शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

बड़ों का माफी - छोटन को फांसी

 


बचपन में एक दोहा पढ़ा था, छिमा बड़ेन को चाहिए, छोटन को उत्पात। यहां बड़े भाई रहीम कह रहे हैं कि जो बड़ेन होते हैं, उन्हें क्षमा किया जाना चाहिए और ये जो छोटन होते हैं, उनकी जिंदगी में हमेशा उत्पात होना चाहिए। होता क्या है ना भाई कि बड़ेन की जिंदगी में ऐसे ही बहुत कुछ होता रहता है, और वो लागतार कुछ ना कुछ करते रहते हैं, जैसे मौज आई तो नोटबंदी कर दी, या यूं ही मजे मजे में बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ कर दिया, स्वच्छ भारत चला दिया, स्मार्ट सिटी शुरु कर दिया, अमृतकाल कर दिया, और कुछ ऑपरेशन कर दिया।  ये बड़ेन क्योंकि मजे मजे में बहुत कुछ करते हैं, इसलिए बहुत संभव है कि उनके बहुत सारे कामों में से कुछ काम ग़लत हो जाएं, खराब हो जाएं, तो उन्हें माफी की ज़रूरत होती है, हो सकता है बड़े भाई रहीम बहुत साल पहले से ये जानते हों, आखिर वो भी तो महमान अकबर के दरबारी थे, इसलिए वो बड़ेन को माफी देने की वकालत कर रहे हों। 

बड़ेन को माफी इसलिए भी लगती है कि आप यूं भी उनका कर ही क्या सकते हैं। मान लीजिए बड़ेन की किसी ग़लती की वजह से हज़ारों-लाखों की संख्या में हवाई उड़ाने रद्द हो जाती हैं। लाखों यात्रियों को माली नुक्सान होता है, लोग रोते हैं, बिलखते हैं, छटपटाते हैं। लेकिन आप बताइए क्या कर लीजिएगा, अंततः आपको बड़ेन को माफ करना ही होगा। यही व्यवस्था है, यही सिस्टम है, यही होता है। 


आपको याद है एक समय में कोविड हुआ था, श्मशान घाट के बाहर शवों की लाइन लगी हुई थी बाबा, चौबीस घंटे का वेटिंग पीरियड हो गया था। पूरा देश मुर्दाघर जैसा हो गया था, लोग हजारों किलोमीटर की यात्रा कर रहे थे कि मरें भी तो आखिर घर जाकर। लेकिन आखिरकार क्या हुआ, बड़ेन को माफी मिल गई। अब इसमें होता कुछ यूं है कि बड़े भाई रहीम के दोहे के हिसाब से बड़ेन माफी मांगता भी नहीं है, लेकिन उसे स्वाभाविक माफी मिल जाती है। ना कोई माफी मांगता है, ना कोई माफी देता है, पर मिल जाती है, माफी, क्योंकि छिमा बड़ेन को चाहिए। अगर आप किसी बड़ेन को माफी नहीं भी देंगे तो वो आपसे माफी खोंस लेगा, यानी छीन लेगा, इसके लिए भी हिन्दी में एक कहावत है, जबरा मारे और रोने भी न दे। इस कहावत में जो जबरा है, मेरे ख्याल में बडे़ भाई रहीम के दोहे में वही बड़ेन है। ये जो बड़ेन है, ये मारता है ओर रोने पर अनिष्ट भी कर सकता है। इसलिए बड़ेन ग़लती करता है, क्योंकि उसे पता है कि माफी तो मिल ही जानी है, माफी उसका अधिकार है, उसका हथियार है। वो नोटबंदी करता है और फिर तुम्हारी मुसीबत पर हंस सकता है।


