नमस्कार। मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। दोस्तों ये कोई बात ना हुई कि देश में कोई नॉनबायोलॉजिकल, ईश्वरीय अवतार पैदा हो, बचपन में चमत्कार करे, किशोरावस्था में चाय बेचे, घर छोड़े, और बुर्जुगियत में छप्पन इंची छाती के साथ इतिहास में पहली बार देश की डोरबाग अपनी कलाई पर बांध ले और लोगबाग उस चमत्कारिक मोड़ का नाम तक न लें जिसने इस देश के इतिहास का बदल कर रख दिया। देश का क्या कहें दुनिया का इतिहास बदल कर रख दिया। हालांकि कई लोगों ने इस बदले हुए इतिहास को अपने शब्दों में बयां करने की कोशिश की है।
ये सारी बातें उस वक्त की हैं जब महामानव स्वयंसिद्ध हो चुके थे, यानी खुद ही तीसमारखां बन चुके थे। उनके अपने शब्दों में कहें तो
मेरा फोटोजेनिक है
मै पहला ऐसा प्रधान मंत्री हूं
मेरा सिर्फ ये कहना है कि खुद ही खुद को बयां करता है, महामानव क्या क्यां करता हैं। आप मेरी तरफ ध्यान रखिए। मेरा कहना है कि एक साधारण मगरमच्छ पकड़ने वाले से नॉनबायोलॉजिकल महामानव के इस सफर में वो एक मोड़ कौन सा था, जिसने इस पूरी दास्तान को ही बदल दिया। वो मोड़ था जब महामानव ने घर छोड़ा।

जब भी दुनिया में घर छोड़ने वालों की बात होगी, तो ये वाला घरछुड़ाव अन्य सभी घर छोड़ने वालों पर भारी पड़ेगा। क्योंकि महत्वपूर्ण ये नहीं है कि महामानव ने घर छोड़ने के बाद क्या किया। महत्वपूर्ण ये है कि महामानव ने घर छोड़ा, घर छोड़ना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि महामानव ने सिर्फ घर नहीं छोड़ा, घर के साथ जुड़ी बाकी चीजें भी छोड़ दीं।
दोस्तों जब व्यक्ति घर छोड़ता है तो क्या घर भी व्यक्ति को छोड़ देता है। इसका जवाब दर्शन में मिलेगा या आध्यात्म में मिलेगा। दरअसल घर को अक्सर माया कहा गया है, मोह और माया। घर से मोह होता है, क्योंकि घर माया होता है, इसलिए हे बालक घर छोड़ के जाने वाले को भगौड़ा नहीं कहते, भागौड़ा उसे कहा जाता है जो घर से भागा हो, भागने और छोड़ने में बहुत सूक्ष्म अंतर होता है, ये वही अंतर होता है, जिसे ओंकारा फिलिम में सैफ अली खान यानी लंगड़ा त्यागी ने रज्जू यानी दीपक डोबरियाल को समझाया था। यानी धागे के इंगे घर छोडने वाला होता है, और उंगे घर से भागने वाला होता है। और जो धागा हैंच लो तो कौण है भागने वाला और कौण है घर छोड़ने वाला।
तो करोड़ रुपये का प्रसन ये है भक्तों कि महामानव ने घर छोड़ा था, या घर से भागे थे। ये मेरा स्टेटमेंट नहीं है, ये दरअसल करोड़ रुपये का प्रसन है, जिसके जवाब पर करोड़ रुपये नहीं मिलने वाले हैं। इसलिए आपको ये करोड़ रुपये जीतने का मौका न देते हुए आज इसी प्रसन पर विचार करेंगे। कि घर से भागने में और घर छोड़ने में क्या फरक होता हैगा।
घर से भागने वाला दरअसल सरम से, चोरी से, और कभी -कभी अपराध बोध से भी घर से भागता है। भई इसमें विद्वानों के मत भिन्न हैं, कोई कहता है कि अगर परिवार के हितों के खिलाफ कोई काम करो तो घर से भागना पड़ता है, किसी का कहना है कि यदि परिवार की जमा-जोत को चुरा कर जुए में, शराबखोरी में, या ऐसे ही किसी चरित्रहीन काम में गवां दो तो भी घर से भागना पड़ता है, एक और मंझे हुए विद्वान ने कहा कि यदि बीवी से ना बनती हो, या बीवी रखनेे की सकत ना हो तो भी आमतौर पर व्यक्ति घर से भाग जाता है।
क्या आपने कभी ऐसी कोई अफवाह सुनी है कि कोई घर से भागते हुए अपनी बेचारी, ग़रीब, मां के गहने लेकर भागा था, और उसने वो गहने चुरा कर बेच दिए थे। क्यों बेच दिए थे, किसे बेच दिए थे, कहां बेच दिए थे, और कितने में बेचे थे, जैसे सवाल बेकार हैं, क्योंकि ये उस व्यक्ति का निजी मामला था और है, और हम यहां निजी मामलों पर विचार नही ंकर रहे हैं। हम सिर्फ घर से भागने पर विचार कर रहे हैं।
