शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

सेंगर को बेल



 नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। सुना भई सेंगर जी को बेल मिल गई। पहले उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा हुई थी, और ये सज़ा जो उन्हें मिली थी वो इसलिए थी कि उन पर बलात्कार और फिर पीड़िता के पूरे परिवार का सफाया करने के आरोप सिद्ध हुए थे। 



कुछ लोग कह रहे हैं कि अगर हम कोर्ट के इस आदेश को स्वीकार करते हैं कि उसने सज़ा दी तो हमें कोर्ट के इस आदेश को भी स्वीकार करना चाहिए। मेरा तो ये कहना है जनाब कि माननीय सेंगर जी को दी गई सज़ा का विरोध करना चाहिए और ये स्वीकार करना चाहिए कि बेल उनका अधिकार था, बेल ही क्यों मेरा तो कहना है कि सिर्फ एक महिला के कहने पर, या मान लीजिए आरोप लगाने पर, जनता द्वारा चुने गए एक संसद सदस्य को यू ंसज़ा देना ही ग़लत है। पुलिस को इन महिलाओं को, जिन्होने माननीय सेंगर जी पर आरोप लगाया, और उनके समर्थन में जो आए उसे भी घसीट कर जेल में डाल देना चाहिए। 

आसाराम को बेल मिली, रामरहीम को लगातार और जितनी वो चाहें बेल मिलती रहती है, तो फिर ये बताओ कि माननीय संेगर जी को बेल क्यों ना मिले। क्या तुमने उन्हें भी ये क्या कहते हैं, उमर खालिद, शारजील इमाम जैसा ही समझते हो क्या? अबे ये लोग कोई राष्ट विरोधी काम थोड़े ही कर रहे हैं कि इन्हें बेल नहीं दी जाएगी, ये कोई सोनम वांगचुक की तरह का काम थोड़े ही कर रहे हैं कि बिना कोई मुकद्मा चलाए इन्हें महीनों जेल में रखा जाएगा। 

सेंगर, समझ रहे हो, कुलदीप सिंह सेंगर, अबे नाम ही काफी है। कोर्ट का कहना है कि माननीय संेगर जी के लिए जो कहा जा रहा है कि पुलिस और कानून के रक्षक उनके कहने पर कुछ ग़लत करेंगे तो कोर्ट ये नहीं मान सकता कि कानून के रखवाले, माननीय के कहने पर ऐसा कुछ करेंगे। बिल्कुल सही बात है, बताइए इसमें कुछ ग़लत हो तो? लड़की को एक साल लगा माननीय के खिलाफ शिकायत करने में, ये कोई बात हुई भला। कानून के रखवालों ने बहुत समझाया कि मान जा, मत अपनी जिंदगी खराब कर। हो गया सो हो गया समझ कर खैर मना। अपने घर जा। लेकिन ये लड़की बहुत ढीठ निकली। 2017 में घटना हुई, 2018 में जाकर उसके आरोप पत्र दायर हुए। फिर भी पुलिस वाले लगातार लड़की को, उसके रिश्तेदारों को बचाने में लगे रहे। 

लेकिन लड़की और उसके परिवार वालों ने हद ही कर दी। उन्होने माननीय कुलटीप सिंह सेंगर पर आरोप लगाते हुए खुद अजय सिंह बिष्ट के पास एक लेटर भेज दिया। भई पुलिस ने कोशिश की कि लड़की का पिता ही बात को सही से समझ ले, इसलिए उसे समझाने के लिए, गौर कीजिएगा, समझाने-बुझाने के लिए, परिवार की इज्जत की बात थी, इसलिए संस्कारी पुलिस ने इसे भारतीय संस्कारों के अनुरूप समझा कि लड़की के बाप को समझाने-बुझाने के लिए थाने बुलाया। पर बाप कमजोर निकला और इस समझाने-बुझाने के दौर में ही उसने दम तोड़ दिया। ऐसे में पुलिस पर ये आरोप लगाना कि पुलिस ने माननीय कुलदीप सिंह सेंगर की हत्या कर दी, बहुत ही बचकाना बात है। 

खैर, माननीय कुलदीप सिंह सेंगर फिर भी अपनी पर अड़े रहे, और इसके बाद उन्होने एक और कोशिश की, लड़की और उसके परिवार वालों को ये समझाने की, कि जो हो गया, उसे भूल जाएं और बेकार के इस विवाद को बंद करें। लेकिन लड़की एक वकील के झांसे में आ गई थी, जिसने शायद उसे ये बताया हो कि भारत का कानून निष्पक्ष होता है, और कानून सबके लिए बराबर होता है, और शायद ये भी समझाया हो कि कानून से उसे न्याय मिलेगा। अब लड़की नाबालिग थी, वकील की बातों में आ गई। फिर एक टक आया उसे ये समझाने की इस बेकार की अफरा-तफरी में कुछ नहीं रखा। लेकिन इस बार भी समझाने-बुझाने में उसकी दो मौसियां और खुद वकील साहब निपट गए। 

