शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

बड़ों का माफी - छोटन को फांसी

 


बचपन में एक दोहा पढ़ा था, छिमा बड़ेन को चाहिए, छोटन को उत्पात। यहां बड़े भाई रहीम कह रहे हैं कि जो बड़ेन होते हैं, उन्हें क्षमा किया जाना चाहिए और ये जो छोटन होते हैं, उनकी जिंदगी में हमेशा उत्पात होना चाहिए। होता क्या है ना भाई कि बड़ेन की जिंदगी में ऐसे ही बहुत कुछ होता रहता है, और वो लागतार कुछ ना कुछ करते रहते हैं, जैसे मौज आई तो नोटबंदी कर दी, या यूं ही मजे मजे में बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ कर दिया, स्वच्छ भारत चला दिया, स्मार्ट सिटी शुरु कर दिया, अमृतकाल कर दिया, और कुछ ऑपरेशन कर दिया।  ये बड़ेन क्योंकि मजे मजे में बहुत कुछ करते हैं, इसलिए बहुत संभव है कि उनके बहुत सारे कामों में से कुछ काम ग़लत हो जाएं, खराब हो जाएं, तो उन्हें माफी की ज़रूरत होती है, हो सकता है बड़े भाई रहीम बहुत साल पहले से ये जानते हों, आखिर वो भी तो महमान अकबर के दरबारी थे, इसलिए वो बड़ेन को माफी देने की वकालत कर रहे हों। 

बड़ेन को माफी इसलिए भी लगती है कि आप यूं भी उनका कर ही क्या सकते हैं। मान लीजिए बड़ेन की किसी ग़लती की वजह से हज़ारों-लाखों की संख्या में हवाई उड़ाने रद्द हो जाती हैं। लाखों यात्रियों को माली नुक्सान होता है, लोग रोते हैं, बिलखते हैं, छटपटाते हैं। लेकिन आप बताइए क्या कर लीजिएगा, अंततः आपको बड़ेन को माफ करना ही होगा। यही व्यवस्था है, यही सिस्टम है, यही होता है। 


आपको याद है एक समय में कोविड हुआ था, श्मशान घाट के बाहर शवों की लाइन लगी हुई थी बाबा, चौबीस घंटे का वेटिंग पीरियड हो गया था। पूरा देश मुर्दाघर जैसा हो गया था, लोग हजारों किलोमीटर की यात्रा कर रहे थे कि मरें भी तो आखिर घर जाकर। लेकिन आखिरकार क्या हुआ, बड़ेन को माफी मिल गई। अब इसमें होता कुछ यूं है कि बड़े भाई रहीम के दोहे के हिसाब से बड़ेन माफी मांगता भी नहीं है, लेकिन उसे स्वाभाविक माफी मिल जाती है। ना कोई माफी मांगता है, ना कोई माफी देता है, पर मिल जाती है, माफी, क्योंकि छिमा बड़ेन को चाहिए। अगर आप किसी बड़ेन को माफी नहीं भी देंगे तो वो आपसे माफी खोंस लेगा, यानी छीन लेगा, इसके लिए भी हिन्दी में एक कहावत है, जबरा मारे और रोने भी न दे। इस कहावत में जो जबरा है, मेरे ख्याल में बडे़ भाई रहीम के दोहे में वही बड़ेन है। ये जो बड़ेन है, ये मारता है ओर रोने पर अनिष्ट भी कर सकता है। इसलिए बड़ेन ग़लती करता है, क्योंकि उसे पता है कि माफी तो मिल ही जानी है, माफी उसका अधिकार है, उसका हथियार है। वो नोटबंदी करता है और फिर तुम्हारी मुसीबत पर हंस सकता है।


और जब तुम मर जाते हो तो बड़े ही नाटकीय तौर पर सजा पाने की घोषणा कर सकता है

क्योंकि उसे पता है कि सज़ा मिलना तो क्या, उसे सज़ा देने के बारे में तुम सोच भी नहीं सकते, और अंततः तुम्हे उसे माफ करना ही पड़ेगा, क्योंकि छिमा बड़ेन का चाहिए। बड़ेन का छिमा का ये कंसेप्ट सदियों से चला आ रहा है, और आगे भी यूं ही चलता रहेगा ऐसी प्रबल संभावना है। वजह वही जो पहले बताई है कि आखिर आप क्या ही कर लेंगे बड़ेन का। 
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दूसरी तरफ छोटेन का मामला ही उल्टा है, बड़े भाई रहीम ने कहा, छोटन को उत्पात। यहां इस दोहे में उनके कहने का मतलब है कि ये जो छोटन हैं, इनके जीवन में हर समय कोई ना कोई उत्पात लगा रहना चाहिए। क्यों ? क्योंकि इनके जीवन में अगर आराम हो जाए तो इन्हें दिक्कत हो जाती है। छोटन की बड़ी दिक्कत ये है कि ये लोग संतोष के साथ जीना नहीं सीखते, जबकि संतोष को लेकर जितनी भी कहावतें बनाई गई हैं, वो इन्हीं छोटन को हद में रहने की हिदायत देती हैं। कहावतें जैसे
संतोषी सदा सुखी
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान
आदि आदि
यानी छोटन को हमेशा कहा गया है कि लला, थोड़ा संतोष में रहोगे तो फायदे में रहोगे, कम से कम जीवित रहोगे, जरा आगे की मत सोचो, जितना मिला उसमें संतोष करो और जिंदगी काट लो, वरना जो मिला है वो भी छिन जाएगा और जान से जाओगे सो अलग। छोटन का बड़ा प्रॉब्लम है कि वो इन कहावतों में भरोसा नहीं करते, और ज्यादा की मांग करने लगते हैं। जैसे अभी पता चला दिल्ली में साफ हवा मांग रहे हैं। इन्हें लगा कि इंटरनेट मिल गया, बिजली मिल गई, पानी मिल गया, तो साफ हवा तो मिलनी चाहिए। लगे इंडिया गेट पर शोर मचाने। बस बड़ेन ने फौरन धर दबोचा, अब झेल रहे हैं अपने साफ हवा के हक़ की मांग करने की सज़ा।


