लीजिए आज आपके लिए एक आश्चर्यजनक कहानी लेकर आया हूं। एक देश में एक साधुवेशधारी राक्षस रहता था। साधुवेशधारी उस राक्षस के बहुत सारे राजनेता मित्र होते थे। वो साधुवेशधारी उन राजनेताओं के साथ नाचता गाता था, और अपने कुकर्मों को अंजाम देता था। आम जनता उस साधुवेशधारी दुरात्मा की लच्छेदार बातों पर मंत्रमुग्ध थी, और उसे देवता मानती थी। अपने आयोजनों के द्वारा उस साधुवेशधारी ने अपने प्रपंच का बहुत लंबा जाल बिछा लिया था। तमाम राजनेताओं की सोहबत और उनकी सत्ता उसे तमाम सुविधाएं दिलवाती रहती थीं। पुलिस वाले उसे सुरक्षा देते थे, उसके आयोजनों को वो सब सुविधाएं मिलती थीं, जो अन्य आयोजनों को नहीं मिलती। पुलिस वाले उसके कदमों में बिछे-बिछे जाते थे। आश्चर्यजनक बात ये थी कि सत्ता जो हर व्यक्ति पर ई डी का छापा पड़वाती थी, उसने इस साधुवेशधारी के खिलाफ कभी किसी भी तरह की कोई जांच नहीं चलाई थी। आखिर सत्ता के शीर्ष पर बैठने वाले व्यक्ति का इस साधुवेशधारी के साथ साझा था, जो इसके साथ नाचता था।
रविवार, 12 अप्रैल 2026
भव्य स्वागत - भयानक स्वागत
गुरुवार, 2 अप्रैल 2026
जब मैं घर से भागा था।
नमस्कार। मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। दोस्तों ये कोई बात ना हुई कि देश में कोई नॉनबायोलॉजिकल, ईश्वरीय अवतार पैदा हो, बचपन में चमत्कार करे, किशोरावस्था में चाय बेचे, घर छोड़े, और बुर्जुगियत में छप्पन इंची छाती के साथ इतिहास में पहली बार देश की डोरबाग अपनी कलाई पर बांध ले और लोगबाग उस चमत्कारिक मोड़ का नाम तक न लें जिसने इस देश के इतिहास का बदल कर रख दिया। देश का क्या कहें दुनिया का इतिहास बदल कर रख दिया। हालांकि कई लोगों ने इस बदले हुए इतिहास को अपने शब्दों में बयां करने की कोशिश की है।
ये सारी बातें उस वक्त की हैं जब महामानव स्वयंसिद्ध हो चुके थे, यानी खुद ही तीसमारखां बन चुके थे। उनके अपने शब्दों में कहें तो
मेरा फोटोजेनिक है
मै पहला ऐसा प्रधान मंत्री हूं
मेरा सिर्फ ये कहना है कि खुद ही खुद को बयां करता है, महामानव क्या क्यां करता हैं। आप मेरी तरफ ध्यान रखिए। मेरा कहना है कि एक साधारण मगरमच्छ पकड़ने वाले से नॉनबायोलॉजिकल महामानव के इस सफर में वो एक मोड़ कौन सा था, जिसने इस पूरी दास्तान को ही बदल दिया। वो मोड़ था जब महामानव ने घर छोड़ा।

जब भी दुनिया में घर छोड़ने वालों की बात होगी, तो ये वाला घरछुड़ाव अन्य सभी घर छोड़ने वालों पर भारी पड़ेगा। क्योंकि महत्वपूर्ण ये नहीं है कि महामानव ने घर छोड़ने के बाद क्या किया। महत्वपूर्ण ये है कि महामानव ने घर छोड़ा, घर छोड़ना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि महामानव ने सिर्फ घर नहीं छोड़ा, घर के साथ जुड़ी बाकी चीजें भी छोड़ दीं।
दोस्तों जब व्यक्ति घर छोड़ता है तो क्या घर भी व्यक्ति को छोड़ देता है। इसका जवाब दर्शन में मिलेगा या आध्यात्म में मिलेगा। दरअसल घर को अक्सर माया कहा गया है, मोह और माया। घर से मोह होता है, क्योंकि घर माया होता है, इसलिए हे बालक घर छोड़ के जाने वाले को भगौड़ा नहीं कहते, भागौड़ा उसे कहा जाता है जो घर से भागा हो, भागने और छोड़ने में बहुत सूक्ष्म अंतर होता है, ये वही अंतर होता है, जिसे ओंकारा फिलिम में सैफ अली खान यानी लंगड़ा त्यागी ने रज्जू यानी दीपक डोबरियाल को समझाया था। यानी धागे के इंगे घर छोडने वाला होता है, और उंगे घर से भागने वाला होता है। और जो धागा हैंच लो तो कौण है भागने वाला और कौण है घर छोड़ने वाला।
तो करोड़ रुपये का प्रसन ये है भक्तों कि महामानव ने घर छोड़ा था, या घर से भागे थे। ये मेरा स्टेटमेंट नहीं है, ये दरअसल करोड़ रुपये का प्रसन है, जिसके जवाब पर करोड़ रुपये नहीं मिलने वाले हैं। इसलिए आपको ये करोड़ रुपये जीतने का मौका न देते हुए आज इसी प्रसन पर विचार करेंगे। कि घर से भागने में और घर छोड़ने में क्या फरक होता हैगा।
घर से भागने वाला दरअसल सरम से, चोरी से, और कभी -कभी अपराध बोध से भी घर से भागता है। भई इसमें विद्वानों के मत भिन्न हैं, कोई कहता है कि अगर परिवार के हितों के खिलाफ कोई काम करो तो घर से भागना पड़ता है, किसी का कहना है कि यदि परिवार की जमा-जोत को चुरा कर जुए में, शराबखोरी में, या ऐसे ही किसी चरित्रहीन काम में गवां दो तो भी घर से भागना पड़ता है, एक और मंझे हुए विद्वान ने कहा कि यदि बीवी से ना बनती हो, या बीवी रखनेे की सकत ना हो तो भी आमतौर पर व्यक्ति घर से भाग जाता है।
