नमस्कार। मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। सुना कुछ पौने दो सौ, एमिनेंट पर्सनैलिटीज़ ने राहुल गांधी के नाम खुला पत्र लिखा है। इस अकेले एक वाक्य में बहुत सारे स्टेटमेंट हैं। पहला तो आप यही देखिए कि राहुल गांधी के नाम खुला पत्र लिखने वाले लगभग तीन सौ लोग जमा हो गए, हालांकि ये कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि चमत्कार से एक दो सीढ़ी नीचे भी नहीं है। देश में लगभग पौने दो अरब की आबादी है, बस अंदाजा आप लगा लीजिए। दूसरे ये एमिनेंट पर्सनैलिटीज़ क्या होती हैं जी। एमिनेंट पर्सनैलिटीज़ का पैमाना क्या होता है, ये कोई सरकारी तमगा है, कोई पद है, या कोई ऐसी डिग्री है जैसी दिल्ली यूनिवर्सिटी से निकल रही हैं और फिर छुप जा रही हैं। इस देश का हर नागरिक एमिनेंट पर्सनैलिटी है। ऐसा इस देश का संविधान कहता है, किसी में कोई खास सुर्खाब के पर लगे हों जो मुझे ना दिखाई दिए हों तो बताना यार। तीसरे ये पत्र में खुल का जो विशेषण है वो क्यों लगाया गया है, क्योंकि ये पत्र राहुल गांधी के नाम तो नहीं ही है, पत्र तो किसी के लिए लिखा जाता है। ये पत्र की जगह एक ओपीनियन पीस है, आपकी एक राजनीतिक ओपीनियन हो ही सकती है, किसी को ये पत्र संबोधित नहीं कर रहा, किसी से प्रेम, शिकायत नहीं दिखा रहा। तो ये पत्र राहुल गांधी के नाम क्योंकर हुआ जी। कोई बताए मुझे। मुझे तो ये पूरा लेख पढ़ कर कुछ चीजें लगीं,
- पहला ये कोई खास अच्छा लेख नहीं है, इसे पत्र तो खैर कहा ही नहीं जा सकता।
- दूसरा इसे लिखने वाले या लिखने वालों की राजनीतिक समझ थोड़ी कम है।
- तीसरे ये पत्र ठहराव और समझदारी से ज्यादा फ्रस्टेशन निकालने के लिए लिखा गया एक लेख लगता है।
- चौथे पत्र लिखने वाले खुद को डिफेंडर मान बैठे हैं और बाकी देश की तमाम जनता उनके नज़दीक गब्दू हैं जो कुछ समझ-बूझ नहीं पा रहे हैं।
- पांचवा राहुल गांधी को पत्र की जगह इसे राहुल गांधी के खिलाफ, इलैक्शन कमीशन की प्रशंसा में या रक्षा में, वर्तमान सरकार की चापलूसी में लिखा गया पत्र कहना ज्यादा बेहतर होगा।
मुझे लगता है कि हमें यानी इस देश के नागरिकों को, खासतौर पर उन नागरिकों को जो राहुल गांधी की बात से सहमत हैं, और जिन्हें लगता है कि लोकतंत्र में सवाल पूछने का, सवाल उठाने का, और जवाब पाने के लिए ज़िद करने का अधिकार हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, उन्हे राहुल गांधी के नाम एक पत्र लिखना चाहिए।
मैं आपके सामने एक मसौदा रख रहा हूं, अगर आप इससे सहमत हों, तो कृप्या इसे देश के आम नागरिकों का राहुल गांधी को पत्र समझिए और इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाइए, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे या ऐसे पत्र सीधे राहुल गांधी को लिखें और इस देश के आम जन को ये हौसला दें कि उसे सरकार से और तमान संस्थाओं से सवाल करने और जवाब हासिल करने का अधिकार है, ना ही सरकार, ना न्यायालय, ना कोई और संवैधानिक संस्था नागरिकों और नागरिक अधिकारों से उपर है और ना हो सकती है।
प्रिय राहुल गांधी जी।
हम भारत के लोग, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथ-निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य मानते हैं। संविधान की इस प्रस्तावना के अनुसार इस संविधान को हमने अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया है। इसलिए हम ये मानते हैं कि भारत के संविधान में उसके आम नागरिक उसकी सबसे बड़ी ताकत और सबसे प्रख्यात शख्सियत हैं। इसलिए हम आपको ये पत्र भेज रहे हैं।
