या कहें कि धूर्त होते हैं, और सिर्फ अपना फायदा देखते हैं। इनसे किसी भी तरह के नैतिक व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती। 

जबकि घर छोड़ना बिल्कुल ही जुदा बात होती है। घर छोड़ने में व्यक्ति की मजबूरी नहीं बल्कि उसकी इच्छा काम करती है। इतिहास और भूगोल दोनो में ही अनेकों व्यक्तियों ने घर छोड़ा, घर छोड़ कर उन्होने इतिहास और भूगोल बदलने जैसे कई काम किए। इसीलिए घर छोड़ने वाले जब घर छोड़ कर जाते हैं, तो अक्सर दुनिया की सैर पर निकल जाते हैं। कहा जाता है घर का खूंटा छूटा, तो छान ले पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा। वैसे भी इस फानी दुनिया का पता नहीं कब क्या हो जाए। 

घर छोड़ने वाले घर छोड़ने के बाद अक्सर बहुत महान काम करते हैं। वे जब घर छोड़ते हैं, तो ज्ञान की तलाश में जाते हैं, ज्ञान पाते हैं, और ज्ञान पाकर पूरी दुनिया में ज्ञान का परकास फैला देते हैं। पर हमारा प्रसन तो भगतों अब भी वहीं का वहीं लटका है। हालांकि कुछ परकास अपने ज्ञान से हमने इस सवाल पर डाला है। लेकिन इस मामले में एक चोट ये होती है कि अक्सर घर से भागने वाले खुद का घर छोड़ने वाला बताने लगते हैं। ये जो ऐसा बताने वाले होते हैं, ये तरह - तरह के भेस बनाते हैं, तरह-तरह की बातें बनाते हैं, तमाम तरह के स्वांग रचा कर ऐसे-ऐसे नाटक करते हैं कि भोला-भाला इंसान धोखा खा जाता है, और उनका अंधभक्त बन जाता है। और यही इन्हें खतरनाक बना देता है। 

घर छोड़ने वाले का ढांेग करने वाले, घरभगौड़ों से बचें, इनकी सर्वकालिक पहचान रही है, घर से भागने के बाद घर छोड़ने का प्रचार करना, अपने त्याग की झूठी कहानियां प्रचारित करना, अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटना, और खूब विलासिता से जीना। अरे मेरे यार, घर छोड़ने वाला विलासिता नहीं करता, खुद अपना प्रचार नहीं करता, अपने मुहं मियां मिठ्ठू नहीं बनता। 

खैर मेरे इतना बताने पर भी अगर आपकी आंखों की झांई ना उतरे तो उसमें मेरा कोई दोष नहीं। कहा भी गया है, बताने वाले को नहीं दोष मेरे भाई। तो इसी कहावत के अनुसार, कम बताए को ज्यादा समझो और अपनी आंखों की पट्टी उतारो, घर छोड़ने वाले और घर से भागने वाले में फरक करो। क्योंकि ये करोड़ रुपये का प्रसन है।

बाकी चचा जो थे हमारे, कभी घर ना छोड़े, भागने का तो मामला ही पैदा नहीं होता। कहते थे

न जा कहीं घर छोड़ के ग़ालिब,
कहीं लोग भगौड़ा ना समझ लें
खुद ही से खुदा बन बैठा बदतमीज़
कहीं लोग तुझे मूरख ना समझ लें

बहुत साफ थे चचा अपने इस मामले में, उन्हें पता था कि घर से भागने में और घर छोड़ने में क्या अंतर है। सवाल ये है कि क्या आपको पता है। अपना जवाब कमेंटस् में ज़रूर लिख भेजिएगा, और ध्यान रखिएगा, ये वीडियो ही हू मस्ट नॉट बी नेम्ड के बारे में है। बाकी आपकी मर्जी।

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

सेंगर को बेल



 नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। सुना भई सेंगर जी को बेल मिल गई। पहले उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा हुई थी, और ये सज़ा जो उन्हें मिली थी वो इसलिए थी कि उन पर बलात्कार और फिर पीड़िता के पूरे परिवार का सफाया करने के आरोप सिद्ध हुए थे। 



कुछ लोग कह रहे हैं कि अगर हम कोर्ट के इस आदेश को स्वीकार करते हैं कि उसने सज़ा दी तो हमें कोर्ट के इस आदेश को भी स्वीकार करना चाहिए। मेरा तो ये कहना है जनाब कि माननीय सेंगर जी को दी गई सज़ा का विरोध करना चाहिए और ये स्वीकार करना चाहिए कि बेल उनका अधिकार था, बेल ही क्यों मेरा तो कहना है कि सिर्फ एक महिला के कहने पर, या मान लीजिए आरोप लगाने पर, जनता द्वारा चुने गए एक संसद सदस्य को यू ंसज़ा देना ही ग़लत है। पुलिस को इन महिलाओं को, जिन्होने माननीय सेंगर जी पर आरोप लगाया, और उनके समर्थन में जो आए उसे भी घसीट कर जेल में डाल देना चाहिए। 

आसाराम को बेल मिली, रामरहीम को लगातार और जितनी वो चाहें बेल मिलती रहती है, तो फिर ये बताओ कि माननीय संेगर जी को बेल क्यों ना मिले। क्या तुमने उन्हें भी ये क्या कहते हैं, उमर खालिद, शारजील इमाम जैसा ही समझते हो क्या? अबे ये लोग कोई राष्ट विरोधी काम थोड़े ही कर रहे हैं कि इन्हें बेल नहीं दी जाएगी, ये कोई सोनम वांगचुक की तरह का काम थोड़े ही कर रहे हैं कि बिना कोई मुकद्मा चलाए इन्हें महीनों जेल में रखा जाएगा। 

सेंगर, समझ रहे हो, कुलदीप सिंह सेंगर, अबे नाम ही काफी है। कोर्ट का कहना है कि माननीय संेगर जी के लिए जो कहा जा रहा है कि पुलिस और कानून के रक्षक उनके कहने पर कुछ ग़लत करेंगे तो कोर्ट ये नहीं मान सकता कि कानून के रखवाले, माननीय के कहने पर ऐसा कुछ करेंगे। बिल्कुल सही बात है, बताइए इसमें कुछ ग़लत हो तो? लड़की को एक साल लगा माननीय के खिलाफ शिकायत करने में, ये कोई बात हुई भला। कानून के रखवालों ने बहुत समझाया कि मान जा, मत अपनी जिंदगी खराब कर। हो गया सो हो गया समझ कर खैर मना। अपने घर जा। लेकिन ये लड़की बहुत ढीठ निकली। 2017 में घटना हुई, 2018 में जाकर उसके आरोप पत्र दायर हुए। फिर भी पुलिस वाले लगातार लड़की को, उसके रिश्तेदारों को बचाने में लगे रहे। 

लेकिन लड़की और उसके परिवार वालों ने हद ही कर दी। उन्होने माननीय कुलटीप सिंह सेंगर पर आरोप लगाते हुए खुद अजय सिंह बिष्ट के पास एक लेटर भेज दिया। भई पुलिस ने कोशिश की कि लड़की का पिता ही बात को सही से समझ ले, इसलिए उसे समझाने के लिए, गौर कीजिएगा, समझाने-बुझाने के लिए, परिवार की इज्जत की बात थी, इसलिए संस्कारी पुलिस ने इसे भारतीय संस्कारों के अनुरूप समझा कि लड़की के बाप को समझाने-बुझाने के लिए थाने बुलाया। पर बाप कमजोर निकला और इस समझाने-बुझाने के दौर में ही उसने दम तोड़ दिया। ऐसे में पुलिस पर ये आरोप लगाना कि पुलिस ने माननीय कुलदीप सिंह सेंगर की हत्या कर दी, बहुत ही बचकाना बात है। 

खैर, माननीय कुलदीप सिंह सेंगर फिर भी अपनी पर अड़े रहे, और इसके बाद उन्होने एक और कोशिश की, लड़की और उसके परिवार वालों को ये समझाने की, कि जो हो गया, उसे भूल जाएं और बेकार के इस विवाद को बंद करें। लेकिन लड़की एक वकील के झांसे में आ गई थी, जिसने शायद उसे ये बताया हो कि भारत का कानून निष्पक्ष होता है, और कानून सबके लिए बराबर होता है, और शायद ये भी समझाया हो कि कानून से उसे न्याय मिलेगा। अब लड़की नाबालिग थी, वकील की बातों में आ गई। फिर एक टक आया उसे ये समझाने की इस बेकार की अफरा-तफरी में कुछ नहीं रखा। लेकिन इस बार भी समझाने-बुझाने में उसकी दो मौसियां और खुद वकील साहब निपट गए। 