क्या आपने कभी ऐसी कोई अफवाह सुनी है कि कोई घर से भागते हुए अपनी बेचारी, ग़रीब, मां के गहने लेकर भागा था, और उसने वो गहने चुरा कर बेच दिए थे। क्यों बेच दिए थे, किसे बेच दिए थे, कहां बेच दिए थे, और कितने में बेचे थे, जैसे सवाल बेकार हैं, क्योंकि ये उस व्यक्ति का निजी मामला था और है, और हम यहां निजी मामलों पर विचार नही ंकर रहे हैं। हम सिर्फ घर से भागने पर विचार कर रहे हैं।
पर बात फिर घूम-फिर कर वहीं आ जाती है। क्या ये व्यक्ति वो है जिसकी बात हम नही ंकर रहे हैं, हैरी पॉटर वाली किताब की तरह, यू नो हू, की बात कर रहे हैं। उसके अधिकार में सारी काली शक्तियां हैं, वो डार्क आर्टस् का स्वामी है, जो खुद को ईश्वर बनाने पर तुला हुआ है। यानी घर से भागने वाला अपनी पत्नि को छोड़ कर भागता है, यानी उससे शादी करता है और फिर बिना उसे तलाक दिए, बहुत ही कायराना तरीके से उसे छोड़ कर घर से ही भाग जाता है ताकि उसे घर की जिम्मेदारियों का सामना ना करना पड़े। अपनी कायरता छिपाने के लिए यू नो हू किसी को बताता भी नहीं कि उसकी एक ब्याहता बीवी है, जिसे वो बेशर्मी से छोड़ आया है। खैर ये भी किसी का बहुत ही निजी मामला हो सकता है और हमें कोई चाव नहीं है किसी की निजी ज़िंदगी के बखिए उधेड़ने की और इसलिए हम इस पर बात न ही करें तो अच्छा है।
इसके अलावा, जुआ खेलने, चोरी करने, या कोई और काम करने के भी कोई रिकॉर्ड न मिलें हों तो उनके बारे में बात करने का भी कोई औचित्य नहीं है। हालांकि घर से भागने वाले अक्सर यही सब करने के बाद, या करते हुए घर छोड़ते हैं। और ठीक इसी वजह से वो इसी तरह की प्रवृति में लिप्त होते हैं। जैसे सब कुछ चोरी करना, सबकुछ बेच देना, बेशर्मी से झूठ बोलना, आत्ममुग्धता और आत्मप्रशंसा की प्रवृति भी ऐसे लोगों में देखी जाती है। यदि आप ऐसे किसी व्यक्ति से मिलें तो सावधान रहें, ये बहुत ही चतुर या कहें कि धूर्त होते हैं, और सिर्फ अपना फायदा देखते हैं। इनसे किसी भी तरह के नैतिक व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती।
जबकि घर छोड़ना बिल्कुल ही जुदा बात होती है। घर छोड़ने में व्यक्ति की मजबूरी नहीं बल्कि उसकी इच्छा काम करती है। इतिहास और भूगोल दोनो में ही अनेकों व्यक्तियों ने घर छोड़ा, घर छोड़ कर उन्होने इतिहास और भूगोल बदलने जैसे कई काम किए। इसीलिए घर छोड़ने वाले जब घर छोड़ कर जाते हैं, तो अक्सर दुनिया की सैर पर निकल जाते हैं। कहा जाता है घर का खूंटा छूटा, तो छान ले पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा। वैसे भी इस फानी दुनिया का पता नहीं कब क्या हो जाए।
घर छोड़ने वाले घर छोड़ने के बाद अक्सर बहुत महान काम करते हैं। वे जब घर छोड़ते हैं, तो ज्ञान की तलाश में जाते हैं, ज्ञान पाते हैं, और ज्ञान पाकर पूरी दुनिया में ज्ञान का परकास फैला देते हैं। पर हमारा प्रसन तो भगतों अब भी वहीं का वहीं लटका है। हालांकि कुछ परकास अपने ज्ञान से हमने इस सवाल पर डाला है। लेकिन इस मामले में एक चोट ये होती है कि अक्सर घर से भागने वाले खुद का घर छोड़ने वाला बताने लगते हैं। ये जो ऐसा बताने वाले होते हैं, ये तरह - तरह के भेस बनाते हैं, तरह-तरह की बातें बनाते हैं, तमाम तरह के स्वांग रचा कर ऐसे-ऐसे नाटक करते हैं कि भोला-भाला इंसान धोखा खा जाता है, और उनका अंधभक्त बन जाता है। और यही इन्हें खतरनाक बना देता है।
घर छोड़ने वाले का ढांेग करने वाले, घरभगौड़ों से बचें, इनकी सर्वकालिक पहचान रही है, घर से भागने के बाद घर छोड़ने का प्रचार करना, अपने त्याग की झूठी कहानियां प्रचारित करना, अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटना, और खूब विलासिता से जीना। अरे मेरे यार, घर छोड़ने वाला विलासिता नहीं करता, खुद अपना प्रचार नहीं करता, अपने मुहं मियां मिठ्ठू नहीं बनता।
खैर मेरे इतना बताने पर भी अगर आपकी आंखों की झांई ना उतरे तो उसमें मेरा कोई दोष नहीं। कहा भी गया है, बताने वाले को नहीं दोष मेरे भाई। तो इसी कहावत के अनुसार, कम बताए को ज्यादा समझो और अपनी आंखों की पट्टी उतारो, घर छोड़ने वाले और घर से भागने वाले में फरक करो। क्योंकि ये करोड़ रुपये का प्रसन है।
