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रविवार, 12 अप्रैल 2026

भव्य स्वागत - भयानक स्वागत






 लीजिए आज आपके लिए एक आश्चर्यजनक कहानी लेकर आया हूं। एक देश में एक साधुवेशधारी राक्षस रहता था। साधुवेशधारी उस राक्षस के बहुत सारे राजनेता मित्र होते थे। वो साधुवेशधारी उन राजनेताओं के साथ नाचता गाता था, और अपने कुकर्मों को अंजाम देता था। आम जनता उस साधुवेशधारी दुरात्मा की लच्छेदार बातों पर मंत्रमुग्ध थी, और उसे देवता मानती थी। अपने आयोजनों के द्वारा उस साधुवेशधारी ने अपने प्रपंच का बहुत लंबा जाल बिछा लिया था। तमाम राजनेताओं की सोहबत और उनकी सत्ता उसे तमाम सुविधाएं दिलवाती रहती थीं। पुलिस वाले उसे सुरक्षा देते थे, उसके आयोजनों को वो सब सुविधाएं मिलती थीं, जो अन्य आयोजनों को नहीं मिलती। पुलिस वाले उसके कदमों में बिछे-बिछे जाते थे। आश्चर्यजनक बात ये थी कि सत्ता जो हर व्यक्ति पर ई डी का छापा पड़वाती थी, उसने इस साधुवेशधारी के खिलाफ कभी किसी भी तरह की कोई जांच नहीं चलाई थी। आखिर सत्ता के शीर्ष पर बैठने वाले व्यक्ति का इस साधुवेशधारी के साथ साझा था, जो इसके साथ नाचता था। 




अपने धंधे के चक्कर में वो इतना शक्तिशाली बन चुका था कि वो पुलिस जिसे जनता की रक्षा करना थी, वो उस साधुवेशधारी राक्षस की ही रक्षा करती थी, उसके लिए काम करने को तैयार थी। ये आपके देश की बात नहीं है, अगर किसी को इस कहानी में किसी के साथ कोई समानता नज़र आती है, तो ये उसकी अपनी कल्पनाशक्ति का कमाल होगा। साधुवेशधारी ने अपने इस धंधे का साम्राज्य पूरे देश भर में फैला लिया था। देश के हर राज्य में उसके विशाल आश्रम थे, जहां वो मासूम महिलाओं का शिकार करता था। देश के अलावा उसने विदेशों में भी अपने कुकर्मांे का जाल फैलाया हुआ था, और वो देश-विदेश से करोड़ों का चंदा लेता था। उसका प्रभावक्षेत्र इतना ज्यादा था कि उसकी शिकार बच्चियों और उनके परिवार वालों की हिम्मत तक नहीं होती थी कि उस साधुवेशधारी के खिलाफ वो कोई आवाज़ तक उठा सके। वे चुपचाप अपनी मूर्खता पर आसूं बहाते थे, और अतंतः अपने भाग्य को रोते थे। लेकिन अंततः एक बच्ची ने हिम्मत की, उसके माता-पिता ने पुलिस में रिपोर्ट की, 16 साल की ये लड़की अपने माता-पिता के कहने पर उस साधुवेशधारी के पास गई, जिसने उस बच्ची के साथ वहशियाना हरकतें कीं और फिर उसे जान से मारने की धमकी भी दी। साथ में ये धमकी भी दी कि यदि उसने इस बारे में किसी को भी बताया तो उसके पूरे परिवार को खत्म कर दिया जाएगा। लेकिन बात सिर्फ यहां खत्म नहीं होती, इसके अलावा एक महिला और उसकी छोटी बहन ने भी हिम्मत करके उस साधुवेशधारी और उसके बेटे के खिलाफ शिकायत लिखवाई। 

दोनो ही मामलों में उन बच्चियों को सुरक्षा प्रदान करने की जगह, पूरी सत्ता जिसमें उस साधुवेशधारी के चेले बैठे हुए थे, और खुद भी इसी तरह की वासना से लिप्त थे, पूरी व्यवस्था ने और खुद इस साधुवेशधारी के अंधभक्तों ने भी इन बच्चियों का और उनके परिवार और रिश्तेदारों का जीना हराम कर दिया। उन्हें लगातार धमकियां मिलने लगीं, इन बच्चियों के पक्ष में जिसने भी इस साधुवेशधारी के खिलाफ गवाही देने की कोशिश की उसकी ही जान पर बन आई। कई लोग सिर्फ इसलिए मारे गए, क्योंकि वे उन बच्चियों के पक्ष में थे, और इस साधुवेशधारी की सत्ता के सबसे उंचे पद तक पहुंच थी। उसके खिलाफ जिन गवाहों ने गवाहियां दीं, उनमें से नौ गवाहों पर जानलेवा हमला किया गया, जिनमें से तीन की हत्या कर दी गई, और पुलिस इन मामलों की जांच कर रही है। 

उसके कुकर्मों की इतनी लंबी लिस्ट हो गई थी कि पाप का घड़ा भर गया था। आखिरकार उसे पुलिस ने गिरफ्तार किया, और न्यायालय ने उसे उसके कुकर्माें की सज़ा सुनाई। लेकिन उस साधुवेषधारी के पाप अभी कम नहीं हुए थे, सुनते हैं उसने गिरफ्तारी से बचने की भरसक कोशिश की, और लगातार पूरे देश में भागता रहा, ताकि सत्ता उसे संरक्षण दे सके। जब उसकी कहीं पेश ना चली तो उसे आखिरकार गिरफ्तार कर लिया गया, गिरफ्तार होते समय भी वो पुलिस अफसर को अपने रसूख की धमकी देता रहा, अंत तक वो अपने अंधभक्तों से गुहार लगाता रहा कि वो पुलिस को अपना काम न करने दें, और उसे छुड़ा लें। 

सुनते तो ये भी हैं कि इस साधुवेशधारी के भय का साम्राज्य इतना विशाल है कि उसे गिरफ्तार करने के बाद, उसे सज़ा हो जाने के बाद भी आज तक उन पुलिस वालों को, गौर कीजिएगा, पुलिसवालों को विशेष सुरक्षा मुहैया करवाई गई है ताकि उनका हश्र भी उन गवाहों जैसा ना हो जाए, जिनकी हत्या करवा दी गई है। ये साधुवेशधारी मुकद्में में गया तो गवाहों के बयानात और पीड़िता की निशानदेही पर अंततः उसे सज़ा तो मिली, लेकिन साथ ही उसके समर्थन में पूरी अंधभक्त बिरादरी लग गई, पूरी व्यवस्था उसके बचाव में उतर आई, सारी सत्ता ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया कि उसे किसी तरह जेल से बाहर निकाला जाए। 

आखिरकार इसका भी इंतजाम किया गया। उस साधुवेशधारी को उसके स्वास्थय का हवाला देकर छः महीने की ज़मानत पर छोड़ दिया गया। वही व्यवस्था जिसने एक 90 प्रतिशत अशक्त व्यक्ति को ज़मानत पर नहीं छोड़ा था, एक बूढ़े व्यक्ति को, एक अशक्त व्यक्ति को पानी पीने के लिए स्टा तक नहीं दी थी, उसी व्यवस्थ ने इस साधुवेशधारी के मामले में दयालुता दिखाते हुए इसे, एक नहीं, दो नहीं, बल्कि छः महीने के लिए स्वास्थयलाभ करने के लिए ज़मानत दे दी। अब मुसीबत उन गवाहों की है, जिन्हें कोई सुरक्षा नहीं है, जो कभी भी मारे जा सकते हैं। अब मुसीबत उन पुलिसवालों की है, जिन्होने इस साधुवेशधारी को पकड़ा, उसे सज़ा दिलवाने में मदद की। 
लेकिन मामला तो इससे भी ज्यादा संगीन है। यदि आपके घर कोई बलात्कारी आएगा, तो आप उसका स्वागत कैसे करेंगे? ज़रा सोच कर देखिए। क्या आप उसका स्वागत करेंगे? क्या आप उसकी आरती उतारेंगे? क्या आप उसकी पूजा करेंगे? क्या आप उसे पूज्यनीय मानंेगे? जी नहीं। आप पूरी कोशिश करेंगे कि वो वहशी आपके परिवार के क़रीब तक ना फटके, आप कोशिश करेंगे कि आपके घर की, आप के समाज की बहु-बेटी, महिलाएं सुरक्षित रहें, और उसके चंगुल से बच सकें। 

लेकिन अफसोस की जब वो ज़मानत पर छूटा तो उसका भव्य स्वागत किया गया। देश की सनातन, पवित्रता को हज़ारों अंधभक्तों ने अपने कदमों तले रौंद दिया। उस साधुवेशधारी के इस आयोजन से किसी को कोई तकलीफ नहीं हुई, वही व्यवस्था तो डेढ़ सौ मजदूरों को प्रदर्शन से रोकने के लिए लाठीचार्ज कर देती है, उसने इस आयोजन को होने दिया। आस्था के नाम पर बलात्कारी का भव्य स्वागत किया गया। और पीड़ित लड़कियां इस आयोजन को बेबस देखती रहीं। 

मैं एक बार फिर कहना चाहता हूं कि मेरी इस कहानी से अगर आपको किसी के साथ साम्यता दिखाई देती है तो आपकी अपनी कल्पनाशक्ति का कमाल है। 