इतिहास गवाह है कि जब भी छोटन को भरपेट खाना मिला है, तब-तब उसने जीवन की और सुख-सुविधा के लिए नारे लगाए हैं। जैसे इस देश में लोकतंत्र आया तो उसके बाद इसी छोटन ने जमीन पर हक़ के लिए नारे लगाए, संघर्ष किया, लड़ाई लड़ी, हुआ क्या, एक पूरी पीढ़ी गायब कर दी गई, और आज तक नक्सल के नाम पर प्रो. जी एन साईबाबा, से लेकर गौतम नवलखा तक जेल की साफ हवा में सांस दिया जा रहा है, एक थे स्टेन स्वामी, भले मर गए, लेकिन किसी बड़ेन ने माफी तो दूर, उनकी हत्या की जिम्मेदारी तक ना ली अपने सिर पर, उमर खालिद समेत तमाम बच्चों को सिर्फ इसलिए जेल की उड़द दाल का स्वाद मिल रहा है कि छोटेन होकर संतोष नहीं किया। लगे आज़ादी और ग़रीबों के हक़-अधिकार की आवाज़ उठाने। लेकिन ग़लती इनकी भी नहीं है, ये चरित्र होता है छोटेन का, इन्हें शिक्षा दो तो ये हक़ मांगते हैं, भरपेट खाना दो तो वोट करने का अधिकार मांगेगे, और थोड़ा पढ़ने-लिखने दोगे तो और ज्यादा आज़ादी और अधिकार मांगेगे। इसलिए बड़े भाई रहीम ने कहा था कि छोटेन के जीवन में हमेशा कोई ना कोई उत्पात होना चाहिए, ताकि आज़ादी, प्राइवेसी, साफ हवा, के बारे में शोर नाम मचाएं। छोटन की दिक्कत ये है कि जिंदगी में आराम हो तो दिमाग शैतान का कारखाना बन जाता है। यानी छोटन को जब-जब सुविधाएं मिलती हैं, यानी जब भी उनके जीवन में उत्पात नहीं होता, वो सरकार से अजीब-अजीब मांग करने लगते हैं। 


अभी बड़ेन ने एस आई आर करवाया, एस आई आर माने, ये तय किया जाएगा कि किसे वोट करने दिया जाए और किसे नहीं, अब छोटन शोर मचा रहे हैं कि हमारा वोट का अधिकार छीना जा रहा है। ये जो कुकर्म हैं, छोटन के, इसी वजह से इनके जीवन में उत्पात की ज़रूरत बनती है। अबे वोट करके ही तुम क्या कर लोगे बे, मैं तो कहूं ये जो इन्हे मुफ्त राशन दिया जा रहा है, उसे बंद करो, जैसे ही पेट की भूख सताएगी, सब वोट-फोट भूल जाएंगे। मेरी बात का यकीन नहीं है तो इन्हें देखिए 


ज़रा पढ़-लिख गईं तो लगी बड़ेन की नाक में दम करने। अब इन्हें वो सारे हक़ चाहिएं, जो बड़ेन के पास हैं, कैसे चलेगा? इसीलिए कहता हूं कि वही पुरानी स्टाइल ठीक थी, बड़ेन के पास सबकुछ हो, और छोटन के पास जीवन पूरा करने का संघर्ष हो। इन्हें खाने को मत दो, पढ़ने मत दो, सोचने-समझने मत दो। तभी ये छोटन काबू में रहेंगे, आपको याद होगा कि किसानों ने दिल्ली को घेर लिया था, दिल्ली को, बताइए, बड़ेन की नाक में दम हो गया था। उस वक्त बड़ेन की सबसे बड़ी परेशानी थी कि ये जो छोटन हैं, किसान हैं, ये खाना कैसे खा ले रहे हैं, भूखे क्यों नहीं मर रहे, सुंदर क्यों दिख रहे हैं, और तमाम आरोप लगा दिए बड़ेन ने इनके उपर....जैसे
खालिस्तानी हैं ये लोग, किसान ही नहीं हैं, बाहरी ताकते हैं जो इन्हें उकसा रही हैं।
लेकिन असली बात किसी ने नहीं पकड़ी। असली बात ये है कि इन छोटन के जीवन में उत्पात नहीं था, मुसीबत नहीं थी, इन्हें काबू में करना है तो इनके जीवन में उत्पात होना चाहिए, वरना ये बड़ेन का परेशान करेंगे। कहेंगे कि खेत और फसल की सही क़ीमत दो, आदिवासी होंगे तो कहेंगे कि जंगल, पहाड़, नदी और ज़मीन बचानी है। इन्हें काबू में करने का सही तरीका यही है कि सुप्रीम कोर्ट में जो बड़ेन बैठे हैं, उनके सामने इन्हें खालिस्तानी और नक्सली का ठप्पा लगाकर पटक दो, साबित कुछ नहीं करना, सारा जीवन बीत जाएगा भाई साहब, ये बाहर नहीं आ पाएंगे। आखिर सुप्रीम कोर्ट में भी बड़ेन बैठे हैं, और संसद में भी, और तो और मीडिया भी असल में बड़ेन के ही पास है। कौन क्या कहेगा?


