गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

बुर्के पर वबाल

 




 भई यारों ये क्या किस्सा है जिसके पीछे पूरे देश में इत्ता वबाल कट रहा है। देखा कि एक राज्य के मुख्यमंत्री जी ने भरी सभा में एक महिला के चेहरे से बुर्का नोंच लिया। 



मुझे समझ नहीं आता कि आखिर ये ऐसी क्या बात है जिस पर वबाल हो सकता है। आखिर एक राज्य के मुख्यमंत्री को इतना भी अधिकार नहीं होगा कि वो नौकरी मांगने आई एक महिला के चेहरे से बुर्का उतार दे। आपको तो इसी बात पर खुश होना चाहिए कि उन्होने सिर्फ यही किया है, मेरा मतलब है, एक साहब हुए थे, भाजपा के कुलदीपक, उन्होने तो नौकरी मांगने पहुंची एक 16 साल की नाबालिग लड़की का बलात्कार कर दिया था। बताइए, ऐसे में मुख्यमंत्री द्वारा बस बुर्का खींचने जैसी हरकत पर आपको एतराज हो रहा है, ये सरासर नाजायज़ बात है भाई।

असल बात की तरफ आपका ध्यान नहीं गया भाई। असल बात ये है कि वो महिला बुर्का पहन कर एक सरकारी प्रोग्राम में गई थी, तो ये मुख्यमंत्री का कर्तव्य था कि वो उसकी सही पहचान करें। मुख्यमंत्री हमारे सबको पहचानते हैं, यही तो उनकी खासियत है। इसी सही पहचान के लिए तो उन्होने उस महिला के चेहरे से बुर्का नोचा था। देखिए किसी भी सरकारी आयोजन में अगर जाते हैं, तो ये पहचान करना कि जो व्यक्ति आपके सामने है वही सही व्यक्ति है, मुख्यमंत्री का कर्तव्य होता है, कहीं अगर वो ग़लत कैंडीडेट को नौकरी दे देते तो बताइए क्या गजब होता। 

मैं बताता हूं हुआ क्या था। दरअसल अभी कुछ ही दिन पहले राज्य में चुनाव हुआ था। उस चुनाव में हुआ क्या कि महिलाओं को दस हज़ार की राशि दी गई ताकि वो सही जगह वोट कर सकें। आखिर महिला सशक्तिकरण का मामला था। इसके बाद हुआ ये कि उसी वोट की ताकत से राज्य में अ लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी जिसके सर्वेसर्वा यही महानुभाव थे, जिन्होने अभी एक महिला के चेहरे से बुर्का नोचा है। तो हुआ ये कि अब सरकार यानी बिहार सरकार ये कह रही है कि वो जो दस हज़ार रुपये भेजे गए थे, वो ग़लत लोगों के पास चले गए थे। और अब उनकी उगाही की जा रही है, लोगों को नोटिस भेजे जा रहे हैं कि अबे पैसे वापिस करो बे।

तो ऐसे में मुख्यमंत्री को ये लगा कि अगर किसी ग़लत कैंडीडेट को नौकरी मिल गई तो नौकरी वापिस लेना तो मुश्किल होगा। इसलिए उन्होने ये जिम्मेदारी अपने हाथ में ली कि वो महिला की सही पहचान करके ही उसे नौकरी दें। और इन वामियों ने, तथाकथित प्रगतिशीलों ने, इन महिला अधिकार के रक्षकों ने इसी पर वबाल काट दिया। 

अभी कुछ ही दिन पहले एक हाई कोर्ट के जज साहब ने कहा था, कि किसी पीड़िता के स्तनों को छूना या कपड़े उतारने की कोशिश दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता है। अब आप ही सोचिए भाई, हमारे न्यायालय कितने सहिष्णु होते जा रहे है, हमारे विधायक और मुख्यमंत्री भी सहिष्णु होते जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि ऐसे कृत्यों के प्रति जनता भी सहिष्णु हो जाए, लेकिन जनता, खासतौर पर महिलाएं, सहिष्णु नहीं होना चाहतीं। अरे भई, अगर कोई आपके चेहरे से बुर्का खींच ले, या आपको देख कर सीटी मारे, या मान लीजिए की हाथ पकड़ ले, तो थोड़ा सहिष्णु बनिए, इसे इतना बड़ा मुद्दा मत बनाइए। 

