शनिवार, 3 जनवरी 2026

महामानव और नक्सली लिंक




नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। दिल्ली में समस्या खत्म नहीं हो रही, बल्कि बढ़ती जा रही है। एक तो सी एम और फिर पी एम को परेशान करने वाला प्रदूषण तो कम नहीं ही हो रहा, साथ में इस प्रदूषण पर प्रदर्शन करने वालों ने और जान खा रखी है। दिल्ली पुलिस का काम बढ़ाते हैं ये सारे। ये प्रदूषण का विरोध करना, प्रदूषण के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराना, ये सब पिछले साल तक ठीक था, लेकिन अब जबकि माननीय रेखा जी गुप्ता की सरकार है और उनके पति ये सरकार चला रहे हैं, तब आप ही बताइए, क्या दिल्ली की जनता के लिए ये प्रदूषण के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराना क्या सही बात है? नहीं, नहीं, आप ही बताइए, क्या ये सही बात है कि आप रेख जी गुप्ता को, उनके सिर पर जिनका वरदहस्त है, ऐसे महामानव को, दिल्ली के प्रदूषण का जिम्मेदार बताएं। ना भई ना, ये कतई हिंदू राष्ट के, सनातन के और सबसे बड़ी बात देश के खिलाफ बात आप करते हैं। मजबूर होकर रेखा जी गुप्ता को कहना पड़ा कि भई इस प्रदूषण से निपटने के लिए दिल्ली की जनता को ही कदम उठाने होंगे। 



महामानव इस दौरान किसी आयोजन के लिए विदेश भ्रमण करने गए हैं, जब आएंगे तो भी उनका मन होगा तो कुछ कहेंगे, वरना जब वो मणिपुर जैसे संगीन मसले पर कुछ ना बोले तो दिल्ली के प्रदूषण पर तो क्या ही बोलेंगे। पर ये कुछ वामपंथी हैं, कुछ साइंटिस्ट वगैरह हैं, जो बकौल मुख्यमंत्री, केन्द्र सरकार, दिल्ली पुलिस और कुछ बहुत ही समझदार लोगों के अनुसार छात्रों को भड़का रहे हैं, कि वे प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन करें। आप ही बताइए, ज़रा हवा जहरीली हो जाने से आपको कोई अधिकार थोड़े ही मिल जाता है कि आप इंडिया गेट पर जाकर प्रदर्शन करने लगें। 




और प्रदर्शन भी कैसा जिसमें घनघोर नक्सली माडवी हिड़मा के समर्थन में नारे लगे। हमारे एक बहुत ही शानदार बुद्धिजीवी मित्र ने सही ही कहा, कि यार तुम्हें मान लो बहुत लग रहा था कि प्रदूषण के खिलाफ कुछ करो, तो करते, ये बीच में किसी आदिवासी को मार दिया तो उसके लिए नारे क्यों लगा रहे हो। ये सब छात्रों को बरगलाने वाले वामपंथी करते हैं, इन्हीं मित्र ने बताया कि इन्हें भी ऐसे ही बरगलाया गया था, वो तो सही समय पर ये उन गलियों से वापस आ गए और वामपंथी नहीं बने, वरना बताइए वे भी आज ऐसे ही नारे लगा रहे होते। खुदा खैर करे, इनके लिए ईश्वर की कृपा से सब कुशल रहा, कि ये वामपंथी नहीं बने और आज ठीक-ठाक खा कमा रहे हैं। मैं विषय से भटक रहा हूं, तो वापस विषय पर आते हुए, कहना चाहता हूं कि मुझे भी बहुत बुरा लगा कि भई ये माडवी हिड़मा को सरकार ने मारा, सेना ने मारा, या अर्धसैनिक बलों ने अपना शौर्य दिखाया, और ये छात्र, नालायक छात्र महामानव के शौर्य की जगह, माडवी हिड़मा के लिए नारे लगा रहे हैं। कतई देशद्रोही काम है साहब।


वो तो भला हो पुलिस का कि इन्हें मौके पर गिरफ्तार कर लिया। बेमौके भी गिरफ्तार करते तो कोई क्या ही कर लेता, लेकिन भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती देखिए, सत्ता की नरमदिली देखिए कि इन्हें मौके पर गिरफ्तार किया गया। उससे भी बढ़कर इन्हें टॉर्चर नहीं किया गया, बल्कि जज के सामने पेश किया गया, जज को समझाया गया कि भई ये लोग लाल सलाम के नारे लगा रहे थे, माडवी हिड़मा के लिए नारे लगा रहे थे, जिससे साफ पता चलता कि इनका कोई नक्सली लिंक है। तो जज साहब ने कहा कि चलो ठीक है, दो दिन इन्हें रिमांड पर लो और इनके नक्सली लिंक का पता लगाओ। अब पुलिस जो है वो इन छात्रों के नक्सली लिंक का पता लगा रही है। 