खैर साहब फिर से आते हैं अपने असली दोहे पर, यानी बड़े भाई रहीम ने लिखा था, छिमा बड़ेन का चाहिए, छोटन को उत्पात, तो ये छोटन का उत्पात ही दरअसल बड़ेन की शंाति है। बड़ेन की शांति ही दरअसल देश की शांति होती है, और देश की शांति दरअसल छोटन की मंाग और संघर्ष की खामोशी का संकेत हैं। 

खैर चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, वो भी बड़े भाई रहीम की तर्ज पर एक संुदर शोर कह गए हैं, सुनिए
बड़े बड़े लोगन के मोटरगाड़ी
और हीरो होण्डा अलग से
हम्मन गरीबन के साइकिल जुलुमवा
चलने में टायर फटे फट से

अब आप इसका तर्जुमा कीजिए कि चचा आखिर कहना क्या चाहते थे, लेकिन बड़े भाई रहीम पक्का यही कहना चाहते थे कि छोटन की जिंदगी में उत्पात मचा के रखिए ताकी देश में शांति रहे। बाकी आपकी मर्जी। 

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

महामानव की जादूई नज़रें

देखिए, नईं आप ज़रा देखिए ये विपक्षियों के डरामे को। महमानव चाहते हैं कि सरकार हर वक्त आपकी हथेलियों में रहे, इकतरफा रहे, लेकिन रहे, और ये विपक्षी मोहतरमा इसे स्नूपिंग एप बता रही हैं।
महामानव चाहते हैं कि वो हर वक्त, हर क्षण, हर घड़ी आपके साथ रहें, आपके फोन में रहें, और ये विपक्षी, ये कांगी, ये वामी चाहते हैं कि ऐसा ना हो, बताइए ये कोई बात हुई भला। जब महामानव खुद को अवतार घोषित कर चुके हैं। तो वे चौथाई या उससे ज्यादा ईश्वर तो हो ही चुके हैं। अब ईश्वर तो जनाब सर्वव्यापी होता है, सर्वज्ञानी और अंर्तयामी होता है। जैसे महामानव ईश्वर हुए हैं, वैसे ही वो सर्वज्ञानी और अंर्तयामी होना चाहते हैं, तो इन्हें इसमें भी प्रॉब्लम है। अरे इस देश में कोई है जो इस घोर कलियुग में महामानव से ईश्वर होने की जुगत लगा रहा है और ये दिलजले हैं कि इन्हें चैन नहीं पड़ता। संचार एप के ज़रिए महामानव चाहते हैं कि सरकार को आपकी इच्छाओं का, आपकी आकाक्षांओं का पता रहे, आप किससे बात कर रहे हैं, क्या बातें कर रहे हैं, क्या आपको कोई शिकायत तो नहीं है?, क्या आपकी कोई दबी, ढंकी, छुपी इच्छा तो नहीं है? महामानव को सबकुछ पता होना चाहिए। ताकि समय रहते आपको ठीक किया जा सके.....मेरा मतलब, मेरा कहने का मतलब है कि समय रहते आपकी इच्छाएं पूरी की जा सकें। आज के दौर में दोस्तों जब महामानव ईश्वर होने में पूरी ताकत लगा रहे हैं, ये विपक्षी महामानव की इत्ती सी इच्छा पूरी नहीं होने दे रहे।
ये सब आपको झूठ बता रहे हैं, अरे भई हर वक्त आप सरकार की नज़र में रहेंगे तो आपका ही तो फायदा है, आप कितना पैसा कमा रहे हैं, कितना टैक्स चुरा रहे हैं, किससे क्या बातें कर रहे हैं, ये सब तो सरकार को पता होना चाहिए। देखो यार अगर तुम ठीक हो, महामानव से खुश हो, यानी उनके बारे मे सब भला-भला बोल रहे हो, सोच रहे हो, तो सब ठीक ही ठीक है। तो तुम्हे डरने की ज़रूरत ही क्या है? डरे वो जो महामानव की आलोचना करता हो, सरकार की आलोचना करता हो, ऐसा करने वाले को तो वैसे भी जेल भेज देने की ज़रूरत है। अभी हो क्या रहा है कि लोग महामानव की आलोचना कर रहे हैं, बेकार मे ंकर रहे हैं, लेकिन कर रहे हैं। यार ये तो वैसे भी ठीक बात नहीं है कि देश मे महामानव की आलोचना की जाए। पर ज़रा सोचिए, अगर ये संचार एप आपके फोन में आ जाएगा, तो चुनाव आयोग को ये एस आई आर करने की ज़रूरत नहीं होगी, महामानव को पहले ही पता होगा कि कौन किसे वोट कर रहा है, बस इत्ती सी बात है। आप महामानव की आलोचना करने से बचेंगे, और सरकार को पहले से ही पता चल जाएगा कि कौन, किसकी, कहां, कब, कैसे आलोचना करना चाहता है। लोकचंद्र को बचाने