ऐसे ही एक किस्सा याद आता है, जिस पर वबाल हुआ था, और सुनते हैं बड़ा भारी युद्ध हुआ था, इसी देश की बात है। 
सभा में सब स्तब्ध थे। सबकी नज़रें उन पासों पर थीं, जिन्होने दुर्योधन की जीत का निशान दिया था। एकबारगी तो दुर्योधन भी स्तब्ध था। हालांकि उसे मामा शकुनि की जुआ खेलने की कला पर पूरा यकीन था। लेकिन अपने भाग्य की वजह से वो थोड़ा असहज था। लेकिन पासों के गिरते ही पहले उसकी आंखे चौड़ी हुई, फिर आंखों ने दिमाग को बताया वो फिर से जीत गया है। अचानक कंठ से अट्टहास गूंजा जो पूरी सभा में फैल गया। इस अट्टहास ने पूरी सभा को जैसे नींद से जगा दिया था। अचानक सहस्रों कंठों से आवाज़ निकली और पूरी सभा में एक शोर गूंज गया। दुर्योधन ने पीछे मुड़ कर देखा, दुःशासन उसके कांधे पर से झांक रहा था, और उसकी हंसी साफ दिखाई दे रही थी।




”दुःशासन”, दुर्योधन ने पूरी ताकत लगाकर कहा, ताकि पूरी सभा को पता चल जाए कि वो बोल रहा है।

”जी भाई जी” दुःशासन ने कहा।

”जाओ, हमारी जीती हुई वस्तु को तत्काल सभा में ले आओ। जो वस्तु जीत ली गई हो, उसे तत्काल अपने कब्जे़ में लेना ही नीति है।”
”मैं अभी गया और अभी आया” दुःशासन ने कहा और फौरन निकल गया।
सभा में एक ओर खड़ी द्रौपदी है, दूसरी तरफ दुःशासन उसकी साड़ी खींच रहा है, और पीछे खड़ा दुर्योधन हंस रहा है, सारे कौरव हंस रहे हैं, और जिन पर द्रौपदी ने विश्वास किया था, वो सिर झुकाए मौन बैठे हैं।

जब राज्य में राजसभा में हुए इस वबाल की खबर फैली तो जनता ने इसका प्रतिकार किया। राजा अपने राज्य के मद में चूर हो सकता है, लेकिन जतना के कांधो पर तो नैतिकता की जिम्मेदारी लेती है। जनता ने कहा कि महिलाओं का अपमान नहीं सहा जाएगा। इस तरह किसी का भी अपमान नहीं सहा जाएगा, और जो राजा मद में चूर हो जाए, उसे शासन का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।

राजभवन में जनता के इस आक्रोश की खबर फैली तो थोड़ा अटका-झटकी हुई, लेकिन अनैतिकता के जिन मजबूत कंधो का सहारा लेकर दुर्योधन राजगद्दी पर बैठा था, उन्होने अपनी कुटिल चालें चलीं। असत्य, अनैतिकता, पाखंड, भ्रष्टाचार और अमानवीयता के हथियारों से लैस दुर्योधन और उसके समर्थकों ने जनता के बीच एक नये तरह का ज्ञान पेलना शुरु किया।

”वे तो महिलाओं के अधिकार के सबसे बड़े चिंतक हैं।”
”उन्होने महिलाओं के लिए काम किया है।”
”उन्होने साड़ी खींचते हुए भी महिला सम्मान किया है।”
”उनकी उम्र तो देखो, उनकी उम्र का सम्मान करो।”
”उन्होने तो मज़ाक किया था, इस बात का इतना बतंगड़ मत बनाओ।”
”उनका ये काम भी महिला अधिकार की श्रेणी में ही आना चाहिए।”

धीरे-धीरे जनता में ये बात फैलने लगी, और जनता दुर्योधन के इस घृणित कृत्य को भूल गई, बल्कि बात इस बारे में होने लगी कि किसी महिला को साड़ी पहनने का अधिकार होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए।