ये आजकल नक्सली लिंक बहुत हो जा रहा है लोगों का, ये हमारी पुलिस और जज इत्ते समझदार, इत्ते कर्मठ ना होते तो भाई साहब सोचिए देश का क्या होता, चारों तरफ नक्सली लिंक ही नक्सली लिंक होता। नक्सली लिंक के बारे में मैं बताउं आपको, अगर आप एक्सपर्ट ना हों तो आपको बिल्कुल पता नहीं चलता कि किसका नक्सली लिंक होता है। इसीलिए पुलिस वाले पहले पकड़ते हैं, फिर नक्सली लिंक का पता लगाते हैं। उसमें भी कई बार तो ये हो जाता है कि नक्सली लिंक मिल कर ही नहीं देता, तो फिर ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। आपको याद होगा सोनी सोरी के केस में क्या हुआ था, नक्सली लिंक ढूंढने के चक्कर में पुलिस को, इस देश की शानदार पुलिस को, क्या-क्या करना पड़ा था, उस आदिवासी महिला के साथ, मुझे तो ये भी नहीं पता कि नक्सली लिंक मिला भी कि नहीं। खैर मेरा ख्याल है कि अगर पुलिस वैसा ही व्यवहार इन गिरफ्तार छात्रों के साथ करे, तो शायद नक्सली लिंक मिल जाए? क्यों आपका क्या ख्याल है? 

भई मेरा तो ये मानना है कि ये पिछले सत्तर-अस्सी सालों में ये नक्सलियों ने खूब हल्ला काटा है, और अब जब हजारों साल बाद कोई सनातन का रक्षक, हिंदू शेर राजा गद्दी पर बैठा है तो ये निकल-निकल कर आ रहे हैं। अब इन्हें रोज़ पकड़ना, रोज़ पहचानना और फिर इनके नक्सली लिंक ढूंढना बहुत ही जांमारी वाला काम हो जाता है। तो मेरा तो ये सुझाव है कि इन सबको पकड़ लिया जाए। यानी गिरफ्तार कर लिया जाए, और जज जो हैं वो इन्हें जेल भेज दें, ओर इनसे कहा जाए कि बेटा जी अब तुम साबित करो कि तुम्हारा नक्सली लिंक नहीं है, वरना ये डिफॉल्ट माना जाए कि इन सबका नक्सली लिंक है, और ये देश के लिए खतरा हैं। 

अब कुछ लोग कहेंगे कि कपिल भाई ये ज्यादा हो जाएगा, इत्ते लोगों को पकड़ेंगे कैसे, और कहां रखेंगे। तो मेरे पास उसका भी इलाज है। ये जो वामपंथी टाइप लोग होते हैं ना, इनकी कुछ खास पहचान होती हैगी। बस इसी पहचान के आधार पर इनकी धरपकड़ हो, और धरपकड़ के बाद इन्हें सीधा किया जाए। अब जैसे एस आई आर हो रही है, उससे भी मदद ली जा सकती है। पर पहले तो आप इनकी पहचान सुन लीजिए, जिन्हें आपको पहले गिरफ्तार करना है, और फिर उनका नक्सली लिंक ढूंढना है।