के लिए साथियों, संचार एप जरूरी है। ये जो संचार एप का विरोध कर रहे हैं, ये लोकचंद्र के दुश्मन हैं, महामानव और उनकी टीम जो सभी मोबाइलों में संचार एप डालना चाहती है, वो लोकचंद्र को बचाना चाहती है। देखिए अभी क्या होता है कि कोई ज़रा कोई नारा लगाता है, या कहीं भाषण देता है, या कोई फेसबुक पोस्ट करता है, तब जाकर पुलिस हरक़त में आती है। लेकिन अगर संचार एप आ गया तो नारा लगाने से पहले ही पुलिस यानी सरकार आपको अरेस्ट कर लेगी, और फिर आपके नक्सली लिंक का पता लगाएगी। आपने ज़रा सरकार की आलोचना के बारे में सोचा तो पुलिस फौरन आपको अरेस्ट कर लेगी और फिर आपके नक्सली लिंक का पता लगाएगी, आपने फेसबुक पर या ट्विटर पर कुछ लिखने की सोचा, या शेयर करने की सोचा तो पुलिस फौरन आपको अरेस्ट कर लेगी और फिर आपके नक्सली लिंक का पता लगाएगी। जरा सोच के देखिए, आपके पास एक मोटरसाइकिल है, और आप अपने दोस्त से कह रहे हैं कि आप सिर्फ दो सौ रुपये का पैटोल डलवाने की सोच रहे हैं, क्योंकि पैटोल बहुत महंगा है। अब जब अपने दोस्त से ये बात कर रहे होंगे तो आपका फोन आपकी जेब में होगा, जिसमें संचार एप होगा, जिसके ज़रिए आपकी ये बात पुलिस के कानो तक पहुंचेगी। बस पुलिस फौरन आपको अरेस्ट कर लेगी, क्योंकि पैटोल की कीमतों के बारे में बात करना तो सरकार की आलोचना करना है, और सरकार की आलोचना करना तो नक्सल होना है। बस हो गए आप अर्बन नक्सल। कित्ती सीधी सी बात है। अब ज़रा सोचिए, देश की सीमा पर सैनिक लोग अपना सब कुछ निछावर करने को तैयार खड़े हैं, और आप हैं कि आपको अपनी निजता की पड़ी है, अपनी आज़ादी की पड़ी है। अरे ये मत सोचो की महामानव ने आपके लिए क्या किया, आप तो ये सोचो कि आपने महामानव के लिए क्या किया? आप ये नहीं सोचते कि संचार एप से आपकी निजता जाएगी, लेकिन महामानव की अमरता तो बनेगी। अब आप ही बताइए, आपकी दो टके की निजता के मुकाबले महामानव की अनश्वरता, उनके ईश्वर होने का दावा, ज़रूरी है या नहीं। चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, निजता के यानी प्राइवेसी के वो बिल्कुल खिलाफ थे, प्राइवेसी के नाम से तो उन्हें कतई चिढ़ मची हुई थी, इसलिए संचार एप के लिए उन्होने एक शानदार शेर लिखा था। हर पल मेरे हर हाल पे नज़र रखें सरकार आपमें मुझे तो खुदा दिखें संचार एप डाल के मेरे मोबाइल में वो कह रहे हैं लोकचंद्र है ये चखें आलोचना नहीं होगी तो लोकचंद्र बरबाद हो जाएगा चचा भी यही मानते थे, लोकचंद्र के वो कतई खिलाफ थे, कहते थे अमां मोबाइल में डालो संचार एप और प्राइवेसी को प्राइवेटाइजेशन की जेब में डाल दो, सारे झगड़े-टंटे मिट जांगे। बस उसी पर चलाओ लोकचंद्र की सवारी, जब तक चलती हैं और फिर हंस देते थे। ये तो खैर चचा की बात है, कहां तक करेंगे। आप तो मोबाइल पे संचार एप डाल कर मजे लो तरकारी के ।हम चले, फिर मिलेंगे अगर संचार एप ना डला तो।

बुधवार, 7 जनवरी 2026

डॉलर फिर चढ़ा

 




 सुना डॉलर फिर उपर चढ़ गया। हालांकि ये कॉमी, वामी, कांगी, और सनातन विरोधी देश और दुनिया के पत्रकार ये कहते सुने गए हैं कि रुपया नीचे आया है। लेकिन जैसा कि देश की महान अर्थ मंत्री निर्मला जी सीतारमन बता चुकी हैं कि रुपया नहीं गिरा है, डॉलर चढ़ गया है। 




अब सवाल ये है कि देश की जनता को डॉलर की इस चढ़ाई पर खुशी मनानी चइए कि नई मनानी चइए। भई जब देश में डीयर फ्रेंड डोलांड का जन्मदिन मनाया जा सकता है, डीयर फ्रेंड डोलांड की जीत के लिए नारे लगाए जा सकते हैं, तो जाहिर है डोलांड की करेंसी यानी डॉलर की चर्ढ़ाइ पर खुशियां भी मनाई जा सकती हैं। 