बाकी चचा जो थे हमारे, कभी घर ना छोड़े, भागने का तो मामला ही पैदा नहीं होता। कहते थे
न जा कहीं घर छोड़ के ग़ालिब,
कहीं लोग भगौड़ा ना समझ लें
खुद ही से खुदा बन बैठा बदतमीज़
कहीं लोग तुझे मूरख ना समझ लें
बहुत साफ थे चचा अपने इस मामले में, उन्हें पता था कि घर से भागने में और घर छोड़ने में क्या अंतर है। सवाल ये है कि क्या आपको पता है। अपना जवाब कमेंटस् में ज़रूर लिख भेजिएगा, और ध्यान रखिएगा, ये वीडियो ही हू मस्ट नॉट बी नेम्ड के बारे में है। बाकी आपकी मर्जी।
शनिवार, 14 मार्च 2026
बलात्कार के समर्थक
लेकिन चर्चा में सेंगर इसलिए नहीं है क्योंकि वो बलात्कारी है। इसलिए भी नहीं कि वो इन आरोपों के सिद्ध होने के बाद सज़ा काट रहा है। चर्चा में वो इसलिए भी नहीं है कि उसने कोई पश्चाताप किया है, या कोई माफी लायक काम किया है। चर्चा में वो इसलिए है कि कुछ महान लोग, कुछ कम महान लोग, और कुछ महानता की चाहत रखने वाले लोग उसके समर्थक हैं।
देखिए, एक बात तो ये समझ लीजिए कि कुलदीप सिंह सेंगर की बेटी जो भी बयान दें, वो एक बेटी की तरफ से एक बाप के बचाव की बात है, और इसलिए उस पर यक़ीन करना, ना करना, उस बेटी के कांशस की बात है। जिनमें कोई भी किसी भी तरह की टिप्पणी ना ही करे तो बेहतर है। उस महिला ने, जो कुलदीप सिंह सेंगर की बेटी है, ना तो कुछ ग़लत किया है, ना अपराध किया है, और अगर वो अपने पिता को दोषी नहीं मानती तो ये उसका अपना फैसला है, वो अपने पिता को दोषी नहीं मानती, इसलिए वो हरसंभव प्रयास करेगी कि साबित करे कि उसके पिता दोषी नहीं हैं। इसलिए उसकी बेटी क्या करती है, क्या कहती है, क्यों कहती है पर किसी भी तरह की बात करना व्यर्थ है। एक बेटी से आप यही उम्मीद करते हो, आश्चर्य तब होता जब बेटी खुद भी अदालत का फैसला मानती, और अपने पिता को दोषी मानती और कुछ ऐसा करती जो आपको भी आश्चर्य में डालता। खैर, इसबात का यहीं पटाक्षेप करते हैं।
बात है ब्रजभूषण सरण की। जो कहते हैं कि वो हमेशा कुलदीप सिंह सेंगर का समर्थन करेंगे।
बात है ओमप्रकाश राजभर की, जिन्हें पीड़िता पर हंसी आ रही है।
बात है दयाशंकर सिंह की, जो मानते हैं कि सेंगर को न्याय मिला है
और बात है इन मोहतरमा की
अब सवाल ये उठता है कि आखिर ये लोग समर्थन किस चीज़ का कर रहे हैं। अदालत ने कुलदीप सिंह सेंगर की सज़ा पर कोई सवाल नहीं उठाया है, ना उन्होने इस विषय में किसी तर्क को विचारणीय माना है। अदालत दिसंबर 2019 में कुलदीप सिंह सेंगर को भारतीय दंड संहिता यानी आई पी सी के बलात्कार के मामले के प्रावधान और बच्चे-बच्चियों के यौन शोषण से सुरक्षा के कानून पॉक्सो में एग्रेवेटेड पेनिटेटिव सैक्सुअल असॉल्ट यानी गंभीर यौन हिंसा के प्रावधान के तहत उम्र कै़द की सज़ा दी गई थी।
इसका मतलब ये हुआ कि अदालत ने अब भी जब सेंगर की सज़ा को निलंबित किया तो ये नहीं कहा कि उन पर आरोप ग़लत हैं। कोर्ट ने ये नहीं कहा कि उनकी सज़ा ग़लत थी या है। अब यहां इस बात पर भी ध्यान देना ज़रूरी है कि अपराधी को कोर्ट में किसी भी तरह की अपील का अधिकार है, और यहां अपराधी ने ये अपील की थी कि उन्हें जो सज़ा मिली थी वो कानूनन ज्यादा थी। कोर्ट ने इसी तकनीकी नुक्ते पर विचार किया और उनकी सज़ा को निलंबित किया ताकि उसकी सही सज़ा तय की जा सके।
इसका मतलब ये हुआ कि कोर्ट ने अपराध को कम नहीं आंका, कोर्ट ने ये नहीं कहा कि उसने अपराध नहीं किया। तब संेगर के समर्थक आखिर किस बात पर सेंगर का सपोर्ट कर रहे हैं।
ब्रजभूषण की बाइट
अब आप इसे समझिए, ये व्यक्ति कह रहा है कि वो सेंगर का समर्थन करता है। अब क्योंकि ये सिद्ध हो चुका है कि सेंगर बलात्कारी है, और एक नाबालिग लड़की से बलात्कार के आरोप के सिद्ध हो जाने के बाद सज़ा काट रहा है तो इसका सीधा मतलब ये हुआ कि ब्रजभूष्ण सरण, बलात्कार का समर्थक है, या कोर्ट का विरोधी है। दोनो ही मामलों में क्या इस नैतिक पोजीशन के बाद उसका भारतीय लोकतंत्र का किसी भी तरह का सदस्य होना संभव है। कोई संविधान जानने वाले मित्र इस बारे में प्रकाश डालें तो बेहतर होगा। दूसरी तरफ क्या किसी व्यक्ति द्वारा बलात्कार के विषय में बलात्कारी का इस तरह समर्थन करने वाले के प्रति उसकी पार्टी का क्या रुख होना चाहिए ये वो पार्टी तय करे।