आपने पिछले कुछ दिनों में लोकतंत्र और संविधान की रक्षार्थ जो सवाल उठाए हैं, देश की सरकार और संस्थाओं को नगारिकों के प्रति जवाबदेह बनाने की मुहिम शुरु की है वो काबिले तारीफ है, और इस मुहिम के लिए हम आपका अभिवादन करते हैं। हम जानते हैं कि पिछले कुछ सालों में भारत में लोकतंत्र पर हमले बढ़े हैं, और अब सरकार से सवाल करना लगातार खतरनाक होता जा रहा है। देश की संवैधानिक व ग़ैर संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार सरकार के पक्ष में करने के लिए उन पर दबाव बनाया जा रहा है, मीडिया संस्थानों का व्यवहार जो पहले से ही संतोषजनक नहीं था, उसे बिल्कुल की खराब कर दिया गया है। आज देश की साख, देश की मीडिया की साख पूरी दुनिया में लगातार गिर रही है, लोगों का लोकतंत्र की निष्पक्षता और न्याय के सम्मुख समानता के अधिकार पर से लगातार विश्वास उठता जा रहा है। पूरा देश लगातार एक आपदा के शिकंजे में दिखाया जा रहा है, और लगातार ये कोशिश की जा रही है कि देश के लोकतंत्र को कमज़ोर करके किसी खास व्यक्ति को इसके तारणहार के तौर पर प्रोजेक्ट किया जाए। हम मानते हैं कि ये जो डर का माहौल बनाया जा रहा है, ये लोकतंत्र के लिए, और नागरिक अधिकारों के लिए खतरा है।
पिछले दिनों चुनाव आयोग के कार्य पर जिस तरह के अकाट्य सबूतों के साथ आपने अपनी बात रखी और चुनाव आयोग को ये अवसर दिया कि वो भारतीय जनता के सामने, भारतीय लोकतंत्र और चुनावों के प्रति अपने कार्यशैली की पारदर्शिता और निष्पक्षता को साबित करे, ये भारतीय लोकतंत्र, भारतीय संविधान और भारत की जनता के प्रति आपके कर्तव्य के पालन की एक मिसाल है, और इसके लिए हम आपका अभिवादन करते हैं, और आपको ये विश्वास दिलाते हैं कि हम महती अभियान में हम आपके साथ हैं। चुनाव आयोग की ये एक बड़ी जिम्मेदारी है कि वो भारत की जनता के सामने निष्पक्ष निर्वाचन के सबूत पेश करे, बार-बार पेश करे, हर बार पेश करे। चुनाव आयोग से ऐसी मांग चुनाव आयोग की साख को और बढ़ाती है। चुनाव आयोग की जिस निष्पक्षता और पारदर्शिता की मिसाल पूर्व चुनाव आयुक्तों जैसे टी एन शेषण ने रखी, आज उसी निष्पक्षता और पारदर्शिता को खत्म किया जा रहा है। सरकार ने पहले ही मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को पूरी तरह अपने अधिकार क्षेत्र में लेकर इस पद की ग़ैर-दलीय भूमिका और चरित्र का खत्म कर दिया, साथ ही चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग को किसी भी घपले या अपराध की सूरत में सज़ा से बाहर करने का कानून बना दिया, जो इस बात की तरफ साफ संकेत है कि चुनाव आयोग में कुछ आपराधिक हो रहा है। इसके अलावा खुद चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता जाहिर करने की जगह, जवाबदेही से बचने के सभी हथकंडे अपना रहा है, कोई डाटा नहीं दे रहा है, सिर्फ सत्तापक्ष के प्रति अपनी वफादारी का प्रदर्शन कर रहा है। ये ना सिर्फ भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में बल्कि भारतीय जनता के प्रति चुनाव आयोग और चुनाव आयुक्त का विश्वासघात है।
राहुल जी, ये एक अजीब बात है कि जब भी आप चुनाव आयोग से सवाल करते हैं तो चुनाव आयोग एवं सत्ता द्वारा स्थापित मुख्य चुनाव आयुक्त का समर्थन करने के लिए सीधे सरकार और सरकार के मंत्री मंचों पर उतर आते हैं। वे तमाम स्वघोषित ”एमिनेंट पर्सनैलिटीज़” जिन्होने किसी भी अन्य विषय पर कोई राय नहीं जाहिर की, वे आज सत्ता द्वारा पोषित ”घुसपैठिया-बोगस वोटर” के नाम पर चुनाव आयोग के वोटिंग लिस्ट में गड़बड़ी पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें सत्ता का सीधा संरक्षण मिल रहा है, और तमाम बिकाउ मीडिया और चापलूस संगठनों ने इसे मुद्दा बना दिया है। इन्हीं घुसपैठियों का नाम लेकर बिहार चुनाव से ठीक पहले जिस हड़बड़ी में चुनाव करवाया गया था, उस घपले के परिणाम आपके सामने हैं, एक ऐसा अविश्वसनीय नतीजा जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जिसमें ऐसे संयोग हुए हैं कि जैसे ब्रहमा द्वारा सृष्टि के निमार्ण तक में संभव नहीं थे। इस सबके बावजूद, इन तमाम हमलों, आरोपो, को झेलने के बावजूद आप जिस हिम्मत और प्रतिबद्धता के साथ भारत के लोकतंत्र और जनता के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं, उसके लिए देश की जनता आपका अभिवादन करती है। और हम आपसे से ये अनुरोध करते हैं कि इन तथाकथित स्वघोषित ”एमिनेंट पर्सनैलिटीज़” के अर्नगल आरोपो और बेकार के खुले पत्रों का जवाब देने की कोई ज़रूरत नहीं है, कि हम, इस देश की जनता पूरी प्रतिबद्धता के साथ आपके समर्थन मंें खड़ी है और आपके इस हिम्मतवर अभियान के लिए आपका अभिवादन करती है।