देश की समृद्धि इसी बात से जाहिर है कि सुना आई एम एफ नाम की एक संस्था है, इंटरनेशनल मोनेटेरी फंड जिसने रुपये की बेइज्जती की है। अब रुपये की बेइज्जती की गई तो बर्दाश्त थोड़े ही किया जाएगा, ठीक है डॉलर उपर चढ़ रहा है, हमें खुशी है कि हमारे डीयर फ्रेंड की करेंसी उपर जा रही है, लेकिन हम अपनी करेंसी की बेइज्जती नहीं सहेंगे, फौरन आर बी आई ने मोर्चा संभाला, और डॉलर की पूंछ पकड़ के थोड़ा सा नीचे गिरा दिया। हम लहुसन प्याज ना खाने वाले सनातनी हिंदू जो हैं, वो इसी तरह काम करते हैं, थोड़ा लटक-झटक कर, थोड़ा मटक-मटक कर। खैर डॉलर जो उपर जाता हुआ इतरा रहा था, उसकी तो हमने नटकन कम कर दी। हालांकि इससे भारत की करेंसी को घिसटने वाली व्यवस्था से बाहर नहीं निकाला जा सका, लेकिन जैसा कि निर्मला ताई ने कहा था।




रुपये के बारे में भ्रम फैलाने वाले सबको जेल भेजा जाएगा, कल तक अमरीका कहता था तुम क्या हो, आज जैसे ही हमने डॉलर को उपर चढ़ने से रोका हर भारतीय के, खासतौर पर सनातनी भारतीय के पेट से आवाज़ निकली





अच्छा रुपये की इस हालत से आप पर क्या फर्क पड़ा, ये सब फालतू बातें हैं, देखिए जी डी पी की ग्रोथ लगभग नौ नंबर को छू रही हैं, क्या इससे आपकी सेहत पर कोई फर्क पड़ रहा है? या फिर भारतीय अर्थव्यवस्था कदम-कदम करके पांचवे से चौथे, और चौथे से तीसरे पायदान पर चढ़ रही ह, इससे आपकी सेहत पर कोई फर्क पड़ रहा है क्या? नहीं, पैटोल वही नब्बे के उपर मिल रहा है, शायद जल्दी ही सौ पार हो जाए, दाल-चावल-आटा महंगा हो ही रहा है, लेकिन उससे भी आपकी सेहत पर तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि अभी से ही करोड़ों परिवारों को हर महीना पांच किलो राशन मिल रहा है, कुछ दिन बाद हर परिवार को इसी राशन पर जीने का विकल्प मिलेगा। हर परिवार को महामानव की तस्वीर वाला एक झोला मिलेगा जिसमें पांच किलो राशन होगा, बस तीन दिन तो काम चलेगा, बाकी हरि भजन करो। 




अब जिस जनता को महामानव पांच किलो राशन दे दें, वो क्यों तुम्हारे जी डी पी, और पी एच डी के झंझट में पड़ेगी भई। जनता के लिए सब सुखमय है, सब शानदार है, सब महामानवीय है। तुम क्यों इन वामियों की बातों में आते हो, तुम बाबा अनिरुद्धाचार्य की बातों में आओ, सनातन और भगवाए हिंद वाले बागेश्वर धाम की बातों में आओ, ज्ञानपीठ वाले पतित और नीच ब्राहमणों की सूचि निकालने वाले रामभद्राचार्य की बातों में आएं, क्यों बेकार ये जी डीपी समझने में लगे हैं। सच मानिए सब सनातन के हाथों में है तो सब शुभ ही होगा। 

अभी देखिए भारत की अर्थव्यवस्था को चरम पर पहुंचाया जाएगा, जब भारतीय अर्थव्यवस्था चरम पर पहुंच जाएगी, तो भारत विश्वगुरु बन जाएगा, अभी तो सिर्फ जापानियों को चकमा दिया गया है, अभी बाकी देश भी कतार में लगे हुए हैं।  हम धीरे-धीरे सबको नीचे कर देंगे, आप बस देखते रहो। 

खैर डॉलर के उपर जाने की, ध्यान दीजिएगा, रुपया नीचे जाने की नहीं, बल्कि डॉलर के उपर जाने के कुछ विशेष कारण हैं, कारण जैसे देश में धर्म का हड़ास हो रहा है, आप ही देखिए आज से दस-पंद्रह साल पहले तक लोग कितनी सत्यनाराण की कथा करवाते थे, लीलावती और कलावती की कथा सुनते थे, पंजीरी खाते थे, चरणामृत पीते थे, और पंडीजी को दान-दक्षिणा देते थे, अब नहीं दे रहे। इसलिए दोस्तों, इसलिए इस देश की मुद्रा का जिसे अंग्रेजी में करेंसी कहते हैं, हड़ास हुआ जा रहा है। 
लेकिन महामानव ने उसका भी उपाय निकाला है, अयोध्या में ध्वजारोहण कर दिया है, जिसकी वजह से डॉलर की थोड़ी बहुत टूटन संभव हो पाई है। लेकिन, लेकिन, लेकिन, अभी काम पूरा नहीं हुआ है, इसी वजह से मितरों, सनातन की रक्षा के लिए पदयात्रा करने वाले बागेश्वर बाबा के पैरों में छाले पड़ गए, और बिचारे को पश्चिमी दवाओं का सहारा लेना पड़ा, आफत इस कदर हो गई कि सुना उनके प्रवचनों में से रजाई-गद्दे चोरी होने लगे, बताइए धरम का ऐसा हड़ास होगा तो रुपया कैसे उपर चढ़ेगा। अब बताइए एक चमत्कार तो महामानव और निर्मला ताई के किए हो गया कि रुपया लगातार नीचे जा रहा था, लेकिन अर्थव्यवस्था लगातार उपर जाती जा रही है। अब मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं, इसलिए मेरी इल्तिजा है कि भई अगर कोई इस चमत्कार को एक्सप्लेन कर सके तो जरूर करे, कि जिस देश की करेंसी नीचे जा रही हो, उसकी अर्थव्यवस्था लगातार उपर कैसे चली जा रही है। और देखिए बेकार की तकनीकी बातें मत कीजिएगा, इस तरह बताइएगा कि कोई चौथी क्लास का बच्चा, या मान लीजिए महामानव भी समझ सकें कि ये चमत्कार हो कैसे रहा है। 

