शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

राहुल गांधी के नाम एक और खुला पत्र

 



नमस्कार। मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। सुना कुछ पौने दो सौ, एमिनेंट पर्सनैलिटीज़ ने राहुल गांधी के नाम खुला पत्र लिखा है। इस अकेले एक वाक्य में बहुत सारे स्टेटमेंट हैं। पहला तो आप यही देखिए कि राहुल गांधी के नाम खुला पत्र लिखने वाले लगभग तीन सौ लोग जमा हो गए, हालांकि ये कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि चमत्कार से एक दो सीढ़ी नीचे भी नहीं है। देश में लगभग पौने दो अरब की आबादी है, बस अंदाजा आप लगा लीजिए। दूसरे ये एमिनेंट पर्सनैलिटीज़ क्या होती हैं जी। एमिनेंट पर्सनैलिटीज़ का पैमाना क्या होता है, ये कोई सरकारी तमगा है, कोई पद है, या कोई ऐसी डिग्री है जैसी दिल्ली यूनिवर्सिटी से निकल रही हैं और फिर छुप जा रही हैं। इस देश का हर नागरिक एमिनेंट पर्सनैलिटी है। ऐसा इस देश का संविधान कहता है, किसी में कोई खास सुर्खाब के पर लगे हों जो मुझे ना दिखाई दिए हों तो बताना यार। तीसरे ये पत्र में खुल का जो विशेषण है वो क्यों लगाया गया है, क्योंकि ये पत्र राहुल गांधी के नाम तो नहीं ही है, पत्र तो किसी के लिए लिखा जाता है। ये पत्र की जगह एक ओपीनियन पीस है, आपकी एक राजनीतिक ओपीनियन हो ही सकती है, किसी को ये पत्र संबोधित नहीं कर रहा, किसी से प्रेम, शिकायत नहीं दिखा रहा। तो ये पत्र राहुल गांधी के नाम क्योंकर हुआ जी। कोई बताए मुझे। मुझे तो ये पूरा लेख पढ़ कर कुछ चीजें लगीं, 



  • पहला ये कोई खास अच्छा लेख नहीं है, इसे पत्र तो खैर कहा ही नहीं जा सकता।
  • दूसरा इसे लिखने वाले या लिखने वालों की राजनीतिक समझ थोड़ी कम है।
  • तीसरे ये पत्र ठहराव और समझदारी से ज्यादा फ्रस्टेशन निकालने के लिए लिखा गया एक लेख लगता है।
  • चौथे पत्र लिखने वाले खुद को डिफेंडर मान बैठे हैं और बाकी देश की तमाम जनता उनके नज़दीक गब्दू हैं जो कुछ समझ-बूझ नहीं पा रहे हैं।
  • पांचवा राहुल गांधी को पत्र की जगह इसे राहुल गांधी के खिलाफ, इलैक्शन कमीशन की प्रशंसा में या रक्षा में, वर्तमान सरकार की चापलूसी में लिखा गया पत्र कहना ज्यादा बेहतर होगा।

मुझे लगता है कि हमें यानी इस देश के नागरिकों को, खासतौर पर उन नागरिकों को जो राहुल गांधी की बात से सहमत हैं, और जिन्हें लगता है कि लोकतंत्र में सवाल पूछने का, सवाल उठाने का, और जवाब पाने के लिए ज़िद करने का अधिकार हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, उन्हे राहुल गांधी के नाम एक पत्र लिखना चाहिए। 

मैं आपके सामने एक मसौदा रख रहा हूं, अगर आप इससे सहमत हों, तो कृप्या इसे देश के आम नागरिकों का राहुल गांधी को पत्र समझिए और इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाइए, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे या ऐसे पत्र सीधे राहुल गांधी को लिखें और इस देश के आम जन को ये हौसला दें कि उसे सरकार से और तमान संस्थाओं से सवाल करने और जवाब हासिल करने का अधिकार है, ना ही सरकार, ना न्यायालय, ना कोई और संवैधानिक संस्था नागरिकों और नागरिक अधिकारों से उपर है और ना हो सकती है। 

प्रिय राहुल गांधी जी।

हम भारत के लोग, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथ-निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य मानते हैं। संविधान की इस प्रस्तावना के अनुसार इस संविधान को हमने अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया है। इसलिए हम ये मानते हैं कि भारत के संविधान में उसके आम नागरिक उसकी सबसे बड़ी ताकत और सबसे प्रख्यात शख्सियत हैं। इसलिए हम आपको ये पत्र भेज रहे हैं। 

आपने पिछले कुछ दिनों में लोकतंत्र और संविधान की रक्षार्थ जो सवाल उठाए हैं, देश की सरकार और संस्थाओं को नगारिकों के प्रति जवाबदेह बनाने की मुहिम शुरु की है वो काबिले तारीफ है, और इस मुहिम के लिए हम आपका अभिवादन करते हैं। हम जानते हैं कि पिछले कुछ सालों में भारत में लोकतंत्र पर हमले बढ़े हैं, और अब सरकार से सवाल करना लगातार खतरनाक होता जा रहा है। देश की संवैधानिक व ग़ैर संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार सरकार के पक्ष में करने के लिए उन पर दबाव बनाया जा रहा है, मीडिया संस्थानों का व्यवहार जो पहले से ही संतोषजनक नहीं था, उसे बिल्कुल की खराब कर दिया गया है। आज देश की साख, देश की मीडिया की साख पूरी दुनिया में लगातार गिर रही है, लोगों का लोकतंत्र की निष्पक्षता और न्याय के सम्मुख समानता के अधिकार पर से लगातार विश्वास उठता जा रहा है। पूरा देश लगातार एक आपदा के शिकंजे में दिखाया जा रहा है, और लगातार ये कोशिश की जा रही है कि देश के लोकतंत्र को कमज़ोर करके किसी खास व्यक्ति को इसके तारणहार के तौर पर प्रोजेक्ट किया जाए। हम मानते हैं कि ये जो डर का माहौल बनाया जा रहा है, ये लोकतंत्र के लिए, और नागरिक अधिकारों के लिए खतरा है।

पिछले दिनों चुनाव आयोग के कार्य पर जिस तरह के अकाट्य सबूतों के साथ आपने अपनी बात रखी और चुनाव आयोग को ये अवसर दिया कि वो भारतीय जनता के सामने, भारतीय लोकतंत्र और चुनावों के प्रति अपने कार्यशैली की पारदर्शिता और निष्पक्षता को साबित करे, ये भारतीय लोकतंत्र, भारतीय संविधान और भारत की जनता के प्रति आपके कर्तव्य के पालन की एक मिसाल है, और इसके लिए हम आपका अभिवादन करते हैं, और आपको ये विश्वास दिलाते हैं कि हम महती अभियान में हम आपके साथ हैं। चुनाव आयोग की ये एक बड़ी जिम्मेदारी है कि वो भारत की जनता के सामने निष्पक्ष निर्वाचन के सबूत पेश करे, बार-बार पेश करे, हर बार पेश करे। चुनाव आयोग से ऐसी मांग चुनाव आयोग की साख को और बढ़ाती है। चुनाव आयोग की जिस निष्पक्षता और पारदर्शिता की मिसाल पूर्व चुनाव आयुक्तों जैसे टी एन शेषण ने रखी, आज उसी निष्पक्षता और पारदर्शिता को खत्म किया जा रहा है। सरकार ने पहले ही मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को पूरी तरह अपने अधिकार क्षेत्र में लेकर इस पद की ग़ैर-दलीय भूमिका और चरित्र का खत्म कर दिया, साथ ही चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग को किसी भी घपले या अपराध की सूरत में सज़ा से बाहर करने का कानून बना दिया, जो इस बात की तरफ साफ संकेत है कि चुनाव आयोग में कुछ आपराधिक हो रहा है। इसके अलावा खुद चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता जाहिर करने की जगह, जवाबदेही से बचने के सभी हथकंडे अपना रहा है, कोई डाटा नहीं दे रहा है, सिर्फ सत्तापक्ष के प्रति अपनी वफादारी का प्रदर्शन कर रहा है। ये ना सिर्फ भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में बल्कि भारतीय जनता के प्रति चुनाव आयोग और चुनाव आयुक्त का विश्वासघात है। 

राहुल जी, ये एक अजीब बात है कि जब भी आप चुनाव आयोग से सवाल करते हैं तो चुनाव आयोग एवं सत्ता द्वारा स्थापित मुख्य चुनाव आयुक्त का समर्थन करने के लिए सीधे सरकार और सरकार के मंत्री मंचों पर उतर आते हैं। वे तमाम स्वघोषित ”एमिनेंट पर्सनैलिटीज़” जिन्होने किसी भी अन्य विषय पर कोई राय नहीं जाहिर की, वे आज सत्ता द्वारा पोषित ”घुसपैठिया-बोगस वोटर” के नाम पर चुनाव आयोग के वोटिंग लिस्ट में गड़बड़ी पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें सत्ता का सीधा संरक्षण मिल रहा है, और तमाम बिकाउ मीडिया और चापलूस संगठनों ने इसे मुद्दा बना दिया है। इन्हीं घुसपैठियों का नाम लेकर बिहार चुनाव से ठीक पहले जिस हड़बड़ी में चुनाव करवाया गया था, उस घपले के परिणाम आपके सामने हैं, एक ऐसा अविश्वसनीय नतीजा जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जिसमें ऐसे संयोग हुए हैं कि जैसे ब्रहमा द्वारा सृष्टि के निमार्ण तक में संभव नहीं थे। इस सबके बावजूद, इन तमाम हमलों, आरोपो, को झेलने के बावजूद आप जिस हिम्मत और प्रतिबद्धता के साथ भारत के लोकतंत्र और जनता के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं, उसके लिए देश की जनता आपका अभिवादन करती है। और हम आपसे से ये अनुरोध करते हैं कि इन तथाकथित स्वघोषित ”एमिनेंट पर्सनैलिटीज़” के अर्नगल आरोपो और बेकार के खुले पत्रों का जवाब देने की कोई ज़रूरत नहीं है, कि हम, इस देश की जनता पूरी प्रतिबद्धता के साथ आपके समर्थन मंें खड़ी है और आपके इस हिम्मतवर अभियान के लिए आपका अभिवादन करती है।  

राहुल जी, हम जानते हैं कि किसी भी लोकतंत्र को पुष्ट करने का सबसे कारगर तरीका है कि उसके प्रतिनिधियों को, उसके निर्वाचित पदाधिकारियों को, संस्थानों को लगातार उत्तरदायी बनाए रखना चाहिए। डॉ. राम मनोहर लोहिया का कथन था कि, ”अगर सड़कें खामोश हो जाएं तो संसद आवारा हो जाएगी।” लोकतंत्र के लिए, जनता के हक़-अधिकारों के लिए और संविधान को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए, आपके इस अभियान का समर्थन करते हैं और आपका अभिवादन करते हैं। भारत का लोकतंत्र उन संस्थाओं के भरोसे नहीं चलता है, जिन्हें इसे चलाने की जिम्मेदारी दी गई है, बल्कि भारत का लोकतंत्र उन नागरिकों की विरासत है, जिन्होने इसे पाने के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी है। इसीलिए ये भारत की जनता है जो इन संस्थानों को, जो लोकतंत्र के लिए कार्यरत हैं, उन्हें लगातार उत्तरदायी बनाए रखें, उससे लगातार सवाल करें, हर कदम पर उसे लोकतंत्र के प्रति विश्वास को साबित करने को प्रेरित करें। भारतीय लोकतंत्र को इसी जन प्रतिबद्धता पर साबित करने के लिए हम आपका अभिवादन करते हैं। 

अंत में हम ये कहना चाहते हैं कि आज देश की सबसे बड़ी ज़रूरत है कि देश की हर संवैधानिक संस्था को एक बार फिर से याद दिलाया जाए कि वो भारत की जनता के प्रति हर पल, हर कार्य के लिए जवाबदेह है। ये भारत की जनता का अधिकार है कि वो हर संस्था से, हर निर्वाचित या मनोनीत प्रतिनिधि से सवाल पूछ सकती है, और उसे जवाब देना आपका कर्तव्य है। देश की साख, लोकतंत्र की साख, सवाल पूछने से नहीं घटती, बल्कि जवाब ना देने से, सवाल पूछने वाले पर आरोप लगाने से, सवाल पूछने वाले को प्रताड़ित करके, उसे जेल भेज कर, उसे अपराधी बनाने से घटती है, लोकतंत्र की साख सवाल पूछने को अपराध बनाने से घटती है। देश की साख सवाल देने की जगह सरकार की चापलूसी करने से घटती है। 

हम सभी भारतीय नागरिकों से अपील करते हैं कि वे लोकतंत्र को बचाने की, उसकी साख को बचाने की इस मुहिम का हिस्सा बनें। सरकार के हर छोटे से छोटे हिस्से से सवाल करें, उसे उत्तरदायी बनाएं, हर संवैधानिक संस्था, चाहे वो चुनाव आयोग हो, या न्यायपालिका, चाहे वो राष्टपति भवन हो, या रिजर्व बैंक, यहा तक कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में सेना तक जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। ये स्वघोषित तथाकथित ”एमिनेंट पर्सनैलिटीज़” अपने अहंकार के चलते आपके अधिकारों और सवाल करने की आपकी क्षमता को खत्म करना चाहते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां बिना कोई सवाल पूछे खुद को एक अभिशप्त लोकतंत्र में जीने की आदत डालें, लेकिन हम भारत की जनता जिन्होने लगातार अपने अधिकारों के लिए लड़ाई की है, और जीत हासिल की है। 

याद रखिए, अंग्रेजों से लड़ाई करने में, भारत को आजादी दिलवाने में, और भारत में लोकतंत्र की स्थापना में, भारत की इसी ग़रीब जनता का तन-मन-धन होम हुआ था। इसीलिए, भारत के लोकतंत्र की स्थापना करने वालों ने, संविधाान निर्माताओं ने भारत की जनता को, भारत के नागरिकों को संविधान में सबसे पहला, और सबसे उंचा स्थान दिया है। आजादी के लड़ाई में अंग्रेजों के प्रशासनिक कार्य करने वाले दरअसल उसी राज को कायम रखना चाहते थे। विडंबना ये है कि यही प्रशासनिक अधिकारी आज हमसे उम्मीद करते हैं कि ये हमें लोकतंत्र सिखाएं, लोकतंत्र के असली मायने हमें बताएं, और हम इनके ज्ञान और मेधा को स्वीकार कर लें। 

प्रिय राहुल गांधी जी, हम भारत के लोग, भारतीय संविधान, भारतीय लोकतंत्र और भारतीय जन के अधिकारों और हक़ों की संरक्षा के इस संघर्ष के लिए आपका अभिवादन करते हैं और आपको अपना समर्थन पेश करते हैं। 

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

महामानव वर्सेज़ राहुल




नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। दोस्तों, बहुत दिनों से एक सवाल फिजाओं में गूंज रहा है, गूंज नहीं रहा तो कम से कम फुसफुसा तो रहा है। ये सवाल दरअसल भक्तों ने ही शुरु किया था, शुरुआती दिन थे, और उस समय बहुत सारे भक्तों ने अपनी असली पहचान उजागर नहीं की थी। तब बार -बार एक ही सवाल सामने आता था, महामानव नही ंतो कौन? इस कौन का जवाब नहीं था। नहीं था का मतलब कुछ लोगों ने भरसक तर्क की मदद से इसका जवाब देने की कोशिश की थी, लेकिन किसी को तर्क ही मानना होता तो लोकतंत्र में ये सवाल ही पैदा नहीं होता। लेकिन पिछले कुछ पांच-सात सालों में, लोकसभा के नेता विपक्ष ने कुछ अपने व्यक्तित्व को कुछ ऐसा उभारा है, ऐसा राजनीतिक वातावरण तैयार किया है कि खुद महामानव भी थोड़ा परेशान से दिखने लगे हैं, और एक बार फिर से राहुल गांधी की जगह उनके नाना, यानी जवाहरलाल नेहरु को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। 


तो आज फैसला हो ही जाए कि महामानव वर्सेज लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के बीच अगर मुकाबला हो तो कौन कितना कैसा और कहां बैठेगा। महामानव ने राष्टीय पटल पर आते ही ऐसे-ऐसे काम किए हैं कि जिनके मुकाबले इस दुनिया में तो किसी और व्यक्ति का उस लेवल पर आ पाना मुश्किल है। लेकिन हम यूं ही हवा में बात नहीं करेंगे बल्कि एक-एक करके हर बात में तुलना की जाएगी और आपके सामने रखा जाएगा असली यानी वास्तविक तथ्य।


तो सबसे पहले आते हैं शिक्षा पर। महामानव की दोनो डिग्रियां यानी बी ए और एम ए की डिग्रियां डिप्टी महामानव ने एक प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान जनता के सामने रखी थीं। हालांकि इस शानदार प्रेस कांफ्रेंस के बाद भी उन डिग्रियों पर विवाद रहा, लेकिन इस विवाद से कोई फर्क नहीं पड़ता। इधर राहुल गांधी की कोई डिग्री कभी सार्वजनिक ना की गई, और मेरी जानकारी में अब तक उन पर कोई विवाद भी ना हुआ। लेकिन ये तो आपको मानना पड़ेगा कि जहां महामानव की डिग्री डीयू यानी दिल्ली यूनिवर्सिटी की है, वहीं राहुल गांधी सुना है विदेशों में पढ़े हैं, कैम्ब्रिज से उन्होने एम फिल किया है। तो इस तरह देखा जाए मितरों तो जहां महामावन सिर्फ एम ए की डिग्री पर रुक गए, हालांकि वो चाहते तो पी एच डी की डिग्री भी ले सकते थे, उन्हें कौन रोक सकता था, लेकिन उन्होने एम ए पर ही संतोष कर लिया। तो खैर इस मामले में राहुल गांधी उनसे बाजी मार ले गए। अब जो हो गया वो हो गया, हम आगे चलते हैं। 

आपको याद होगा मितरों की महामानव ने अपनी फिटनेस और चुस्ती-फुर्ती के बारे में कई बातें की हैं। वो दिन के चौबीस में से चालीस घंटे काम करते हैं, वो योगा करते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से राहुल गांधी के फिटनेस के वीडियो देखे जा रहे हैं, जो बहुत वायरल भी हो रहे हैं, राहुल गांधी जहां मर्जी दौड़ पड़ते हैं, पानी में कूद जाते हैं, और भी जाने क्या क्या करते हैं। अब ऐसे में फिटनेस के तौर पर भी राहुल गांधी महामानव से बीस ही पड़ते हैं। हालांकि महामानव की छाती का नाप छप्पन इंच है, जिसका जिक्र खुद महामानव ने ही किया है, और राहुल गांधी की छाती का नाप हमें नहीं पता है, लेकिन फिटनेस के मामले में तो राहुल गांधी ने महामानव से बाजी मार ही ली है। पर भी और बहुत सारे क्राइटेरिया हैं जिन पर हम बात कर सकते हैं। 






महामानव को बच्चों से बहुत प्यार है। ये प्यार वो लगातार दिखाते रहते हैं। इस मामले में तो वो एक नंबर हैं, परीक्षा पर चर्चा करते हैं, और बच्चों को ये बताते हैं कि परीक्षा कैसे दी जाएं, हालांकि उन्होने खुद गांव छोड़ने के बाद स्कूल का मुहं नहीं देखा लेकिन बच्चों को अक्सर वे बताते पाए गए हैं कि परीक्षा कैसे दी जाए।



लेकिन राहुल गांधी यहां भी महामानव से बाजी मार ले गए। बच्चों के साथ एक सहज व्यवहार बना लेने में राहुल गांधी महामानव से आगे ही लगते हैं। 



पिछले दस से ज्यादा सालों से महामानव ने बहुत प्रयास किया कि उनकी छवि ऐसी बने कि वो बच्चों के बीच लोकप्रिय हैं, और बच्चे उन्हें चाहते हैं, लेकिन बहुत प्रयास करने के बाद भी उन्हें इसमें बहुत सफलता नहीं मिली। जबकि बच्चों के साथ राहुल गांधी के जितने भी वीडियो दिखाई देते हैं, उनमें ये बात साफ पता चलती है कि बच्चे उन्हें बहुत पसंद करते हैं, और वो बच्चों के साथ सहज होते हैं। अब इसके कारण कोई भी हों, और आप इसमें कोई भी और कैसा भी कयास लगाएं, लेकिन बात तो यही है बच्चों के साथ राहुल गांधी के नंबर महामानव से ज्यादा हैं। अब हैं तो हैं, क्या किया जा सकता है। लेकिन रुकिए अभी हमारे पास बहुत सारा मसाला है।

कहा जाता है कि महामानव ऑरेटर बहुत बढ़िया हैं, यानी कि वक्ता बहुत अच्छे हैं, बढ़िया भाषण देते हैं, और महामानव के समर्थक और उनके विरोधी भी ये तो मानते ही हैं कि भाषणबाजी में महामानव का जवाब नहीं, जब वो भाषण देते हैं, तो कब उत्तर-उत्तर, दक्षिण-दक्षिण निकल जाते हैं कि खुद उनको भी पता नहीं चलता। इस मामले मे ंतो आपको मानना पड़ेगा कि तुलना की जाए तो महामानव का पलड़ा ही भारी पड़ेगा। 
भीड़ के सामने भाषण देते महामानव के कुछ फोटो
लेकिन अफसोस कि यहां भी महामानव ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी हुई है, यानी घपला किया हुआ है। ये जो टेकनिकल टीम है महामानव की ये सबकुछ गड़बड़ कर देती है। कई बार तो यूं हुआ कि भाषण देने के बीच में ही महामानव का टेलीप्रॉमप्टर बंद हो गया, और इधर टेलीप्रॉमप्टर बंद हुआ उधर महामानव की सिट्टी-पिट्टी गुम, बहुत ही भद्द पिटी। 

तब पता चला कि ये भाषण देने की कला असल में टेलीप्रॉमप्टर का कमाल है, उपर से अपनी भाषण बाजी में ही महामानव इतने घपले कर चुके हैं कि हम चादर डालना भी चाहें तो वो घपले छुपते नहीं हैं। 


इधर राहुल गांधी के नाम पर जो घपले दरअसल दिखाए जाते हैं, उनकी पोल खुल जाती है, और राहुल गांधी अपने भाषणों में महामानव की धुर्री छिड़ा देते हैं। अभी तक तो राहुल गांधी के भाषणों में हमें कोई घपला दिखाई दिया नहीं, बल्कि वोटचोरी वाले अभियान में तो उनके भाषणों का बड़ा ही चर्चा चला। 

तो ऐसे में भाषणबाजी वाले मामले में भी महामानव राहुल गांधी से नीचे ही निकलते हैं। अब कर ही क्या सकते हैं। 

मुझे लगता है कि अब भी एक फील्ड तो ऐसा बचता है कि जिसमें महामानव राहुल गांधी से बाज़ी मार सकते हैं। 

महामानव ने देश में भाषण दे देकर, भाषणों को एक नई उंचाई दी है, इन भाषणों से पी एम के पद की गरिमा में भी जर्बदस्त उछाल आया है। ये जो महामानव की सड़कछाप भाषा उनके भाषणों में दिखाई देती है, मेरी गारंटी है कि राहुल गांधी अभी एक जनम और ल ेले, तो इस कला में वो महामानव की बराबरी नहीं कर सकता। राहुल गांधी अपने भाषणों में गाली नहीं देता, किसी का अपमान नहीं करता, और ना ही वो पर्सनल अटैक करता है। बस यही राहुल गांधी की कमजोरी है साहब, और मुझे लगता है कि महामानव को यहीं चोट करनी चाहिए। महामानव अपने भाषणों का स्तर और उंचा कर दें, अपने भाषणों को गालियों से, पर्सनल अटैक से सजाएं, उसे और सड़कछाप बना दें। वो ऐसा कर सकते हैं, उनमें ये क्षमता है। राहुल गांधी में वो क्षमता नहीं है, वो अपने भाषणों को ऐसा नहीं बना पाएंगे, और इस मामलें मे महामानव जो राहुल गांधी से कई दर्जे उपर चल रहे हैं, वो और उपर होते जाएंगे। 

मुझे यकीन है मितरों कि मेरी इस बात पर कोई महामानव का ध्यान दिलाएगा और आने वाले दिनों में हमें महामानव के कुछ ऐसे ही कतई गलघुच्चन भाषण सुनने को मिलेंगे। 

चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, उन्होने कहा था

तू करता जा जो करना है, दुनिया की ऐसी की तैसी
कर बंटाधार इस दुनिया का, दुनिया की ऐसी की तैसी

हालांकि सुनने में ये शेर ग़ालिब का नहीं लगता, लेकिन आप तो इसे ग़ालिब का ही मानिए, वैसे भी क्या फर्क पड़ता है,। 

गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

Don't Eat Shit - गोबर मत खाइए।





दोस्तों, आज आपसे अपने दिल की बात करने का जी चाहता है। कुछ ऐसी चीजें भी होती हैं दुनिया में जो राजनीति से आगे होती हैं। आज इन्हीं बातों के बारे मे बात करना चाहता हूं। 



अब आप कह सकते हैं कि भैया ये तो आस्था की बात है। तो अब ज़रा मेरी बात सुनिए। जीवों के बनने या विकसित होने के दो सिद्धांत प्रचलित हैं। पहला ये कि ईश्वर या अल्लाह ने इन्हें बनाया, बिल्कुल ठीक, दूसरा सिद्धांत इससे बिल्कुल उलट है, वो ये कि जैविक विकास की प्रक्रिया में सभी जीवों का विकास हुआ और वे इस अवस्था में पहुंचे जैसा वो हमें दिखाई देते हैं। इन दोनो ही सिद्धांतों में से आपको जो भी मानना हो मानिए, लेकिन ये तो आप मानेंगे ही कि कोई भी जीव जब भोजन करता है, यानी खाना खाता है तो उसका शरीर उस भोजन में से शरीर के लिए आवश्यक पदार्थों का अपशोषण कर लेता है और जो अपशिष्ट यानी बेकार का पदार्थ बचता है, उसे निकाल देता है। जिसे विष्ठा कहा जाता है। यानी विष्ठा भोजन का वो हिस्सा होता है जो अपशिष्ट होता है। लेकिन फिर भी कुछ लोग इसे खाते हैं, या खाने की इच्छा रखते हैं। इसे मनोविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो ये एक बीमारी होती है, जिसमें इंसान की इच्छा विष्ठा खाने की हो सकती है, इस बीमारी को कोपरोफाजिया कहते हैं, ये एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और चिकित्सकीय बीमारी होती है। जिसका इलाज संभव है। इसलिए यदि किसी की इच्छा विष्ठा खाने की करती हो तो उसे किसी मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक को दिखाया जाना चाहिए। उसका अनुसरण ना करें।



इसी तरह की एक और बीमारी होती है, जिसमें किसी इंसान की इच्छा पेशाब पीने की हो सकती है। अब पेशाब भी दरअसल अपशिष्ट ही होता है, जिसे हिन्दी में मूत्र कहा जाता है। बहुत खोजने पर भी मूत्र पीने से, स्वमूत्रपान से किसी भी बीमारी के किसी इलाज का कोई प्रमाणिक संकेत नहीं मिलता है। लेकिन फिर भी अगर आपके आसपास किसी की मूत्र पीने की इच्छा होती हो, तो ये समझ लीजिए कि इस बीमारी को यूरोफाजिया कहा जाता है, यानी ये भी एक मानसिक बीमारी होती है। 

मेरा सिर्फ इतना सा निवेदन है दोस्तों कि मनोवैज्ञानिक बीमारियों को हल्के में ना लें, आप एक पढ़े-लिखे समझदार समाज में रहते हैं, तो आपका ये कर्तव्य बनता है कि यदि आपके आस-पास कोई इन बीमारियों से ग्रसित है तो उसे समुचित मनोवैज्ञानिक चिकित्सा, परामर्श आदि दिलवाएं। 



अब ये एक और मामला है। देखिए इसमें मेरा सिर्फ ये कहना है कि आपकी आस्था और आपका विश्वास किसी तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। इसलिए आपके लिए कोई अपशिष्ट या विष्ठा मूल्यवान हो सकती है। लेकिन किसी चीज़ के मूल्यवान होने का ये मतलब नहीं है कि उसकी क़ीमत बढ़ जाती है। एक फिल्म देखी थी कभी जिसमें किसी अरबपति व्यक्ति की जायदाद को नीलाम किया जाना था, उस नीलामी में पहली पेंटिंग बहुत ही बचकानी थी, जिसकी कीमत शायद छ सौ डॉलर लगाई जाती है। ट्विस्ट ये था कि हमारा हीरो जो उस बचकानी पेंटिंग का खरीदता है, उसके बाद एक वकील आकर उस अरबपति की विल पढ़ता है कि इस पेंटिंग की कीमत चाहे कम हो, लेकिन ये पेंटिंग मेरे लिए मेरी अरबों की जायदाद से भी ज्यादा मूल्यवान है। तो गोबल आपके लिए मूल्यवान होने का ये मतलब नहीं है कि उसकी कीमत कोहेनूर से ज्यादा हो जाएगी। या आप उसे शादी की अंगूठी में, या जडाउ हार में लगवाना पसंद करने लगेंगे। ये बहुत ही साधारण सी बात है जो विद्वानों को तो समझ में आनी ही चाहिए, पर साधारण इंसान को भी समझ आनी चाहिए। 

आज आपके सामने इन बातों को रखने से मेरा आशय यही है कि मनोवैज्ञानिक बीमारियों के प्रति समाज को सचेत किया जाए, और यदि कोई व्यक्ति आपसे विष्ठा खाने का अनुरोध करे, या उसे खाने के फायदे बताए तो मानवता के नाते उसे किसी मनोचिकित्सक के पास रैफर करें। इसी तरह यदि कोई आपसे मूत्रपान के फायदों की बात करे, तो उसे भी मानवता के नाते कृप्या, किसी मनोवैज्ञानिक की दिशा बताएं। 

समझदार इंसानों का ये कर्तव्य है कि यदि कोई मनोरोग से पीड़ित है तो उनकी मदद करें, यदि आप ईश्वर को मानते हैं तो यकीन मानिए, इससे बड़ी मानवता की और ईश्वर की कोई और सेवा नहीं है। और यदि आप ईश्वर को नहीं मानते हैं तो ज़ाहिर है इंसानियत के नाते इतना काम तो आप कर ही सकते हैं। इसके अलावा अभी जो सरकार है वो बड़े जोर-शोर से मुफ्त इलाज की बात कर रही है तो साथियों इसका लाभ उठाएं और खुद से वादा करें कि यदि ऐसा कोई वाकया आपकी नज़र से गुज़रेगा तो आप अपना इंसानी फर्ज निभाएंगे और विष्ठा खाने और मूत्र पीने वालों को किसी मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक को रैफर करेंगे। 
बाकी चचा ग़ालिब ने आज के विषय पर कोई शेर नहीं कहा, बहुत ढूंढा पर उनकी खोई हुई डायरी में भी ऐसा कोई शेर नहीं मिला। इसलिए आज अपना एक शेर आपको सुनाते हैं, उम्मीद है आपको अच्छा लगेगा।


मैं हरदम तुम्हें कुछ सुनाता रहा
अपने ग़म अपने दिल में छुपाता रहा
वो जो बातें हुई तेरे मेरे दरमियां
अपनी दुनिया उन्हीं से सजाता रहा

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

यूनिवर्सिटी में लेफ्ट की जीत



 ग़ालिब ने कहा था बाज़ीचा ए अतफाल है दुनिया मेरे आगे, और ये जो बच्चों का खेल है, ये बार-बार खेला जाता है। बच्चों का ऐसा ही खेल हर यूनिवर्सिटी में हर साल होता है, पूरे देश में अलग-अलग समय पर, लेकिन हर यूनिवर्सिटी में खेला जाता है। कहीं-कहीं सरकार इस खेल पर रोक भी लगा देती है, क्योंकि सरकार का एक काम ये देखना और सुनिश्चित करना भी है कि कहीं विद्यार्थियों को गलत राजनीतिक संदेश और गलत राजनीतिक टेनिंग ना मिल जाए। जैसे जामिया मिल्लिया में कई सालों से चुनाव ना हुए, क्योंकि यहां सरकार को पूरा यकीन है कि वो राजनीतिक संदेश या टेनिंग नहीं मिल सकती जो सरकार चाहती है कि विद्यार्थियों को जिसे जामिया में तालिब-ए-इल्म कहा जाता है, मिले। 

खैर साहब, दिल्ली में एक यूनिवर्सिटी है, क्या ही कहें, बहुत ही खराब यूनिवर्सिटी है। जे एन यू नाम है, पूरा नाम शायद जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी है। बढ़िया मजाक है, उधर महामानव हर रोज़ कोई ना कोई मुद्दा उठाकर जवाहरलाल नेहरु को मार ठोंसे दे रहे हैं, और इधर जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी उनके सपनों में आकर उन्हें डरा जाती है। तो मामला ये हुआ कि इसी मर्दुई यूनिवर्सिटी में एक बार फिर ये लाल सलाम वालों ने चारों सीटों पर कब्जा कर लिया। 



ए बी वी पी के जवानों ने खूब हल्ला काटा चुनाव से पहले, वी सी, एडमिनिस्टेशन, सिक्योरिटी यहां तक कि पुलिस और सरकार ने भी ए बी वी पी के इन जवानों को खूब साथ दिया। लेकिन जाने कौन सा खेला चल रहा है यहां कि इत्ते तमाम तामझामों के बावजूद, इत्ती कोशिशों के बावजूद लाल झंडे वाले जीत गए। 
ल्ेफ्ट की जेएन यू में जीत का वीडियो

वैसे कोई खास बात नहीं है, ये लोग थोड़ा - मोड़ा इधर-उधर से जीत भी लें, लेकिन असली पॉवर तो हमारे पास ही रहेगी। कुछ ही साल पहले की बात है, बाहर से कुछ लोग यूनिवर्सिटी में घुसे, खूब तोड़-फोड़ की, मारपीट की, गाली-गुफ्तार तो मान लीजिए छोटी-मोटी बात थी, और फिर निकल लिए। गलती ये हुई कि किसी-किसी के चेहरे का नकाब उतर गया, और वो पहचान लिए गए। लेकिन तब भी हमारी पॉवर में जो कुछ था, वो सब करके उन हमलावरों को बचा लिया गया। आज कोई उस घटना का नाम तक नहीं लेता। 



तो असली पॉवर तो हमारे पास ही है। लेकिन अब ये बन गया है नाक का मामला, सच बात कहें, एक चाहत है, बड़े दिनों से दिल में दगड़-दगड़ हो रही है ये चाहत। चाहत ये है कि पहले इस युनिवर्सिटी पर कब्जा किया जाए और फिर इस यूनिवर्सिटी का नाम बदल दिया जाए। माने दीन दयाल उपाध्याय यूनिवर्सिटी या मान लीजिए गुरु गोलवलकर यूनिवर्सिटी कर दिया जाए। उपर से यूनिवर्सिटी दिल्ली की प्राइम लोकेशन पर बनी हुई है। इत्ती प्राइम लोकेशन पर ये एजुकेशन और रिसर्च के नाम पर कब्जा किया हुआ है। देखिए मैं एजुकेशन या रिसर्च का दुश्मन नहीं हूं। लेकिन यारों पढ़ाई का सबसे अच्छा तरीका महामानव ने आपको दिखाया ही ह ै।


पढ़ाई की जानी चाहिए ऐसे कि भरे मंच से बड़े गर्व के साथ कह सको कि मैने कोई पढ़ाई नहीं की है। या डिग्री के लिए कॉलेज जाने की जरूरत ही क्या है, जब आपको एंटायर सबजेक्ट की डिग्री ऐसे ही मिल सकती हो। खैर तो मेरा सिर्फ ये कहना है कि लोग-बाग घर बैठ कर पढ़ाई क्यों नहीं करते, ये जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी की ज़रूरत ही क्या है आखिर, जहां लोग-बाग बरसों बैठे रिसर्च करते रह सकते हैं, जबकि डिग्री तो हमारे महामानव के पास भी है। 


तो सवाल ये है कि इस प्राइम लोकेशन वाली यूनिवर्सिटी का क्या किया जाना चाहिए। मेरा तो मानना है दोस्तों की जे एन यू को देश के कुछ बड़े सेठ लोगों को, जैसे अडानी या अंबानी को दे दिया जाना चाहिए। ये लोग जैसे एयरपोर्ट का ऑपरेशन देखते हैं, वैसे ही से लोग यूनिवर्सिटी का भी ऑपरेशन देख लेंगे। तो मान लीजिए यहां जो खाली जमीनें हैं, जंगल-फंगल हैं, उन्हें डेवलप किया जा सकता है, वहां कोरपोरेट ऑफिस खोले जा सकते हैं, कुछ होटल, या मॉल टाइप चीजें बनाई जा सकती हैं, जिनसे कुछ पैसा बनाया जा सकता है। 

सपने तो बहुत हैं यार हमारे, लेकिन ये लाल झंडे वाले डरावने सपने की तरह बैठे हुए हैं हमारी इच्छाओं पर। जैसे दिल्ली यूनिवर्सिटी पर कब्जा करते ही हमने दिखा दिया कि हमारे बाहुबली नेता अध्यापकों के साथ किस तरह का संस्कारवत् व्यवहार करते हैं।




हम चाहते हैं कि एक किस्म का डर का माहौल रहे, यूनिवर्सिटीज़ में देश भर की, अब जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी में क्या होता है, मैं आपको अंदर की बात बताता हूं। अजी मैने खुद अपनी आंखों से देखा है, ये जो टीचर हैं, ये स्टूडेंट की इज्जत करते हैं, और स्टूडेंट टीचर्स की इज्जत करते हैं, बताइए, ऐसा होगा तो यूनिवर्सिटी की पॉलिटिक्स कैसे चलेगी साहब। ये लेफ्ट ने बहुत सालों से अपनी मनमानी चलाई हुई है जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी में, यहां चुनाव से पहले डिबेट होती है भाई, मैं ने खुद अपनी आंखों से देखा है। देश -विदेश की, हक़-अधिकार की बातें चलती हैं इस यूनिवर्सिटी में, लड़कियां खुलेआम घूमती हैं, देश की संस्कृति का बट्टा लगा रखा है। अरे यार यूनिवर्सिटी है, कोई ढिशुम-ढांय वाली फिल्म दिखाओ, अश्लील गाने गाओ, दारू पार्टी करो, लड़कियों को छेड़ो, लेकिन नहीं, इस यूनिवर्सिटी का मिज़ाज तो भाई साहब अब एक ही चीज़ से ठीक हो सकता है। अब यहां संघ की शाखा लगानी ही पड़ेगी, जहां सुबह-सुबह विद्यार्थियों को डंडा चलाना सिखाया जाएगा, अरे किसी के सर फोड़ने के काम तो आएगा। ये क्या कि किताबें खोलकर बैठे हैं, थीसिस लिखी जा रही है, बहसें हो रही हैं, और केाई किसी को सिर नहीं फोड़ रहा। केरल का उदाहरण लीजिए जहां एक युवा ने संघ में अपने शोषण के चलते आत्महत्या कर ली, लेकिन संस्कार को नहीं छोड़ा, जे एन यू में किसी को छेड़ भी दो तो लोग हल्ला काट देते हैं। 
 ना भई ना, ऐसा नहीं चलने दिया जा सकता। 
दिक्कत ये है कि तमाम तरह के बहाने बनाए जा चुके हैं, इस यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों को बिना किसी कारण जेल भेजा जा चुका है, 

इसे बदनाम किया जा चुका है।

पूरा सिस्टम चेंज करने की कोशिश भी की जा चुकी है। लेकिन ये मरदूद जे एन यू प्राण नहीं छोड़ता। अब इस बार तो इसने किया ये कि एक तरफ तो चारों सीटें लेफ्ट जीता, और उसमें भी तीन सीटों पर तो लड़कियां जीती हैं, ना भई, इसे अब और बढ़ने नहीं दिया जा सकता। महामानव को चाहिए कि जल्द से जल्द कोई मुकद्मा या आरोप जे एन यू के खिलाफ खड़ा करें, जैसे यही कह दें कि नेहरु ने जे एन यू से 120 रु. का गबन किया, या उनकी डिग्री जो थी वो फर्जी थी, इसलिए अब जे एन यू को खत्म किया जाएगा। वैसे भी हवा से लेकर पानी तक, और पाकिस्तान से लेकर राष्टगान तक, नेहरु पर हर तरह का आरोप लगाया जा चुका है। तो यही आरोप लगा कर जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी को खत्म करें, या तब तक बंद कर दें, जब तक वहां संघ की रोज छः बार नियमित शाखा ना लगने लगे, छः बार इसलिए कि मुसलमाल पांच बार नमाज़ पढ़ते हैं तो संघ को दिन में कम से कम छ बार शाखा लगानी चाहिए। हमारा काम था बताना सो बता चुके, आगे जैसा महामानव चाहें। 

बाकी चचा हमारे, ग़ालिब जे एन यू तो ना देखा उन्होने, लेकिन सुना है एक दफा जाकिर हुसैन कॉलेज की तरफ गए थे जब उसे दिल्ली कॉलेज कहा जाता था। खैर पढ़ाया नहीं उन्होने वहां पर, पर जे एन यू के बारे में बिनदेखे ही उन्होने शेर कह मारा....सुनिए

जे एन यू का जो जिक्र किया तूने हमनशीं
इक तीर मेरे सीने में मारा के हाय हाय
जे एन यू नहीं जाउंगा तब तक मैं मितरों
जब तक रोज़ उसमें शाखा ना लग जाए
संस्कार की खान, नैतिकता की दुकान, हिंदुत्व की आन-बान-शान आर एस एस की शाखा जे एन यू में लगा दो, ताकि आने वाले समयों मे ंजे एन यू में ए बी वी पी की जीत सुनिश्चित की जा सके। बाकी जब शाखाएं लगनी शुरु हो जाएंगी, तब तक के लिए नमस्ते। 

रविवार, 7 दिसंबर 2025

महामानव और वंदे मातरम




वंदे मातरम यानी हमारे देश के राष्टगीत को लेकर महामानव ने एक ऐसी ज़रूरी मेरा मतलब है महत्वपूर्ण जानकारी जनता के साथ साझा की कि भई सच कहें तो गला भर आता है। इस बारे में और बता करने से पहले ये समझ लीजिए कि वंदे मातरम राष्टगान नहीं है, राष्टगान जन गण मन है। मुझे पूरा यकीन है कि महामानव को ये बयान देते हुए ये सूक्ष्म अंतर पता होगा। राष्टगान गाने के कुछ प्रोटोकॉल होते हैं, जिन्हें पूरा करना देश के हर नागरिक का कर्तव्य होता है। यानी राष्टगान गाया जा रहा हो, या उसकी धुन बजाई जा रही हो तो भारत के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वो सावाधान की मुद्रा में खड़ा हो जाए, और राष्टग्रान के प्रति अपने सम्मान को प्रदर्शित करे। 



कुछेक साल पहले एक हल्ला सा मचा था, जिसमें जिस किसी को पकड़ कर राष्टगान का अपमान करने के अपराध में जेल भेजने की अच्छी-खासी परंपरा चली थी। जैसे सिनेमा हॉल में राष्टगान बजाया जाता था, और फिर किसी को पकड़ कर उसकी धुनाई की जाती थी, फिर उसे पुलिस पकड़ के ले जाती थी और फिर ऐसा माहौल बनाया जाता था कि जाने कैसा बड़ा राष्टीय सुरक्षा टाइप अपराध उस व्यक्ति ने किया होगा।


हालांकि महामानव का धन्यवाद कि ऐसे समय में जब पूरे देश में बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और सबसे उपर वाटचोरी का मुद्दा चल रहा है, ता वे ऐसे समय में इस महत्वपूर्ण मुद्दे को देश के सामने ले आए हैं कि कैसे कांग्रेस ने राष्टगीत वंदे मातरम के एक हिस्से को राष्टगीत का हिस्सा नहीं बनाया है। मैं उम्मीद करूंगा कि आइंदा दिनों में हमारे महान महामानव कांग्रेस के शासन काल में जारी उस सरकारी विज्ञप्ति या गजेट नोटिफिकेशन को भी जारी करेंगे जिसमें ये कहा गया हो कि कांग्रेस सरकार या नेहरु ने ये निश्चय किया था कि राष्टगीत वंदे मातरम के आखिरी पैरा को नहीं गाया जाएगा। ये नेहरु कतई खराब लोग थे साहब, जानबूझकर 1950 में इसे राष्टगीत बनाया गया, जबकि आर एस एस जिसके बारे में महामानव के बहुत ही उम्दा विचार हैं, इसे कबसे अडॉप्ट किए बैठा है। 


महामानव ने ये बयान देेते हुए गज़ब की याददाश्त से बताया कि ये गीत बंकिमचंद चट्टोपाध्याय ने 1875 में लिखा था और इसलिए अब यानी 2025 में इसके 150 साल पूरे हुए हैं। इसे पहली बार 1896 मं भारतीय राष्टीय कांग्रेस के सत्र में गुरु रविन्द्रनाथ टैैगौर ने ही गाया था, मेरे हिसाब से इसकी कम्पोजीशन भी उन्हीं की थी जो राग देश पर आधारित थी। 



दोस्तों कांग्रेस हमेशा से ऐसे ही काम करती रही है, जब पहली बार इसे गाया गया था, यानी 1896 को, तब भी शायद नेहरु ने कहा था कि इसे नहीं गाया जाना चाहिए। बताइए कैसे-कैसे लोग हैं, जबकि आर एस एस ने अपनी स्थापना के समय से अब तक इसे रोज़ गाया है, पूरा का पूरा गाया है। मुझे यकीन है कि अपने अगले सम्बोधन में महामानव इस गीत के 150 साल के उपलक्ष्य में वो वीडियो भी जारी करेंगे जिसमें आर एस एस की शाखाओं में राष्टगीत को गाया जा रहा है, ताकि देशविभाजक ताकतों को एक मजबूत संदेश दिया जा सके। कांग्रेस का क्या है, कांग्रेस को क्या पता कि राष्टगान का या राष्टगीत का सम्मान कैसे किया जाता है। 


यूं, राष्टगान या राष्टगीत का सम्मान आर एस एस से ज्यादा किसी ने न किया आज तक, संघ की हर प्रमुख बैठक के बाद, राष्टगान और राष्टगीत गाया, बजाया जाता रहा है, हर संघी हो, हर भाजपाई को राष्टगान और राष्टगीत याद रहता है, और वो मौके-बेमौके गाते ही रहते हैं। 

छोड़िए ये सब, ये सब सिर्फ आर एस एस को बदनाम करने की चाल है, आप तो ये देखिए कि खुद महामानव को राष्टगीत याद है, ये क्या कम बड़ी बात है। भई ये तो हम कह ही सकते हैं, कि महामानव को राष्टगीत याद है, 

देखिए क्या होठों ही होठों में रहस्यमयी तरीके से महामानव गा रहे हैं राष्टगीत। असल में राष्टगीत इसी तरह गाया जाता है, जब भी गाया जाता है। भाजपा के जितने भी खालिस कार्यकर्ता नेता आदि हैं, उन्हें राष्टगान अच्छी तरह आता है, राष्टगीत अच्छी तरह आता है, और कमाल ये है कि ये जब भी गाते हैं, पूरा गाते हैं, सारे पांचों पैरा, उसमें कोई फेर-बदल नहीं करते, जैसा बंकिमचंद्र ने आनन्द मठ में लिखा था, ठीक वैसा ही इसे गाया जाता है। मुझे पूरा यकीन है कि महामानव को ये पांचो पैरा याद हैं, और आपसे मेरी अपील है कि आप आर एस एस के सदस्यों से ये पांचो पैरा राष्टगीत के सुनिए, इतने सम्मान के साथ, इतने मधुर सुरों में आर एस एस अपने हर कार्यक्रम में राष्टगीत को गाता है कि मन गद्गद् हो जाता है। 


लेकिन अफसोस कि महामानव को एक बार फिर से कांग्रेस की इस गलती की तरफ जनता का ध्यान दिलाना पड़ा। खुद जिसकी गीत को गुरु रविन्द्रनाथ टैगौर ने सुर दिए हों, महामानव कह रहे हैं कि उसमें दुर्भावना के साथ कुछ पैरा काट दिए गए थे, यानी उसमें कुछ ग़लत हो गया है। अब हमें ये सोचना है दोस्तों की महामानव के इस मैसेज का क्या अर्थ है, क्या महामानव कह रहे हैं कि गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर ने जो किया वो ग़लत किया? क्या गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर जैसी महान शख्सियत जो बंगाल की प्रतिष्ठा की साक्षात मूर्ति हैं, ने जानबूझ कर राष्टगीत के सिर्फ दो पद गाए थे, या पूरा राष्टगीत गाया था? क्या महामानव उन पर कोई आरोप लगा रहे हैं? हालांकि गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर ने ऐसा कोई संकेत कभी नहीं दिया कि वे नॉन बायोलॉजिकल हैं, और हमारे महामानव तो सीधे-सीधे टी वी पर बिना किसी लागलपेट के दुनिया को ये बता चुके हैं कि वो अजैविक यानी नॉन बायोलॉजिकल हैं, इसलिए हमारे लिए यही सही होगा कि हम महामानव की बात माने और गुरु रविन्द्रनाथ टैगौर की इस भूल को स्वीकार करें।


दोस्तों बंगाल चुनाव पास में हैं, कांग्रेस वोट-चोरी को मुद्दा बनाए हुए है, ममता दीदी तो पहले से ही बोल रही थी कि बी जे पी यानी महामानव वोट में गोलमाल करता है। खैर जो भी हो, बड़ा मसला है कि महामानव को एक ऐसा मुद्दा चाहिए जो सीधे-सीधे कांग्रेस को लपेटे में ल ेले, बंगाल की जनता का ध्यान खींच ले और एक बार फिर से राष्टवाद को मुद्दा बना दे और उसकी डोर महामानव के हाथों में थमा दे। कुछ तो करो यारों, कुछ तो करो।


खैर चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, बंकिमचंद्र से पहले हुए थे। वो कहते थे


जब कोई ना हाथ में कमाल हो
बात ऐसी करो कि वबाल हो
जब सबकी नज़र हट जाए तो
वोटचोरी करो कि मालामाल हो


तो राष्टगीत गाएं महामानव, पूरा गाना ही चाहिए, किसी ने रोका हो तो आप रुके ना। लेकिन बाकी ग़ालिब के इस शेर का महत्व समझें और वोटचोरी पर पूरा ध्यान रखें।


बाकी फिर से टैगौर बनने की कोशिश ना हो तो ही बेहतर हो।

मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

महामानव-डोलांड और पुतिन का तेल




 तो भाई दुनिया में बहुत कुछ हो रहा है, लेकिन इन जलकुकड़े, प्रगतिशीलों को महामानव के सिवा और कुछ नहीं दिखाई देता। मुझे तो लगता है कि इसी प्रेशर में बिचारे महामानव से कुछ ना कुछ लफड़ा हो जाता है। काफी दिनों तक अच्छी चली, हमारे महामानव और परम मित्र डोलांड की, अच्छी ही कहेंगे, जब भी महामानव का मन तू तड़ाक से बात करने का करता था, महामानव अमरीका पहुंच जाते थे। पिछले चुनावों में अबकी बार टरम्प सरकार का नारा भी लगा आए थे।



आपने देखा होगा महामानव, अपने भाषणों को कितना भी असभ्य बना दें, कितना भी गालियां दें, कितने भी अपशब्द कहें, कभी तू-तड़ाक में बात नहीं करते। इस मामले में हमारे महामानव बहुत संस्कारी हैं। तू-तड़ाक से उनकी बातचीत सिर्फ डोलांड से थी। अब मामले कुछ ऐसे बन गए कि अब मिलना नहीं हो पा रहा है, पहले तो ऐसा था कि मन किया तो फोन उठाकर बात कर ली, अब सुना कि फोन पर भी बात नहीं होती। इसीलिए शायद महामानव का मूड भी कुछ उखड़ा-उखड़ा सा रहता है। अब यार अपने परम मित्र से बात ना हो पाए तो मूड तो खराब होना ही ठहरा। कुछ भी हो, दोस्त तो दोस्त होता है, और महामानव का तो वो डीयर फ्रेंड था, डोलांड। आप ये समझो कि दोस्त जो होता है, वो तो ऐवें ही होता है, उससे बड़ी कैटेगरी होती है फ्रेंड की, फिर उससे उपर होता है क्लोज़ फ्रेंड और फिर आता है तू-तड़ाक वाला फ्रेंड। ये जो सूक्ष्म अंतर है मित्रता में, यही समझने की ज़रूरत है। इसीलिए आजकल महामानव का मूड खराब रहता है, उधर डोलांड भी सुना है काफी चिड़चिड़ा सा हो गया है। इसी चिड़चिड़े मूड की वजह से उसने कई आयं-बायं-शायं फैसले कर डाले, जिसने उसकी कम अमेरिकियों की रातों की नींद हराम कर दी है, पूरी दुनिया के उसने कल्ले काट रखे हैं। 




महामानव और डोलांड की फ्रेंडशिप में ये दरार जो पड़ी वो असल में ऑपरेशन सिंदूर के रुकने से पड़ी, अगर आपको याद हो तो, ये वो समय था जब अपने परम मित्र के कहने पर महामानव ने ऑपरेशन सिंदूर को फौरन स्टॉप कर दिया था। अब भाजपा के अन्य मंत्री जो भी कहें, लेकिन दोस्तों हुआ तो यही था, वरना ये कैसे संभव था कि उधर डोलांड कहें कि भैये मैने वॉर रुकवा दी, और इधर पता चले कि सचुमुच में वॉर रुक गई।



बस इसके बाद जो भब्भड़ मचा इंडियन पॉलिटिक्स में, जनाब क्या ही रंग उड़ा था। मार बयान पे बयान पूरे विपक्ष ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, महामानव को कायर, यानी कॉवर्ड कहा गया, उन्हें डरपोक कहा गया, उनकी छाती के नाप पर फिकरे कसे गए, लेकिन मज़ाल है कि महामानव ने अपने होठों से उंगली को हटाया हो, मैं पहले भी कह चुका हूं, महामानव अपनी फ्रेंडशिप को लेकर बहुत सीरियस थे, उन्होने एक शब्द भी डीयर फ्रेंड डोलांड के खिलाफ नहीं कहा। 



अब ये जो सारे विपक्षी हैं, ये फें्रडशिप क्या जानें, इन्होने घेर-घार कर महामानव की फजीहत कर दी, इसी चक्कर में महामानव को भी थोड़ा सख्त होना पड़ा। इधर टम्प को लगा कि महामानव की फ्रेंडशिप में कुछ कमी आ गई है, याद रखिएगा दोस्तो, हैल हैथ नो फ्यूरी लाइक ए टम्प स्कॉर्न्ड, यानी डीयर फ्रेंड डोलांड ने अपने इसी गुस्से के चलते भारत पर टैरिफ पर टैरिफ लगाना शुरु कर दिया, साथ ही चेतावनी भी दे दी, कि बाज़ आ जाओ, इधर हमारे महामानव जानते थे कि एक बार वो डीयर फ्रेंड के सामने दोबारा पड़े तो कहीं लेने के देने ना पड़ जाएं। इसलिए उन्होने अपनी भरसक कोशिश की कि उनकी और डीयर फ्रेंड टम्प की मुलाकात ना हो सके। इस बच निकलने मे ंतो महामानव माहिर हैं, वैसे वो और कई कारनामों में माहिर हैं, लेकिन इसमें तो उनका जवाब नहीं है, वो जहां चाहते हैं, वहां से गायब हो जाते हैं, जैसे पूरे साल मणिपुर से गायब रहे, पुलवामा हमले के समय बहुत समय तक गायब रहे, इस बार के पहलगाम हमले के वक्त गायब रहे, जब विदेश से वापस आए तो भी सीधा बिहार गए, पहलगाम नहीं गए। तो अपनी इसी बच के निकल जाने की महारत के चलते उनकी डीयर फ्रेंड से मुलाकात ही ना हुई, और इस तरह महामानव ने देश को सीधे कन्फ्रंटेशन से बचा लिया। 

खैर डोलांड अपनी तरफ से महामानव को उकसाने की पूरी कोशिश करता रहा, उसने टैरिफ लगाए, पाकिस्तान से प्रेम की पींगे बढ़ाईं, और भी बहुत कुछ किया कि महामानव पलट कर कोई तो रिएक्शन दें, इधर महामानव चुप बैठे थे। दरअसल महामानव के बारे में एक बात जो अक्सर आप भूल जाते हैं वो ये कि वो अवतार होने यानी नॉन बायोलॉजिकल होने के चलते, समय से पहले ही उसे भांप जाते हैं। 



तो महामानव तो पहले से ही सबकुछ भांपे बैठे थे, उन्हें कोई चिंता नहीं थी। अपनी अजैविक ईश्वरीय क्षमता से वो पहले ही देख चुके थे कि आगे क्या होने वाला है, और इसलिए उन्हें कोई चिंता नहीं थी। इधर डोलांड ने अपना आखिरी दांव चला, और उसने कहा कि क्योंकि इंडिया पुतिन का तेल खरीद रहा है, इसलिए वो इंडिया से नाराज़ है, और अगर इंडिया पुतिन का तेल खरीदना बंद कर दे, तो फिर से फ्रेंडशिप का रास्ता खोला जा सकता है। बस महामानव को एक रास्ता मिल गया, वो रास्ता जिसकी उन्हें काफी समय से तलाश थी। इस एक रास्ते से महामानव को एक तीर से एक दर्जन शिकार करने का मौका मिल गया। 

एक तरफ वो अपने देश में तथाकथित प्रगतिशीलों को, वामियों को, कांगियों को जवाब दे सकते थे। साथ ही अमेरिका से व्यापार को दोबारा शुरु कर सकते थे, तीसरे अपने दोस्तों पर अमेरिका व अन्य देशों में चलने वाले फ्रॉड के केसों में हस्तक्षेप करके उन्हें बचा सकते थे, अपने दोस्तों को किसी और ज़रिए माली इमदाद दे सकते थे, और सबसे बड़ी बात, तेल की क़ीमतों में जो कमी उन्होने नहीं की, उसे जस्टीफाई भी कर सकते थे। हालांकि आप अगर गौर से देखें तो इससे भी ज्यादा कारण मिल सकते हैं, लेकिन महामानव जैसे चतुर-सुजान को इससे ज्यादा इशारा नहीं चाहिए था, और उन्होने इसे लपक लिया। फौरन लपक लिया। 



पिछले कुछ ही दिनों में पुतिन के तेल की आवक में सत्तर प्रतिशत की कमी आई है। यानी अब भारत में पुतिन का तेल नहीं आ रहा है, या बहुत कम आ रहा है। तेल का ये खेल महामानव की जर्बदस्त राजनीतिक दूरदृष्टि के चलते हुआ है, अब आप ये मत देखिए कि भारत में पुतिन का तेल नहीं आ रहा, जो कि भारतीय दलाल पूंजीपतियों को बहुत सस्ते में मिल रहा था, जिसे वो रिफाइन करके बहुत महंगे में बेच रहे थे। आप ऐसा इसलिए ना कीजिए क्योंकि पुतिन के इस सस्ते तेल का आपको यानी देश की जनता कोई फायदा नहीं मिल रहा था। इस सस्ते तेल का फायदा सिर्फ और सिर्फ महामानव के दलाल मित्रों को था, जो इधर का माल उधर करते थे और बीच में अपनी दलाली कमाते थे। 

खैर साहब अब मामला यूं है कि पुतिन से तो साहब की कोई मुरव्वत थी नहीं, वो तो उनके डीयर फ्रेंड से थोड़ी बतकही हो गई थी, तो महामानव ने सोचा कि चलो इस बतकही का भी फायदा उठाया जाए और अपने देसी दोस्तों को भी कुछ थोड़ा कमा-खाने दिया जाए। लेकिन याद रखिएगा ऐसी दोस्ती को फ्रेंडशिप पर कुर्बान करने में महामानव को एक सैंकिंड की हिचक नहीं होगी, यही महामानव का संदेश है। 

अब ये जो देसी दलाल हैं, इन्होने भी खूब चांदी काट ली है, और अब इन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि अब वो पुतिन का तेल खरीद सकते हैं कि नहीं, देश को वैसे ही कोई फर्क नहीं पड़ता, आपको अब भी वहीं 100 रु. लीटर मिलने वाला है, और उसमें भी बीस प्रतिशत गन्ने का रस मिला हुआ होगा। तो आपको कोई फायदा या नुक्सासन नहीं होने वाला है, इसलिए आप इस पर अपना दिमाग खपाना बंद कीजिए। सिर्फ इस बात की खुशी मनाइए कि दुनिया के दो ऐसे लोग, जो खुद को ईश्वर का वरदान मानते हैं, फिर से फ्रेंडशिप के, क्लोज़ फ्रेंडशिप के रास्ते पर अग्रसर हो गए हैं, और वो दिन दूर नहीं, जब आपको एक बार फिर डोलांड और महामानव बगलगीर दिखेंगे और महामानव एक बार फिर कहेंगे


महामानव की ऐसी दोस्ती पर देश की प्रभुसत्ता को भी निछावर करना पड़े तो भी कोई चिंता नहीं होनी चाहिए दोस्तों, हम कहें महामानव से, देश गया भाड़ में आप तो अपनी ये क्लोज़ फ्रेंडशिप बचा के रखो, फिर देखी जाएगी जो होना होगा हो जाएगा।

बाकी चचा ग़ालिब को भी पुतिन का तेल कुछ खास पसंद नहीं था, पर मुश्किल ये है कि उस समय फॉसिल फ्यूल नाम की चीज़ भी नहीं थी, इसलिए थोड़ा कनफ्यूज़न में उन्होने एक शेर कहा है, जो आपकी नज़र है