सोचा था कि अब लड़की को समझ आ जाएगा कि बेकार माननीय कुलदीप सिंह सेंगर साहब पर व्यर्थ के आरोप लगाने का कोई फायदा नहीं है। लेकिन लडकी ना मानी। अब पुलिस ने तो अपना काम मुस्तैदी से किया, कोर्ट बिचारे के पास कोई रास्ता नहीं बचा था। उसे माननीय कुलदीप सिंह संेगर को सज़ा देनी पड़ी। 





लेकिन बेजीपी के घर में देर हो सकती है, अंधेर नहीं। एक भाजपा एम एल ए को बलात्कार के आरोप मे ंसज़ा हो जाए, ये तो इस अभी 2014 में ताज़ा-ताज़ा आज़ाद हुए भारत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ये वो भारत है, जहां एक गर्भवती महिला का खुली सड़क पर गैंगरेप करने वालों की सज़ा ये कहकर माफ की जाती है कि वो खासे संस्कारी लोग हैं। जहां गुफा में बलात्कार करने और फिर लड़की के परिवार वालों की हत्या करने वाले, पिताजी, कहलाने वाले बाबा, राम-रहीम जेल से कम रिसॅार्ट में अपनी सज़ा काटते हैं, जहां बलात्कारी आसाराम के साथ खुद महामानव नाचते हैं। 



ऐसे में माननीय कुलदीप सिंह सेंगर को, एक अदना लड़की से बलात्कार के लिए जेल मे ंतो नहीं रहने दिया जा सकता था। इसलिए आखिरकार संस्कार की जीत हुई, और अदालत ने एक तकनीकी पंेच निकाल ही लिया, जिसके तहत उन्हें अंततः बेल दी गई। 


तो अंततः माननीय कुलदीप सिंह सेंगर को न्याय मिला, थोड़ा देर से मिला तो भी क्या हुआ। आखिर कोर्ट के इस फैसले से पुलिस वालों के हौसले बुलंद हुए। भाजपा के अन्य कुलदीपकों को ये संदेश गया कि आखिरकार उन्हें भी माननीय कुलदीप सिंह सेंगर की तरह, पहले पुलिस और अंततः अदालत साफ बचा ले जाएंगी। धन्य है भारतीय पुलिस, और न्यायालय, जिन्होने न्याय की इस लौ को बुझने नहीं दिया है। जब माननीय कुलदीप सिंह जी बाहर आएंगे तो फूलमालाओं से उनका स्वागत किया जाएगा, क्योंकि वो विजेता हैं।




दूसरी तरफ सेंगर को, पुलिस को, और न्यायालय को चुनौती देने वाली महिला और उनके समर्थकों को मौके पर ही उनके किए की सज़ा दे दी गई। 

कुल मिलाकर बात ये है मितरों कि ये लोग कितना ही शोर मचा लें, बलात्कार जैसी छोटी-मोटी चीजों के लिए भाजपा के किसी संस्कारी कुलदीपक, जैसे कुलदीप सिंह संेगर को जेल में नही रखा जा सकता, नहीं रखा जाना चाहिए। बल्कि मैं तो कहता हूं कि कुलदीप सिंह सेंगर पर आरोप लगाने वाली लड़की को, कटघरे में खड़ा करना चाहिए। मेरे भक्त मितरों आपको फौरन अपनी यूज़ुअल ड्यूटी पर लग जाना चाहिए। यही मौका है कि हम महामानव के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन करने का, यही मौका है खुद को संस्कारी साबित करने का, यही मौका है अपने धर्म के प्रति अपनी निष्ठा दिखाने का। 



आज इन तथाकथित वामपंथियों की इतनी मजाल हो चुकी है कि, ये एक बलत्कृत लड़की को साथ लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, इनका कोई भरोसा नहीं है, ये लोग इंडिया गेट पर, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने लगेंगे। याद रखिए दोस्तों, आसाराम हों कि प्रज्जवल रेवन्ना हों, हमारे महामानव ने हमेशा ही बलात्कारियों का समर्थन किया है। 


अगर हमें महामानव की नज़रों में आना है तो हमें, भी ऐसा ही बनना पडे़गा। जहां तक संभव हो, महिला का मज़ाक उड़ाइए। उसकी पीड़ा पर हंसिए, यही हमें सिखाया गया है। 

ये भारत की जनता को क्या हो गया है, जहां संस्कारों के लिए, परिवार की इज्जत के लिए, महिलाएं बलात्कार को रिपोर्ट तक नहीं करती थीं, अब वो उंचे पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखवा रही हैं। चाहे वो पूज्यनीय धार्मिक बाबा हों, या चुनाव जीत कर मंत्री बने हुए लोग हों, इन लड़कियों की हिम्मत कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। पुलिस इनके परिवार के सदस्यों की हत्या कर देती है, इनके समर्थन में आने वाली लड़कियों को सोशल मीडिया पर टोल किया जाता है, लेकिन ये मा नही नहीं रही हैं। अब ये मौका आया है कि इनकी आवाज़ का खामोश कर दिया जाए। याद रखिए अगर उन्नाव पीड़िता को न्याय मिल गया, तो इनके हौसले बढ़ जाएंगे। कोर्ट ने हमें ये मौका दिया है कि ये दिखा दिया जाए कि कानून पीड़ित के पक्ष में हो तो भी कोई ना कोई तकनीकी कमी निकाल कर बलात्कारी को राहत दी जा सकती है। अब हमारा काम है कि इस लड़की को न्याय ना मिले, बाकी आपकी मर्जी।

ग़्ाालिब जो चचा कहलाते हैं, उन्होने इस मामले से खुद को दूर ही रखा है। लेकिन पूज्यनीय आसाराम जिन्हें बलात्कार के आरोप मे ंसज़ा झेलनी पड़ी, और बाद में उन्हें भी कोर्ट ने राहत दे ही दी, उनका कहना था।

अब आप कहेंगे, कपिल भाई, आसाराम क्यों? भई काफी रसिक रहे आसाराम, और अब तो जेल से बाहर हैं, आनंद कर रहे हैं, तो सोचा इस मामले में उनके विचार ज्यादा बेहतर लगेंगे। बाकी जल्द ही सभी बलात्कारी बाहर होंगे। जय हो भारत के कोर्ट और जजों की। नमस्कार। 

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

बुर्के पर वबाल

 




 भई यारों ये क्या किस्सा है जिसके पीछे पूरे देश में इत्ता वबाल कट रहा है। देखा कि एक राज्य के मुख्यमंत्री जी ने भरी सभा में एक महिला के चेहरे से बुर्का नोंच लिया। 



मुझे समझ नहीं आता कि आखिर ये ऐसी क्या बात है जिस पर वबाल हो सकता है। आखिर एक राज्य के मुख्यमंत्री को इतना भी अधिकार नहीं होगा कि वो नौकरी मांगने आई एक महिला के चेहरे से बुर्का उतार दे। आपको तो इसी बात पर खुश होना चाहिए कि उन्होने सिर्फ यही किया है, मेरा मतलब है, एक साहब हुए थे, भाजपा के कुलदीपक, उन्होने तो नौकरी मांगने पहुंची एक 16 साल की नाबालिग लड़की का बलात्कार कर दिया था। बताइए, ऐसे में मुख्यमंत्री द्वारा बस बुर्का खींचने जैसी हरकत पर आपको एतराज हो रहा है, ये सरासर नाजायज़ बात है भाई।

असल बात की तरफ आपका ध्यान नहीं गया भाई। असल बात ये है कि वो महिला बुर्का पहन कर एक सरकारी प्रोग्राम में गई थी, तो ये मुख्यमंत्री का कर्तव्य था कि वो उसकी सही पहचान करें। मुख्यमंत्री हमारे सबको पहचानते हैं, यही तो उनकी खासियत है। इसी सही पहचान के लिए तो उन्होने उस महिला के चेहरे से बुर्का नोचा था। देखिए किसी भी सरकारी आयोजन में अगर जाते हैं, तो ये पहचान करना कि जो व्यक्ति आपके सामने है वही सही व्यक्ति है, मुख्यमंत्री का कर्तव्य होता है, कहीं अगर वो ग़लत कैंडीडेट को नौकरी दे देते तो बताइए क्या गजब होता। 