2014 के बाद देश की डोर जिस धर्म और संस्कृति के ठेकेदारों ने संभाली है, वे निश्चय ही बहुत कर्मठ हैं, कुलदीप सिंह सेंगर, बृजभूषण, और अब नितीश कुमार तो मान लीजिए छोटी-मोटी हस्तियां हैं, यहां तो हालत ये है कि सुना खुद महामानव ने एक लड़की का पीछा करवाया था, और फिर जब ये बात खुली तो कोर्ट ने उनका ये तर्क भी मान लिया था कि खुद लड़की के पिता के कहने पर राज्य के गृहमंत्री ने उसका पीछा करवाया था। यानी इस देश में यदि एक बालिग लड़की का पिता राज्य के गृहमंत्री से कहेगा तो राज्य के मुख्यमंत्री के कहने पर पूरी पुलिस उस लड़की का पीछा करवा सकती है, और ये हरकत कानून सम्मत मानी जाएगी। बल्कि हमें तो इस देश में ही ये कहने वाले भी मिल चुके हैं कि 
मेदी मेरी बीवी वाला वीडियो
और जब ये सामान्य है, कोर्ट इसे मान चुका है, जनता इसे मान चुकी है तो फिर एक ग़रीब राज्य के मुख्यमंत्री की इस हरकत को ओछी हरकत मानना, उसे महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली हरकत मानना कहां की समझदारी है भई। मेरा तो मानना है कि अब इस देश में एक ऐसा कानून भी बना ही देना चाहिए कि जिसमें एक निश्चित पार्टी के सदस्यों के लिए महिलाओं के साथ किए गए व्यवहार, कारगुज़ारियों, कारस्तानियों, और कांडों को देश की सुरक्षा के नाम पर दबा दिया जाए। और अगर प्रगतिशीलता, महिला अधिकार, मानवाधिकार आदि के नाम पर कोई इन्हें मुद्दा बनाए, तो कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों को चाहिए कि वे स्वतः संज्ञान लेकर उस व्यक्ति, संस्था, पार्टी के खिलाफ यू ए पी ए, पी एम एल ए, या एन एस ए वाले कानून के तहत बिना मुकद्मा चलाए उन्हें जेल में डालने की तजवीज करें। ताकि ये देश विश्वगुरु बन सके। 
सबसे बड़ी बात ये है कि आज देश की बड़ी बहस ये होनी चाहिए कि महिलाएं कौन सा कपड़ा पहनेंगी, और कौन सा नहीं, कैसे कपड़े पहनेंगी, और कैसे कपड़े पहनने की इजाज़त उन्हें मिलनी चाहिए, वे कैसी दिखें, क्या करें, क्या ना करें, कैसा व्यवहार करें, और हम यानी पुरुष उन्हें क्या अधिकार दे सकते हैं, कैसी और कितनी आजादी देनी चाहिए, कब दे
बाकी चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, लड़कियों को पर्दे में रखने के कायल थे, इसलिए कभी महिलाओं का अपमान नहीं किये, कभी बुर्का भी नहीं खींचे किसी का, लेकिन इस मामले में कतई सनातनी पार्टी के तर्कों के कायल हो गए थे, इसीलिए तो ये लिखा

कि 

तेरे दम में है अगर तो, तू कांड कर कोई भी
तुझे हक़ है मेरे यारा, तू कांड कर कोई भी
तू बड़ा है, तू खड़ा है, तू ही जीता, तू लड़ा है
तूझे डर ही क्या बता तू, तू कांड कर कोई भी

तो चचा का मिज़ाज भी ऐसा ही था, कहते थे हम न करेंगे, बाकी जिसके पास ताकत है वो तो करेगा ही कांड। तो मेरा मानना ये है मितरों कि नितीश कुमार को, महामानव को, और भी सबको, थोड़ा बहुत भ्रष्टाचार, थोड़ा बहुत व्यभिचार करने की स्वतंत्रता और अनुमति होनी चाहिए। ठीक है ना। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

सेंगर को बेल

  नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। सुना भई सेंगर जी को बेल मिल गई। पहले उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा हुई थी, और ये सज़ा जो उन्हें मि...