खैर जनाब, हमें तो इसी बात की खुशी है कि महामानव के होते, उनके डीयर फ्रेंड की करेंसी यानी डॉलर उपर जा रहा है, बाकी निर्मला ताई ही इस बार भी समझाएंगी कि कैसे रुपया नीचे नहीं जा रहा है, बल्कि डॉलर उपर जा रहा है, आप रुपया मत देखिए, चश्मा गिर जाएगा, आप डॉलर देखिए ताकि टोपी गिर सके, या पगड़ी जिसे अंग्रेजी में इज्जत भी कहते हैं नीचे गिरने का खतरा हो तो वो भी मत देखिए, आप तो बाबा बागेश्वरधाम के पैरों के छाले देखिए जो पदयात्रा से हो गए, और उन्हें अस्पताल भर्ती होना पड़ा।

बकी चचा जो थे हमारे वो बहुत उम्दा एक शेर कह गए हैं इस मामले में, आप भी सुन लीजिए

डॉलर उड़ा, उड़ता ही गया, उड़ता ही गया
करेंसी और भी थी आसमान में बहुत सारी
रुपये का मत पूछो मेरे हमदम हाल ओ हिसाब
वो तो बस लुढ़कने में यकीन रखता है।

वाह, वाह भई वाह, चचा ने दिल जीत लिया। खैर हमारी यही दुआ है कि आई एम एफ जैसी संस्थाओं का झूठ पकड़ा जाए, और रुपये की इज्जत सबसे नीचे जाकर भी बनी रहे, बाकी जो है सो हइये है।
नमस्कार।  

शनिवार, 3 जनवरी 2026

महामानव और नक्सली लिंक




नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। दिल्ली में समस्या खत्म नहीं हो रही, बल्कि बढ़ती जा रही है। एक तो सी एम और फिर पी एम को परेशान करने वाला प्रदूषण तो कम नहीं ही हो रहा, साथ में इस प्रदूषण पर प्रदर्शन करने वालों ने और जान खा रखी है। दिल्ली पुलिस का काम बढ़ाते हैं ये सारे। ये प्रदूषण का विरोध करना, प्रदूषण के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराना, ये सब पिछले साल तक ठीक था, लेकिन अब जबकि माननीय रेखा जी गुप्ता की सरकार है और उनके पति ये सरकार चला रहे हैं, तब आप ही बताइए, क्या दिल्ली की जनता के लिए ये प्रदूषण के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराना क्या सही बात है? नहीं, नहीं, आप ही बताइए, क्या ये सही बात है कि आप रेख जी गुप्ता को, उनके सिर पर जिनका वरदहस्त है, ऐसे महामानव को, दिल्ली के प्रदूषण का जिम्मेदार बताएं। ना भई ना, ये कतई हिंदू राष्ट के, सनातन के और सबसे बड़ी बात देश के खिलाफ बात आप करते हैं। मजबूर होकर रेखा जी गुप्ता को कहना पड़ा कि भई इस प्रदूषण से निपटने के लिए दिल्ली की जनता को ही कदम उठाने होंगे। 



महामानव इस दौरान किसी आयोजन के लिए विदेश भ्रमण करने गए हैं, जब आएंगे तो भी उनका मन होगा तो कुछ कहेंगे, वरना जब वो मणिपुर जैसे संगीन मसले पर कुछ ना बोले तो दिल्ली के प्रदूषण पर तो क्या ही बोलेंगे। पर ये कुछ वामपंथी हैं, कुछ साइंटिस्ट वगैरह हैं, जो बकौल मुख्यमंत्री, केन्द्र सरकार, दिल्ली पुलिस और कुछ बहुत ही समझदार लोगों के अनुसार छात्रों को भड़का रहे हैं, कि वे प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन करें। आप ही बताइए, ज़रा हवा जहरीली हो जाने से आपको कोई अधिकार थोड़े ही मिल जाता है कि आप इंडिया गेट पर जाकर प्रदर्शन करने लगें। 




और प्रदर्शन भी कैसा जिसमें घनघोर नक्सली माडवी हिड़मा के समर्थन में नारे लगे। हमारे एक बहुत ही शानदार बुद्धिजीवी मित्र ने सही ही कहा, कि यार तुम्हें मान लो बहुत लग रहा था कि प्रदूषण के खिलाफ कुछ करो, तो करते, ये बीच में किसी आदिवासी को मार दिया तो उसके लिए नारे क्यों लगा रहे हो। ये सब छात्रों को बरगलाने वाले वामपंथी करते हैं, इन्हीं मित्र ने बताया कि इन्हें भी ऐसे ही बरगलाया गया था, वो तो सही समय पर ये उन गलियों से वापस आ गए और वामपंथी नहीं बने, वरना बताइए वे भी आज ऐसे ही नारे लगा रहे होते। खुदा खैर करे, इनके लिए ईश्वर की कृपा से सब कुशल रहा, कि ये वामपंथी नहीं बने और आज ठीक-ठाक खा कमा रहे हैं। मैं विषय से भटक रहा हूं, तो वापस विषय पर आते हुए, कहना चाहता हूं कि मुझे भी बहुत बुरा लगा कि भई ये माडवी हिड़मा को सरकार ने मारा, सेना ने मारा, या अर्धसैनिक बलों ने अपना शौर्य दिखाया, और ये छात्र, नालायक छात्र महामानव के शौर्य की जगह, माडवी हिड़मा के लिए नारे लगा रहे हैं। कतई देशद्रोही काम है साहब।