मैं बताता हूं हुआ क्या था। दरअसल अभी कुछ ही दिन पहले राज्य में चुनाव हुआ था। उस चुनाव में हुआ क्या कि महिलाओं को दस हज़ार की राशि दी गई ताकि वो सही जगह वोट कर सकें। आखिर महिला सशक्तिकरण का मामला था। इसके बाद हुआ ये कि उसी वोट की ताकत से राज्य में अ लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी जिसके सर्वेसर्वा यही महानुभाव थे, जिन्होने अभी एक महिला के चेहरे से बुर्का नोचा है। तो हुआ ये कि अब सरकार यानी बिहार सरकार ये कह रही है कि वो जो दस हज़ार रुपये भेजे गए थे, वो ग़लत लोगों के पास चले गए थे। और अब उनकी उगाही की जा रही है, लोगों को नोटिस भेजे जा रहे हैं कि अबे पैसे वापिस करो बे।

तो ऐसे में मुख्यमंत्री को ये लगा कि अगर किसी ग़लत कैंडीडेट को नौकरी मिल गई तो नौकरी वापिस लेना तो मुश्किल होगा। इसलिए उन्होने ये जिम्मेदारी अपने हाथ में ली कि वो महिला की सही पहचान करके ही उसे नौकरी दें। और इन वामियों ने, तथाकथित प्रगतिशीलों ने, इन महिला अधिकार के रक्षकों ने इसी पर वबाल काट दिया। 

अभी कुछ ही दिन पहले एक हाई कोर्ट के जज साहब ने कहा था, कि किसी पीड़िता के स्तनों को छूना या कपड़े उतारने की कोशिश दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता है। अब आप ही सोचिए भाई, हमारे न्यायालय कितने सहिष्णु होते जा रहे है, हमारे विधायक और मुख्यमंत्री भी सहिष्णु होते जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि ऐसे कृत्यों के प्रति जनता भी सहिष्णु हो जाए, लेकिन जनता, खासतौर पर महिलाएं, सहिष्णु नहीं होना चाहतीं। अरे भई, अगर कोई आपके चेहरे से बुर्का खींच ले, या आपको देख कर सीटी मारे, या मान लीजिए की हाथ पकड़ ले, तो थोड़ा सहिष्णु बनिए, इसे इतना बड़ा मुद्दा मत बनाइए। 

ऐसे ही एक किस्सा याद आता है, जिस पर वबाल हुआ था, और सुनते हैं बड़ा भारी युद्ध हुआ था, इसी देश की बात है। 
सभा में सब स्तब्ध थे। सबकी नज़रें उन पासों पर थीं, जिन्होने दुर्योधन की जीत का निशान दिया था। एकबारगी तो दुर्योधन भी स्तब्ध था। हालांकि उसे मामा शकुनि की जुआ खेलने की कला पर पूरा यकीन था। लेकिन अपने भाग्य की वजह से वो थोड़ा असहज था। लेकिन पासों के गिरते ही पहले उसकी आंखे चौड़ी हुई, फिर आंखों ने दिमाग को बताया वो फिर से जीत गया है। अचानक कंठ से अट्टहास गूंजा जो पूरी सभा में फैल गया। इस अट्टहास ने पूरी सभा को जैसे नींद से जगा दिया था। अचानक सहस्रों कंठों से आवाज़ निकली और पूरी सभा में एक शोर गूंज गया। दुर्योधन ने पीछे मुड़ कर देखा, दुःशासन उसके कांधे पर से झांक रहा था, और उसकी हंसी साफ दिखाई दे रही थी।




”दुःशासन”, दुर्योधन ने पूरी ताकत लगाकर कहा, ताकि पूरी सभा को पता चल जाए कि वो बोल रहा है।

”जी भाई जी” दुःशासन ने कहा।

”जाओ, हमारी जीती हुई वस्तु को तत्काल सभा में ले आओ। जो वस्तु जीत ली गई हो, उसे तत्काल अपने कब्जे़ में लेना ही नीति है।”
”मैं अभी गया और अभी आया” दुःशासन ने कहा और फौरन निकल गया।
सभा में एक ओर खड़ी द्रौपदी है, दूसरी तरफ दुःशासन उसकी साड़ी खींच रहा है, और पीछे खड़ा दुर्योधन हंस रहा है, सारे कौरव हंस रहे हैं, और जिन पर द्रौपदी ने विश्वास किया था, वो सिर झुकाए मौन बैठे हैं।

जब राज्य में राजसभा में हुए इस वबाल की खबर फैली तो जनता ने इसका प्रतिकार किया। राजा अपने राज्य के मद में चूर हो सकता है, लेकिन जतना के कांधो पर तो नैतिकता की जिम्मेदारी लेती है। जनता ने कहा कि महिलाओं का अपमान नहीं सहा जाएगा। इस तरह किसी का भी अपमान नहीं सहा जाएगा, और जो राजा मद में चूर हो जाए, उसे शासन का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।

राजभवन में जनता के इस आक्रोश की खबर फैली तो थोड़ा अटका-झटकी हुई, लेकिन अनैतिकता के जिन मजबूत कंधो का सहारा लेकर दुर्योधन राजगद्दी पर बैठा था, उन्होने अपनी कुटिल चालें चलीं। असत्य, अनैतिकता, पाखंड, भ्रष्टाचार और अमानवीयता के हथियारों से लैस दुर्योधन और उसके समर्थकों ने जनता के बीच एक नये तरह का ज्ञान पेलना शुरु किया।

”वे तो महिलाओं के अधिकार के सबसे बड़े चिंतक हैं।”
”उन्होने महिलाओं के लिए काम किया है।”
”उन्होने साड़ी खींचते हुए भी महिला सम्मान किया है।”
”उनकी उम्र तो देखो, उनकी उम्र का सम्मान करो।”
”उन्होने तो मज़ाक किया था, इस बात का इतना बतंगड़ मत बनाओ।”
”उनका ये काम भी महिला अधिकार की श्रेणी में ही आना चाहिए।”

धीरे-धीरे जनता में ये बात फैलने लगी, और जनता दुर्योधन के इस घृणित कृत्य को भूल गई, बल्कि बात इस बारे में होने लगी कि किसी महिला को साड़ी पहनने का अधिकार होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए।

2014 के बाद देश की डोर जिस धर्म और संस्कृति के ठेकेदारों ने संभाली है, वे निश्चय ही बहुत कर्मठ हैं, कुलदीप सिंह सेंगर, बृजभूषण, और अब नितीश कुमार तो मान लीजिए छोटी-मोटी हस्तियां हैं, यहां तो हालत ये है कि सुना खुद महामानव ने एक लड़की का पीछा करवाया था, और फिर जब ये बात खुली तो कोर्ट ने उनका ये तर्क भी मान लिया था कि खुद लड़की के पिता के कहने पर राज्य के गृहमंत्री ने उसका पीछा करवाया था। यानी इस देश में यदि एक बालिग लड़की का पिता राज्य के गृहमंत्री से कहेगा तो राज्य के मुख्यमंत्री के कहने पर पूरी पुलिस उस लड़की का पीछा करवा सकती है, और ये हरकत कानून सम्मत मानी जाएगी। बल्कि हमें तो इस देश में ही ये कहने वाले भी मिल चुके हैं कि 
मेदी मेरी बीवी वाला वीडियो
और जब ये सामान्य है, कोर्ट इसे मान चुका है, जनता इसे मान चुकी है तो फिर एक ग़रीब राज्य के मुख्यमंत्री की इस हरकत को ओछी हरकत मानना, उसे महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली हरकत मानना कहां की समझदारी है भई। मेरा तो मानना है कि अब इस देश में एक ऐसा कानून भी बना ही देना चाहिए कि जिसमें एक निश्चित पार्टी के सदस्यों के लिए महिलाओं के साथ किए गए व्यवहार, कारगुज़ारियों, कारस्तानियों, और कांडों को देश की सुरक्षा के नाम पर दबा दिया जाए। और अगर प्रगतिशीलता, महिला अधिकार, मानवाधिकार आदि के नाम पर कोई इन्हें मुद्दा बनाए, तो कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों को चाहिए कि वे स्वतः संज्ञान लेकर उस व्यक्ति, संस्था, पार्टी के खिलाफ यू ए पी ए, पी एम एल ए, या एन एस ए वाले कानून के तहत बिना मुकद्मा चलाए उन्हें जेल में डालने की तजवीज करें। ताकि ये देश विश्वगुरु बन सके। 
सबसे बड़ी बात ये है कि आज देश की बड़ी बहस ये होनी चाहिए कि महिलाएं कौन सा कपड़ा पहनेंगी, और कौन सा नहीं, कैसे कपड़े पहनेंगी, और कैसे कपड़े पहनने की इजाज़त उन्हें मिलनी चाहिए, वे कैसी दिखें, क्या करें, क्या ना करें, कैसा व्यवहार करें, और हम यानी पुरुष उन्हें क्या अधिकार दे सकते हैं, कैसी और कितनी आजादी देनी चाहिए, कब दे
बाकी चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, लड़कियों को पर्दे में रखने के कायल थे, इसलिए कभी महिलाओं का अपमान नहीं किये, कभी बुर्का भी नहीं खींचे किसी का, लेकिन इस मामले में कतई सनातनी पार्टी के तर्कों के कायल हो गए थे, इसीलिए तो ये लिखा

कि 

तेरे दम में है अगर तो, तू कांड कर कोई भी
तुझे हक़ है मेरे यारा, तू कांड कर कोई भी
तू बड़ा है, तू खड़ा है, तू ही जीता, तू लड़ा है
तूझे डर ही क्या बता तू, तू कांड कर कोई भी

तो चचा का मिज़ाज भी ऐसा ही था, कहते थे हम न करेंगे, बाकी जिसके पास ताकत है वो तो करेगा ही कांड। तो मेरा मानना ये है मितरों कि नितीश कुमार को, महामानव को, और भी सबको, थोड़ा बहुत भ्रष्टाचार, थोड़ा बहुत व्यभिचार करने की स्वतंत्रता और अनुमति होनी चाहिए। ठीक है ना। 

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

महामानव की जादूई नज़रें

देखिए, नईं आप ज़रा देखिए ये विपक्षियों के डरामे को। महमानव चाहते हैं कि सरकार हर वक्त आपकी हथेलियों में रहे, इकतरफा रहे, लेकिन रहे, और ये विपक्षी मोहतरमा इसे स्नूपिंग एप बता रही हैं।
महामानव चाहते हैं कि वो हर वक्त, हर क्षण, हर घड़ी आपके साथ रहें, आपके फोन में रहें, और ये विपक्षी, ये कांगी, ये वामी चाहते हैं कि ऐसा ना हो, बताइए ये कोई बात हुई भला। जब महामानव खुद को अवतार घोषित कर चुके हैं। तो वे चौथाई या उससे ज्यादा ईश्वर तो हो ही चुके हैं। अब ईश्वर तो जनाब सर्वव्यापी होता है, सर्वज्ञानी और अंर्तयामी होता है। जैसे महामानव ईश्वर हुए हैं, वैसे ही वो सर्वज्ञानी और अंर्तयामी होना चाहते हैं, तो इन्हें इसमें भी प्रॉब्लम है। अरे इस देश में कोई है जो इस घोर कलियुग में महामानव से ईश्वर होने की जुगत लगा रहा है और ये दिलजले हैं कि इन्हें चैन नहीं पड़ता। संचार एप के ज़रिए महामानव चाहते हैं कि सरकार को आपकी इच्छाओं का, आपकी आकाक्षांओं का पता रहे, आप किससे बात कर रहे हैं, क्या बातें कर रहे हैं, क्या आपको कोई शिकायत तो नहीं है?, क्या आपकी कोई दबी, ढंकी, छुपी इच्छा तो नहीं है? महामानव को सबकुछ पता होना चाहिए। ताकि समय रहते आपको ठीक किया जा सके.....मेरा मतलब, मेरा कहने का मतलब है कि समय रहते आपकी इच्छाएं पूरी की जा सकें। आज के दौर में दोस्तों जब महामानव ईश्वर होने में पूरी ताकत लगा रहे हैं, ये विपक्षी महामानव की इत्ती सी इच्छा पूरी नहीं होने दे रहे।
ये सब आपको झूठ बता रहे हैं, अरे भई हर वक्त आप सरकार की नज़र में रहेंगे तो आपका ही तो फायदा है, आप कितना पैसा कमा रहे हैं, कितना टैक्स चुरा रहे हैं, किससे क्या बातें कर रहे हैं, ये सब तो सरकार को पता होना चाहिए। देखो यार अगर तुम ठीक हो, महामानव से खुश हो, यानी उनके बारे मे सब भला-भला बोल रहे हो, सोच रहे हो, तो सब ठीक ही ठीक है। तो तुम्हे डरने की ज़रूरत ही क्या है? डरे वो जो महामानव की आलोचना करता हो, सरकार की आलोचना करता हो, ऐसा करने वाले को तो वैसे भी जेल भेज देने की ज़रूरत है। अभी हो क्या रहा है कि लोग महामानव की आलोचना कर रहे हैं, बेकार मे ंकर रहे हैं, लेकिन कर रहे हैं। यार ये तो वैसे भी ठीक बात नहीं है कि देश मे महामानव की आलोचना की जाए। पर ज़रा सोचिए, अगर ये संचार एप आपके फोन में आ जाएगा, तो चुनाव आयोग को ये एस आई आर करने की ज़रूरत नहीं होगी, महामानव को पहले ही पता होगा कि कौन किसे वोट कर रहा है, बस इत्ती सी बात है। आप महामानव की आलोचना करने से बचेंगे, और सरकार को पहले से ही पता चल जाएगा कि कौन, किसकी, कहां, कब, कैसे आलोचना करना चाहता है। लोकचंद्र को बचाने के लिए साथियों, संचार एप जरूरी है। ये जो संचार एप का विरोध कर रहे हैं, ये लोकचंद्र के दुश्मन हैं, महामानव और उनकी टीम जो सभी मोबाइलों में संचार एप डालना चाहती है, वो लोकचंद्र को बचाना चाहती है। देखिए अभी क्या होता है कि कोई ज़रा कोई नारा लगाता है, या कहीं भाषण देता है, या कोई फेसबुक पोस्ट करता है, तब जाकर पुलिस हरक़त में आती है। लेकिन अगर संचार एप आ गया तो नारा लगाने से पहले ही पुलिस यानी सरकार आपको अरेस्ट कर लेगी, और फिर आपके नक्सली लिंक का पता लगाएगी। आपने ज़रा सरकार की आलोचना के बारे में सोचा तो पुलिस फौरन आपको अरेस्ट कर लेगी और फिर आपके नक्सली लिंक का पता लगाएगी, आपने फेसबुक पर या ट्विटर पर कुछ लिखने की सोचा, या शेयर करने की सोचा तो पुलिस फौरन आपको अरेस्ट कर लेगी और फिर आपके नक्सली लिंक का पता लगाएगी। जरा सोच के देखिए, आपके पास एक मोटरसाइकिल है, और आप अपने दोस्त से कह रहे हैं कि आप सिर्फ दो सौ रुपये का पैटोल डलवाने की सोच रहे हैं, क्योंकि पैटोल बहुत महंगा है। अब जब अपने दोस्त से ये बात कर रहे होंगे तो आपका फोन आपकी जेब में होगा, जिसमें संचार एप होगा, जिसके ज़रिए आपकी ये बात पुलिस के कानो तक पहुंचेगी। बस पुलिस फौरन आपको अरेस्ट कर लेगी, क्योंकि पैटोल की कीमतों के बारे में बात करना तो सरकार की आलोचना करना है, और सरकार की आलोचना करना तो नक्सल होना है। बस हो गए आप अर्बन नक्सल। कित्ती सीधी सी बात है। अब ज़रा सोचिए, देश की सीमा पर सैनिक लोग अपना सब कुछ निछावर करने को तैयार खड़े हैं, और आप हैं कि आपको अपनी निजता की पड़ी है, अपनी आज़ादी की पड़ी है। अरे ये मत सोचो की महामानव ने आपके लिए क्या किया, आप तो ये सोचो कि आपने महामानव के लिए क्या किया? आप ये नहीं सोचते कि संचार एप से आपकी निजता जाएगी, लेकिन महामानव की अमरता तो बनेगी। अब आप ही बताइए, आपकी दो टके की निजता के मुकाबले महामानव की अनश्वरता, उनके ईश्वर होने का दावा, ज़रूरी है या नहीं। चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, निजता के यानी प्राइवेसी के वो बिल्कुल खिलाफ थे, प्राइवेसी के नाम से तो उन्हें कतई चिढ़ मची हुई थी, इसलिए संचार एप के लिए उन्होने एक शानदार शेर लिखा था। हर पल मेरे हर हाल पे नज़र रखें सरकार आपमें मुझे तो खुदा दिखें संचार एप डाल के मेरे मोबाइल में वो कह रहे हैं लोकचंद्र है ये चखें आलोचना नहीं होगी तो लोकचंद्र बरबाद हो जाएगा चचा भी यही मानते थे, लोकचंद्र के वो कतई खिलाफ थे, कहते थे अमां मोबाइल में डालो संचार एप और प्राइवेसी को प्राइवेटाइजेशन की जेब में डाल दो, सारे झगड़े-टंटे मिट जांगे। बस उसी पर चलाओ लोकचंद्र की सवारी, जब तक चलती हैं और फिर हंस देते थे। ये तो खैर चचा की बात है, कहां तक करेंगे। आप तो मोबाइल पे संचार एप डाल कर मजे लो तरकारी के ।हम चले, फिर मिलेंगे अगर संचार एप ना डला तो।