अब आते हैं, ओमप्रकाश राजभर की बात पर।
ये एक अजीब बात है कि लड़की के उन्नाव रहने की बात पर इन्हें हंसी आ रही है। ये शायद किसी तरह के शॉक में हैं और समझ नहीं पा रहे हैं कि कोर्ट द्वारा बलात्कारी कुलदीप सिंह सेंगर को लड़की के घर से दूर रहने का आदेश, लड़की की सुरक्षा के लिए है। यानी कोर्ट मानता है कि कुलदीप सिंह सेंगर लड़की की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं, और इसलिए उन्हें ये निर्देश मिला है िकवे लड़की से दूर रहें। ऐसे में लड़की की आवाजाही पर, या आज़ादी पर कोई पाबंदी नहीं है, और वो कहीं भी आ जा सकती है। अब कोई राजभर जी को समझाए कि कोर्ट का ये आदेश इस देश के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देने वालों के मुहं पर तमाचा है, कि वो एक लड़की को बचा नहीं पा रहे हैं, और उसके लिए कोर्ट को आदेश देना पड़ रहा है।
तीसरे और बड़े वाले हैं, जो सज़ा के इस निलंबन को ही न्याय मान बैठे हैं।
दयाशंकर की बाइट
कोई दयाशंकर जी को जाकर समझाए कि दयाशंकर जी, कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की सज़ा माफ़ नहीं की है। वो बलात्कारी ही है, कोर्ट ने सिर्फ ये कहा है कि अगर उसने विधायक रहते हुए बलात्कार किया था तो क्या उसे लोक सेवक माना जाएगा या नहीं, इस विषय पर विचार करना है। यानी कोर्ट की नज़र में, कानून की नज़र में वो बलात्कारी ही है, इसलिए अगर आप उसका समर्थन करते हैं तो आप बलात्कार का ही समर्थन कर रहे हैं। अब जनता को फैसला करना है कि वो बलात्कार का समर्थन करने वाले व्यक्ति को कैसे देखती है।
सबसे बड़ा झटका इन त्रेहन जी के समर्थन से लगा। जो जाने किस दिमागी परेशानी की हालत में बलात्कार का समर्थन करने पहंुच गई हैं। जनाब कोई तो इन्हें बताए कि कोर्ट अब भी कुलदीप सिंह सेंगर को बलात्कारी ही मानता है, और उसकी जमानत का विरोध इसलिए हो रहा है कि जनता मानती है कि अगर वो जेल से बाहर आया तो पीड़िता की जान को खतरा है। इसलिए कोर्ट से जनता की अपील थी कि जमानत ना दी जाए। कोर्ट ने अपनी सज़ा में कह दिया कि वो गुनहगार है, यानी बलात्कारी है, हत्यारा है। अब आप बलात्कार और हत्या का समर्थन कर रही हैं।
खैर, मूर्खता की कोई सीमा नहीं होती। लेकिन वर्तमान सत्ता में जहां गुंडई ही सत्ता से नजदीकी का एकमात्र पैमाना बन जाए तो त्रेहन मैडम क्या करें? उनकी भी मजबूरी है।
जो मजबूरी मुझे समझ नहीं आई, वो थी महामानव की चुप्पी, गृहमंत्री की चुप्पी, सवाल ये है कि भारत की एक लड़की, जिसका बलात्कार हुआ, जिसके बलात्कारी आपकी अपनी पार्टी से थे, जिसे बलात्कार के आरोप मे ंसज़ा मिली, जिसे उस लड़की के पिता की हत्या के आरोप मे ंसज़ा मिली। आप उस लड़की के समर्थन में एक शब्द नहीं बोल पाए। आप उस लड़की को ये आश्वासन तक ना दे पाए कि वो सुरक्षित है। आप एक बलात्कार पीड़ित लड़की को ये संदेश तक न दे पाए कि आप उसे सुरक्षा दे सकते हैं। क्या देश की जनता को महामानव से ये सवाल नहीं पूछना चाहिए कि आखिर वो कैसे बेटी बचाओ, का नारा दे सकते हैं, जब वो अपनी ही पार्टी के सदस्य द्वारा पीड़ित एक लड़की को सुरक्षा नहीं दे सकते। क्या उनमें ये नैतिक हिम्मत है कि वे अपनी पार्टी के सदस्यों को ये कह सकें कि अगर आप उस लड़की का समर्थन नहीं कर रहे तो कम से कम बलात्कारी का, बलात्कार का समर्थन न करें। याद रखिए महामानव चुप हैं, तो ये चुप्पी बलात्कार के समर्थन में मानी जाएगी। और ये इस बलात्कार के समर्थन से भी ज्यादा खतरनाक बात है।
मुझे, पीड़िता के, भयाना के, तमाम स्त्रीवादी, प्रगतिशील संगठनों के, देश भर के नागरिकों के पीड़िता के समर्थन में शोर मचाने से बहुत फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि लोकतंत्र में ये जनता का अधिकार होता है कि यदि सत्ता का या न्यायालय का कोई फैसला उसे पसंद ना आए तो वो उसके खिलाफ सड़कों पर उतरे। यही लोकतंत्र होता है। मुझे देश की सत्ता की चुप्पी से फर्क पड़ता है, क्योंकि ये चुप्पी भारत की हर लड़की, हर महिला के लिए चेतावनी है कि तुम सुरक्षित नहीं हो, कि सत्ता की बुरी नज़र तुम पर है, कि ये सत्ता कभी भी तुम्हारे साथ कुछ भी बुरा कर सकती है। महामानव की चुप्पी तो यही कहती लगती है।