पुतिन का तेल जो आए, कहीं फ्रेंडशिप की आड़ में
तो उसको मार लात, भेज दे वहीं से भाड़ में
तू अपने देश की इज्जत को भी सरका दे ज़रा सा
कहीं सच दिख ना जाए, ऐसी धका धक उघाड़ में

चचा कहना चाहते थे कि फ्रेंडशिप से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती, और क्लोज़ फ्रेंडशिप तो ईश्वर से भी उपर की चीज़ होती है, तो दोस्तों, महामानव और उनके परम मित्र, यानी डीयर फ्रेंड डोलांड की दोस्ती जिंदाबाद, बाकी जो है सो हइये है।

फिर मिलते हैं, नमस्कार। 

शनिवार, 29 नवंबर 2025

गंजहों का देश - भारत





    
     चुनावों में धंाधली कोई नई बात नहीं है। आज राहुल गांधी ने एक ऐसा बम जैसा विस्फोट करने का दावा किया है जिससे साफ जाहिर होता कि के चु आ के साथ मिलकर महामानव ने, या जिसे पुराने समयों में भाजपा माना जाता था उस पार्टी ने चुनावों में जम कर धंाधली की और सारे चुनाव जिनमें महाराष्ट, मध्य प्रदेश और हरियाणा तक शामिल हैं अपने नाम कर लिए। अब आपको ये समझाने के लिए कि ये सिर्फ कोरी हवा-हवाई बात नहीं है, राहुल गांधी ने के चु आ द्वारा जारी वोटर लिस्ट को ही आधार बनाया और सबके सामने रख दिया। ऐसे में क्या ही कहने लोकतंत्र के, भारतीय प्रजातंत्र के, या इस खुलासे के बाद तो कहा जाए, भारत के चुनाव आयोग तंत्र के, क्योंकि जब सरकार चुनने का काम चुनाव आयोग अपने हाथ में ले ले, तो फिर उस व्यवस्था को ईमानदारी से तो चुनाव आयोग तंत्र ही कहा जाएगा जिसे संक्षिप्त में केचुआ तंत्र भी कहा जा सकता है। और शायद यही बात राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कान्फ्रेंस में अंत में कही थी। 
   
     पर आज मैं आपको एक पुरानी जानकारी दे रहा हूं। दरअसल राहुल गांधी ने अपने आकट्य सबूतों से जिस तरह की धंाधली का आरोप लगाया है, उसका सूत्र जिन्होने धंाधली की है, उन्होने एक मशहूर व्यंग्य उपन्यास रागदरबारी से लिया है। यकीन नहीं आता, वीडियो पूरा देखिए आपको समझ में आ जाएगा। 
    
    श्रीलाल शुक्ल जी के उपन्यास में जिस चुनाव की बात है, उसी संदर्भ में चुनाव जीतने के कुछ तरीके बताए गए हैं। तो
चुनाव जीतने के रागदरबारी में जो तीन टिक बताई गई हैं, वो हैं। रामनगर वाली टिक, नेवादा वाली टिक और महिपालपुर वाली टिक। 
   
     रामनगर वाली टिक वो होती है जिसमें किसी चुनाव में दो मुख्य उम्मीदवार एक ही जाति के हों। ऐसे में जब जनता जाति के आधार पर वोट देने को तैयार ना हो, या उसमें उम्मीदवारों को लगे कि जाति का फायदे से ज्यादा नुक्सान हो सकता है, तो पहले जनता को ये समझाने की कोशिश की जानी चाहिए कि प्रजातंत्र बहुत महत्वपूर्ण है और वोट ग़लत आदमी को नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन अमूमन जनता समझदार होती है और वो जानती है कि जब दोनो ही आदमी ग़लत हो, तो वोट किसी को भी दो, जीतेगा ग़लत आदमी ही। तब जनता को ये समझाने की कोशिश की जानी चाहिए कि तुम्हारा प्रतिद्वंदी अगर जीता तो वो जनता का नुक्सान करेगा, लेकिन ऐसे में जनता जानती है कि नुक्सान दोनो ही करने वाले हैं, तब इसके अलावा कोई उपाय नहीं रह जाता कि पुलिस में कम्पलेंट करवा कर अपनी तरफ के और दूसरी तरफ के पच्चीस तीस आदमियों को जेल भिजवा दिया जाए। अब जब दोनो तरफ के पच्चीस-तीस आदमी जेल में हैं तो जिसके उम्मीदवार के आदमी जेल जाने से बच गए हैं, वो अपनी मनमानी करके चुनाव जीत लेगा। बहुत आसान तरीका है। लेकिन ये तरीका सिर्फ तब ही काम में लाया जा सकता है जब उम्मीदवार, समर्थकों और मतदाताओं की संख्या कम हो। आज के दौर में जहां, उम्मीदवार भी सैंकड़ों हों, समर्थक हजारों हों, और वोटर लाखों हों, इस टिक को चलाने और इस्तेमाल करने में मुश्किल हो सकती है। 
    
    रागदरबारी के अनुसार चुनाव जीतने की दूसरी टिक नेवादा वाली है, जिसे भाजपा बहुत शानदार तरीके से बहुत बार इस्तेमाल कर चुकी है। इस टिक में होता यूं है कि चुनाव के दिनों में किसी मंदिर, धर्म, का सहारा लिया जाता है। सीधे तौर पर धार्मिक बाबा लोग चुनाव प्रचार में नहीं उतरते, लेकिन अपने-अपने डेरों और ठिकानों से अपने अंधभक्तों को ये संदेश देते रहते हैं कि उन्हें किस पार्टी को वोट करना चाहिए। ऐसे में बलात्कार और हत्या के अपराध की सजा भुगत रहे एक खास बाबा को चुनावों के आस-पास बेल, फरलो, जैसी शर्तों के नाम पर जेल से बाहर निकाला जाता है, उसे ससम्मान तब तक बाहर रखा जाता है, जब तक उसके अंधभक्तों के वोट अपने नाम हो जाएं। ऐसे में वो बाबा जी 15 रुपये का पैटोल देने की बात कर सकते हैं, या हनुमान जी से सीधे बात भी कर सकते हैं, लेकिन जो एक बात बदलती नहीं है वो ये कि चुनाव के बाद वो बाबा जी गायब हो जाते हैं, जनता के सामने नहीं आते हैं। इस तरीके को चुनाव जीतने की नेवादा वाली टिक कहा जाता है, और देश में इस टिक बहुतेरा इस्तेमाल किया जा चुका है, अब भी हो ही रहा है। 
    
    लेकिन राहुल गांधी ने जो खुलासा किया है, वो बहुत हद तक राग दरबारी के चुनाव जीतने की महिपालपुर वाली टिक जैसा है। इसे चुनाव जीतने का एक वैज्ञानिक तरीका बताया गया है जिसकी खोज न्यूटन की खोज की तरह संयोगवश हुई थी, और अब उसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। ये चाल पूरी चुनाव प्रक्रिया में धांधली करने की एक व्यापक रणनीति है, इसमें गांव में रहने वाले लोगों के नामों को मतदाता सूची से हटाकर एक झूठी मतदाता सूची बनाना शामिल है, और फिर अपने हिसाब से वोट डालना शामिल है। राग दरबारी की महिपालपुर टिक में वैद्यजी ने चुनाव कमिश्नर को अपने साथ मिला लिया था, और चुनाव के समय की घड़ी को एक घंटा आगे और पीछे करके, दूसरी पार्टी के वोटरों को वोट डालने से ही रोक दिया था। यानी जाली वोट डालकर धोखाधड़ी से चुनाव जीत लिया था।
    
    अब राहुल गांधी की बातों को माने तो यही तरीका महामानव ने अपनाया है, लेकिन ज़रा बड़े पैमाने पर, यानी पहले के चु आ को अपने साथ मिलाया गया। वैद्यजी ने इसके लिए चुनाव अधिकारी को काफी कुछ दिया था, यहां ये नहीं पता कि क्या लिया-दिया गया है, या कुछ लिया-दिया गया है या नहीं। दूसरे पूरी मतदाता सूची का नक्शा ही बदल दिया गया है, और फिर महिपालपुर वाली टिक के अुनसार ही के चु आ ने घड़ी में टाइम ही बदल दिया। यानी उसूलों को ही बदल दिया, एक तो डिजिटल वोटर लिस्ट देने से ही मना कर दिया ताकि धोखाधड़ी पकड़ी ना जा सके, और दूसरे चुनाव के वक्त के वीडियो रिलीज़ करने से ही मना कर दिया, बल्कि कानून में ही फेरबदल कर दिया, कि अब वीडियो को जल्द से जल्द नष्ट करने का प्रावधान हो गया। इससे हमें ये समझ में आता है कि राग दरबारी की महिपालपुर वाली टिक का भी इवोल्यूशन हो गया है। आज रागदरबारी सार्थक हुआ, और महामानव यानी भाजपा के वैद्यजी ने, पहलवान, रुप्पन, और सभी गंजहों के साथ मिलकर इस देश को महिपालपुर बना दिया है। अब तुम सब इस महिपालपुर वाली टिक से चुनाव जीते हुए वैद्यजी के शासनकाल में उनके द्वारा गबन किए हुए रुपयों की भरपाई सरकार से करने का आयोजन देखो। 
    
    खैर हमें क्या, चचा हमारे याानी ग़ालिब जो थे, वो कोई रामाधीन भीखमखेड़वी से कम शायर नहीं थे, उन्होने भी ठीक भीखमखेड़वी की तरह ये शानदार शेर इस चुनावी टिक के बारे में कहा है, 

    पूछो हमसे इस इलैक्शन में खिला क्या गुल कहो
    कुछ हुआ ना महिपालपुर वाली टिक ही चल गई
    गंजहों का देश बन के रह गया इंडिया सुनो
    टापती जनता रही, बैद जी की दिवाली मन गई
       
     एक वाक्य में कहें तो ग़ालिब को पता था कि अंततः ये बैद्य जी देश के राजा की कुर्सी पर बैठेंगे, और उसी टिक का इस्तेमाल करके बैठेंगे, बाकि वैसा ही चलेगा जैसा चल रहा है, क्योंकि ये देश गंजहों का देश बन चुका है, और गंजहे......अब क्या कहं, खुद पढ़ लीजिए। 
   

बुधवार, 26 नवंबर 2025

सालाना नोटबंदी हो





 दोस्तों मैं आपसे एक खास अपील करना चाहता हूं। एक अपील जिससे इस देश का बहुत भला हो सकता है। आपको याद होगा महामानव ने एक दिन रात को आठ बजे टीवी पर आकर एक ऐसा आदेश देश को दिया था, जिसने इस देश का पूरा रंग-रूप ही बदल दिया था। 