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

यूनिवर्सिटी में लेफ्ट की जीत



 ग़ालिब ने कहा था बाज़ीचा ए अतफाल है दुनिया मेरे आगे, और ये जो बच्चों का खेल है, ये बार-बार खेला जाता है। बच्चों का ऐसा ही खेल हर यूनिवर्सिटी में हर साल होता है, पूरे देश में अलग-अलग समय पर, लेकिन हर यूनिवर्सिटी में खेला जाता है। कहीं-कहीं सरकार इस खेल पर रोक भी लगा देती है, क्योंकि सरकार का एक काम ये देखना और सुनिश्चित करना भी है कि कहीं विद्यार्थियों को गलत राजनीतिक संदेश और गलत राजनीतिक टेनिंग ना मिल जाए। जैसे जामिया मिल्लिया में कई सालों से चुनाव ना हुए, क्योंकि यहां सरकार को पूरा यकीन है कि वो राजनीतिक संदेश या टेनिंग नहीं मिल सकती जो सरकार चाहती है कि विद्यार्थियों को जिसे जामिया में तालिब-ए-इल्म कहा जाता है, मिले। 

खैर साहब, दिल्ली में एक यूनिवर्सिटी है, क्या ही कहें, बहुत ही खराब यूनिवर्सिटी है। जे एन यू नाम है, पूरा नाम शायद जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी है। बढ़िया मजाक है, उधर महामानव हर रोज़ कोई ना कोई मुद्दा उठाकर जवाहरलाल नेहरु को मार ठोंसे दे रहे हैं, और इधर जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी उनके सपनों में आकर उन्हें डरा जाती है। तो मामला ये हुआ कि इसी मर्दुई यूनिवर्सिटी में एक बार फिर ये लाल सलाम वालों ने चारों सीटों पर कब्जा कर लिया। 



ए बी वी पी के जवानों ने खूब हल्ला काटा चुनाव से पहले, वी सी, एडमिनिस्टेशन, सिक्योरिटी यहां तक कि पुलिस और सरकार ने भी ए बी वी पी के इन जवानों को खूब साथ दिया। लेकिन जाने कौन सा खेला चल रहा है यहां कि इत्ते तमाम तामझामों के बावजूद, इत्ती कोशिशों के बावजूद लाल झंडे वाले जीत गए। 
ल्ेफ्ट की जेएन यू में जीत का वीडियो

वैसे कोई खास बात नहीं है, ये लोग थोड़ा - मोड़ा इधर-उधर से जीत भी लें, लेकिन असली पॉवर तो हमारे पास ही रहेगी। कुछ ही साल पहले की बात है, बाहर से कुछ लोग यूनिवर्सिटी में घुसे, खूब तोड़-फोड़ की, मारपीट की, गाली-गुफ्तार तो मान लीजिए छोटी-मोटी बात थी, और फिर निकल लिए। गलती ये हुई कि किसी-किसी के चेहरे का नकाब उतर गया, और वो पहचान लिए गए। लेकिन तब भी हमारी पॉवर में जो कुछ था, वो सब करके उन हमलावरों को बचा लिया गया। आज कोई उस घटना का नाम तक नहीं लेता। 



तो असली पॉवर तो हमारे पास ही है। लेकिन अब ये बन गया है नाक का मामला, सच बात कहें, एक चाहत है, बड़े दिनों से दिल में दगड़-दगड़ हो रही है ये चाहत। चाहत ये है कि पहले इस युनिवर्सिटी पर कब्जा किया जाए और फिर इस यूनिवर्सिटी का नाम बदल दिया जाए। माने दीन दयाल उपाध्याय यूनिवर्सिटी या मान लीजिए गुरु गोलवलकर यूनिवर्सिटी कर दिया जाए। उपर से यूनिवर्सिटी दिल्ली की प्राइम लोकेशन पर बनी हुई है। इत्ती प्राइम लोकेशन पर ये एजुकेशन और रिसर्च के नाम पर कब्जा किया हुआ है। देखिए मैं एजुकेशन या रिसर्च का दुश्मन नहीं हूं। लेकिन यारों पढ़ाई का सबसे अच्छा तरीका महामानव ने आपको दिखाया ही ह ै।


पढ़ाई की जानी चाहिए ऐसे कि भरे मंच से बड़े गर्व के साथ कह सको कि मैने कोई पढ़ाई नहीं की है। या डिग्री के लिए कॉलेज जाने की जरूरत ही क्या है, जब आपको एंटायर सबजेक्ट की डिग्री ऐसे ही मिल सकती हो। खैर तो मेरा सिर्फ ये कहना है कि लोग-बाग घर बैठ कर पढ़ाई क्यों नहीं करते, ये जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी की ज़रूरत ही क्या है आखिर, जहां लोग-बाग बरसों बैठे रिसर्च करते रह सकते हैं, जबकि डिग्री तो हमारे महामानव के पास भी है। 


तो सवाल ये है कि इस प्राइम लोकेशन वाली यूनिवर्सिटी का क्या किया जाना चाहिए। मेरा तो मानना है दोस्तों की जे एन यू को देश के कुछ बड़े सेठ लोगों को, जैसे अडानी या अंबानी को दे दिया जाना चाहिए। ये लोग जैसे एयरपोर्ट का ऑपरेशन देखते हैं, वैसे ही से लोग यूनिवर्सिटी का भी ऑपरेशन देख लेंगे। तो मान लीजिए यहां जो खाली जमीनें हैं, जंगल-फंगल हैं, उन्हें डेवलप किया जा सकता है, वहां कोरपोरेट ऑफिस खोले जा सकते हैं, कुछ होटल, या मॉल टाइप चीजें बनाई जा सकती हैं, जिनसे कुछ पैसा बनाया जा सकता है। 

सपने तो बहुत हैं यार हमारे, लेकिन ये लाल झंडे वाले डरावने सपने की तरह बैठे हुए हैं हमारी इच्छाओं पर। जैसे दिल्ली यूनिवर्सिटी पर कब्जा करते ही हमने दिखा दिया कि हमारे बाहुबली नेता अध्यापकों के साथ किस तरह का संस्कारवत् व्यवहार करते हैं।




हम चाहते हैं कि एक किस्म का डर का माहौल रहे, यूनिवर्सिटीज़ में देश भर की, अब जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी में क्या होता है, मैं आपको अंदर की बात बताता हूं। अजी मैने खुद अपनी आंखों से देखा है, ये जो टीचर हैं, ये स्टूडेंट की इज्जत करते हैं, और स्टूडेंट टीचर्स की इज्जत करते हैं, बताइए, ऐसा होगा तो यूनिवर्सिटी की पॉलिटिक्स कैसे चलेगी साहब। ये लेफ्ट ने बहुत सालों से अपनी मनमानी चलाई हुई है जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी में, यहां चुनाव से पहले डिबेट होती है भाई, मैं ने खुद अपनी आंखों से देखा है। देश -विदेश की, हक़-अधिकार की बातें चलती हैं इस यूनिवर्सिटी में, लड़कियां खुलेआम घूमती हैं, देश की संस्कृति का बट्टा लगा रखा है। अरे यार यूनिवर्सिटी है, कोई ढिशुम-ढांय वाली फिल्म दिखाओ, अश्लील गाने गाओ, दारू पार्टी करो, लड़कियों को छेड़ो, लेकिन नहीं, इस यूनिवर्सिटी का मिज़ाज तो भाई साहब अब एक ही चीज़ से ठीक हो सकता है। अब यहां संघ की शाखा लगानी ही पड़ेगी, जहां सुबह-सुबह विद्यार्थियों को डंडा चलाना सिखाया जाएगा, अरे किसी के सर फोड़ने के काम तो आएगा। ये क्या कि किताबें खोलकर बैठे हैं, थीसिस लिखी जा रही है, बहसें हो रही हैं, और केाई किसी को सिर नहीं फोड़ रहा। केरल का उदाहरण लीजिए जहां एक युवा ने संघ में अपने शोषण के चलते आत्महत्या कर ली, लेकिन संस्कार को नहीं छोड़ा, जे एन यू में किसी को छेड़ भी दो तो लोग हल्ला काट देते हैं। 
 ना भई ना, ऐसा नहीं चलने दिया जा सकता। 
दिक्कत ये है कि तमाम तरह के बहाने बनाए जा चुके हैं, इस यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों को बिना किसी कारण जेल भेजा जा चुका है, 