राहुल जी, हम जानते हैं कि किसी भी लोकतंत्र को पुष्ट करने का सबसे कारगर तरीका है कि उसके प्रतिनिधियों को, उसके निर्वाचित पदाधिकारियों को, संस्थानों को लगातार उत्तरदायी बनाए रखना चाहिए। डॉ. राम मनोहर लोहिया का कथन था कि, ”अगर सड़कें खामोश हो जाएं तो संसद आवारा हो जाएगी।” लोकतंत्र के लिए, जनता के हक़-अधिकारों के लिए और संविधान को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए, आपके इस अभियान का समर्थन करते हैं और आपका अभिवादन करते हैं। भारत का लोकतंत्र उन संस्थाओं के भरोसे नहीं चलता है, जिन्हें इसे चलाने की जिम्मेदारी दी गई है, बल्कि भारत का लोकतंत्र उन नागरिकों की विरासत है, जिन्होने इसे पाने के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी है। इसीलिए ये भारत की जनता है जो इन संस्थानों को, जो लोकतंत्र के लिए कार्यरत हैं, उन्हें लगातार उत्तरदायी बनाए रखें, उससे लगातार सवाल करें, हर कदम पर उसे लोकतंत्र के प्रति विश्वास को साबित करने को प्रेरित करें। भारतीय लोकतंत्र को इसी जन प्रतिबद्धता पर साबित करने के लिए हम आपका अभिवादन करते हैं।
अंत में हम ये कहना चाहते हैं कि आज देश की सबसे बड़ी ज़रूरत है कि देश की हर संवैधानिक संस्था को एक बार फिर से याद दिलाया जाए कि वो भारत की जनता के प्रति हर पल, हर कार्य के लिए जवाबदेह है। ये भारत की जनता का अधिकार है कि वो हर संस्था से, हर निर्वाचित या मनोनीत प्रतिनिधि से सवाल पूछ सकती है, और उसे जवाब देना आपका कर्तव्य है। देश की साख, लोकतंत्र की साख, सवाल पूछने से नहीं घटती, बल्कि जवाब ना देने से, सवाल पूछने वाले पर आरोप लगाने से, सवाल पूछने वाले को प्रताड़ित करके, उसे जेल भेज कर, उसे अपराधी बनाने से घटती है, लोकतंत्र की साख सवाल पूछने को अपराध बनाने से घटती है। देश की साख सवाल देने की जगह सरकार की चापलूसी करने से घटती है।
हम सभी भारतीय नागरिकों से अपील करते हैं कि वे लोकतंत्र को बचाने की, उसकी साख को बचाने की इस मुहिम का हिस्सा बनें। सरकार के हर छोटे से छोटे हिस्से से सवाल करें, उसे उत्तरदायी बनाएं, हर संवैधानिक संस्था, चाहे वो चुनाव आयोग हो, या न्यायपालिका, चाहे वो राष्टपति भवन हो, या रिजर्व बैंक, यहा तक कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में सेना तक जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। ये स्वघोषित तथाकथित ”एमिनेंट पर्सनैलिटीज़” अपने अहंकार के चलते आपके अधिकारों और सवाल करने की आपकी क्षमता को खत्म करना चाहते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां बिना कोई सवाल पूछे खुद को एक अभिशप्त लोकतंत्र में जीने की आदत डालें, लेकिन हम भारत की जनता जिन्होने लगातार अपने अधिकारों के लिए लड़ाई की है, और जीत हासिल की है।
याद रखिए, अंग्रेजों से लड़ाई करने में, भारत को आजादी दिलवाने में, और भारत में लोकतंत्र की स्थापना में, भारत की इसी ग़रीब जनता का तन-मन-धन होम हुआ था। इसीलिए, भारत के लोकतंत्र की स्थापना करने वालों ने, संविधाान निर्माताओं ने भारत की जनता को, भारत के नागरिकों को संविधान में सबसे पहला, और सबसे उंचा स्थान दिया है। आजादी के लड़ाई में अंग्रेजों के प्रशासनिक कार्य करने वाले दरअसल उसी राज को कायम रखना चाहते थे। विडंबना ये है कि यही प्रशासनिक अधिकारी आज हमसे उम्मीद करते हैं कि ये हमें लोकतंत्र सिखाएं, लोकतंत्र के असली मायने हमें बताएं, और हम इनके ज्ञान और मेधा को स्वीकार कर लें।
प्रिय राहुल गांधी जी, हम भारत के लोग, भारतीय संविधान, भारतीय लोकतंत्र और भारतीय जन के अधिकारों और हक़ों की संरक्षा के इस संघर्ष के लिए आपका अभिवादन करते हैं और आपको अपना समर्थन पेश करते हैं।
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