और जब तुम मर जाते हो तो बड़े ही नाटकीय तौर पर सजा पाने की घोषणा कर सकता है

क्योंकि उसे पता है कि सज़ा मिलना तो क्या, उसे सज़ा देने के बारे में तुम सोच भी नहीं सकते, और अंततः तुम्हे उसे माफ करना ही पड़ेगा, क्योंकि छिमा बड़ेन का चाहिए। बड़ेन का छिमा का ये कंसेप्ट सदियों से चला आ रहा है, और आगे भी यूं ही चलता रहेगा ऐसी प्रबल संभावना है। वजह वही जो पहले बताई है कि आखिर आप क्या ही कर लेंगे बड़ेन का। 
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दूसरी तरफ छोटेन का मामला ही उल्टा है, बड़े भाई रहीम ने कहा, छोटन को उत्पात। यहां इस दोहे में उनके कहने का मतलब है कि ये जो छोटन हैं, इनके जीवन में हर समय कोई ना कोई उत्पात लगा रहना चाहिए। क्यों ? क्योंकि इनके जीवन में अगर आराम हो जाए तो इन्हें दिक्कत हो जाती है। छोटन की बड़ी दिक्कत ये है कि ये लोग संतोष के साथ जीना नहीं सीखते, जबकि संतोष को लेकर जितनी भी कहावतें बनाई गई हैं, वो इन्हीं छोटन को हद में रहने की हिदायत देती हैं। कहावतें जैसे
संतोषी सदा सुखी
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान
आदि आदि
यानी छोटन को हमेशा कहा गया है कि लला, थोड़ा संतोष में रहोगे तो फायदे में रहोगे, कम से कम जीवित रहोगे, जरा आगे की मत सोचो, जितना मिला उसमें संतोष करो और जिंदगी काट लो, वरना जो मिला है वो भी छिन जाएगा और जान से जाओगे सो अलग। छोटन का बड़ा प्रॉब्लम है कि वो इन कहावतों में भरोसा नहीं करते, और ज्यादा की मांग करने लगते हैं। जैसे अभी पता चला दिल्ली में साफ हवा मांग रहे हैं। इन्हें लगा कि इंटरनेट मिल गया, बिजली मिल गई, पानी मिल गया, तो साफ हवा तो मिलनी चाहिए। लगे इंडिया गेट पर शोर मचाने। बस बड़ेन ने फौरन धर दबोचा, अब झेल रहे हैं अपने साफ हवा के हक़ की मांग करने की सज़ा।


इतिहास गवाह है कि जब भी छोटन को भरपेट खाना मिला है, तब-तब उसने जीवन की और सुख-सुविधा के लिए नारे लगाए हैं। जैसे इस देश में लोकतंत्र आया तो उसके बाद इसी छोटन ने जमीन पर हक़ के लिए नारे लगाए, संघर्ष किया, लड़ाई लड़ी, हुआ क्या, एक पूरी पीढ़ी गायब कर दी गई, और आज तक नक्सल के नाम पर प्रो. जी एन साईबाबा, से लेकर गौतम नवलखा तक जेल की साफ हवा में सांस दिया जा रहा है, एक थे स्टेन स्वामी, भले मर गए, लेकिन किसी बड़ेन ने माफी तो दूर, उनकी हत्या की जिम्मेदारी तक ना ली अपने सिर पर, उमर खालिद समेत तमाम बच्चों को सिर्फ इसलिए जेल की उड़द दाल का स्वाद मिल रहा है कि छोटेन होकर संतोष नहीं किया। लगे आज़ादी और ग़रीबों के हक़-अधिकार की आवाज़ उठाने। लेकिन ग़लती इनकी भी नहीं है, ये चरित्र होता है छोटेन का, इन्हें शिक्षा दो तो ये हक़ मांगते हैं, भरपेट खाना दो तो वोट करने का अधिकार मांगेगे, और थोड़ा पढ़ने-लिखने दोगे तो और ज्यादा आज़ादी और अधिकार मांगेगे। इसलिए बड़े भाई रहीम ने कहा था कि छोटेन के जीवन में हमेशा कोई ना कोई उत्पात होना चाहिए, ताकि आज़ादी, प्राइवेसी, साफ हवा, के बारे में शोर नाम मचाएं। छोटन की दिक्कत ये है कि जिंदगी में आराम हो तो दिमाग शैतान का कारखाना बन जाता है। यानी छोटन को जब-जब सुविधाएं मिलती हैं, यानी जब भी उनके जीवन में उत्पात नहीं होता, वो सरकार से अजीब-अजीब मांग करने लगते हैं। 