इसे बदनाम किया जा चुका है।

पूरा सिस्टम चेंज करने की कोशिश भी की जा चुकी है। लेकिन ये मरदूद जे एन यू प्राण नहीं छोड़ता। अब इस बार तो इसने किया ये कि एक तरफ तो चारों सीटें लेफ्ट जीता, और उसमें भी तीन सीटों पर तो लड़कियां जीती हैं, ना भई, इसे अब और बढ़ने नहीं दिया जा सकता। महामानव को चाहिए कि जल्द से जल्द कोई मुकद्मा या आरोप जे एन यू के खिलाफ खड़ा करें, जैसे यही कह दें कि नेहरु ने जे एन यू से 120 रु. का गबन किया, या उनकी डिग्री जो थी वो फर्जी थी, इसलिए अब जे एन यू को खत्म किया जाएगा। वैसे भी हवा से लेकर पानी तक, और पाकिस्तान से लेकर राष्टगान तक, नेहरु पर हर तरह का आरोप लगाया जा चुका है। तो यही आरोप लगा कर जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी को खत्म करें, या तब तक बंद कर दें, जब तक वहां संघ की रोज छः बार नियमित शाखा ना लगने लगे, छः बार इसलिए कि मुसलमाल पांच बार नमाज़ पढ़ते हैं तो संघ को दिन में कम से कम छ बार शाखा लगानी चाहिए। हमारा काम था बताना सो बता चुके, आगे जैसा महामानव चाहें। 

बाकी चचा हमारे, ग़ालिब जे एन यू तो ना देखा उन्होने, लेकिन सुना है एक दफा जाकिर हुसैन कॉलेज की तरफ गए थे जब उसे दिल्ली कॉलेज कहा जाता था। खैर पढ़ाया नहीं उन्होने वहां पर, पर जे एन यू के बारे में बिनदेखे ही उन्होने शेर कह मारा....सुनिए

जे एन यू का जो जिक्र किया तूने हमनशीं
इक तीर मेरे सीने में मारा के हाय हाय
जे एन यू नहीं जाउंगा तब तक मैं मितरों
जब तक रोज़ उसमें शाखा ना लग जाए
संस्कार की खान, नैतिकता की दुकान, हिंदुत्व की आन-बान-शान आर एस एस की शाखा जे एन यू में लगा दो, ताकि आने वाले समयों मे ंजे एन यू में ए बी वी पी की जीत सुनिश्चित की जा सके। बाकी जब शाखाएं लगनी शुरु हो जाएंगी, तब तक के लिए नमस्ते। 

शनिवार, 29 नवंबर 2025

गंजहों का देश - भारत





    
     चुनावों में धंाधली कोई नई बात नहीं है। आज राहुल गांधी ने एक ऐसा बम जैसा विस्फोट करने का दावा किया है जिससे साफ जाहिर होता कि के चु आ के साथ मिलकर महामानव ने, या जिसे पुराने समयों में भाजपा माना जाता था उस पार्टी ने चुनावों में जम कर धंाधली की और सारे चुनाव जिनमें महाराष्ट, मध्य प्रदेश और हरियाणा तक शामिल हैं अपने नाम कर लिए। अब आपको ये समझाने के लिए कि ये सिर्फ कोरी हवा-हवाई बात नहीं है, राहुल गांधी ने के चु आ द्वारा जारी वोटर लिस्ट को ही आधार बनाया और सबके सामने रख दिया। ऐसे में क्या ही कहने लोकतंत्र के, भारतीय प्रजातंत्र के, या इस खुलासे के बाद तो कहा जाए, भारत के चुनाव आयोग तंत्र के, क्योंकि जब सरकार चुनने का काम चुनाव आयोग अपने हाथ में ले ले, तो फिर उस व्यवस्था को ईमानदारी से तो चुनाव आयोग तंत्र ही कहा जाएगा जिसे संक्षिप्त में केचुआ तंत्र भी कहा जा सकता है। और शायद यही बात राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कान्फ्रेंस में अंत में कही थी। 
   
     पर आज मैं आपको एक पुरानी जानकारी दे रहा हूं। दरअसल राहुल गांधी ने अपने आकट्य सबूतों से जिस तरह की धंाधली का आरोप लगाया है, उसका सूत्र जिन्होने धंाधली की है, उन्होने एक मशहूर व्यंग्य उपन्यास रागदरबारी से लिया है। यकीन नहीं आता, वीडियो पूरा देखिए आपको समझ में आ जाएगा। 
    
    श्रीलाल शुक्ल जी के उपन्यास में जिस चुनाव की बात है, उसी संदर्भ में चुनाव जीतने के कुछ तरीके बताए गए हैं। तो
चुनाव जीतने के रागदरबारी में जो तीन टिक बताई गई हैं, वो हैं। रामनगर वाली टिक, नेवादा वाली टिक और महिपालपुर वाली टिक। 
   
     रामनगर वाली टिक वो होती है जिसमें किसी चुनाव में दो मुख्य उम्मीदवार एक ही जाति के हों। ऐसे में जब जनता जाति के आधार पर वोट देने को तैयार ना हो, या उसमें उम्मीदवारों को लगे कि जाति का फायदे से ज्यादा नुक्सान हो सकता है, तो पहले जनता को ये समझाने की कोशिश की जानी चाहिए कि प्रजातंत्र बहुत महत्वपूर्ण है और वोट ग़लत आदमी को नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन अमूमन जनता समझदार होती है और वो जानती है कि जब दोनो ही आदमी ग़लत हो, तो वोट किसी को भी दो, जीतेगा ग़लत आदमी ही। तब जनता को ये समझाने की कोशिश की जानी चाहिए कि तुम्हारा प्रतिद्वंदी अगर जीता तो वो जनता का नुक्सान करेगा, लेकिन ऐसे में जनता जानती है कि नुक्सान दोनो ही करने वाले हैं, तब इसके अलावा कोई उपाय नहीं रह जाता कि पुलिस में कम्पलेंट करवा कर अपनी तरफ के और दूसरी तरफ के पच्चीस तीस आदमियों को जेल भिजवा दिया जाए। अब जब दोनो तरफ के पच्चीस-तीस आदमी जेल में हैं तो जिसके उम्मीदवार के आदमी जेल जाने से बच गए हैं, वो अपनी मनमानी करके चुनाव जीत लेगा। बहुत आसान तरीका है। लेकिन ये तरीका सिर्फ तब ही काम में लाया जा सकता है जब उम्मीदवार, समर्थकों और मतदाताओं की संख्या कम हो। आज के दौर में जहां, उम्मीदवार भी सैंकड़ों हों, समर्थक हजारों हों, और वोटर लाखों हों, इस टिक को चलाने और इस्तेमाल करने में मुश्किल हो सकती है। 
    
    रागदरबारी के अनुसार चुनाव जीतने की दूसरी टिक नेवादा वाली है, जिसे भाजपा बहुत शानदार तरीके से बहुत बार इस्तेमाल कर चुकी है। इस टिक में होता यूं है कि चुनाव के दिनों में किसी मंदिर, धर्म, का सहारा लिया जाता है। सीधे तौर पर धार्मिक बाबा लोग चुनाव प्रचार में नहीं उतरते, लेकिन अपने-अपने डेरों और ठिकानों से अपने अंधभक्तों को ये संदेश देते रहते हैं कि उन्हें किस पार्टी को वोट करना चाहिए। ऐसे में बलात्कार और हत्या के अपराध की सजा भुगत रहे एक खास बाबा को चुनावों के आस-पास बेल, फरलो, जैसी शर्तों के नाम पर जेल से बाहर निकाला जाता है, उसे ससम्मान तब तक बाहर रखा जाता है, जब तक उसके अंधभक्तों के वोट अपने नाम हो जाएं। ऐसे में वो बाबा जी 15 रुपये का पैटोल देने की बात कर सकते हैं, या हनुमान जी से सीधे बात भी कर सकते हैं, लेकिन जो एक बात बदलती नहीं है वो ये कि चुनाव के बाद वो बाबा जी गायब हो जाते हैं, जनता के सामने नहीं आते हैं। इस तरीके को चुनाव जीतने की नेवादा वाली टिक कहा जाता है, और देश में इस टिक बहुतेरा इस्तेमाल किया जा चुका है, अब भी हो ही रहा है। 
    