पर बात फिर घूम-फिर कर वहीं आ जाती है। क्या ये व्यक्ति वो है जिसकी बात हम नही ंकर रहे हैं, हैरी पॉटर वाली किताब की तरह, यू नो हू, की बात कर रहे हैं। उसके अधिकार में सारी काली शक्तियां हैं, वो डार्क आर्टस् का स्वामी है, जो खुद को ईश्वर बनाने पर तुला हुआ है। यानी घर से भागने वाला अपनी पत्नि को छोड़ कर भागता है, यानी उससे शादी करता है और फिर बिना उसे तलाक दिए, बहुत ही कायराना तरीके से उसे छोड़ कर घर से ही भाग जाता है ताकि उसे घर की जिम्मेदारियों का सामना ना करना पड़े। अपनी कायरता छिपाने के लिए यू नो हू किसी को बताता भी नहीं कि उसकी एक ब्याहता बीवी है, जिसे वो बेशर्मी से छोड़ आया है। खैर ये भी किसी का बहुत ही निजी मामला हो सकता है और हमें कोई चाव नहीं है किसी की निजी ज़िंदगी के बखिए उधेड़ने की और इसलिए हम इस पर बात न ही करें तो अच्छा है।
इसके अलावा, जुआ खेलने, चोरी करने, या कोई और काम करने के भी कोई रिकॉर्ड न मिलें हों तो उनके बारे में बात करने का भी कोई औचित्य नहीं है। हालांकि घर से भागने वाले अक्सर यही सब करने के बाद, या करते हुए घर छोड़ते हैं। और ठीक इसी वजह से वो इसी तरह की प्रवृति में लिप्त होते हैं। जैसे सब कुछ चोरी करना, सबकुछ बेच देना, बेशर्मी से झूठ बोलना, आत्ममुग्धता और आत्मप्रशंसा की प्रवृति भी ऐसे लोगों में देखी जाती है। यदि आप ऐसे किसी व्यक्ति से मिलें तो सावधान रहें, ये बहुत ही चतुर या कहें कि धूर्त होते हैं, और सिर्फ अपना फायदा देखते हैं। इनसे किसी भी तरह के नैतिक व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती।
जबकि घर छोड़ना बिल्कुल ही जुदा बात होती है। घर छोड़ने में व्यक्ति की मजबूरी नहीं बल्कि उसकी इच्छा काम करती है। इतिहास और भूगोल दोनो में ही अनेकों व्यक्तियों ने घर छोड़ा, घर छोड़ कर उन्होने इतिहास और भूगोल बदलने जैसे कई काम किए। इसीलिए घर छोड़ने वाले जब घर छोड़ कर जाते हैं, तो अक्सर दुनिया की सैर पर निकल जाते हैं। कहा जाता है घर का खूंटा छूटा, तो छान ले पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा। वैसे भी इस फानी दुनिया का पता नहीं कब क्या हो जाए।
घर छोड़ने वाले घर छोड़ने के बाद अक्सर बहुत महान काम करते हैं। वे जब घर छोड़ते हैं, तो ज्ञान की तलाश में जाते हैं, ज्ञान पाते हैं, और ज्ञान पाकर पूरी दुनिया में ज्ञान का परकास फैला देते हैं। पर हमारा प्रसन तो भगतों अब भी वहीं का वहीं लटका है। हालांकि कुछ परकास अपने ज्ञान से हमने इस सवाल पर डाला है। लेकिन इस मामले में एक चोट ये होती है कि अक्सर घर से भागने वाले खुद का घर छोड़ने वाला बताने लगते हैं। ये जो ऐसा बताने वाले होते हैं, ये तरह - तरह के भेस बनाते हैं, तरह-तरह की बातें बनाते हैं, तमाम तरह के स्वांग रचा कर ऐसे-ऐसे नाटक करते हैं कि भोला-भाला इंसान धोखा खा जाता है, और उनका अंधभक्त बन जाता है। और यही इन्हें खतरनाक बना देता है।
घर छोड़ने वाले का ढांेग करने वाले, घरभगौड़ों से बचें, इनकी सर्वकालिक पहचान रही है, घर से भागने के बाद घर छोड़ने का प्रचार करना, अपने त्याग की झूठी कहानियां प्रचारित करना, अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटना, और खूब विलासिता से जीना। अरे मेरे यार, घर छोड़ने वाला विलासिता नहीं करता, खुद अपना प्रचार नहीं करता, अपने मुहं मियां मिठ्ठू नहीं बनता।
खैर मेरे इतना बताने पर भी अगर आपकी आंखों की झांई ना उतरे तो उसमें मेरा कोई दोष नहीं। कहा भी गया है, बताने वाले को नहीं दोष मेरे भाई। तो इसी कहावत के अनुसार, कम बताए को ज्यादा समझो और अपनी आंखों की पट्टी उतारो, घर छोड़ने वाले और घर से भागने वाले में फरक करो। क्योंकि ये करोड़ रुपये का प्रसन है।
बाकी चचा जो थे हमारे, कभी घर ना छोड़े, भागने का तो मामला ही पैदा नहीं होता। कहते थे
न जा कहीं घर छोड़ के ग़ालिब,
कहीं लोग भगौड़ा ना समझ लें
खुद ही से खुदा बन बैठा बदतमीज़
कहीं लोग तुझे मूरख ना समझ लें
बहुत साफ थे चचा अपने इस मामले में, उन्हें पता था कि घर से भागने में और घर छोड़ने में क्या अंतर है। सवाल ये है कि क्या आपको पता है। अपना जवाब कमेंटस् में ज़रूर लिख भेजिएगा, और ध्यान रखिएगा, ये वीडियो ही हू मस्ट नॉट बी नेम्ड के बारे में है। बाकी आपकी मर्जी।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें