वंदे मातरम यानी हमारे देश के राष्टगीत को लेकर महामानव ने एक ऐसी ज़रूरी मेरा मतलब है महत्वपूर्ण जानकारी जनता के साथ साझा की कि भई सच कहें तो गला भर आता है। इस बारे में और बता करने से पहले ये समझ लीजिए कि वंदे मातरम राष्टगान नहीं है, राष्टगान जन गण मन है। मुझे पूरा यकीन है कि महामानव को ये बयान देते हुए ये सूक्ष्म अंतर पता होगा। राष्टगान गाने के कुछ प्रोटोकॉल होते हैं, जिन्हें पूरा करना देश के हर नागरिक का कर्तव्य होता है। यानी राष्टगान गाया जा रहा हो, या उसकी धुन बजाई जा रही हो तो भारत के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वो सावाधान की मुद्रा में खड़ा हो जाए, और राष्टग्रान के प्रति अपने सम्मान को प्रदर्शित करे।
कुछेक साल पहले एक हल्ला सा मचा था, जिसमें जिस किसी को पकड़ कर राष्टगान का अपमान करने के अपराध में जेल भेजने की अच्छी-खासी परंपरा चली थी। जैसे सिनेमा हॉल में राष्टगान बजाया जाता था, और फिर किसी को पकड़ कर उसकी धुनाई की जाती थी, फिर उसे पुलिस पकड़ के ले जाती थी और फिर ऐसा माहौल बनाया जाता था कि जाने कैसा बड़ा राष्टीय सुरक्षा टाइप अपराध उस व्यक्ति ने किया होगा।
हालांकि महामानव का धन्यवाद कि ऐसे समय में जब पूरे देश में बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और सबसे उपर वाटचोरी का मुद्दा चल रहा है, ता वे ऐसे समय में इस महत्वपूर्ण मुद्दे को देश के सामने ले आए हैं कि कैसे कांग्रेस ने राष्टगीत वंदे मातरम के एक हिस्से को राष्टगीत का हिस्सा नहीं बनाया है। मैं उम्मीद करूंगा कि आइंदा दिनों में हमारे महान महामानव कांग्रेस के शासन काल में जारी उस सरकारी विज्ञप्ति या गजेट नोटिफिकेशन को भी जारी करेंगे जिसमें ये कहा गया हो कि कांग्रेस सरकार या नेहरु ने ये निश्चय किया था कि राष्टगीत वंदे मातरम के आखिरी पैरा को नहीं गाया जाएगा। ये नेहरु कतई खराब लोग थे साहब, जानबूझकर 1950 में इसे राष्टगीत बनाया गया, जबकि आर एस एस जिसके बारे में महामानव के बहुत ही उम्दा विचार हैं, इसे कबसे अडॉप्ट किए बैठा है।
महामानव ने ये बयान देेते हुए गज़ब की याददाश्त से बताया कि ये गीत बंकिमचंद चट्टोपाध्याय ने 1875 में लिखा था और इसलिए अब यानी 2025 में इसके 150 साल पूरे हुए हैं। इसे पहली बार 1896 मं भारतीय राष्टीय कांग्रेस के सत्र में गुरु रविन्द्रनाथ टैैगौर ने ही गाया था, मेरे हिसाब से इसकी कम्पोजीशन भी उन्हीं की थी जो राग देश पर आधारित थी।
दोस्तों कांग्रेस हमेशा से ऐसे ही काम करती रही है, जब पहली बार इसे गाया गया था, यानी 1896 को, तब भी शायद नेहरु ने कहा था कि इसे नहीं गाया जाना चाहिए। बताइए कैसे-कैसे लोग हैं, जबकि आर एस एस ने अपनी स्थापना के समय से अब तक इसे रोज़ गाया है, पूरा का पूरा गाया है। मुझे यकीन है कि अपने अगले सम्बोधन में महामानव इस गीत के 150 साल के उपलक्ष्य में वो वीडियो भी जारी करेंगे जिसमें आर एस एस की शाखाओं में राष्टगीत को गाया जा रहा है, ताकि देशविभाजक ताकतों को एक मजबूत संदेश दिया जा सके। कांग्रेस का क्या है, कांग्रेस को क्या पता कि राष्टगान का या राष्टगीत का सम्मान कैसे किया जाता है।
यूं, राष्टगान या राष्टगीत का सम्मान आर एस एस से ज्यादा किसी ने न किया आज तक, संघ की हर प्रमुख बैठक के बाद, राष्टगान और राष्टगीत गाया, बजाया जाता रहा है, हर संघी हो, हर भाजपाई को राष्टगान और राष्टगीत याद रहता है, और वो मौके-बेमौके गाते ही रहते हैं।
छोड़िए ये सब, ये सब सिर्फ आर एस एस को बदनाम करने की चाल है, आप तो ये देखिए कि खुद महामानव को राष्टगीत याद है, ये क्या कम बड़ी बात है। भई ये तो हम कह ही सकते हैं, कि महामानव को राष्टगीत याद है,
देखिए क्या होठों ही होठों में रहस्यमयी तरीके से महामानव गा रहे हैं राष्टगीत। असल में राष्टगीत इसी तरह गाया जाता है, जब भी गाया जाता है। भाजपा के जितने भी खालिस कार्यकर्ता नेता आदि हैं, उन्हें राष्टगान अच्छी तरह आता है, राष्टगीत अच्छी तरह आता है, और कमाल ये है कि ये जब भी गाते हैं, पूरा गाते हैं, सारे पांचों पैरा, उसमें कोई फेर-बदल नहीं करते, जैसा बंकिमचंद्र ने आनन्द मठ में लिखा था, ठीक वैसा ही इसे गाया जाता है। मुझे पूरा यकीन है कि महामानव को ये पांचो पैरा याद हैं, और आपसे मेरी अपील है कि आप आर एस एस के सदस्यों से ये पांचो पैरा राष्टगीत के सुनिए, इतने सम्मान के साथ, इतने मधुर सुरों में आर एस एस अपने हर कार्यक्रम में राष्टगीत को गाता है कि मन गद्गद् हो जाता है।
लेकिन अफसोस कि महामानव को एक बार फिर से कांग्रेस की इस गलती की तरफ जनता का ध्यान दिलाना पड़ा। खुद जिसकी गीत को गुरु रविन्द्रनाथ टैगौर ने सुर दिए हों, महामानव कह रहे हैं कि उसमें दुर्भावना के साथ कुछ पैरा काट दिए गए थे, यानी उसमें कुछ ग़लत हो गया है। अब हमें ये सोचना है दोस्तों की महामानव के इस मैसेज का क्या अर्थ है, क्या महामानव कह रहे हैं कि गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर ने जो किया वो ग़लत किया? क्या गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर जैसी महान शख्सियत जो बंगाल की प्रतिष्ठा की साक्षात मूर्ति हैं, ने जानबूझ कर राष्टगीत के सिर्फ दो पद गाए थे, या पूरा राष्टगीत गाया था? क्या महामानव उन पर कोई आरोप लगा रहे हैं? हालांकि गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर ने ऐसा कोई संकेत कभी नहीं दिया कि वे नॉन बायोलॉजिकल हैं, और हमारे महामानव तो सीधे-सीधे टी वी पर बिना किसी लागलपेट के दुनिया को ये बता चुके हैं कि वो अजैविक यानी नॉन बायोलॉजिकल हैं, इसलिए हमारे लिए यही सही होगा कि हम महामानव की बात माने और गुरु रविन्द्रनाथ टैगौर की इस भूल को स्वीकार करें।
दोस्तों बंगाल चुनाव पास में हैं, कांग्रेस वोट-चोरी को मुद्दा बनाए हुए है, ममता दीदी तो पहले से ही बोल रही थी कि बी जे पी यानी महामानव वोट में गोलमाल करता है। खैर जो भी हो, बड़ा मसला है कि महामानव को एक ऐसा मुद्दा चाहिए जो सीधे-सीधे कांग्रेस को लपेटे में ल ेले, बंगाल की जनता का ध्यान खींच ले और एक बार फिर से राष्टवाद को मुद्दा बना दे और उसकी डोर महामानव के हाथों में थमा दे। कुछ तो करो यारों, कुछ तो करो।
खैर चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, बंकिमचंद्र से पहले हुए थे। वो कहते थे
जब कोई ना हाथ में कमाल हो
बात ऐसी करो कि वबाल हो
जब सबकी नज़र हट जाए तो
वोटचोरी करो कि मालामाल हो
तो राष्टगीत गाएं महामानव, पूरा गाना ही चाहिए, किसी ने रोका हो तो आप रुके ना। लेकिन बाकी ग़ालिब के इस शेर का महत्व समझें और वोटचोरी पर पूरा ध्यान रखें।
बाकी फिर से टैगौर बनने की कोशिश ना हो तो ही बेहतर हो।
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