    लेकिन राहुल गांधी ने जो खुलासा किया है, वो बहुत हद तक राग दरबारी के चुनाव जीतने की महिपालपुर वाली टिक जैसा है। इसे चुनाव जीतने का एक वैज्ञानिक तरीका बताया गया है जिसकी खोज न्यूटन की खोज की तरह संयोगवश हुई थी, और अब उसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। ये चाल पूरी चुनाव प्रक्रिया में धांधली करने की एक व्यापक रणनीति है, इसमें गांव में रहने वाले लोगों के नामों को मतदाता सूची से हटाकर एक झूठी मतदाता सूची बनाना शामिल है, और फिर अपने हिसाब से वोट डालना शामिल है। राग दरबारी की महिपालपुर टिक में वैद्यजी ने चुनाव कमिश्नर को अपने साथ मिला लिया था, और चुनाव के समय की घड़ी को एक घंटा आगे और पीछे करके, दूसरी पार्टी के वोटरों को वोट डालने से ही रोक दिया था। यानी जाली वोट डालकर धोखाधड़ी से चुनाव जीत लिया था।
    
    अब राहुल गांधी की बातों को माने तो यही तरीका महामानव ने अपनाया है, लेकिन ज़रा बड़े पैमाने पर, यानी पहले के चु आ को अपने साथ मिलाया गया। वैद्यजी ने इसके लिए चुनाव अधिकारी को काफी कुछ दिया था, यहां ये नहीं पता कि क्या लिया-दिया गया है, या कुछ लिया-दिया गया है या नहीं। दूसरे पूरी मतदाता सूची का नक्शा ही बदल दिया गया है, और फिर महिपालपुर वाली टिक के अुनसार ही के चु आ ने घड़ी में टाइम ही बदल दिया। यानी उसूलों को ही बदल दिया, एक तो डिजिटल वोटर लिस्ट देने से ही मना कर दिया ताकि धोखाधड़ी पकड़ी ना जा सके, और दूसरे चुनाव के वक्त के वीडियो रिलीज़ करने से ही मना कर दिया, बल्कि कानून में ही फेरबदल कर दिया, कि अब वीडियो को जल्द से जल्द नष्ट करने का प्रावधान हो गया। इससे हमें ये समझ में आता है कि राग दरबारी की महिपालपुर वाली टिक का भी इवोल्यूशन हो गया है। आज रागदरबारी सार्थक हुआ, और महामानव यानी भाजपा के वैद्यजी ने, पहलवान, रुप्पन, और सभी गंजहों के साथ मिलकर इस देश को महिपालपुर बना दिया है। अब तुम सब इस महिपालपुर वाली टिक से चुनाव जीते हुए वैद्यजी के शासनकाल में उनके द्वारा गबन किए हुए रुपयों की भरपाई सरकार से करने का आयोजन देखो। 
    
    खैर हमें क्या, चचा हमारे याानी ग़ालिब जो थे, वो कोई रामाधीन भीखमखेड़वी से कम शायर नहीं थे, उन्होने भी ठीक भीखमखेड़वी की तरह ये शानदार शेर इस चुनावी टिक के बारे में कहा है, 

    पूछो हमसे इस इलैक्शन में खिला क्या गुल कहो
    कुछ हुआ ना महिपालपुर वाली टिक ही चल गई
    गंजहों का देश बन के रह गया इंडिया सुनो
    टापती जनता रही, बैद जी की दिवाली मन गई
       
     एक वाक्य में कहें तो ग़ालिब को पता था कि अंततः ये बैद्य जी देश के राजा की कुर्सी पर बैठेंगे, और उसी टिक का इस्तेमाल करके बैठेंगे, बाकि वैसा ही चलेगा जैसा चल रहा है, क्योंकि ये देश गंजहों का देश बन चुका है, और गंजहे......अब क्या कहं, खुद पढ़ लीजिए। 
   

बुधवार, 12 नवंबर 2025

गांधी नहीं, महामानव महान हैं।




 दोस्तों आज मैं आपके सामने एक बहुत बड़ा सवाल लेकर आया हूं। ये सवाल, या आप इसे जो भी कहें, इत्ता बड़ा है कि इसके आगे सभी सवाल फीके और बेजान मालूम होते हैं। सवाल ये है कि इस देश में गांधी बड़े या महामानव। सबसे पहले तो इसी बात पर गौर कीजिए कि इत्ती बड़ी मतलब, बहुत बड़ी, मतलब बहुत से भी ज्यादा बड़ी शख्सियत महामानव की, गांधी उनके आगे क्या हैं? महामानव वर्ल्ड लीडर हैं इत्ते बड़े कि जहां अन्य देशों के राष्टपति, प्रधानमंत्री इत्यादी जमा होते हैं, वहां अकेले एकमात्र वर्ल्ड लीडर महामानव सबसे बीच में खड़े होते हैं, और सबकी फोटो खिंचती है, महामानव की फोटो उतारी जाती है, जैसे आरती उतारी जाती हो। वो इत्ते बड़े हैं वो हंसते हैं तो और लोगों को समझ में आता है कि यहां, यानी इस मौके पर हंसना है, और उनके बाद सब लोग हंसते हैं। यानी वो बहुत बड़े वर्ल्ड लीडर हैं। चाहते तो गज़ा पर इस्राइल का हमला यूं रुकवा देते, चुटकी बजा कर, लेकिन सबर किया, इंतजार किया, कि कोई छोटा मोटा लीडर इसका हल निकाले। और वजह  सिर्फ एक, इतने हम्बल हैं कि अपने मुहं से अपनी तारीफ के लिए एक शब्द नहीं निकलता। अब इत्ते बड़े, माने विशाल व्यक्तित्व के मालिक, महामानव खुद महात्मा गांधी की बहुत चिंता करते हैं। 




लेकिन गांधी को कभी आपने महामानव की चिंता करते हुए नहीं देखा होगा। वो तो संयोग की बात है कि महामानव से पहले ही रिचर्ड एटनबरो गांधी पर फिल्म बना लिए थे, वरना ये जिम्मेदारी भी बिचारे महामानव की हो जाती कि वो दुनिया को गांधी के बारे में बताएं। मैं आपको सच बताउं तो गांधी कभी उतने मशहूर नहीं थे, जितना हमें बताया जाता है, 



ये वाली मोहतरमा जो कह रही हैं ना, वही दरअसल सच है। अगर आप अपनी आंखें खोल कर देखेंगे, सच्ची में देखेंगे तो आप को पता चलेगा गांधी सच में उत्ते मशहूर नहीं थे, जित्ता बताया जाता है, और महामानव वाली शोहरत तक तो कभी पहुंच ही ना पाए। उन्हें जानता ही कौन था, सिर्फ देश के कुछ लोग, कुछ लोग विदेशों में उन्हें जानते थे, जिन तक उनकी पब्लिकसिटी पहुंचती थी, वरना कौन जानता था, गांधी को। जबरदस्ती लोगों से गांधी का आदर करवाया जाता था, यानी कोई मन से उनका आदर नहीं करता था, जो उनका आदर नहीं करता था, उसके पीेछे ई डी और सी बी आई लगा दी जाती थी। किसी को उनकी आलोचना नहीं करने दिया जाता था। दूसरी तरफ हमारे महामानव हैं, जिन्होने शोहरत की सारी हदें पार कर दी हैं, और अपनी शोहरत के लिए उन्हें कोई वीडियो नहीं बनानी पड़ती, कहीं अपनी फोटो नहीं लगानी पड़ती, किसी अखबार, रेडियो प्रोग्राम या टी वी इंटरव्यू के ज़रिए नहीं बताना पड़ता कि वो महान हैं, बिना कुछ पब्लिकसिटी किए ही दुनिया की कुल 800 करोड़ से कुछ ज्यादा की आबादी के कम से कम अस्सी प्रतिशत लोगों में उनकी शोहरत है।  