अभी बड़ेन ने एस आई आर करवाया, एस आई आर माने, ये तय किया जाएगा कि किसे वोट करने दिया जाए और किसे नहीं, अब छोटन शोर मचा रहे हैं कि हमारा वोट का अधिकार छीना जा रहा है। ये जो कुकर्म हैं, छोटन के, इसी वजह से इनके जीवन में उत्पात की ज़रूरत बनती है। अबे वोट करके ही तुम क्या कर लोगे बे, मैं तो कहूं ये जो इन्हे मुफ्त राशन दिया जा रहा है, उसे बंद करो, जैसे ही पेट की भूख सताएगी, सब वोट-फोट भूल जाएंगे। मेरी बात का यकीन नहीं है तो इन्हें देखिए 


ज़रा पढ़-लिख गईं तो लगी बड़ेन की नाक में दम करने। अब इन्हें वो सारे हक़ चाहिएं, जो बड़ेन के पास हैं, कैसे चलेगा? इसीलिए कहता हूं कि वही पुरानी स्टाइल ठीक थी, बड़ेन के पास सबकुछ हो, और छोटन के पास जीवन पूरा करने का संघर्ष हो। इन्हें खाने को मत दो, पढ़ने मत दो, सोचने-समझने मत दो। तभी ये छोटन काबू में रहेंगे, आपको याद होगा कि किसानों ने दिल्ली को घेर लिया था, दिल्ली को, बताइए, बड़ेन की नाक में दम हो गया था। उस वक्त बड़ेन की सबसे बड़ी परेशानी थी कि ये जो छोटन हैं, किसान हैं, ये खाना कैसे खा ले रहे हैं, भूखे क्यों नहीं मर रहे, सुंदर क्यों दिख रहे हैं, और तमाम आरोप लगा दिए बड़ेन ने इनके उपर....जैसे
खालिस्तानी हैं ये लोग, किसान ही नहीं हैं, बाहरी ताकते हैं जो इन्हें उकसा रही हैं।
लेकिन असली बात किसी ने नहीं पकड़ी। असली बात ये है कि इन छोटन के जीवन में उत्पात नहीं था, मुसीबत नहीं थी, इन्हें काबू में करना है तो इनके जीवन में उत्पात होना चाहिए, वरना ये बड़ेन का परेशान करेंगे। कहेंगे कि खेत और फसल की सही क़ीमत दो, आदिवासी होंगे तो कहेंगे कि जंगल, पहाड़, नदी और ज़मीन बचानी है। इन्हें काबू में करने का सही तरीका यही है कि सुप्रीम कोर्ट में जो बड़ेन बैठे हैं, उनके सामने इन्हें खालिस्तानी और नक्सली का ठप्पा लगाकर पटक दो, साबित कुछ नहीं करना, सारा जीवन बीत जाएगा भाई साहब, ये बाहर नहीं आ पाएंगे। आखिर सुप्रीम कोर्ट में भी बड़ेन बैठे हैं, और संसद में भी, और तो और मीडिया भी असल में बड़ेन के ही पास है। कौन क्या कहेगा?


खैर साहब फिर से आते हैं अपने असली दोहे पर, यानी बड़े भाई रहीम ने लिखा था, छिमा बड़ेन का चाहिए, छोटन को उत्पात, तो ये छोटन का उत्पात ही दरअसल बड़ेन की शंाति है। बड़ेन की शांति ही दरअसल देश की शांति होती है, और देश की शांति दरअसल छोटन की मंाग और संघर्ष की खामोशी का संकेत हैं। 

खैर चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, वो भी बड़े भाई रहीम की तर्ज पर एक संुदर शोर कह गए हैं, सुनिए
बड़े बड़े लोगन के मोटरगाड़ी
और हीरो होण्डा अलग से
हम्मन गरीबन के साइकिल जुलुमवा
चलने में टायर फटे फट से

अब आप इसका तर्जुमा कीजिए कि चचा आखिर कहना क्या चाहते थे, लेकिन बड़े भाई रहीम पक्का यही कहना चाहते थे कि छोटन की जिंदगी में उत्पात मचा के रखिए ताकी देश में शांति रहे। बाकी आपकी मर्जी। 

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