वो तो भला हो पुलिस का कि इन्हें मौके पर गिरफ्तार कर लिया। बेमौके भी गिरफ्तार करते तो कोई क्या ही कर लेता, लेकिन भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती देखिए, सत्ता की नरमदिली देखिए कि इन्हें मौके पर गिरफ्तार किया गया। उससे भी बढ़कर इन्हें टॉर्चर नहीं किया गया, बल्कि जज के सामने पेश किया गया, जज को समझाया गया कि भई ये लोग लाल सलाम के नारे लगा रहे थे, माडवी हिड़मा के लिए नारे लगा रहे थे, जिससे साफ पता चलता कि इनका कोई नक्सली लिंक है। तो जज साहब ने कहा कि चलो ठीक है, दो दिन इन्हें रिमांड पर लो और इनके नक्सली लिंक का पता लगाओ। अब पुलिस जो है वो इन छात्रों के नक्सली लिंक का पता लगा रही है। 



ये आजकल नक्सली लिंक बहुत हो जा रहा है लोगों का, ये हमारी पुलिस और जज इत्ते समझदार, इत्ते कर्मठ ना होते तो भाई साहब सोचिए देश का क्या होता, चारों तरफ नक्सली लिंक ही नक्सली लिंक होता। नक्सली लिंक के बारे में मैं बताउं आपको, अगर आप एक्सपर्ट ना हों तो आपको बिल्कुल पता नहीं चलता कि किसका नक्सली लिंक होता है। इसीलिए पुलिस वाले पहले पकड़ते हैं, फिर नक्सली लिंक का पता लगाते हैं। उसमें भी कई बार तो ये हो जाता है कि नक्सली लिंक मिल कर ही नहीं देता, तो फिर ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। आपको याद होगा सोनी सोरी के केस में क्या हुआ था, नक्सली लिंक ढूंढने के चक्कर में पुलिस को, इस देश की शानदार पुलिस को, क्या-क्या करना पड़ा था, उस आदिवासी महिला के साथ, मुझे तो ये भी नहीं पता कि नक्सली लिंक मिला भी कि नहीं। खैर मेरा ख्याल है कि अगर पुलिस वैसा ही व्यवहार इन गिरफ्तार छात्रों के साथ करे, तो शायद नक्सली लिंक मिल जाए? क्यों आपका क्या ख्याल है? 

भई मेरा तो ये मानना है कि ये पिछले सत्तर-अस्सी सालों में ये नक्सलियों ने खूब हल्ला काटा है, और अब जब हजारों साल बाद कोई सनातन का रक्षक, हिंदू शेर राजा गद्दी पर बैठा है तो ये निकल-निकल कर आ रहे हैं। अब इन्हें रोज़ पकड़ना, रोज़ पहचानना और फिर इनके नक्सली लिंक ढूंढना बहुत ही जांमारी वाला काम हो जाता है। तो मेरा तो ये सुझाव है कि इन सबको पकड़ लिया जाए। यानी गिरफ्तार कर लिया जाए, और जज जो हैं वो इन्हें जेल भेज दें, ओर इनसे कहा जाए कि बेटा जी अब तुम साबित करो कि तुम्हारा नक्सली लिंक नहीं है, वरना ये डिफॉल्ट माना जाए कि इन सबका नक्सली लिंक है, और ये देश के लिए खतरा हैं। 

अब कुछ लोग कहेंगे कि कपिल भाई ये ज्यादा हो जाएगा, इत्ते लोगों को पकड़ेंगे कैसे, और कहां रखेंगे। तो मेरे पास उसका भी इलाज है। ये जो वामपंथी टाइप लोग होते हैं ना, इनकी कुछ खास पहचान होती हैगी। बस इसी पहचान के आधार पर इनकी धरपकड़ हो, और धरपकड़ के बाद इन्हें सीधा किया जाए। अब जैसे एस आई आर हो रही है, उससे भी मदद ली जा सकती है। पर पहले तो आप इनकी पहचान सुन लीजिए, जिन्हें आपको पहले गिरफ्तार करना है, और फिर उनका नक्सली लिंक ढूंढना है।