जिस महामानव को 600 करोड़ लोगों ने वोट दिया हो, बताइए वो इतना हम्बल है कि अब भी, आज भी गांधी जी को विनम्र श्रद्धांजली अर्पित करते हैं, अब मुझे ये बताइए दोस्तों कि क्या आपने कभी देखा कि गांधी ने कभी महामानव को आदर दिया हो, आदर देना तो दूर की बात है, महामानव के बारे में कभी दो अच्छी बातें नहीं बोली गई गांधी से। ये एटिट्यूड दिखाता है जो व्यक्ति जितना बड़ा होता है, वो उतना ही विनम्र होता है, महामानव हैं, गांधी नहीं थे। 
दरअसल गांधी के बारे में जो सब अच्छी बातें हैं, वो सब सिर्फ उपर का आवरण था, उनकी पब्लिकसिटी की गई थी, ये पब्लिकसिटी का कमाल था कि उन्हें लोग इतना मानते थे। 


इत्ती पब्लिकसिटी के बावजूद गांधी के बारे मे बहुत कम लोग आज तक जान पाए, और दूसरी तरफ हमारे महामानव, आप सच में सोच के देखिए, महामानव ने कभी अपनी शोहरत के लिए अपनी पब्लिकसिटी का सहारा नहीं लिया। महामानव की महानता की रौशनी इतनी चकाचौंध करने वाली है कि लोग खुद-ब-खुद उनके उपर निछावर हो जाते हैं। बचपन से लेकर आज तक, महामानव ने कभी कहीं, अपना ढिंढोरा नहीं पीटा, कभी कोई अच्छा काम किया भी तो उसका क्रेडिट नहीं लिया, बल्कि हर बार, बार -बार, लगातार कहते रहे कि उन्हें क्रेडिट नहीं चाहिए।

हालांकि अगर आप गौर से देखें, यानी अगर आप सच मंे देखे तो महामानव की उपलब्धियों के आगे गांधी की उपलब्धियां छोटी नज़र आती हैं। गांधी क्या थे, क्या थे गांधी, गांधी ने अपने पूरे जीवन में इतने कपड़े नहीं पहने होंगे, जितने महामानव एक हफ्ते में डिस्कार्ड कर देते हैं। देश के लिए महामानव ने अपना घर छोड़ा, अपनी पत्नि को भी छोड़ दिया। क्या गांधी ने ऐसा किया? नहीं किया, उनकी पत्नि कस्तूरबा लगातार पूरे जीवन उनके साथ रही। लेकिन महामानव, उन्होने सत्रह साल की उमर में घर छोड़ा, शायद उनके जीवन का यही कालखंड था, जिसमें उन्होने अपनी पत्नि को भी छोड़ दिया था। बताइए, किसका त्याग ज्यादा बड़ा है। महामानव खुद हाथ पकड़ कर राम को उनके मंदिर तक लेकर गए, गांधी तो कुछ छोटी -छोटी जनसभाओं में बस वो एक भजन जैसा गाते रह गए। इस बारे में कोई कुछ क्यों नहीं बोलता। 
आखिर गांधी ने किया ही क्या था, देश को आज़ाद ही तो करवाया था। लेकिन रुकिए, ये भी पूरा सच नहीं है दोस्तों, पूरा सच वो है जो इस बार हमारे प्रधानमंत्री ने लालकिले की प्राचीर से दुनिया को बताया है। 


असल में इस देश को आज़ादी आर एस एस ने दिलवाई थी, और जब आजादी मिल गई, तो वो अपनी हम्बलनेस के चलते अलग खड़े हो गए, और गांधी को इसका क्रेडिट दे दिया। सेवा की जो प्रवृति हमारे महामानव में आपको देखने को मिलती है, वो इसी आर एस एस की देन है। ये गुण, यानी सेवा, समर्पण, संगठन, और अप्रतिम अनुशासन, आपको महामानव में भी देखने को मिलेंगे, लेकिन क्या गांधी में आपको ये सेवा, ये समर्पण, ये अप्रतिम अनुशासन देखने को मिलता है? ये महामानव का ही जहूरा है कि आज भी दुनिया में गांधी का कोई नामलेवा है, वरना गांधी को कौन पूछता है। सब बस महामानव का ही गुणगान करते हैं। 
दोस्तों आज मैं आपको राज़ की बात बताता हूं, अभी जो नोबेल पीस प्राइज़ मिला है, माजाडो नाम की एक महिला हैं, उन्हें मिला है, लोग कह रहे हैं कि वो गांधीवादी हैं। लेकिन अगर आप उनके काम देखेंगे, और उनकी विचारधारा पर गौर करेंगे तो वो गांधी से नहीं, हमारे महामानव से प्रभावित लगती हैं। नोबेल मिलते ही उन्होेने इसे महामानव के डीयर फें्रड डोलांड को समर्पित कर दिया। मुझे पूरा यकीन है कि अगर ये नोबेल महामानव को मिला होता, तो वो भी इसे अपने डीयर फ्रेंड डोलांड को ही समर्पित करते। और यहां गौर करने वाली बात एक और भी है, महामानव को पूरी दुनिया के लोग बुला-बुला कर अपने देश में सम्मानित कर रहे हैं, उन्हें अवार्डस् दे रहे हैं, क्या गांधी को कभी भी, कहीं भी, किसी भी देश ने कोई अवार्ड दिया है? 
अभी हमारे यहां इतिहास को ठीक करने की जो मुहिम महामानव के नेतृत्व में चल रही है, उसमें हमें इस इतिहास को भी ठीक करना चाहिए, और आजादी की लड़ाई में संघ के योगदान पर पूरा एक चैप्टर होना चाहिए। हां गांधी को भी जगह मिलनी चाहिए, कहीं एक आधी लाइन लिखी जा सकती है कि कोई गांधी भी एक नेता थे, जिन्होने अपनी तरफ से कोशिश की थी। वो भी इसलिए कि गांधी थे, वरना यूं हम हर छोटे-मोटे नेता का जिक्र करने लगे तो आजादी का इतिहास बहुत लंबा हो जाएगा ना। इसकी जगह हमें बाल नरेंन्द्र के कुछ चैप्टर्स को बच्चों को पढ़ाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को ये पता चल सके कि आज के दौर में भी इस देश में अवतारों ने जन्म लिया है। 



गांधी ने अपने पूरे जीवन में कहीं नहीं कहा कि वो नॉन बायोलॉजिकल हैं, गांधी ने एक किताब लिखी थी, सत्य के मेरे प्रयोग, जिसे गांधी की आत्मकथा कहा जाता है, पूरी पढ़ लीजिए, कहीं आपको गांधी ये कहते नहीं मिलेंगे कि वो अवतार हैं, लेकिन महामानव ने कहा है, और खुलेआम कहा है, एक से ज्यादा बार कहा है। क्या आपको इससे भी ज्यादा सबूत चाहिएं ये समझने के लिए कि महामानव का कद गांधी से ज्यादा बड़ा है। मेरा तो ये मानना है कि ये कांग्रेस और इसके लीडरों को महामानव से और इस देश की जनता से माफी मांगनी चाहिए कि गांधी ने कभी महामानव की तारीफ नहीं की, उन्हें आदर नहीं दिया, उनसे प्रेरणा नहीं ली। 
पर मुझे पता है कि ये तथाकथित प्रगतिशील, ये वामी और कांगी, कभी इस सच्चाई पर विश्वास नहीं करेंगे, लेकिन आप तो जनता हैं, आप तो सच्चाई जानते हैं कि महामानव बड़े, बहुत बड़े हैं, और गांधी उनके सामने.....छोड़िए जाने दीजिए।

चचा जो थे अपने, ग़ालिब, गांधी पे कुछ ना लिख गए, समय का बहुत बड़ा अंतराल रहा, लेकिन महामानव तो अजैविक जीव हैं, इसलिए महामानव की महानता पर एक शेर लिख गए हैं। वही आपको सुना रहा हूं

अब तो दुनिया भी पहचान गई है उसको
कहो तो नाम उसका हम बताएं किसको
तुम्ही कहते हो कि तुम हो, महामानव
अब बताएं हम ये बात किसको किसको

तड़प रहे थे, चचा ये बताने के लिए कि महामानव स्वयंसिद्ध हैं, स्वयंभू हैं, स्वयंप्रसिद्ध हैं। पर ये बात पक्की है कि गांधी से महामानव की तुलना करना, सूरज का दिया दिखाने जैसा है, हम तो कहेंगे कि अब महामानव को इतनी शोहरत मिल चुकी है कि अपना एक नया धर्म भी वो शुरु कर ही सकते हैं। पर ये बात करेंगे अगली बार, इस बार चलते हैं। नमस्कार

भव्य स्वागत - भयानक स्वागत

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