मैं खुद इस मामले में इतना ही कहना चाहता हूं कि 

एक और पाप देखना था इस जमीं को अभी
बच्चियों की अस्मत से नहीं कोई सरोकार इन्हे
कहां तो होना था, बच्चियों को बेखौफ आज़ाद
कहां डर की चादर ओढ़े बैठी हैं बच्चियां यहां 

सुना था दुनिया तरक्की की ओर जा रही है, यहां तो अभी तक खौफ के साये से निकल न पाई है आधी आबादी। अब इस आधी आबादी की जिम्मेदारी है किसकी, किस पर एतबार करें, कौन बनेगा पासबां इनका। यही सोच के हाथ कांपते हैं, दिल लरज़ता है। नमस्कार।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

अरावली - कहां चली




नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। लो भई, और कुछ नहीं मिला तो लगे ये प्रगतिशील शोर मचाने अरावली की पहाड़ियों के बारे में। महामानव ने एक नई सोच को जाग्रत करते हुए कहा कि भैया जो पहाड़ सौ मीटर या उससे नीचा होगा, यानी जिसकी उंचाई सौ मीटर तक नहीं पहुंचेगी उसे पहाड़ नहीं माना जाएगा। भई वाह, वाह भई वाह, क्या ही शानदार सोच है महामानव की। यानी जो सौ मीटर का नहीं है वो पहाड़ नहीं है। 




ये जो लोग शोर मचा रहे हैं कि अरावली खतम हो जाएगी, अरावली खतम हो जाएगी। वो महामानव के विज़न को नहीं देख पा रहे हैं। अरे तुम ग़रीब लोग, तुमने देखा ही क्या है। अगर हम दुनिया के नंबर वन देश बनना चाहते हैं, तो हमें कुछ सैक्रीफाइस तो करना ही पड़ेगा। ये सैक्रीफाइस ही है देश को दुनिया का नंबर वन देश बनाएगा, विश्वगुरु बनने के तिराहे पर तो हम खड़े ही हैं, अब हमें दुनिया का सबसे बढ़िया देश बनना है।

अब तुम देखोगे कि हम ये कैसे करें। इसके लिए हमें बहुत सारे बोल्ड कदम उठाने पड़ेंगे, बहुत सारे। तो सबसे पहले तो ये सोचो कि तुमने देखा होगा कि कैसे दुबई के, सउदी अरब के देश अमीर हैं, उनके यहां अमीर लोगों के पास तेल के भंडार हैं, तेल कहां से मिलता है, रेतीले रेगिस्तान से। रेत के रेगिस्तान में होती है, देश में रेगिस्तान बहुत कम है। इसलिए अरावली को हटाने की योजना है। अरावली को हटाने से रेगिस्तान फैल जाएगा, दूर-दूर तक रेगिस्तान फैल जाएगा। फिर सारी दुनिया के लोग रेगिस्तान के मज़े लेने के लिए हमारे देश में आया करेंगे। क्या ही कमाल होगा। आज जैसे मिडल ईस्ट के रेगिस्तान की वीडियो और फोटो हर जगह दिखाई देती हैं, वैसे दिल्ली की फोटो और वीडियो दिखेंगे। रेगिस्तान होने की वजह से सउदी अरब इतना इतराता है, अब महामानव की वजह से हम भी इतना ही इतराया करेंगे। हम उन्हें दिखा देंगे कि हम भी रेगिस्तान बना सकते हैं। 

दोस्तों इस रेगिस्तान के कितने फायदे हैं आप नहीं जानते। रेगिस्तान बनेगा तो क्या पता अपने यहां भी तेल के भंडार मिल जाएं। फिर उन तेल के कुआंे को अडानी, अम्बानी मैनेज करेंगे और हमारे आपके जैसे लोगों को नौकरियां मिलेंगी। फिर हमारे देश के लोगों को नौकरी के लिए सउदी अरब नहीं जाना पड़ेगा, बल्कि बाकी देशों के लोग हमारे देश में आकर नौकरी करेंगे। फिर देखना हमारा रुपया डॉलर से भी उपर हो जाएगा। अभी जो लोग रुपये की गिरावट पर शोर मचा रहे हैं, उन्हें तब पता चलेगा कि हमारा रुपया क्या कमाल दिखा सकता है। 

और तुम्हें क्या लग रहा है कि ये जो महामानव अरावली के पहाड़ों को काटेंगे तो उनका क्या करेंगे। अरे उनसे अपने देश में हम भी बुर्ज-खलीफा जैसी गगनचुंबी इमारते बनाएंगे। बुर्ज खलीफा 828 मीटर की है, तो हम 1000 मीटर उंची इमारत बनाएंगे और उसका नाम राम की लाट रखेंगे। राम की लाट बनाने के लिए दोस्तों अरावली का कटना जरूरी है, क्योंकि अरावली खतम होगी, तो ही रेगिस्तान फैलेगा, रेगिस्तान फैलेगा, तो हमें तेल मिलेगा, तेल मिलेगा तो पैसा आएगा, और तब उसी पैसे से हम राम की लाट जैसी बिल्डिंग बना पाएंगे। इसीलिए मुझे महामानव पसंद हैं उनकी सोच जो है, वो कोई आम सोच नहीं है, बल्कि दूरदृष्टि है, दूर भी नहीं, भैया उनकी बहुतदूरदृष्टि है। 

अरावली के खतम होने का दूसरा फायदा हमें ये होगा कि अभी दिल्ली में बहुत गर्मी पड़ती है, और बहुत ज्यादा सर्दी पड़ती है। दिल्ली के मौसम पर अरावली का, हिमालय का, और भी पहाड़ों का बहुत असर होता है, सभी जगह होता है। हम पहाड़ों के इस असर को खतम कर देंगे, दिल्ली में, और पूरे देश मे ंहम मौसम का एक ही तौर रखेंगे, गर्मी तो गर्मी, सर्दी तो सर्दी। अभी आप लोग दिल्ली में पानी की कमी से जूझ रहे हो, तब ऐसा नहीं होगा, होगा ये कि हिमालय में जो बर्फ पिघल रही है, वो पानी आपके पास आएगा, दूसरी तरफ रेगिस्तान के चलते, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और बहुत सारे उत्तर प्रदेश के खेत बंजर हो जाएंगे। इससे दिल्ली जो देश की राजधानी है उसमें भरपूर पानी होगा, इतना पानी होगा कि तुम्हें कभी पानी की कमी महसूस नहीं होगी। 


ये जो लोग अभी अरावली के खतम होने का मातम मना रहे हैं, आप उनकी तरफ मत देखो। ये वो लोग हैं तो कभी विकास को नहीं पहचान पाते, इन्हें हमेशा किसानों की, मजदूरों की, ग़रीबों की पड़ी रहती है। महामानव को देखो, उनकी तरह सोचना सीखो, ज़रा सोचो क्या महामानव ने कभी ग़रीबों के बारे मे ंसोचा है। अगर महामानव कभी किसानों, दलितों, आदिवासियों के बारे में सोचते, तो क्या कभी अडानी और अम्बानी दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूचि में अपनी जगह बना सकते थे। नहीं? इसलिए ग़रीबों के बारे में सोचना छोड़ो, तुम तो ये सोचो कि देश को अमीर कैसे बनया जा सकता है।

ये जो लोग अरावली को खतम नहीं करना चाहते वो देश को अमीर नहीं बनने देना चाहते, हमारे प्रिय एंकर अद्भुत मेघा से हमें बता रहे हैं कि ये जो दिल्ली का प्रदूषण है वो अरावली की वजह से ही है और अरावली खतम होने से वो प्रदूषण भी खतम हो जाएगा। अरावली खतम होने से समझिए क्या-क्या खतम हो जाएगा। ग़रीबी, प्रदूषण, बेचारगी, कमजोरी, घात, सुन्नापन, टेढ़ापन और अन्य विशेष बिमारियों का इलाज भी अरावली खतम होने से हो जाएगा। 


दरअसल, नेहरु ने जानबूझ कर दिल्ली को कटोरी से नहीं निकाला था, ये उनकी भूल थी, ग़लती थी, साजिश थी, लेकिन अब जबकि हमारे पास एक नॉनबॉयोलोजिकल महामानव है तो ये काम भी कर ही डाला जाए। पूरी अरावली खतम करने के लिए जिस तरह की हिम्मत और जिगरा चाहिए, वो नेहरु के पास नहीं था, महामानव के पास है, इसलिए इस काम को वही करेंगे। 

और एक विशेष बात पर चर्चा करना तो मैं भूल ही गया। देश की सुरक्षा। देश की सुरक्षा बहुत जरूरी है मितरों। और इस देश की सुरक्षा में सबसे बड़ी अड़चन ये अरावली ही तो है। अरावली होने के चलते, हमें दिल्ली से सीधा पाकिस्तान बॉर्डर नहीं दिखाई देता। एक बार अरावली खतम हो जाए तो हम दिल्ली में भी स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी जैसा ही एक और स्टैच्यू बनाएंगे, फिर उस स्टैच्यू की आंख से सीधे पाकिस्तान दिखाई देगा, और जैसे ही हम देखेंगे कि पाकिस्तान कोई ग़लत हरक़त कर रहा है, सीधे उस पर हमला कर दिया जाएगा। फिर हमें राडार से छुपने के लिए खराब मौसम या बादलों की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, क्योंकि दुश्मन सीधे हमारी आंख की सीध में होगा। अभी क्या होता है ना, कि पहलगाम, या पुलवामा जैसा कायराना हमला पाकिस्तान कर ले जाता है, अब नही ंकर पाएगा। बढ़िया हो गया। 