अब गंेद आपके यानी जनता के पाले में है। लोकतंत्र, न्याय, निष्पक्षता, और अधिकार तब तक सुरक्षित नहीं रह सकते जबतक जनता लगातार-लगातार विजिलेंट न रहे।
चचा हमारे यानी ग़ालिब इस बारे में कह के गए हैं।
कहां खो गए मेरे हक़ हुजूर ए वाला
ज़रा नज़र हटी कि चुरा लिए किसी ने
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
हताश थे अपने चचा शायद, उन्होने सोचा भी न होगा कि कभी उनके मुल्क को ये दिन देखना पड़ेगा कि चुने हुए प्रतिनिधि ज़िना का समर्थन करेंगे। पर ये बुरे दिन भी देखने ही थे। पर उम्मीद पे दुनिया कायम है, तो उम्मीद है कि
वो सुबह कभी तो आएगी
शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026
सेंगर को बेल
नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। सुना भई सेंगर जी को बेल मिल गई। पहले उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा हुई थी, और ये सज़ा जो उन्हें मिली थी वो इसलिए थी कि उन पर बलात्कार और फिर पीड़िता के पूरे परिवार का सफाया करने के आरोप सिद्ध हुए थे।
कुछ लोग कह रहे हैं कि अगर हम कोर्ट के इस आदेश को स्वीकार करते हैं कि उसने सज़ा दी तो हमें कोर्ट के इस आदेश को भी स्वीकार करना चाहिए। मेरा तो ये कहना है जनाब कि माननीय सेंगर जी को दी गई सज़ा का विरोध करना चाहिए और ये स्वीकार करना चाहिए कि बेल उनका अधिकार था, बेल ही क्यों मेरा तो कहना है कि सिर्फ एक महिला के कहने पर, या मान लीजिए आरोप लगाने पर, जनता द्वारा चुने गए एक संसद सदस्य को यू ंसज़ा देना ही ग़लत है। पुलिस को इन महिलाओं को, जिन्होने माननीय सेंगर जी पर आरोप लगाया, और उनके समर्थन में जो आए उसे भी घसीट कर जेल में डाल देना चाहिए।
आसाराम को बेल मिली, रामरहीम को लगातार और जितनी वो चाहें बेल मिलती रहती है, तो फिर ये बताओ कि माननीय संेगर जी को बेल क्यों ना मिले। क्या तुमने उन्हें भी ये क्या कहते हैं, उमर खालिद, शारजील इमाम जैसा ही समझते हो क्या? अबे ये लोग कोई राष्ट विरोधी काम थोड़े ही कर रहे हैं कि इन्हें बेल नहीं दी जाएगी, ये कोई सोनम वांगचुक की तरह का काम थोड़े ही कर रहे हैं कि बिना कोई मुकद्मा चलाए इन्हें महीनों जेल में रखा जाएगा।
सेंगर, समझ रहे हो, कुलदीप सिंह सेंगर, अबे नाम ही काफी है। कोर्ट का कहना है कि माननीय संेगर जी के लिए जो कहा जा रहा है कि पुलिस और कानून के रक्षक उनके कहने पर कुछ ग़लत करेंगे तो कोर्ट ये नहीं मान सकता कि कानून के रखवाले, माननीय के कहने पर ऐसा कुछ करेंगे। बिल्कुल सही बात है, बताइए इसमें कुछ ग़लत हो तो? लड़की को एक साल लगा माननीय के खिलाफ शिकायत करने में, ये कोई बात हुई भला। कानून के रखवालों ने बहुत समझाया कि मान जा, मत अपनी जिंदगी खराब कर। हो गया सो हो गया समझ कर खैर मना। अपने घर जा। लेकिन ये लड़की बहुत ढीठ निकली। 2017 में घटना हुई, 2018 में जाकर उसके आरोप पत्र दायर हुए। फिर भी पुलिस वाले लगातार लड़की को, उसके रिश्तेदारों को बचाने में लगे रहे।
लेकिन लड़की और उसके परिवार वालों ने हद ही कर दी। उन्होने माननीय कुलटीप सिंह सेंगर पर आरोप लगाते हुए खुद अजय सिंह बिष्ट के पास एक लेटर भेज दिया। भई पुलिस ने कोशिश की कि लड़की का पिता ही बात को सही से समझ ले, इसलिए उसे समझाने के लिए, गौर कीजिएगा, समझाने-बुझाने के लिए, परिवार की इज्जत की बात थी, इसलिए संस्कारी पुलिस ने इसे भारतीय संस्कारों के अनुरूप समझा कि लड़की के बाप को समझाने-बुझाने के लिए थाने बुलाया। पर बाप कमजोर निकला और इस समझाने-बुझाने के दौर में ही उसने दम तोड़ दिया। ऐसे में पुलिस पर ये आरोप लगाना कि पुलिस ने माननीय कुलदीप सिंह सेंगर की हत्या कर दी, बहुत ही बचकाना बात है।
खैर, माननीय कुलदीप सिंह सेंगर फिर भी अपनी पर अड़े रहे, और इसके बाद उन्होने एक और कोशिश की, लड़की और उसके परिवार वालों को ये समझाने की, कि जो हो गया, उसे भूल जाएं और बेकार के इस विवाद को बंद करें। लेकिन लड़की एक वकील के झांसे में आ गई थी, जिसने शायद उसे ये बताया हो कि भारत का कानून निष्पक्ष होता है, और कानून सबके लिए बराबर होता है, और शायद ये भी समझाया हो कि कानून से उसे न्याय मिलेगा। अब लड़की नाबालिग थी, वकील की बातों में आ गई। फिर एक टक आया उसे ये समझाने की इस बेकार की अफरा-तफरी में कुछ नहीं रखा। लेकिन इस बार भी समझाने-बुझाने में उसकी दो मौसियां और खुद वकील साहब निपट गए।