जिस दिन से इस देश में नोटबंदी हुई, उसी दिन से इस देश तक़दीर बदल गई, एकदम से देश की किस्मत ने ऐसी पलटी मारी कि ये देश तरक्की के ऐसे रास्ते पर चल निकला कि आज तक कोई भी इस देश को उस रास्ते से हटा नहीं पाया है। आपको याद होगा दोस्तों महामानव के उस क्रांतिकारी कदम का क्या जमकर विरोध हुआ था, क्या तो प्रगतिशील, क्या वामपंथी, क्या कांग्रेसी, सब ने महामानव की नोटबंदी को देश के लिए घातक बताया था। 


लेकिन महामानव को पता था कि ये नोटबंदी आखिरकार देश के कालेधन का बाहर निकाल लेगी, और आखिरकार सारा कालाधन बाहर आ गया। जो अरबों-खरबों रुपये का कालाधन लोगों ने दबा कर रखा हुआ था, वो बाहर आ गया, देश के कालेधन को लोगों की जेबों से बाहर निकालने में महामानव को जिन परेशानियों का सामना करना पड़ा वो तो महामानव ही जानते हैं। पूरे देश में कालेधन को बाहर निकालने के लिए जिस हिम्मत की ज़रूरत थी वो सिर्फ महामानव में थी। इस पूरे कालेधन पर हमले में सिर्फ कुछ हिम्मतवाले पत्रकार ही महामानव के साथ बने रहे थे। लेकिन आखिरकार महामानव ने सभी ग़रीब लोगों की जेबों से सारे कालेधन का बाहर निकाल ही लिया।


आखिरकार जब नोटबंदी के इस महती कार्य का मूल्यांकन किया गया तो पता चला कि, कुल 98 प्रतिशत धन वापस आया था। इसकी वजह ये थी कि ग़रीबों के पास जितना कालाधन था वो निकल गया, और अमीरों के पास जो कालाधन था, उसे व्हाइट करने के सारे रास्ते उन्होने अपना लिए होंगे। 

ये सही कि बहुत ज्यादा कालाधन वापिस नहीं आ पाया था, यानी जितना पैसा देश भर में घूम रहा था, उसका ज्यादातर हिस्सा तो वापस आ गया। तब महामानव ने हमें बताया कि ये नोटबंदी तो उन्होने इसलिए की थी ताकि आतंकवाद की कमर टूट जाए। आतंकवाद की कमर आप जानते ही हैं कि आज तक कोई तोड़ नहीं पाया, लेकिन महामानव का निशाना अचूक था, उन्होने सीधे आतंकवाद की कमर पर चोट की थी और नोटबंदी के चलते आतंकवाद की कमर ऐसी टूटी कि आज तक वो बेचारा अपनी टूटी कमर के साथ कराह रहा है और नोटबंदी के बाद से देश में एक भी आतंकवादी घटना नहीं हुई है। इसलिए जब आप नोटबंदी के समय सामान्य नागरिकों की मौत की बात करते हैं तो ये याद रखिए कि इसी नोटबंदी से ही तो आतंकवाद की कमर टूटी है।

उसी समय एक अफवाह भी उड़ी थी कि महामानव के महान साथी, आधुनिक युग के चाणक्य और देश के गृहमंत्री ने कई हज़ार करोड़ रुपये का कालाधन इसी धकापेल में सफेद करवा लिए थे, जिनका कोई हिसाब नहीं था। खैर वो अफवाह थी, क्योंकि ई डी ने कोई छापा नहीं मारा, और इस खबर पर कोई कार्यवाही ना हुई। जिन खबरों पर कार्यवाही नहीं होती, वो सब अफवाहें होती हैं। लेकिन इन्हीं सब  तथाकथित प्रगतिशीलों के लगातार हमलों से आजिज आकर महामानव ने कह ही दिया, कि 50 दिन में अगर नोटबंदी का कोई पॉजीटिव रिजल्ट ना आए, तो वो खुद चौराहे पर आएंगे और उन्हें सरेराह पीटा जा सकता है। 

देखते देखते पचास दिन बीत गए, लेकिन महामानव को चौराहे पर नहीं आना था, वो ना आए। इन प्रगतिशीलों के कलेजे पर सांप लोट गया, इनकी बड़ी इच्छा थी कि महामानव अपने कहे अनुसार चौराहे पर आएं, और ये लोग उनके सिर पर जूते बरसाएं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ, इसलिए नहीं कि महामानव झूठे हैं, और उन्हें झूठ बोलने की आदत है, बल्कि इसलिए कि तब, यानी आखिर में महामानव ने अपना फाइनल दांव खेला, उन्होने जनता को बताया कि दरअसल ये नोटबंदी कालेधन के बारे में नहीं थी, ना ही इसका आतंकवाद से कोई लेना-देना था, बल्कि सारा मसला ये था कि जनता को डिजिटल करेंसी की आदत लगानी थी। 

अब बताइए, नोटबंदी के बिना डिजिटल करेंसी का चलन कैसे संभव था। सदियों से इस देश में कैश का सिस्टम था, लोगों को आदत पड़ चुकी थी कि वो कैश में बैंक के ज़रिए डील करते थे। ऐसे में हमारे आधुनिक युग के महामानव ने ये सख्त कदम उठाया था कि लोग कैश को भूल जाएं, बैंक से पैसे निकालना बंद करें, और डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल करें। और महामानव का ये कदम सफल रहा।
आज परे भारत में ढूंढ लीजिए किसी भी जेब में आपको कैश जिसे नगद कहते हैं, नहीं मिलेगा। अब कई लोगों को मानना है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि किसी के पास पैसा ही नहीं है। और जब पैसा है ही नही ंतो किसी की जेब में मिलेगा कैसे। लेकिन यहीं ये लोग ग़लत हैं, दरअसल पैसा बहुत है, सिर्फ अकाउंट नंबर बदल गया है। पहले पैसा जनता के पास होता था, लेकिन नोटबंदी के बाद सारा पैसा कुछ खास अकाउंटस् में टांसफर हो रहा है। ये जो खास अकांउटस् हैं ये महामानव के दोस्तों के हैं, इनमें देश का ज्यादातर पैसा जमा हो गया है, और अब वहां सेफ है। इसी सेफ पैसे के बलबूते हमारा देश दुनिया की चौथे नंबर की इकानॉमी बन गया है। और तो और, अब देश के तमाम पैसे को इन्हीं सेफ जगहों पर रखने के लिए महामानव ने एल आई सी का पैसा तक इन्हीं लोगों के पास टांसफर कर दिया है। 

और आपको याद होगा कि उसी दौरान दो हज़ार का ऐसा टेकनीकली एडवांस नोट भी ईजाद किया गया था, जिसमें चमत्कारी चिप लगी हुई थी।

ऐसे नोट की वजह से हालांकि कोई छापेमारी नहीं हो सकी, और ना ही किसी कालेधन का पकड़ा जा सका, लेकिन क्योंकि सरकार की तरफ से इसका कोई खंडन नहीं हुआ था, इसलिए मुझे तो अब भी लगता है कि ये खबर सच ही थी। पर सच कहूं तो मुझे तो दो हज़ार को नोट देखे ही सालों हो गए, क्या पता क्या सही है क्या ग़लत। पर इन महान पत्रकारों ने कहा और महामानव ने मना नहीं किया तो सही ही होगा। 
अब जब मैं आपको, महामानव के इस महान क्रांतिकारी कदम के बारे में बता चुका हूं, तो मैं अब आपसे अपील करना चाहता हूं कि नोटबंदी जैसे इस महान कदम को रिपीट करने की ज़रूरत है। जरूरत इस बात की है कि नोटबंदी ने जिस तरह देश की काया बदली है, इस देश को हर साल इसी तरह के कायाकल्प की ज़रूरत है। इसलिए हमें महामानव अपील करनी चाहिए कि वो हर साल उसी तरह आठ बजे टी वी पर आकर नोटबंदी की घोषणा करें। दोस्तों मेरा कहना है कि हर साल नोटबंदी होनी चाहिए। हर साल कालाधन बाहर आना चाहिए, हर साल आतंकवाद की कमर टूटनी चाहिए, हर साल डिजिटल करेंसी और डिजिटल इकॉनॉमी को मजबूत करना चाहिए, हर साल देश की अर्थव्यवस्था को बूस्ट मिलना चाहिए, और हर साल जनता को देशभक्ति का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। 

और वहीं महान चाणक्य का ये अमर कथन भी गूंजा था कि जब विरोधी एकजुट हो जाएं तो समझ जाओ कि राजा सही कर रहा है। एक और महान मंत्री जी ने ये भी साबित किया था कि नोटबंदी की मार सहना ही देशभक्ति है। मेरा सवाल ये है कि क्या ऐसी देशभक्ति से देश की जनता को नियमित तौर पर दो-चार नहीं करना चाहिए। 
इसीलिए दोस्तों मैं चाहता हूं कि आप सबके मुहं पर यही एक सवाल और नारा हो, कि महामानव के इस महान कदम को जनता याद रखे, कि हर साल देश में नोटबंदी हो। आज मेरी आप से यही अपील है कि महामानव या उनके जो भी यार, दोस्त, भक्त, आदि मिलें, तो उनसे कहें कि भैये, देश हर साल एक नोटबंदी मांगता है। हमें चाहिए नोटबंदी, नोटबंदी-नोटबंदी
हमारे चचा ग़ालिब के जमाने में नोटबंदी नहीं हुई थी। कैसे होती, उस वक्त ना कालाधन था, ना आतंकवाद था, और ना ही डिजिटल करेंसी की कोई बात थी। हालांकि सुनते हैं भारत बहुत अमीर था उस समय, महामानव वाली बात तो खैर नहीं थी, फिर भी ठीक-ठाक हालत में था। तो उसी दौर का चचा ग़ालिब का शेर है


हो जाए जनता में कभी देशभक्ति मंदी
करवा दे तू झटक के मेरी जान नोटबंदी


नोटबंदी वो शानदार कदम था दोस्तों, जिसका हर साल याद किया जाना ज़रूरी है, महामानव को याद दिलाया जाना ज़रूरी है, जैसे उस नोटबंदी से देश महान से महानतम बना, वैसे ही हर साल नोटबंदी से देश महान बनता रहे यही हमारी कामना है।
नमस्कार

सेंगर को बेल

  नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। सुना भई सेंगर जी को बेल मिल गई। पहले उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा हुई थी, और ये सज़ा जो उन्हें मि...