तो कुल मिलाकर मामला सीधा बनता है साहब। वो लोग जो देश को दू......रदृष्टि से देख रहे हैं, वो तो कर रहे हैं अरावली को खतम करने की हिमायत, और जो भाई लोग इसे ग़लत बता रहे हैं, विनकी नज़र थोड़ा पास की है, यानी कमज़ोर है। अब ये जो मजदूर-किसान वगैरह हैं, वो कमज़ोर ही होते हैं, मै बताउं आपको, इनकी बात वैसे भी मानी नहीं जाती। महामानव ने डिसाइड कर लिया, सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी, एन जी टी तीर्थ यात्रा पर है। 

तो जल्द ही मेरे दोस्तों, जब अरावली खतम हो जाएगी तो हम भी रेत के टीलों पर रात को बोनफायर में ग़रीबों और आदिवासियों का नाच देख सकेंगे, इसके सपने आप लेते रहें। 

बाकी, चचा जो थे हमारे, यानी ग़ालिब, उन्होने कलकत्ते और नखलउ पर शेर लिखे, दिल्ली पर उनके जानकार कहते हैं कि शेर ना लिखे ग़ालिब ने, लेकिन ऐसा वही कहते हैं, तो जानते नहीं थे, ग़ालिब को, या उतना क़रीब से नहीं जानते थे, जितना क़रीब से मैं उन्हें जानता था। तो अरावली पर एक शेर उन्होने लिखा था। वो कुछ यूं था शेर कि....

तेरे पहाड़ नीचे, मेरे पहाड़ उंचे
तेरी ज़मीं चुरा के, मैं आसमा बना लूं
तू रहेगा 100 के नीचे, मैं रहूंगा उसके उपर
तू कुछ भी कह ले भैया, मैं खत्म कर ये डालूं

ग़ालिब, ग़ालिब थे, कुछ भी कह सकते थे, आप ध्यान रखिए ज़रा, आजकल वैसे भी राष्टद्रोही होने की रवायत चली हुई है, कहीं आप ना हो जाना। 

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

पैमाना बदल दूंगा






ये कौन लोग हैं जो शोर मचा रहे हैं, एक शानदार सनातनी सरकार की मुखिया के लिए ”हाय-हाय” के नारे लगा रहे हैं।  
जनाब दिल्ली की कमान हाथ में लेते ही हिंदू धर्म की रक्षा की जिम्मेदारी का गठ्ठर अपने सिर पर रखने वाली रेखा जी गुप्ता से आप लोग इतना चिढ़ते क्यों हैं। दिल्ली में क्या पहले प्रदूषण नहीं था, क्या पहले हवा खराब नहीं थी, क्या पहले सांस लेना दूभर नहीं था? जब पूरी दुनिया में दिल्ली सबसे प्रदूषित शहर की कैटेगरी में आ गया था तो उस समय रेखा जी गुप्ता की सरकार ने आपको दिवाली पर पटाखे जलाने की अनुमति दिलवाई थी। आप भूल जाएं, लेकिन धर्म उन्हें नहीं भूलेगा, पटाखे जलाकर दिल्ली की जनता को धर्म का असली मर्म रेख जी गुप्ता ने सिखलाया था, ये बात आप भले ही भूल जाएं लेकिन मनिंनदरजीत सिंह जी कभी नहीं भूलेंगे। और आप ऐसे अहसान फरामोश हैं कि स्टेडियम में खडे़ होकर ए क्यू आई का नारा लगा रहे हैं। 




ये दरअसल देशद्रोहियों की, आपियों की, वामियों की, कांगियों की, साजिश है, जिन्होने इस खराब हवा के मुद्दे को इतना बढ़ा-चढ़ा कर दुनिया के सामने रखने की हिमाकत की है। क्या है ये ए क्यू आई जिसे आप इतना बड़ा मुद्दा बना दे रहे हो? क्या ये धर्म से बड़ा है? सनातन से बड़ा है? 






ये इस देश की विडंबना है कि वो एक कर्मठ प्रधानमंत्री को, एक कर्मठ मुख्यमंत्री को पहचान नहीं पा रहा है। 



ये तो पाश्चात्य संस्कृति की साजिश है। ये ए क्यू आई कोई संस्कृत का शब्द नहीं है, ये तो हमारी संस्कृति में भी नहीं है, ये तो विदेशी मुल्कों की साजिश है जिसके ज़रिए वो इस देश को बदनाम करना चाहते हैं, और इसमें कुछ लोग जो इस देश में रहते हैं, इस देश का खाते हैं, लेकिन बाहरी मुल्कों की मदद करते हैं, वो इनका साथ दे रहे हैं। सच बात तो ये है कि रेखा जी गुप्ता जी ने ठीक ही कहा है कि ये ए क्यू आई तो सिर्फ एक टेम्परेचर है, तापमान है जिसे किसी भी इन्स्टूमेंट से पता किया जा सकता है। इसलिए जब आप थर्मामीटर इस्तेमाल करेंगे तो आपको पता चलेगा कि ए क्यू आई जो है वो 106 से उपर जाएगा ही नहीं। अब बताइए, 106 ए क्यू आई क्या गलत होगा, बल्कि अगर आपको मेरी बात का यकीन नहीं है तो अभी की अभी थर्मामीटर निकालिए और देखिए आपको दिल्ली का ए क्यू आई 21 डिग्री से ज्यादा नहीं दिखेगा, बल्कि रात मे ंतो ये 2 से 3 डिग्री तक गिर जाता है। ये विदेशी साजिश है जिसमें दिल्ली के टेम्परेचर को ए क्यू आई से अलग कर दिया गया है, इसलिए हम मांग करते हैं कि देश में यानी भारत में ए क्यू आई नापने के लिए थर्मामीटर का इस्तेमाल किया जाए।





सभी ए क्यू आई नापने वाले केन्द्रों पर थर्मामीटर लगाया जाए, जिनसे ए क्यू आई नापा जाए। ये पूरी दुनिया भारत का विकास देख कर जल रही है। अरविंद केजरीवाल की सरकार जो काम नही ंकर पाई हम वो काम करके दिखाएंगे, हम पूरी दुनिया से अलग, भारत में, खासतौर पर दिल्ली में ए क्यू आई नापने की अलग तदबीर विकसित करेंगे जिसमें हाल कैसा भी हो, ए क्यू आई कम ही दिखाया जाएगा।  



ए क्यू आई ही क्यों, हम बेरोज़गारी नापने के भी नये पैमाने बनाएंगे, जिससे देश में बढ़ती बेरोजगारी पर लगाम लगाई जा सके। इसी तरह पिछले दिनों जो रुपया नीचे गिर रहा है, उससे निपटने के लिए हम रुपये की क़ीमत आंकने के लिए भी नये पैमाने बना देंगे ताकि रुपया नीचे गिरता ना लगे, इसी तरह जब लोग कहते हैं कि हमारे देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, अपराध बढ़ रहा है, नफरत और दंगे बढ़ रहे हैं, हम उन सब पैमानों को भी बदल देंगे ताकि सब अपराध कम होता हुआ लगे और हम अपनी छप्पन इंची छाती को ठोक कर कह सके कि, अच्छे दिन आ गए। बल्कि हम अच्छे दिन की परिभाषा ही बदल देंगे ताकि बुरे दिनों को अच्छे दिन बताया जा सके। 

ये वो लोग हैं दोस्तों जिन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही है, प्रदूषित हवा की वजह से जिनकी जान पर बन आई है। ये लोग वो लोग हैं, जिन्हें रेखा जी गुप्ता जी का सम्मान अपनी जान से बढ़ कर लगता है, ये लोग अपनी जान बचाने को दिल्ली छोड़ कर भाग रहे हैं। लगातार दिल्ली वाले प्रदूषण के लिए जो रेखा जी गुप्ता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, उसके चलते उन्होने एक क्रांतिकारी, ऐतिहासिक फैसला लिया है कि अब दिल्ली में ग्रिल और तंदूर को बैन कर दिया गया है। लेकिन सच तो ये है दोस्तों की सर्दियों में ये जो दिल्ली वाले अपनी रसोइयों में सुबह-सुबह पराठे बनाते हैं, उनसे बहुत धुआं उठता है, इस धुएं से सबसे ज्यादा प्रदूषण होता है। मैं तो रेखा जी गुप्ता से ये मांग करूंगा कि दिल्ली में पराठे बनाना, पराठे खाना बैन करना चाहिए, ताकि प्रदूषण का जो कलंक दिल्ली के माथे पर लगा है उससे छुटकारा मिले। दोस्तों, जो आपको ए क्यू आई की बात कहे, उससे कहिए कि ”जा पहले पराठे पर बैन लगा, फिर मुझसे ए क्यू आई की बात करियो”। दोस्तो, दिल्ली की हवा में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण सर्दियों में घरों में बनने वाले पराठे हैं, जिन पर बैन लगना ही चाहिए, ताकि रेखा जी गुप्ता का आई क्यू बढ़ सके और दिल्ली का ए क्यू आई कम हो सके।




मेरे मितरों अब वक्त आ गया है कि हम दुनिया को बता दें कि हम विश्वगुरु हैं, आज ही से हम संकल्प लें। आपको याद होगा जब हमने ये शुरु किया था कि हमारे मंत्री हर तीसरे दिन कूड़े के ढे़र के पास जाकर कहते थे, ”भाई तुझे जाना होगा”, अब हमारे मंत्री प्रदूषण से कहेंगे कि तुझे जाना होगा भाई, पहले इन समस्याओं को मुख्यमंत्री रेखा जी गुप्ता के प्रोत्साहन से भेज कर हम बाकी अन्य समस्याओं के पास भी मंत्रियों को भेजेंगे, ताकि उन्हें भी रेखा जी गुप्ता का ये संदेश दिया जा सके और आखिरकार जब इन सनातनी मंत्रियों के इस सदंेश को सुन कर दिल्ली और अंततः ये देश समस्याओं से मुक्त हो जाएगा।




इसमें मुझे सिर्फ एक ही बात कहनी है, ज्यादातर मामलों में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा जी गुप्ता बहुत हद तक महामानव से भी आगे निकल गई हैं, अपने आउट ऑफ द वर्ल्ड विज़डम से उन्होने देश दुनिया को भौंचक्का कर दिया है, इतिहास, विज्ञान, स्पेस टेकनॉलॉजी, भाषा, सबके साथ उन्होने लगभग वही व्यवहार किया है, जैसा महामानव ने किया था। इस मामले में वो कतई महामानव जैसी हैं। लेकिन अपने मंत्रियों से दिल्ली के कूड़े को, भाई तुझे जाना पड़ेगा” जैसा संदेश देना महामानव को कतई नहीं सूझा, और इसलिए वो कतई, लेडी महामानव के लकब की हकदार हैं। 



यूं मेरे दोस्तों हम दिल्ली के प्रदूषण को कम करने, कूड़े को कम करने, देश की बेरोज़गारी को कम करने की तरफ कदम बढ़ा सकते हैं।

चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, वो कहते थे

जो आया था ये कह के, जमाना बदल दूंगा
वो कह रहा ह ैअब के, पैमाना बदल दूंगा

सीधा सा मंत्र है मितरों, जब काम ठीक ना हो, तो परिभाषा बदल दो, सारा खेल परिभाषा का है। आप काम करने की कोशिश ही मत करो, परिभाषाएं बदलते रहो, काफी है।
बाकी आप समझदार हैं, बस ये समझ लीजिए कि दिल्ली में प्रदूषण नहीं है, ये सब सरकार को बदनाम करने की साजिश है। 

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

मगरमच्छ पकड़ने की कला



जी जनाब, देश इस वक्त विद्वानों से भरा पड़ा है, भरा क्या पड़ा है भाईसाब विद्वान यूं निकल-निकल पड़ रहे हैं कि क्या कहें। लेकिन मुसीबत ये है कि देश के इन विद्वानों में से कोई भी देश के भले के लिए नहीं सोच रहा, कम से कम उतना नहीं सोच रहा जितना कि महामानव सोच रहे हैं। 





महामानव की सोच और उनके कारस्तानियों से सबक लेकर ही ये देश आगे बढ़ सकता है। मतलब विकास कर सकता है और इस देश के अच्छे दिन आ सकते हैं। यू ंतो महामानव का पूरा जीवन की प्रेरणादायक है, लेकिन आज मैं उनके सिर्फ एक कांड की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कि आप महामानव के बालपन के इस कांड से सबक लें और अपना जीवन भी सार्थक करें।

दोस्तों आज मैं आपको मगरमच्छ पकड़ने की कला से रु-ब-रु कराउंगा। हालांकि अगर बचपन में पकड़ा जाए तो ये कांड सार्थक होता है, लेकिन क्योंकि आप ये मौका खो चुके हैं, इसलिए अब यानी जवानी या बुढ़ापे में भी इस काम को करने से अंजाम भले हो सकते हैं। गौर करें मैं यहा मगरमच्छ की नहीं, आपकी उम्र का जिक्र कर रहा हूं। यानी आपको अपने बचपन में ही मगरमच्छा पकड़ना था, जो आपने नहीं पकड़ा। हालांकि ये काम आसान होता है यदि मगरमच्छ का भी बचपना ही हो जब उसे पकड़ा जाए। इसलिए खैर रखिए।

तो बहुत बेसिक से शुरु करते हैं। मगरमच्छ का मासूम नाम है, लेकिन अप इससे धोखा नहीं खा सकते, ये आपने अब तक के अपने अनुभव से सीख लिया होगा, मासूम नाम के पीछे चेहरा घिनौना हो सकता है, डरावना हो सकता है, या पापी भी हो सकता है। मगरमच्छ नाम का संधि विच्छेद करने पर मगर और मच्छ मिलता है, यानी इसमें अगर-मगर करने की आदत होती है और ये मछली की तरह पानी में रहता है। लेकिन पानी में रहने के बावजूद वो जमीन पर शिकार करता है, यानी कहता कुछ और है करता इसका बिल्कुल उलटा है। इसलिए मगरमच्छ के नाम पर मत जाइए, उसे उसके चरित्र से यानी उसकी आदतों से, उसकी हवस से जानिए।
 
तो सबसे पहले मगरमच्छ को देखिए। देखना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि बिना देखे मगरमच्छ को नहीं पकड़ा जा सकता। देखना इसलिए भी ज़रूरी होता है क्योंकि आजकल नदियों में जो मगरमच्छ होते हैं, उनकी गुणवत्ता वैसी नहीं होती, जैसी उस जमाने में होती थी जब महामानव ने मगरमच्छ पकड़ा था। उस समय के मगरमच्छ मगरमच्छों जैसी हरक़त करते थे, आजकल मगरमच्छों की हरक़तें कुछ -कुछ, गौर कीजिए, मैं ने सारी हरक़तों की बात नहीं की है, कुछ हरक़तें इंसानों जैसी हो गई हैं। जाहिर है, मगरमच्छों के भी अच्छे दिन आए हुए हैं। महामानव के बचपन में जब नेहरु का राज था, मगरमच्छों का सही पोषण और लालन-पालन नहीं हुआ था, अक्सर कमज़ोर रहते थे, और यूं ही पकड़ में आ जाते थे, आजकल के मगरमच्छ जब तक हो सकता है खाते हैं, और फिर पकड़ाई का अंदेशा होते ही देश छोड़कर चले जाते हैं, विदेशों में ऐश करते हैं। आखिर उनके अच्छे दिन भी आ ही गए हैं।

ख़ैर, पकड़ने से पहले मगरमच्छों को देखना इसलिए भी ज़रूरी है कि ये तसल्ली करना चाहिए कि वो मगरमच्छ जिस पर आपकी नज़र है, कहीं कनेक्टिड ना हो, कहीं ऐसा ना हो कि आपको लेने-के-देने पड़ जाएं।




ग़ौर कीजिएगा, इसी लेने के देने के चक्कर में कई लोग आ गए हैं, और आज बिचारे खिसियानी हंसी हंस रहे हैं, अपने ही हालात पर। तो एक बार अच्छी तरह देख लेने के बाद, यानी जांच-परख के बाद आप मगरमच्छ को पकड़ने के लिए तैयार हो चुके हैं। मगर साहब आपने मगरमच्छ को पकड़ने की जल्दी नहीं करनी है। कतई जल्दी नहीं करनी है, आराम से सबर के साथ, पूरे इत्मिनान से मगरमच्छ को पकड़ना है। इस इत्मिनान के समय में आप अपने कई ज़रूरी काम पूरे कर सकते हैं, जैसे घुइंया छील सकते हैं, रेलवे स्टेशन पर चाय बेच सकते हैं, आपातकाल के समय जेल जा सकते हैं, बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग कर सकते हैं, और कुछ ना बने तो भिक्षा मांग कर गुजारा भी कर सकते हैं। 




महामानव के जीवन में ऐसा इत्मिनान मगरमच्छ पकड़ने के बाद आया था, आप ऐसा इत्मिनान मगरमच्छ पकड़ने से पहले भी हासिल कर सकते हैं। आखिर महामानव मगरमच्छ पकड़ ही चुके हैं, इसलिए कोई जल्दबाज़ी और कोई भकभकी करने की जरूरत नहीं है।




अब आप यू ंसमझिए कि आप मगरमच्छ पकड़ने के एकदम क़रीब हैं, यानी बस कुछ ही पलों में मगरमच्छ पकड़ा जाएगा। अब आप ये सोचिए जनाब की जब आप मगरमच्छ को पकड़ने की जुगत लगा रहे होंगे तो मगरमच्छ क्या पंजे-पर-पंजा धरे खाली बैठा होगा। अरे वो भी तो कुछ जुगत लगा रहा होगा, वो भी या तो बचने के या फिर आप ही को धर दबोचने का इंतजाम सोच रहा होगा। अब मेरे मितरों आपको इससे भी बचना है। यानी अब समय पक गया है, मगरमच्छ आपको पकड़े इससे पहले आपको मगरमच्छ पकड़ लेना है। 



अब आप पहले अपनी तरफ देखिए, आखिर इस मगरमच्छ को पकड़ कर आप क्या ही कर लेंगे, जिसने मगरमच्छ पकड़ा उसने जो किया वो आप देख ही रहे हैं। उपर से मगरमच्छ पकड़ने के बाद मगरमच्छ पकड़ने वाले ने ये इंतजाम कर दिया कि बाकी मगरमच्छ आराम से जिंदगी बसर कर सकें, इसलिए अब मगरमच्छ पकड़ कर उनके जीवन में हैजान पैदा करके आप पहले मगरमच्छ पकड़ने वाले को परेशान करने की जुगत कर रहे हैं। इसलिए आपसे मेरी इल्तिजा है कि आप मगरमच्छ पकड़ने का ख्याल छोड़ दीजिए और जिसने मगरमच्छ पकड़ लिया है उसी के मगरमच्छ पकड़ने के किस्से सुनिए, सुनाइए और मजे उड़ाइए। इसी में आपका भला है।

बाकी चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, वो मगरमच्छ पकड़ने के माहिर थे, हालांकि अपनी पूरी जिंदगी उन्होने मगरमच्छ ना पकड़ बिचारे किसी और ही फिराक में रहे, कहते हैं सदा रक़ीब को पकड़ने के चक्कर में क़ासिद का इंतजार करते रहे, कि खतो-किताबत ही बनी रहे किसी तरह। लेकिन मगरमच्छ पकड़ने की कला पर एक गुलुबंद शेर उन्होने लिखा है जो आपके सामने पेश है। शेर कुछ यूंह ै कि

मगर को पकड़ेगा क्या, मगर के मच्छ साहेब हैं
तू इतना जान ले बच्चे सभी के रच्छ साहेब हैं।

मच्छ का तुक मिल नहीं रहा था, इसलिए ग़ालिब ने रच्छ इस्तेमाल किया और फुटनोट में लिखा है कि इसका मतलब नॉनाबायोलॉजिकल होता है। बाकी आप खुद भी तो समझदार हैं, समझ लीजिएगा। मैं चलता हूं। नमस्ते। 

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

बड़ों का माफी - छोटन को फांसी

 


बचपन में एक दोहा पढ़ा था, छिमा बड़ेन को चाहिए, छोटन को उत्पात। यहां बड़े भाई रहीम कह रहे हैं कि जो बड़ेन होते हैं, उन्हें क्षमा किया जाना चाहिए और ये जो छोटन होते हैं, उनकी जिंदगी में हमेशा उत्पात होना चाहिए। होता क्या है ना भाई कि बड़ेन की जिंदगी में ऐसे ही बहुत कुछ होता रहता है, और वो लागतार कुछ ना कुछ करते रहते हैं, जैसे मौज आई तो नोटबंदी कर दी, या यूं ही मजे मजे में बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ कर दिया, स्वच्छ भारत चला दिया, स्मार्ट सिटी शुरु कर दिया, अमृतकाल कर दिया, और कुछ ऑपरेशन कर दिया।  ये बड़ेन क्योंकि मजे मजे में बहुत कुछ करते हैं, इसलिए बहुत संभव है कि उनके बहुत सारे कामों में से कुछ काम ग़लत हो जाएं, खराब हो जाएं, तो उन्हें माफी की ज़रूरत होती है, हो सकता है बड़े भाई रहीम बहुत साल पहले से ये जानते हों, आखिर वो भी तो महमान अकबर के दरबारी थे, इसलिए वो बड़ेन को माफी देने की वकालत कर रहे हों। 

बड़ेन को माफी इसलिए भी लगती है कि आप यूं भी उनका कर ही क्या सकते हैं। मान लीजिए बड़ेन की किसी ग़लती की वजह से हज़ारों-लाखों की संख्या में हवाई उड़ाने रद्द हो जाती हैं। लाखों यात्रियों को माली नुक्सान होता है, लोग रोते हैं, बिलखते हैं, छटपटाते हैं। लेकिन आप बताइए क्या कर लीजिएगा, अंततः आपको बड़ेन को माफ करना ही होगा। यही व्यवस्था है, यही सिस्टम है, यही होता है। 


आपको याद है एक समय में कोविड हुआ था, श्मशान घाट के बाहर शवों की लाइन लगी हुई थी बाबा, चौबीस घंटे का वेटिंग पीरियड हो गया था। पूरा देश मुर्दाघर जैसा हो गया था, लोग हजारों किलोमीटर की यात्रा कर रहे थे कि मरें भी तो आखिर घर जाकर। लेकिन आखिरकार क्या हुआ, बड़ेन को माफी मिल गई। अब इसमें होता कुछ यूं है कि बड़े भाई रहीम के दोहे के हिसाब से बड़ेन माफी मांगता भी नहीं है, लेकिन उसे स्वाभाविक माफी मिल जाती है। ना कोई माफी मांगता है, ना कोई माफी देता है, पर मिल जाती है, माफी, क्योंकि छिमा बड़ेन को चाहिए। अगर आप किसी बड़ेन को माफी नहीं भी देंगे तो वो आपसे माफी खोंस लेगा, यानी छीन लेगा, इसके लिए भी हिन्दी में एक कहावत है, जबरा मारे और रोने भी न दे। इस कहावत में जो जबरा है, मेरे ख्याल में बडे़ भाई रहीम के दोहे में वही बड़ेन है। ये जो बड़ेन है, ये मारता है ओर रोने पर अनिष्ट भी कर सकता है। इसलिए बड़ेन ग़लती करता है, क्योंकि उसे पता है कि माफी तो मिल ही जानी है, माफी उसका अधिकार है, उसका हथियार है। वो नोटबंदी करता है और फिर तुम्हारी मुसीबत पर हंस सकता है।


और जब तुम मर जाते हो तो बड़े ही नाटकीय तौर पर सजा पाने की घोषणा कर सकता है

क्योंकि उसे पता है कि सज़ा मिलना तो क्या, उसे सज़ा देने के बारे में तुम सोच भी नहीं सकते, और अंततः तुम्हे उसे माफ करना ही पड़ेगा, क्योंकि छिमा बड़ेन का चाहिए। बड़ेन का छिमा का ये कंसेप्ट सदियों से चला आ रहा है, और आगे भी यूं ही चलता रहेगा ऐसी प्रबल संभावना है। वजह वही जो पहले बताई है कि आखिर आप क्या ही कर लेंगे बड़ेन का। 
मोदी के हंसने के कई वीडियो
दूसरी तरफ छोटेन का मामला ही उल्टा है, बड़े भाई रहीम ने कहा, छोटन को उत्पात। यहां इस दोहे में उनके कहने का मतलब है कि ये जो छोटन हैं, इनके जीवन में हर समय कोई ना कोई उत्पात लगा रहना चाहिए। क्यों ? क्योंकि इनके जीवन में अगर आराम हो जाए तो इन्हें दिक्कत हो जाती है। छोटन की बड़ी दिक्कत ये है कि ये लोग संतोष के साथ जीना नहीं सीखते, जबकि संतोष को लेकर जितनी भी कहावतें बनाई गई हैं, वो इन्हीं छोटन को हद में रहने की हिदायत देती हैं। कहावतें जैसे
संतोषी सदा सुखी
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान
आदि आदि
यानी छोटन को हमेशा कहा गया है कि लला, थोड़ा संतोष में रहोगे तो फायदे में रहोगे, कम से कम जीवित रहोगे, जरा आगे की मत सोचो, जितना मिला उसमें संतोष करो और जिंदगी काट लो, वरना जो मिला है वो भी छिन जाएगा और जान से जाओगे सो अलग। छोटन का बड़ा प्रॉब्लम है कि वो इन कहावतों में भरोसा नहीं करते, और ज्यादा की मांग करने लगते हैं। जैसे अभी पता चला दिल्ली में साफ हवा मांग रहे हैं। इन्हें लगा कि इंटरनेट मिल गया, बिजली मिल गई, पानी मिल गया, तो साफ हवा तो मिलनी चाहिए। लगे इंडिया गेट पर शोर मचाने। बस बड़ेन ने फौरन धर दबोचा, अब झेल रहे हैं अपने साफ हवा के हक़ की मांग करने की सज़ा।


इतिहास गवाह है कि जब भी छोटन को भरपेट खाना मिला है, तब-तब उसने जीवन की और सुख-सुविधा के लिए नारे लगाए हैं। जैसे इस देश में लोकतंत्र आया तो उसके बाद इसी छोटन ने जमीन पर हक़ के लिए नारे लगाए, संघर्ष किया, लड़ाई लड़ी, हुआ क्या, एक पूरी पीढ़ी गायब कर दी गई, और आज तक नक्सल के नाम पर प्रो. जी एन साईबाबा, से लेकर गौतम नवलखा तक जेल की साफ हवा में सांस दिया जा रहा है, एक थे स्टेन स्वामी, भले मर गए, लेकिन किसी बड़ेन ने माफी तो दूर, उनकी हत्या की जिम्मेदारी तक ना ली अपने सिर पर, उमर खालिद समेत तमाम बच्चों को सिर्फ इसलिए जेल की उड़द दाल का स्वाद मिल रहा है कि छोटेन होकर संतोष नहीं किया। लगे आज़ादी और ग़रीबों के हक़-अधिकार की आवाज़ उठाने। लेकिन ग़लती इनकी भी नहीं है, ये चरित्र होता है छोटेन का, इन्हें शिक्षा दो तो ये हक़ मांगते हैं, भरपेट खाना दो तो वोट करने का अधिकार मांगेगे, और थोड़ा पढ़ने-लिखने दोगे तो और ज्यादा आज़ादी और अधिकार मांगेगे। इसलिए बड़े भाई रहीम ने कहा था कि छोटेन के जीवन में हमेशा कोई ना कोई उत्पात होना चाहिए, ताकि आज़ादी, प्राइवेसी, साफ हवा, के बारे में शोर नाम मचाएं। छोटन की दिक्कत ये है कि जिंदगी में आराम हो तो दिमाग शैतान का कारखाना बन जाता है। यानी छोटन को जब-जब सुविधाएं मिलती हैं, यानी जब भी उनके जीवन में उत्पात नहीं होता, वो सरकार से अजीब-अजीब मांग करने लगते हैं। 