सोचा था कि अब लड़की को समझ आ जाएगा कि बेकार माननीय कुलदीप सिंह सेंगर साहब पर व्यर्थ के आरोप लगाने का कोई फायदा नहीं है। लेकिन लडकी ना मानी। अब पुलिस ने तो अपना काम मुस्तैदी से किया, कोर्ट बिचारे के पास कोई रास्ता नहीं बचा था। उसे माननीय कुलदीप सिंह संेगर को सज़ा देनी पड़ी।
लेकिन बेजीपी के घर में देर हो सकती है, अंधेर नहीं। एक भाजपा एम एल ए को बलात्कार के आरोप मे ंसज़ा हो जाए, ये तो इस अभी 2014 में ताज़ा-ताज़ा आज़ाद हुए भारत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ये वो भारत है, जहां एक गर्भवती महिला का खुली सड़क पर गैंगरेप करने वालों की सज़ा ये कहकर माफ की जाती है कि वो खासे संस्कारी लोग हैं। जहां गुफा में बलात्कार करने और फिर लड़की के परिवार वालों की हत्या करने वाले, पिताजी, कहलाने वाले बाबा, राम-रहीम जेल से कम रिसॅार्ट में अपनी सज़ा काटते हैं, जहां बलात्कारी आसाराम के साथ खुद महामानव नाचते हैं।
ऐसे में माननीय कुलदीप सिंह सेंगर को, एक अदना लड़की से बलात्कार के लिए जेल मे ंतो नहीं रहने दिया जा सकता था। इसलिए आखिरकार संस्कार की जीत हुई, और अदालत ने एक तकनीकी पंेच निकाल ही लिया, जिसके तहत उन्हें अंततः बेल दी गई।
तो अंततः माननीय कुलदीप सिंह सेंगर को न्याय मिला, थोड़ा देर से मिला तो भी क्या हुआ। आखिर कोर्ट के इस फैसले से पुलिस वालों के हौसले बुलंद हुए। भाजपा के अन्य कुलदीपकों को ये संदेश गया कि आखिरकार उन्हें भी माननीय कुलदीप सिंह सेंगर की तरह, पहले पुलिस और अंततः अदालत साफ बचा ले जाएंगी। धन्य है भारतीय पुलिस, और न्यायालय, जिन्होने न्याय की इस लौ को बुझने नहीं दिया है। जब माननीय कुलदीप सिंह जी बाहर आएंगे तो फूलमालाओं से उनका स्वागत किया जाएगा, क्योंकि वो विजेता हैं।
दूसरी तरफ सेंगर को, पुलिस को, और न्यायालय को चुनौती देने वाली महिला और उनके समर्थकों को मौके पर ही उनके किए की सज़ा दे दी गई।
कुल मिलाकर बात ये है मितरों कि ये लोग कितना ही शोर मचा लें, बलात्कार जैसी छोटी-मोटी चीजों के लिए भाजपा के किसी संस्कारी कुलदीपक, जैसे कुलदीप सिंह संेगर को जेल में नही रखा जा सकता, नहीं रखा जाना चाहिए। बल्कि मैं तो कहता हूं कि कुलदीप सिंह सेंगर पर आरोप लगाने वाली लड़की को, कटघरे में खड़ा करना चाहिए। मेरे भक्त मितरों आपको फौरन अपनी यूज़ुअल ड्यूटी पर लग जाना चाहिए। यही मौका है कि हम महामानव के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन करने का, यही मौका है खुद को संस्कारी साबित करने का, यही मौका है अपने धर्म के प्रति अपनी निष्ठा दिखाने का।
आज इन तथाकथित वामपंथियों की इतनी मजाल हो चुकी है कि, ये एक बलत्कृत लड़की को साथ लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, इनका कोई भरोसा नहीं है, ये लोग इंडिया गेट पर, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने लगेंगे। याद रखिए दोस्तों, आसाराम हों कि प्रज्जवल रेवन्ना हों, हमारे महामानव ने हमेशा ही बलात्कारियों का समर्थन किया है।
अगर हमें महामानव की नज़रों में आना है तो हमें, भी ऐसा ही बनना पडे़गा। जहां तक संभव हो, महिला का मज़ाक उड़ाइए। उसकी पीड़ा पर हंसिए, यही हमें सिखाया गया है।
ये भारत की जनता को क्या हो गया है, जहां संस्कारों के लिए, परिवार की इज्जत के लिए, महिलाएं बलात्कार को रिपोर्ट तक नहीं करती थीं, अब वो उंचे पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखवा रही हैं। चाहे वो पूज्यनीय धार्मिक बाबा हों, या चुनाव जीत कर मंत्री बने हुए लोग हों, इन लड़कियों की हिम्मत कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। पुलिस इनके परिवार के सदस्यों की हत्या कर देती है, इनके समर्थन में आने वाली लड़कियों को सोशल मीडिया पर टोल किया जाता है, लेकिन ये मा नही नहीं रही हैं। अब ये मौका आया है कि इनकी आवाज़ का खामोश कर दिया जाए। याद रखिए अगर उन्नाव पीड़िता को न्याय मिल गया, तो इनके हौसले बढ़ जाएंगे। कोर्ट ने हमें ये मौका दिया है कि ये दिखा दिया जाए कि कानून पीड़ित के पक्ष में हो तो भी कोई ना कोई तकनीकी कमी निकाल कर बलात्कारी को राहत दी जा सकती है। अब हमारा काम है कि इस लड़की को न्याय ना मिले, बाकी आपकी मर्जी।
ग़्ाालिब जो चचा कहलाते हैं, उन्होने इस मामले से खुद को दूर ही रखा है। लेकिन पूज्यनीय आसाराम जिन्हें बलात्कार के आरोप मे ंसज़ा झेलनी पड़ी, और बाद में उन्हें भी कोर्ट ने राहत दे ही दी, उनका कहना था।
अब आप कहेंगे, कपिल भाई, आसाराम क्यों? भई काफी रसिक रहे आसाराम, और अब तो जेल से बाहर हैं, आनंद कर रहे हैं, तो सोचा इस मामले में उनके विचार ज्यादा बेहतर लगेंगे। बाकी जल्द ही सभी बलात्कारी बाहर होंगे। जय हो भारत के कोर्ट और जजों की। नमस्कार।
बुधवार, 25 फ़रवरी 2026
अरावली - कहां चली
नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। लो भई, और कुछ नहीं मिला तो लगे ये प्रगतिशील शोर मचाने अरावली की पहाड़ियों के बारे में। महामानव ने एक नई सोच को जाग्रत करते हुए कहा कि भैया जो पहाड़ सौ मीटर या उससे नीचा होगा, यानी जिसकी उंचाई सौ मीटर तक नहीं पहुंचेगी उसे पहाड़ नहीं माना जाएगा। भई वाह, वाह भई वाह, क्या ही शानदार सोच है महामानव की। यानी जो सौ मीटर का नहीं है वो पहाड़ नहीं है।
ये जो लोग शोर मचा रहे हैं कि अरावली खतम हो जाएगी, अरावली खतम हो जाएगी। वो महामानव के विज़न को नहीं देख पा रहे हैं। अरे तुम ग़रीब लोग, तुमने देखा ही क्या है। अगर हम दुनिया के नंबर वन देश बनना चाहते हैं, तो हमें कुछ सैक्रीफाइस तो करना ही पड़ेगा। ये सैक्रीफाइस ही है देश को दुनिया का नंबर वन देश बनाएगा, विश्वगुरु बनने के तिराहे पर तो हम खड़े ही हैं, अब हमें दुनिया का सबसे बढ़िया देश बनना है।
अब तुम देखोगे कि हम ये कैसे करें। इसके लिए हमें बहुत सारे बोल्ड कदम उठाने पड़ेंगे, बहुत सारे। तो सबसे पहले तो ये सोचो कि तुमने देखा होगा कि कैसे दुबई के, सउदी अरब के देश अमीर हैं, उनके यहां अमीर लोगों के पास तेल के भंडार हैं, तेल कहां से मिलता है, रेतीले रेगिस्तान से। रेत के रेगिस्तान में होती है, देश में रेगिस्तान बहुत कम है। इसलिए अरावली को हटाने की योजना है। अरावली को हटाने से रेगिस्तान फैल जाएगा, दूर-दूर तक रेगिस्तान फैल जाएगा। फिर सारी दुनिया के लोग रेगिस्तान के मज़े लेने के लिए हमारे देश में आया करेंगे। क्या ही कमाल होगा। आज जैसे मिडल ईस्ट के रेगिस्तान की वीडियो और फोटो हर जगह दिखाई देती हैं, वैसे दिल्ली की फोटो और वीडियो दिखेंगे। रेगिस्तान होने की वजह से सउदी अरब इतना इतराता है, अब महामानव की वजह से हम भी इतना ही इतराया करेंगे। हम उन्हें दिखा देंगे कि हम भी रेगिस्तान बना सकते हैं।
दोस्तों इस रेगिस्तान के कितने फायदे हैं आप नहीं जानते। रेगिस्तान बनेगा तो क्या पता अपने यहां भी तेल के भंडार मिल जाएं। फिर उन तेल के कुआंे को अडानी, अम्बानी मैनेज करेंगे और हमारे आपके जैसे लोगों को नौकरियां मिलेंगी। फिर हमारे देश के लोगों को नौकरी के लिए सउदी अरब नहीं जाना पड़ेगा, बल्कि बाकी देशों के लोग हमारे देश में आकर नौकरी करेंगे। फिर देखना हमारा रुपया डॉलर से भी उपर हो जाएगा। अभी जो लोग रुपये की गिरावट पर शोर मचा रहे हैं, उन्हें तब पता चलेगा कि हमारा रुपया क्या कमाल दिखा सकता है।
और तुम्हें क्या लग रहा है कि ये जो महामानव अरावली के पहाड़ों को काटेंगे तो उनका क्या करेंगे। अरे उनसे अपने देश में हम भी बुर्ज-खलीफा जैसी गगनचुंबी इमारते बनाएंगे। बुर्ज खलीफा 828 मीटर की है, तो हम 1000 मीटर उंची इमारत बनाएंगे और उसका नाम राम की लाट रखेंगे। राम की लाट बनाने के लिए दोस्तों अरावली का कटना जरूरी है, क्योंकि अरावली खतम होगी, तो ही रेगिस्तान फैलेगा, रेगिस्तान फैलेगा, तो हमें तेल मिलेगा, तेल मिलेगा तो पैसा आएगा, और तब उसी पैसे से हम राम की लाट जैसी बिल्डिंग बना पाएंगे। इसीलिए मुझे महामानव पसंद हैं उनकी सोच जो है, वो कोई आम सोच नहीं है, बल्कि दूरदृष्टि है, दूर भी नहीं, भैया उनकी बहुतदूरदृष्टि है।
अरावली के खतम होने का दूसरा फायदा हमें ये होगा कि अभी दिल्ली में बहुत गर्मी पड़ती है, और बहुत ज्यादा सर्दी पड़ती है। दिल्ली के मौसम पर अरावली का, हिमालय का, और भी पहाड़ों का बहुत असर होता है, सभी जगह होता है। हम पहाड़ों के इस असर को खतम कर देंगे, दिल्ली में, और पूरे देश मे ंहम मौसम का एक ही तौर रखेंगे, गर्मी तो गर्मी, सर्दी तो सर्दी। अभी आप लोग दिल्ली में पानी की कमी से जूझ रहे हो, तब ऐसा नहीं होगा, होगा ये कि हिमालय में जो बर्फ पिघल रही है, वो पानी आपके पास आएगा, दूसरी तरफ रेगिस्तान के चलते, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और बहुत सारे उत्तर प्रदेश के खेत बंजर हो जाएंगे। इससे दिल्ली जो देश की राजधानी है उसमें भरपूर पानी होगा, इतना पानी होगा कि तुम्हें कभी पानी की कमी महसूस नहीं होगी।
ये जो लोग अभी अरावली के खतम होने का मातम मना रहे हैं, आप उनकी तरफ मत देखो। ये वो लोग हैं तो कभी विकास को नहीं पहचान पाते, इन्हें हमेशा किसानों की, मजदूरों की, ग़रीबों की पड़ी रहती है। महामानव को देखो, उनकी तरह सोचना सीखो, ज़रा सोचो क्या महामानव ने कभी ग़रीबों के बारे मे ंसोचा है। अगर महामानव कभी किसानों, दलितों, आदिवासियों के बारे में सोचते, तो क्या कभी अडानी और अम्बानी दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूचि में अपनी जगह बना सकते थे। नहीं? इसलिए ग़रीबों के बारे में सोचना छोड़ो, तुम तो ये सोचो कि देश को अमीर कैसे बनया जा सकता है।
ये जो लोग अरावली को खतम नहीं करना चाहते वो देश को अमीर नहीं बनने देना चाहते, हमारे प्रिय एंकर अद्भुत मेघा से हमें बता रहे हैं कि ये जो दिल्ली का प्रदूषण है वो अरावली की वजह से ही है और अरावली खतम होने से वो प्रदूषण भी खतम हो जाएगा। अरावली खतम होने से समझिए क्या-क्या खतम हो जाएगा। ग़रीबी, प्रदूषण, बेचारगी, कमजोरी, घात, सुन्नापन, टेढ़ापन और अन्य विशेष बिमारियों का इलाज भी अरावली खतम होने से हो जाएगा।
दरअसल, नेहरु ने जानबूझ कर दिल्ली को कटोरी से नहीं निकाला था, ये उनकी भूल थी, ग़लती थी, साजिश थी, लेकिन अब जबकि हमारे पास एक नॉनबॉयोलोजिकल महामानव है तो ये काम भी कर ही डाला जाए। पूरी अरावली खतम करने के लिए जिस तरह की हिम्मत और जिगरा चाहिए, वो नेहरु के पास नहीं था, महामानव के पास है, इसलिए इस काम को वही करेंगे।
और एक विशेष बात पर चर्चा करना तो मैं भूल ही गया। देश की सुरक्षा। देश की सुरक्षा बहुत जरूरी है मितरों। और इस देश की सुरक्षा में सबसे बड़ी अड़चन ये अरावली ही तो है। अरावली होने के चलते, हमें दिल्ली से सीधा पाकिस्तान बॉर्डर नहीं दिखाई देता। एक बार अरावली खतम हो जाए तो हम दिल्ली में भी स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी जैसा ही एक और स्टैच्यू बनाएंगे, फिर उस स्टैच्यू की आंख से सीधे पाकिस्तान दिखाई देगा, और जैसे ही हम देखेंगे कि पाकिस्तान कोई ग़लत हरक़त कर रहा है, सीधे उस पर हमला कर दिया जाएगा। फिर हमें राडार से छुपने के लिए खराब मौसम या बादलों की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, क्योंकि दुश्मन सीधे हमारी आंख की सीध में होगा। अभी क्या होता है ना, कि पहलगाम, या पुलवामा जैसा कायराना हमला पाकिस्तान कर ले जाता है, अब नही ंकर पाएगा। बढ़िया हो गया।
तो कुल मिलाकर मामला सीधा बनता है साहब। वो लोग जो देश को दू......रदृष्टि से देख रहे हैं, वो तो कर रहे हैं अरावली को खतम करने की हिमायत, और जो भाई लोग इसे ग़लत बता रहे हैं, विनकी नज़र थोड़ा पास की है, यानी कमज़ोर है। अब ये जो मजदूर-किसान वगैरह हैं, वो कमज़ोर ही होते हैं, मै बताउं आपको, इनकी बात वैसे भी मानी नहीं जाती। महामानव ने डिसाइड कर लिया, सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी, एन जी टी तीर्थ यात्रा पर है।
तो जल्द ही मेरे दोस्तों, जब अरावली खतम हो जाएगी तो हम भी रेत के टीलों पर रात को बोनफायर में ग़रीबों और आदिवासियों का नाच देख सकेंगे, इसके सपने आप लेते रहें।
बाकी, चचा जो थे हमारे, यानी ग़ालिब, उन्होने कलकत्ते और नखलउ पर शेर लिखे, दिल्ली पर उनके जानकार कहते हैं कि शेर ना लिखे ग़ालिब ने, लेकिन ऐसा वही कहते हैं, तो जानते नहीं थे, ग़ालिब को, या उतना क़रीब से नहीं जानते थे, जितना क़रीब से मैं उन्हें जानता था। तो अरावली पर एक शेर उन्होने लिखा था। वो कुछ यूं था शेर कि....
तेरे पहाड़ नीचे, मेरे पहाड़ उंचे
तेरी ज़मीं चुरा के, मैं आसमा बना लूं
तू रहेगा 100 के नीचे, मैं रहूंगा उसके उपर
तू कुछ भी कह ले भैया, मैं खत्म कर ये डालूं
ग़ालिब, ग़ालिब थे, कुछ भी कह सकते थे, आप ध्यान रखिए ज़रा, आजकल वैसे भी राष्टद्रोही होने की रवायत चली हुई है, कहीं आप ना हो जाना।
भव्य स्वागत - भयानक स्वागत
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