गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

Don't Eat Shit - गोबर मत खाइए।





दोस्तों, आज आपसे अपने दिल की बात करने का जी चाहता है। कुछ ऐसी चीजें भी होती हैं दुनिया में जो राजनीति से आगे होती हैं। आज इन्हीं बातों के बारे मे बात करना चाहता हूं। 



अब आप कह सकते हैं कि भैया ये तो आस्था की बात है। तो अब ज़रा मेरी बात सुनिए। जीवों के बनने या विकसित होने के दो सिद्धांत प्रचलित हैं। पहला ये कि ईश्वर या अल्लाह ने इन्हें बनाया, बिल्कुल ठीक, दूसरा सिद्धांत इससे बिल्कुल उलट है, वो ये कि जैविक विकास की प्रक्रिया में सभी जीवों का विकास हुआ और वे इस अवस्था में पहुंचे जैसा वो हमें दिखाई देते हैं। इन दोनो ही सिद्धांतों में से आपको जो भी मानना हो मानिए, लेकिन ये तो आप मानेंगे ही कि कोई भी जीव जब भोजन करता है, यानी खाना खाता है तो उसका शरीर उस भोजन में से शरीर के लिए आवश्यक पदार्थों का अपशोषण कर लेता है और जो अपशिष्ट यानी बेकार का पदार्थ बचता है, उसे निकाल देता है। जिसे विष्ठा कहा जाता है। यानी विष्ठा भोजन का वो हिस्सा होता है जो अपशिष्ट होता है। लेकिन फिर भी कुछ लोग इसे खाते हैं, या खाने की इच्छा रखते हैं। इसे मनोविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो ये एक बीमारी होती है, जिसमें इंसान की इच्छा विष्ठा खाने की हो सकती है, इस बीमारी को कोपरोफाजिया कहते हैं, ये एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और चिकित्सकीय बीमारी होती है। जिसका इलाज संभव है। इसलिए यदि किसी की इच्छा विष्ठा खाने की करती हो तो उसे किसी मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक को दिखाया जाना चाहिए। उसका अनुसरण ना करें।



इसी तरह की एक और बीमारी होती है, जिसमें किसी इंसान की इच्छा पेशाब पीने की हो सकती है। अब पेशाब भी दरअसल अपशिष्ट ही होता है, जिसे हिन्दी में मूत्र कहा जाता है। बहुत खोजने पर भी मूत्र पीने से, स्वमूत्रपान से किसी भी बीमारी के किसी इलाज का कोई प्रमाणिक संकेत नहीं मिलता है। लेकिन फिर भी अगर आपके आसपास किसी की मूत्र पीने की इच्छा होती हो, तो ये समझ लीजिए कि इस बीमारी को यूरोफाजिया कहा जाता है, यानी ये भी एक मानसिक बीमारी होती है। 

मेरा सिर्फ इतना सा निवेदन है दोस्तों कि मनोवैज्ञानिक बीमारियों को हल्के में ना लें, आप एक पढ़े-लिखे समझदार समाज में रहते हैं, तो आपका ये कर्तव्य बनता है कि यदि आपके आस-पास कोई इन बीमारियों से ग्रसित है तो उसे समुचित मनोवैज्ञानिक चिकित्सा, परामर्श आदि दिलवाएं। 



अब ये एक और मामला है। देखिए इसमें मेरा सिर्फ ये कहना है कि आपकी आस्था और आपका विश्वास किसी तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। इसलिए आपके लिए कोई अपशिष्ट या विष्ठा मूल्यवान हो सकती है। लेकिन किसी चीज़ के मूल्यवान होने का ये मतलब नहीं है कि उसकी क़ीमत बढ़ जाती है। एक फिल्म देखी थी कभी जिसमें किसी अरबपति व्यक्ति की जायदाद को नीलाम किया जाना था, उस नीलामी में पहली पेंटिंग बहुत ही बचकानी थी, जिसकी कीमत शायद छ सौ डॉलर लगाई जाती है। ट्विस्ट ये था कि हमारा हीरो जो उस बचकानी पेंटिंग का खरीदता है, उसके बाद एक वकील आकर उस अरबपति की विल पढ़ता है कि इस पेंटिंग की कीमत चाहे कम हो, लेकिन ये पेंटिंग मेरे लिए मेरी अरबों की जायदाद से भी ज्यादा मूल्यवान है। तो गोबल आपके लिए मूल्यवान होने का ये मतलब नहीं है कि उसकी कीमत कोहेनूर से ज्यादा हो जाएगी। या आप उसे शादी की अंगूठी में, या जडाउ हार में लगवाना पसंद करने लगेंगे। ये बहुत ही साधारण सी बात है जो विद्वानों को तो समझ में आनी ही चाहिए, पर साधारण इंसान को भी समझ आनी चाहिए। 

आज आपके सामने इन बातों को रखने से मेरा आशय यही है कि मनोवैज्ञानिक बीमारियों के प्रति समाज को सचेत किया जाए, और यदि कोई व्यक्ति आपसे विष्ठा खाने का अनुरोध करे, या उसे खाने के फायदे बताए तो मानवता के नाते उसे किसी मनोचिकित्सक के पास रैफर करें। इसी तरह यदि कोई आपसे मूत्रपान के फायदों की बात करे, तो उसे भी मानवता के नाते कृप्या, किसी मनोवैज्ञानिक की दिशा बताएं। 

समझदार इंसानों का ये कर्तव्य है कि यदि कोई मनोरोग से पीड़ित है तो उनकी मदद करें, यदि आप ईश्वर को मानते हैं तो यकीन मानिए, इससे बड़ी मानवता की और ईश्वर की कोई और सेवा नहीं है। और यदि आप ईश्वर को नहीं मानते हैं तो ज़ाहिर है इंसानियत के नाते इतना काम तो आप कर ही सकते हैं। इसके अलावा अभी जो सरकार है वो बड़े जोर-शोर से मुफ्त इलाज की बात कर रही है तो साथियों इसका लाभ उठाएं और खुद से वादा करें कि यदि ऐसा कोई वाकया आपकी नज़र से गुज़रेगा तो आप अपना इंसानी फर्ज निभाएंगे और विष्ठा खाने और मूत्र पीने वालों को किसी मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक को रैफर करेंगे। 
बाकी चचा ग़ालिब ने आज के विषय पर कोई शेर नहीं कहा, बहुत ढूंढा पर उनकी खोई हुई डायरी में भी ऐसा कोई शेर नहीं मिला। इसलिए आज अपना एक शेर आपको सुनाते हैं, उम्मीद है आपको अच्छा लगेगा।


मैं हरदम तुम्हें कुछ सुनाता रहा
अपने ग़म अपने दिल में छुपाता रहा
वो जो बातें हुई तेरे मेरे दरमियां
अपनी दुनिया उन्हीं से सजाता रहा

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