तो सुनिए

1. ये पढ़ते हैं। जी हां, ये सारे नक्सली टाइप लोग, पढ़ते-लिखते हैं, मतलब कहानियां पढ़ते हैं, कविताएं पढ़ते हैं, इतिहास, विज्ञान, साहित्य, सबमें इनकी रुचि होती है। अपने-अपने सबजेक्ट के अलावा और भी सारे सबजेक्ट के बारे में जानना इनकी रुचि होती है। तो बस इनसे किसी अच्छे लेखक का नाम और उसकी किसी कहानी या कविता का नाम पूछिए, अगर ये बता दें, तो बस गिरफ्तार कर लीजिए। इसमें तो मान लीजिए सीधा सा हिसाब है, पढ़ते - लिखते हैं, तो पक्का समझदार होंगे, समझदार होंगे तो पक्का नक्सली लिंक होगा।
2. इनसे पूछिए कि अगर किसी पर अत्याचार हो, तो क्या तुम्हारा दिल दूखता है, क्या तुम उसके लिए आवाज़ उठाओगे? अगर जवाब हां में है तो सबकुछ छोड़ कर पहले इसे गिरफ्तार करो। ऐसा जवाब देने वालों का पक्का नक्सली लिंक मिलेगा, मैं बता रहा हूं आपको। अरे आप बात मानिए मेरी, यही हैं जिन्होने सोनीे सोरी के लिए, सांई बाबा के लिए, नारे लगाए थे, और अब यही हैं जो उमर खालिद के लिए इंसाफ मांग रहे हैं। 
3. इनसे पूछा जाए कि क्या तुम मानते हो कि आदिवासी जल जंगल जमीन पर आदिवासियों का हक होना चाहिए। अगर ये आएं-बाएं करने की जगह सीधा बोल दें कि हां, जल जंगल जमीन पर वहां रहने वालों का हक होना चाहिए तो फौरन, बिना आव-ताव देखे इन्हें गिरफ्तार कर लो। बताइए, जो आदिवासी जल जंगल जमीन पर सेठों का, अडानी अंबानी वेदांता का अधिकार ना माने वो तो नक्सली ही हुआ ना? 
4. सबसे सटीक तरीका है कि अगर कोई ये नहीं मानता कि देश में आज के दौर में हिंदू राष्ट होना चाहिए, और एक हिंदू राजा गद्दी पर बैठा है। तो उसे फौरन गिरफ्तार करना चाहिए। अब इसमें चुनाव आयोग राष्ट की मदद कर सकता है, चुनाव आयोग जो एस आई आर करवा रहा है, इस गहनतम पुर्नरीक्षण में पता लगाए कि कौन भा ज पा को यानी महामानव को वोट नहीं दे रहा है। और अब तक तो इन महामानव विरोधियों का वोट ही काटा जाता था, लेकिन अब ये किया जाए कि इन्हें गिरफ्तार किया जाए और ये माना जाए कि ये नक्सली हैं। इन्हें सीधा जेल या रिमांड पर भेजा जाए, फिर पांच-सात साल तो गई इनकी हवा गुल। 
5. ये लोग, हर मुद्दे पर सवाल करते हैं, सरकार से सवाल, पुलिस से सवाल, सेना से सवाल, न्यायालय से सवाल, इनके सवाल कभी खत्म हीं नहीं होते, और अब तो इनकी ये मजाल हो गई है कि ये महामानव तक से सवाल पूछने लगे हैं। अगर आपको कोई ऐसा मिले जिसको देश में समस्या दिखाई दे और उन समस्याओं के लिए वो नेहरु की जगह महामानव को जिम्मेदार माने, जो आपसे ये ना कहे कि पहले पिछले साठ या सत्तर सालों का हिसाब दो, या अगर इतनी ही परेशानी है तो पाकिस्तान रहने चले जाओ, तो उसे सबसे पहले गिरफ्तार करें, क्योंकि उसका पक्का नक्सली लिंक है।
इसके लिए ये कविता आपकी बहुत मदद कर सकती है।

मैं भी नक्सल, तू भी नक्सल
फूलों की खुशबू भी नक्सल
शब्दों का जादू भी नक्सल
ये भी नक्सल वो भी नक्सल
फ़ैज भी और मंटो भी नक्सल
मुक्तिबोध की कविता नक्सल
ज्ञान तर्क की बातें नक्सल
आदिम दलित की जातें नक्सल
मार्क्स भी नक्सल लेनिन नक्सल

नाटक नक्सल गाना नक्सल
मांसाहारी खाना नक्सल
रोज़ी मांगने वाला नक्सल
रोटी मांगने वाला नक्सल
जो मेरे तलवे ना चाटे
ऐसा जर्नलिस्ट भी नक्सल
पेड़ों के पत्ते भी नक्सल
मधुमक्खी के छत्ते नक्सल
सड़क पे चलने वाला नक्सल
गांव में रहने वाला नक्सल
जंगल ठेकेदार काट ले
पर असली हक़दार है नक्सल

पढ़ने लिखने वाला नक्सल
भूख से मरने वाला नक्सल
साफ हवा का नारा नक्सल
ईंटा पत्थर गारा नक्सल
घर भी नक्सल खेत भी नक्सल
जे एन यू का प्रेत भी नक्सल
संविधान की बातें नक्सल
मज़दूरों की जमातें नक्सल
झंडा हो गर लाल तो नक्सल
नीला हो तो वो भी नक्सल
अर्बन नक्सल रूरल नक्सल
टीचर नक्सल स्टूडेंट नक्सल
नक्सल नक्सल सारे नक्सल

तो मेरी बात का यकीन कीजिए, जब तक इन सब नक्सलियों को पकड़ नहीं लिया जाता, तब तक देश में हिंदू राष्ट नहीं आ सकता, नहीं आ सकता। चुनाव आयोग ध्यान दे, इन सबका वोट काटे, और पुलिस, सेना ध्यान दे कि अब इन्हें पकड़ना है और इन सबका नक्सली लिंक खोजना है। बाकी चचा ग़ालिब की जगह आज इसी कविता से काम चलाइए। वैसे भी चचा को सुन के क्या कीजिएगा, वो भी खासे नक्सल रहे अपने वक्त में। फिर मिलता हूं, नमस्कार।

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