अभी बड़ेन ने एस आई आर करवाया, एस आई आर माने, ये तय किया जाएगा कि किसे वोट करने दिया जाए और किसे नहीं, अब छोटन शोर मचा रहे हैं कि हमारा वोट का अधिकार छीना जा रहा है। ये जो कुकर्म हैं, छोटन के, इसी वजह से इनके जीवन में उत्पात की ज़रूरत बनती है। अबे वोट करके ही तुम क्या कर लोगे बे, मैं तो कहूं ये जो इन्हे मुफ्त राशन दिया जा रहा है, उसे बंद करो, जैसे ही पेट की भूख सताएगी, सब वोट-फोट भूल जाएंगे। मेरी बात का यकीन नहीं है तो इन्हें देखिए 


ज़रा पढ़-लिख गईं तो लगी बड़ेन की नाक में दम करने। अब इन्हें वो सारे हक़ चाहिएं, जो बड़ेन के पास हैं, कैसे चलेगा? इसीलिए कहता हूं कि वही पुरानी स्टाइल ठीक थी, बड़ेन के पास सबकुछ हो, और छोटन के पास जीवन पूरा करने का संघर्ष हो। इन्हें खाने को मत दो, पढ़ने मत दो, सोचने-समझने मत दो। तभी ये छोटन काबू में रहेंगे, आपको याद होगा कि किसानों ने दिल्ली को घेर लिया था, दिल्ली को, बताइए, बड़ेन की नाक में दम हो गया था। उस वक्त बड़ेन की सबसे बड़ी परेशानी थी कि ये जो छोटन हैं, किसान हैं, ये खाना कैसे खा ले रहे हैं, भूखे क्यों नहीं मर रहे, सुंदर क्यों दिख रहे हैं, और तमाम आरोप लगा दिए बड़ेन ने इनके उपर....जैसे
खालिस्तानी हैं ये लोग, किसान ही नहीं हैं, बाहरी ताकते हैं जो इन्हें उकसा रही हैं।
लेकिन असली बात किसी ने नहीं पकड़ी। असली बात ये है कि इन छोटन के जीवन में उत्पात नहीं था, मुसीबत नहीं थी, इन्हें काबू में करना है तो इनके जीवन में उत्पात होना चाहिए, वरना ये बड़ेन का परेशान करेंगे। कहेंगे कि खेत और फसल की सही क़ीमत दो, आदिवासी होंगे तो कहेंगे कि जंगल, पहाड़, नदी और ज़मीन बचानी है। इन्हें काबू में करने का सही तरीका यही है कि सुप्रीम कोर्ट में जो बड़ेन बैठे हैं, उनके सामने इन्हें खालिस्तानी और नक्सली का ठप्पा लगाकर पटक दो, साबित कुछ नहीं करना, सारा जीवन बीत जाएगा भाई साहब, ये बाहर नहीं आ पाएंगे। आखिर सुप्रीम कोर्ट में भी बड़ेन बैठे हैं, और संसद में भी, और तो और मीडिया भी असल में बड़ेन के ही पास है। कौन क्या कहेगा?


खैर साहब फिर से आते हैं अपने असली दोहे पर, यानी बड़े भाई रहीम ने लिखा था, छिमा बड़ेन का चाहिए, छोटन को उत्पात, तो ये छोटन का उत्पात ही दरअसल बड़ेन की शंाति है। बड़ेन की शांति ही दरअसल देश की शांति होती है, और देश की शांति दरअसल छोटन की मंाग और संघर्ष की खामोशी का संकेत हैं। 

खैर चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, वो भी बड़े भाई रहीम की तर्ज पर एक संुदर शोर कह गए हैं, सुनिए
बड़े बड़े लोगन के मोटरगाड़ी
और हीरो होण्डा अलग से
हम्मन गरीबन के साइकिल जुलुमवा
चलने में टायर फटे फट से

अब आप इसका तर्जुमा कीजिए कि चचा आखिर कहना क्या चाहते थे, लेकिन बड़े भाई रहीम पक्का यही कहना चाहते थे कि छोटन की जिंदगी में उत्पात मचा के रखिए ताकी देश में शांति रहे। बाकी आपकी मर्जी। 

बुधवार, 7 जनवरी 2026

डॉलर फिर चढ़ा

 




 सुना डॉलर फिर उपर चढ़ गया। हालांकि ये कॉमी, वामी, कांगी, और सनातन विरोधी देश और दुनिया के पत्रकार ये कहते सुने गए हैं कि रुपया नीचे आया है। लेकिन जैसा कि देश की महान अर्थ मंत्री निर्मला जी सीतारमन बता चुकी हैं कि रुपया नहीं गिरा है, डॉलर चढ़ गया है। 




अब सवाल ये है कि देश की जनता को डॉलर की इस चढ़ाई पर खुशी मनानी चइए कि नई मनानी चइए। भई जब देश में डीयर फ्रेंड डोलांड का जन्मदिन मनाया जा सकता है, डीयर फ्रेंड डोलांड की जीत के लिए नारे लगाए जा सकते हैं, तो जाहिर है डोलांड की करेंसी यानी डॉलर की चर्ढ़ाइ पर खुशियां भी मनाई जा सकती हैं। 




देश की समृद्धि इसी बात से जाहिर है कि सुना आई एम एफ नाम की एक संस्था है, इंटरनेशनल मोनेटेरी फंड जिसने रुपये की बेइज्जती की है। अब रुपये की बेइज्जती की गई तो बर्दाश्त थोड़े ही किया जाएगा, ठीक है डॉलर उपर चढ़ रहा है, हमें खुशी है कि हमारे डीयर फ्रेंड की करेंसी उपर जा रही है, लेकिन हम अपनी करेंसी की बेइज्जती नहीं सहेंगे, फौरन आर बी आई ने मोर्चा संभाला, और डॉलर की पूंछ पकड़ के थोड़ा सा नीचे गिरा दिया। हम लहुसन प्याज ना खाने वाले सनातनी हिंदू जो हैं, वो इसी तरह काम करते हैं, थोड़ा लटक-झटक कर, थोड़ा मटक-मटक कर। खैर डॉलर जो उपर जाता हुआ इतरा रहा था, उसकी तो हमने नटकन कम कर दी। हालांकि इससे भारत की करेंसी को घिसटने वाली व्यवस्था से बाहर नहीं निकाला जा सका, लेकिन जैसा कि निर्मला ताई ने कहा था।




रुपये के बारे में भ्रम फैलाने वाले सबको जेल भेजा जाएगा, कल तक अमरीका कहता था तुम क्या हो, आज जैसे ही हमने डॉलर को उपर चढ़ने से रोका हर भारतीय के, खासतौर पर सनातनी भारतीय के पेट से आवाज़ निकली





अच्छा रुपये की इस हालत से आप पर क्या फर्क पड़ा, ये सब फालतू बातें हैं, देखिए जी डी पी की ग्रोथ लगभग नौ नंबर को छू रही हैं, क्या इससे आपकी सेहत पर कोई फर्क पड़ रहा है? या फिर भारतीय अर्थव्यवस्था कदम-कदम करके पांचवे से चौथे, और चौथे से तीसरे पायदान पर चढ़ रही ह, इससे आपकी सेहत पर कोई फर्क पड़ रहा है क्या? नहीं, पैटोल वही नब्बे के उपर मिल रहा है, शायद जल्दी ही सौ पार हो जाए, दाल-चावल-आटा महंगा हो ही रहा है, लेकिन उससे भी आपकी सेहत पर तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि अभी से ही करोड़ों परिवारों को हर महीना पांच किलो राशन मिल रहा है, कुछ दिन बाद हर परिवार को इसी राशन पर जीने का विकल्प मिलेगा। हर परिवार को महामानव की तस्वीर वाला एक झोला मिलेगा जिसमें पांच किलो राशन होगा, बस तीन दिन तो काम चलेगा, बाकी हरि भजन करो। 




अब जिस जनता को महामानव पांच किलो राशन दे दें, वो क्यों तुम्हारे जी डी पी, और पी एच डी के झंझट में पड़ेगी भई। जनता के लिए सब सुखमय है, सब शानदार है, सब महामानवीय है। तुम क्यों इन वामियों की बातों में आते हो, तुम बाबा अनिरुद्धाचार्य की बातों में आओ, सनातन और भगवाए हिंद वाले बागेश्वर धाम की बातों में आओ, ज्ञानपीठ वाले पतित और नीच ब्राहमणों की सूचि निकालने वाले रामभद्राचार्य की बातों में आएं, क्यों बेकार ये जी डीपी समझने में लगे हैं। सच मानिए सब सनातन के हाथों में है तो सब शुभ ही होगा। 