तो सुनिए

1. ये पढ़ते हैं। जी हां, ये सारे नक्सली टाइप लोग, पढ़ते-लिखते हैं, मतलब कहानियां पढ़ते हैं, कविताएं पढ़ते हैं, इतिहास, विज्ञान, साहित्य, सबमें इनकी रुचि होती है। अपने-अपने सबजेक्ट के अलावा और भी सारे सबजेक्ट के बारे में जानना इनकी रुचि होती है। तो बस इनसे किसी अच्छे लेखक का नाम और उसकी किसी कहानी या कविता का नाम पूछिए, अगर ये बता दें, तो बस गिरफ्तार कर लीजिए। इसमें तो मान लीजिए सीधा सा हिसाब है, पढ़ते - लिखते हैं, तो पक्का समझदार होंगे, समझदार होंगे तो पक्का नक्सली लिंक होगा।
2. इनसे पूछिए कि अगर किसी पर अत्याचार हो, तो क्या तुम्हारा दिल दूखता है, क्या तुम उसके लिए आवाज़ उठाओगे? अगर जवाब हां में है तो सबकुछ छोड़ कर पहले इसे गिरफ्तार करो। ऐसा जवाब देने वालों का पक्का नक्सली लिंक मिलेगा, मैं बता रहा हूं आपको। अरे आप बात मानिए मेरी, यही हैं जिन्होने सोनीे सोरी के लिए, सांई बाबा के लिए, नारे लगाए थे, और अब यही हैं जो उमर खालिद के लिए इंसाफ मांग रहे हैं। 
3. इनसे पूछा जाए कि क्या तुम मानते हो कि आदिवासी जल जंगल जमीन पर आदिवासियों का हक होना चाहिए। अगर ये आएं-बाएं करने की जगह सीधा बोल दें कि हां, जल जंगल जमीन पर वहां रहने वालों का हक होना चाहिए तो फौरन, बिना आव-ताव देखे इन्हें गिरफ्तार कर लो। बताइए, जो आदिवासी जल जंगल जमीन पर सेठों का, अडानी अंबानी वेदांता का अधिकार ना माने वो तो नक्सली ही हुआ ना? 
4. सबसे सटीक तरीका है कि अगर कोई ये नहीं मानता कि देश में आज के दौर में हिंदू राष्ट होना चाहिए, और एक हिंदू राजा गद्दी पर बैठा है। तो उसे फौरन गिरफ्तार करना चाहिए। अब इसमें चुनाव आयोग राष्ट की मदद कर सकता है, चुनाव आयोग जो एस आई आर करवा रहा है, इस गहनतम पुर्नरीक्षण में पता लगाए कि कौन भा ज पा को यानी महामानव को वोट नहीं दे रहा है। और अब तक तो इन महामानव विरोधियों का वोट ही काटा जाता था, लेकिन अब ये किया जाए कि इन्हें गिरफ्तार किया जाए और ये माना जाए कि ये नक्सली हैं। इन्हें सीधा जेल या रिमांड पर भेजा जाए, फिर पांच-सात साल तो गई इनकी हवा गुल। 
5. ये लोग, हर मुद्दे पर सवाल करते हैं, सरकार से सवाल, पुलिस से सवाल, सेना से सवाल, न्यायालय से सवाल, इनके सवाल कभी खत्म हीं नहीं होते, और अब तो इनकी ये मजाल हो गई है कि ये महामानव तक से सवाल पूछने लगे हैं। अगर आपको कोई ऐसा मिले जिसको देश में समस्या दिखाई दे और उन समस्याओं के लिए वो नेहरु की जगह महामानव को जिम्मेदार माने, जो आपसे ये ना कहे कि पहले पिछले साठ या सत्तर सालों का हिसाब दो, या अगर इतनी ही परेशानी है तो पाकिस्तान रहने चले जाओ, तो उसे सबसे पहले गिरफ्तार करें, क्योंकि उसका पक्का नक्सली लिंक है।
इसके लिए ये कविता आपकी बहुत मदद कर सकती है।

मैं भी नक्सल, तू भी नक्सल
फूलों की खुशबू भी नक्सल
शब्दों का जादू भी नक्सल
ये भी नक्सल वो भी नक्सल
फ़ैज भी और मंटो भी नक्सल
मुक्तिबोध की कविता नक्सल
ज्ञान तर्क की बातें नक्सल
आदिम दलित की जातें नक्सल
मार्क्स भी नक्सल लेनिन नक्सल

नाटक नक्सल गाना नक्सल
मांसाहारी खाना नक्सल
रोज़ी मांगने वाला नक्सल
रोटी मांगने वाला नक्सल
जो मेरे तलवे ना चाटे
ऐसा जर्नलिस्ट भी नक्सल
पेड़ों के पत्ते भी नक्सल
मधुमक्खी के छत्ते नक्सल
सड़क पे चलने वाला नक्सल
गांव में रहने वाला नक्सल
जंगल ठेकेदार काट ले
पर असली हक़दार है नक्सल

पढ़ने लिखने वाला नक्सल
भूख से मरने वाला नक्सल
साफ हवा का नारा नक्सल
ईंटा पत्थर गारा नक्सल
घर भी नक्सल खेत भी नक्सल
जे एन यू का प्रेत भी नक्सल
संविधान की बातें नक्सल
मज़दूरों की जमातें नक्सल
झंडा हो गर लाल तो नक्सल
नीला हो तो वो भी नक्सल
अर्बन नक्सल रूरल नक्सल
टीचर नक्सल स्टूडेंट नक्सल
नक्सल नक्सल सारे नक्सल

तो मेरी बात का यकीन कीजिए, जब तक इन सब नक्सलियों को पकड़ नहीं लिया जाता, तब तक देश में हिंदू राष्ट नहीं आ सकता, नहीं आ सकता। चुनाव आयोग ध्यान दे, इन सबका वोट काटे, और पुलिस, सेना ध्यान दे कि अब इन्हें पकड़ना है और इन सबका नक्सली लिंक खोजना है। बाकी चचा ग़ालिब की जगह आज इसी कविता से काम चलाइए। वैसे भी चचा को सुन के क्या कीजिएगा, वो भी खासे नक्सल रहे अपने वक्त में। फिर मिलता हूं, नमस्कार।

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