अभी देखिए भारत की अर्थव्यवस्था को चरम पर पहुंचाया जाएगा, जब भारतीय अर्थव्यवस्था चरम पर पहुंच जाएगी, तो भारत विश्वगुरु बन जाएगा, अभी तो सिर्फ जापानियों को चकमा दिया गया है, अभी बाकी देश भी कतार में लगे हुए हैं।  हम धीरे-धीरे सबको नीचे कर देंगे, आप बस देखते रहो। 

खैर डॉलर के उपर जाने की, ध्यान दीजिएगा, रुपया नीचे जाने की नहीं, बल्कि डॉलर के उपर जाने के कुछ विशेष कारण हैं, कारण जैसे देश में धर्म का हड़ास हो रहा है, आप ही देखिए आज से दस-पंद्रह साल पहले तक लोग कितनी सत्यनाराण की कथा करवाते थे, लीलावती और कलावती की कथा सुनते थे, पंजीरी खाते थे, चरणामृत पीते थे, और पंडीजी को दान-दक्षिणा देते थे, अब नहीं दे रहे। इसलिए दोस्तों, इसलिए इस देश की मुद्रा का जिसे अंग्रेजी में करेंसी कहते हैं, हड़ास हुआ जा रहा है। 
लेकिन महामानव ने उसका भी उपाय निकाला है, अयोध्या में ध्वजारोहण कर दिया है, जिसकी वजह से डॉलर की थोड़ी बहुत टूटन संभव हो पाई है। लेकिन, लेकिन, लेकिन, अभी काम पूरा नहीं हुआ है, इसी वजह से मितरों, सनातन की रक्षा के लिए पदयात्रा करने वाले बागेश्वर बाबा के पैरों में छाले पड़ गए, और बिचारे को पश्चिमी दवाओं का सहारा लेना पड़ा, आफत इस कदर हो गई कि सुना उनके प्रवचनों में से रजाई-गद्दे चोरी होने लगे, बताइए धरम का ऐसा हड़ास होगा तो रुपया कैसे उपर चढ़ेगा। अब बताइए एक चमत्कार तो महामानव और निर्मला ताई के किए हो गया कि रुपया लगातार नीचे जा रहा था, लेकिन अर्थव्यवस्था लगातार उपर जाती जा रही है। अब मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं, इसलिए मेरी इल्तिजा है कि भई अगर कोई इस चमत्कार को एक्सप्लेन कर सके तो जरूर करे, कि जिस देश की करेंसी नीचे जा रही हो, उसकी अर्थव्यवस्था लगातार उपर कैसे चली जा रही है। और देखिए बेकार की तकनीकी बातें मत कीजिएगा, इस तरह बताइएगा कि कोई चौथी क्लास का बच्चा, या मान लीजिए महामानव भी समझ सकें कि ये चमत्कार हो कैसे रहा है। 

खैर जनाब, हमें तो इसी बात की खुशी है कि महामानव के होते, उनके डीयर फ्रेंड की करेंसी यानी डॉलर उपर जा रहा है, बाकी निर्मला ताई ही इस बार भी समझाएंगी कि कैसे रुपया नीचे नहीं जा रहा है, बल्कि डॉलर उपर जा रहा है, आप रुपया मत देखिए, चश्मा गिर जाएगा, आप डॉलर देखिए ताकि टोपी गिर सके, या पगड़ी जिसे अंग्रेजी में इज्जत भी कहते हैं नीचे गिरने का खतरा हो तो वो भी मत देखिए, आप तो बाबा बागेश्वरधाम के पैरों के छाले देखिए जो पदयात्रा से हो गए, और उन्हें अस्पताल भर्ती होना पड़ा।

बकी चचा जो थे हमारे वो बहुत उम्दा एक शेर कह गए हैं इस मामले में, आप भी सुन लीजिए

डॉलर उड़ा, उड़ता ही गया, उड़ता ही गया
करेंसी और भी थी आसमान में बहुत सारी
रुपये का मत पूछो मेरे हमदम हाल ओ हिसाब
वो तो बस लुढ़कने में यकीन रखता है।

वाह, वाह भई वाह, चचा ने दिल जीत लिया। खैर हमारी यही दुआ है कि आई एम एफ जैसी संस्थाओं का झूठ पकड़ा जाए, और रुपये की इज्जत सबसे नीचे जाकर भी बनी रहे, बाकी जो है सो हइये है।
नमस्कार।  

शनिवार, 3 जनवरी 2026

महामानव और नक्सली लिंक




नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। दिल्ली में समस्या खत्म नहीं हो रही, बल्कि बढ़ती जा रही है। एक तो सी एम और फिर पी एम को परेशान करने वाला प्रदूषण तो कम नहीं ही हो रहा, साथ में इस प्रदूषण पर प्रदर्शन करने वालों ने और जान खा रखी है। दिल्ली पुलिस का काम बढ़ाते हैं ये सारे। ये प्रदूषण का विरोध करना, प्रदूषण के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराना, ये सब पिछले साल तक ठीक था, लेकिन अब जबकि माननीय रेखा जी गुप्ता की सरकार है और उनके पति ये सरकार चला रहे हैं, तब आप ही बताइए, क्या दिल्ली की जनता के लिए ये प्रदूषण के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराना क्या सही बात है? नहीं, नहीं, आप ही बताइए, क्या ये सही बात है कि आप रेख जी गुप्ता को, उनके सिर पर जिनका वरदहस्त है, ऐसे महामानव को, दिल्ली के प्रदूषण का जिम्मेदार बताएं। ना भई ना, ये कतई हिंदू राष्ट के, सनातन के और सबसे बड़ी बात देश के खिलाफ बात आप करते हैं। मजबूर होकर रेखा जी गुप्ता को कहना पड़ा कि भई इस प्रदूषण से निपटने के लिए दिल्ली की जनता को ही कदम उठाने होंगे। 



महामानव इस दौरान किसी आयोजन के लिए विदेश भ्रमण करने गए हैं, जब आएंगे तो भी उनका मन होगा तो कुछ कहेंगे, वरना जब वो मणिपुर जैसे संगीन मसले पर कुछ ना बोले तो दिल्ली के प्रदूषण पर तो क्या ही बोलेंगे। पर ये कुछ वामपंथी हैं, कुछ साइंटिस्ट वगैरह हैं, जो बकौल मुख्यमंत्री, केन्द्र सरकार, दिल्ली पुलिस और कुछ बहुत ही समझदार लोगों के अनुसार छात्रों को भड़का रहे हैं, कि वे प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन करें। आप ही बताइए, ज़रा हवा जहरीली हो जाने से आपको कोई अधिकार थोड़े ही मिल जाता है कि आप इंडिया गेट पर जाकर प्रदर्शन करने लगें। 




और प्रदर्शन भी कैसा जिसमें घनघोर नक्सली माडवी हिड़मा के समर्थन में नारे लगे। हमारे एक बहुत ही शानदार बुद्धिजीवी मित्र ने सही ही कहा, कि यार तुम्हें मान लो बहुत लग रहा था कि प्रदूषण के खिलाफ कुछ करो, तो करते, ये बीच में किसी आदिवासी को मार दिया तो उसके लिए नारे क्यों लगा रहे हो। ये सब छात्रों को बरगलाने वाले वामपंथी करते हैं, इन्हीं मित्र ने बताया कि इन्हें भी ऐसे ही बरगलाया गया था, वो तो सही समय पर ये उन गलियों से वापस आ गए और वामपंथी नहीं बने, वरना बताइए वे भी आज ऐसे ही नारे लगा रहे होते। खुदा खैर करे, इनके लिए ईश्वर की कृपा से सब कुशल रहा, कि ये वामपंथी नहीं बने और आज ठीक-ठाक खा कमा रहे हैं। मैं विषय से भटक रहा हूं, तो वापस विषय पर आते हुए, कहना चाहता हूं कि मुझे भी बहुत बुरा लगा कि भई ये माडवी हिड़मा को सरकार ने मारा, सेना ने मारा, या अर्धसैनिक बलों ने अपना शौर्य दिखाया, और ये छात्र, नालायक छात्र महामानव के शौर्य की जगह, माडवी हिड़मा के लिए नारे लगा रहे हैं। कतई देशद्रोही काम है साहब।


वो तो भला हो पुलिस का कि इन्हें मौके पर गिरफ्तार कर लिया। बेमौके भी गिरफ्तार करते तो कोई क्या ही कर लेता, लेकिन भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती देखिए, सत्ता की नरमदिली देखिए कि इन्हें मौके पर गिरफ्तार किया गया। उससे भी बढ़कर इन्हें टॉर्चर नहीं किया गया, बल्कि जज के सामने पेश किया गया, जज को समझाया गया कि भई ये लोग लाल सलाम के नारे लगा रहे थे, माडवी हिड़मा के लिए नारे लगा रहे थे, जिससे साफ पता चलता कि इनका कोई नक्सली लिंक है। तो जज साहब ने कहा कि चलो ठीक है, दो दिन इन्हें रिमांड पर लो और इनके नक्सली लिंक का पता लगाओ। अब पुलिस जो है वो इन छात्रों के नक्सली लिंक का पता लगा रही है। 



ये आजकल नक्सली लिंक बहुत हो जा रहा है लोगों का, ये हमारी पुलिस और जज इत्ते समझदार, इत्ते कर्मठ ना होते तो भाई साहब सोचिए देश का क्या होता, चारों तरफ नक्सली लिंक ही नक्सली लिंक होता। नक्सली लिंक के बारे में मैं बताउं आपको, अगर आप एक्सपर्ट ना हों तो आपको बिल्कुल पता नहीं चलता कि किसका नक्सली लिंक होता है। इसीलिए पुलिस वाले पहले पकड़ते हैं, फिर नक्सली लिंक का पता लगाते हैं। उसमें भी कई बार तो ये हो जाता है कि नक्सली लिंक मिल कर ही नहीं देता, तो फिर ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। आपको याद होगा सोनी सोरी के केस में क्या हुआ था, नक्सली लिंक ढूंढने के चक्कर में पुलिस को, इस देश की शानदार पुलिस को, क्या-क्या करना पड़ा था, उस आदिवासी महिला के साथ, मुझे तो ये भी नहीं पता कि नक्सली लिंक मिला भी कि नहीं। खैर मेरा ख्याल है कि अगर पुलिस वैसा ही व्यवहार इन गिरफ्तार छात्रों के साथ करे, तो शायद नक्सली लिंक मिल जाए? क्यों आपका क्या ख्याल है? 

भई मेरा तो ये मानना है कि ये पिछले सत्तर-अस्सी सालों में ये नक्सलियों ने खूब हल्ला काटा है, और अब जब हजारों साल बाद कोई सनातन का रक्षक, हिंदू शेर राजा गद्दी पर बैठा है तो ये निकल-निकल कर आ रहे हैं। अब इन्हें रोज़ पकड़ना, रोज़ पहचानना और फिर इनके नक्सली लिंक ढूंढना बहुत ही जांमारी वाला काम हो जाता है। तो मेरा तो ये सुझाव है कि इन सबको पकड़ लिया जाए। यानी गिरफ्तार कर लिया जाए, और जज जो हैं वो इन्हें जेल भेज दें, ओर इनसे कहा जाए कि बेटा जी अब तुम साबित करो कि तुम्हारा नक्सली लिंक नहीं है, वरना ये डिफॉल्ट माना जाए कि इन सबका नक्सली लिंक है, और ये देश के लिए खतरा हैं। 

अब कुछ लोग कहेंगे कि कपिल भाई ये ज्यादा हो जाएगा, इत्ते लोगों को पकड़ेंगे कैसे, और कहां रखेंगे। तो मेरे पास उसका भी इलाज है। ये जो वामपंथी टाइप लोग होते हैं ना, इनकी कुछ खास पहचान होती हैगी। बस इसी पहचान के आधार पर इनकी धरपकड़ हो, और धरपकड़ के बाद इन्हें सीधा किया जाए। अब जैसे एस आई आर हो रही है, उससे भी मदद ली जा सकती है। पर पहले तो आप इनकी पहचान सुन लीजिए, जिन्हें आपको पहले गिरफ्तार करना है, और फिर उनका नक्सली लिंक ढूंढना है।

तो सुनिए

1. ये पढ़ते हैं। जी हां, ये सारे नक्सली टाइप लोग, पढ़ते-लिखते हैं, मतलब कहानियां पढ़ते हैं, कविताएं पढ़ते हैं, इतिहास, विज्ञान, साहित्य, सबमें इनकी रुचि होती है। अपने-अपने सबजेक्ट के अलावा और भी सारे सबजेक्ट के बारे में जानना इनकी रुचि होती है। तो बस इनसे किसी अच्छे लेखक का नाम और उसकी किसी कहानी या कविता का नाम पूछिए, अगर ये बता दें, तो बस गिरफ्तार कर लीजिए। इसमें तो मान लीजिए सीधा सा हिसाब है, पढ़ते - लिखते हैं, तो पक्का समझदार होंगे, समझदार होंगे तो पक्का नक्सली लिंक होगा।
2. इनसे पूछिए कि अगर किसी पर अत्याचार हो, तो क्या तुम्हारा दिल दूखता है, क्या तुम उसके लिए आवाज़ उठाओगे? अगर जवाब हां में है तो सबकुछ छोड़ कर पहले इसे गिरफ्तार करो। ऐसा जवाब देने वालों का पक्का नक्सली लिंक मिलेगा, मैं बता रहा हूं आपको। अरे आप बात मानिए मेरी, यही हैं जिन्होने सोनीे सोरी के लिए, सांई बाबा के लिए, नारे लगाए थे, और अब यही हैं जो उमर खालिद के लिए इंसाफ मांग रहे हैं। 
3. इनसे पूछा जाए कि क्या तुम मानते हो कि आदिवासी जल जंगल जमीन पर आदिवासियों का हक होना चाहिए। अगर ये आएं-बाएं करने की जगह सीधा बोल दें कि हां, जल जंगल जमीन पर वहां रहने वालों का हक होना चाहिए तो फौरन, बिना आव-ताव देखे इन्हें गिरफ्तार कर लो। बताइए, जो आदिवासी जल जंगल जमीन पर सेठों का, अडानी अंबानी वेदांता का अधिकार ना माने वो तो नक्सली ही हुआ ना? 
4. सबसे सटीक तरीका है कि अगर कोई ये नहीं मानता कि देश में आज के दौर में हिंदू राष्ट होना चाहिए, और एक हिंदू राजा गद्दी पर बैठा है। तो उसे फौरन गिरफ्तार करना चाहिए। अब इसमें चुनाव आयोग राष्ट की मदद कर सकता है, चुनाव आयोग जो एस आई आर करवा रहा है, इस गहनतम पुर्नरीक्षण में पता लगाए कि कौन भा ज पा को यानी महामानव को वोट नहीं दे रहा है। और अब तक तो इन महामानव विरोधियों का वोट ही काटा जाता था, लेकिन अब ये किया जाए कि इन्हें गिरफ्तार किया जाए और ये माना जाए कि ये नक्सली हैं। इन्हें सीधा जेल या रिमांड पर भेजा जाए, फिर पांच-सात साल तो गई इनकी हवा गुल। 
5. ये लोग, हर मुद्दे पर सवाल करते हैं, सरकार से सवाल, पुलिस से सवाल, सेना से सवाल, न्यायालय से सवाल, इनके सवाल कभी खत्म हीं नहीं होते, और अब तो इनकी ये मजाल हो गई है कि ये महामानव तक से सवाल पूछने लगे हैं। अगर आपको कोई ऐसा मिले जिसको देश में समस्या दिखाई दे और उन समस्याओं के लिए वो नेहरु की जगह महामानव को जिम्मेदार माने, जो आपसे ये ना कहे कि पहले पिछले साठ या सत्तर सालों का हिसाब दो, या अगर इतनी ही परेशानी है तो पाकिस्तान रहने चले जाओ, तो उसे सबसे पहले गिरफ्तार करें, क्योंकि उसका पक्का नक्सली लिंक है।
इसके लिए ये कविता आपकी बहुत मदद कर सकती है।

मैं भी नक्सल, तू भी नक्सल
फूलों की खुशबू भी नक्सल
शब्दों का जादू भी नक्सल
ये भी नक्सल वो भी नक्सल
फ़ैज भी और मंटो भी नक्सल
मुक्तिबोध की कविता नक्सल
ज्ञान तर्क की बातें नक्सल
आदिम दलित की जातें नक्सल
मार्क्स भी नक्सल लेनिन नक्सल

नाटक नक्सल गाना नक्सल
मांसाहारी खाना नक्सल
रोज़ी मांगने वाला नक्सल
रोटी मांगने वाला नक्सल
जो मेरे तलवे ना चाटे
ऐसा जर्नलिस्ट भी नक्सल
पेड़ों के पत्ते भी नक्सल
मधुमक्खी के छत्ते नक्सल
सड़क पे चलने वाला नक्सल
गांव में रहने वाला नक्सल
जंगल ठेकेदार काट ले
पर असली हक़दार है नक्सल

पढ़ने लिखने वाला नक्सल
भूख से मरने वाला नक्सल
साफ हवा का नारा नक्सल
ईंटा पत्थर गारा नक्सल
घर भी नक्सल खेत भी नक्सल
जे एन यू का प्रेत भी नक्सल
संविधान की बातें नक्सल
मज़दूरों की जमातें नक्सल
झंडा हो गर लाल तो नक्सल
नीला हो तो वो भी नक्सल
अर्बन नक्सल रूरल नक्सल
टीचर नक्सल स्टूडेंट नक्सल
नक्सल नक्सल सारे नक्सल

तो मेरी बात का यकीन कीजिए, जब तक इन सब नक्सलियों को पकड़ नहीं लिया जाता, तब तक देश में हिंदू राष्ट नहीं आ सकता, नहीं आ सकता। चुनाव आयोग ध्यान दे, इन सबका वोट काटे, और पुलिस, सेना ध्यान दे कि अब इन्हें पकड़ना है और इन सबका नक्सली लिंक खोजना है। बाकी चचा ग़ालिब की जगह आज इसी कविता से काम चलाइए। वैसे भी चचा को सुन के क्या कीजिएगा, वो भी खासे नक्सल रहे अपने वक्त में। फिर मिलता हूं, नमस्कार।

भव्य स्वागत - भयानक स्वागत

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