सोचा था कि अब लड़की को समझ आ जाएगा कि बेकार माननीय कुलदीप सिंह सेंगर साहब पर व्यर्थ के आरोप लगाने का कोई फायदा नहीं है। लेकिन लडकी ना मानी। अब पुलिस ने तो अपना काम मुस्तैदी से किया, कोर्ट बिचारे के पास कोई रास्ता नहीं बचा था। उसे माननीय कुलदीप सिंह संेगर को सज़ा देनी पड़ी। 





लेकिन बेजीपी के घर में देर हो सकती है, अंधेर नहीं। एक भाजपा एम एल ए को बलात्कार के आरोप मे ंसज़ा हो जाए, ये तो इस अभी 2014 में ताज़ा-ताज़ा आज़ाद हुए भारत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ये वो भारत है, जहां एक गर्भवती महिला का खुली सड़क पर गैंगरेप करने वालों की सज़ा ये कहकर माफ की जाती है कि वो खासे संस्कारी लोग हैं। जहां गुफा में बलात्कार करने और फिर लड़की के परिवार वालों की हत्या करने वाले, पिताजी, कहलाने वाले बाबा, राम-रहीम जेल से कम रिसॅार्ट में अपनी सज़ा काटते हैं, जहां बलात्कारी आसाराम के साथ खुद महामानव नाचते हैं। 



ऐसे में माननीय कुलदीप सिंह सेंगर को, एक अदना लड़की से बलात्कार के लिए जेल मे ंतो नहीं रहने दिया जा सकता था। इसलिए आखिरकार संस्कार की जीत हुई, और अदालत ने एक तकनीकी पंेच निकाल ही लिया, जिसके तहत उन्हें अंततः बेल दी गई। 


तो अंततः माननीय कुलदीप सिंह सेंगर को न्याय मिला, थोड़ा देर से मिला तो भी क्या हुआ। आखिर कोर्ट के इस फैसले से पुलिस वालों के हौसले बुलंद हुए। भाजपा के अन्य कुलदीपकों को ये संदेश गया कि आखिरकार उन्हें भी माननीय कुलदीप सिंह सेंगर की तरह, पहले पुलिस और अंततः अदालत साफ बचा ले जाएंगी। धन्य है भारतीय पुलिस, और न्यायालय, जिन्होने न्याय की इस लौ को बुझने नहीं दिया है। जब माननीय कुलदीप सिंह जी बाहर आएंगे तो फूलमालाओं से उनका स्वागत किया जाएगा, क्योंकि वो विजेता हैं।




दूसरी तरफ सेंगर को, पुलिस को, और न्यायालय को चुनौती देने वाली महिला और उनके समर्थकों को मौके पर ही उनके किए की सज़ा दे दी गई। 

कुल मिलाकर बात ये है मितरों कि ये लोग कितना ही शोर मचा लें, बलात्कार जैसी छोटी-मोटी चीजों के लिए भाजपा के किसी संस्कारी कुलदीपक, जैसे कुलदीप सिंह संेगर को जेल में नही रखा जा सकता, नहीं रखा जाना चाहिए। बल्कि मैं तो कहता हूं कि कुलदीप सिंह सेंगर पर आरोप लगाने वाली लड़की को, कटघरे में खड़ा करना चाहिए। मेरे भक्त मितरों आपको फौरन अपनी यूज़ुअल ड्यूटी पर लग जाना चाहिए। यही मौका है कि हम महामानव के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन करने का, यही मौका है खुद को संस्कारी साबित करने का, यही मौका है अपने धर्म के प्रति अपनी निष्ठा दिखाने का। 



आज इन तथाकथित वामपंथियों की इतनी मजाल हो चुकी है कि, ये एक बलत्कृत लड़की को साथ लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, इनका कोई भरोसा नहीं है, ये लोग इंडिया गेट पर, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने लगेंगे। याद रखिए दोस्तों, आसाराम हों कि प्रज्जवल रेवन्ना हों, हमारे महामानव ने हमेशा ही बलात्कारियों का समर्थन किया है। 


अगर हमें महामानव की नज़रों में आना है तो हमें, भी ऐसा ही बनना पडे़गा। जहां तक संभव हो, महिला का मज़ाक उड़ाइए। उसकी पीड़ा पर हंसिए, यही हमें सिखाया गया है। 

ये भारत की जनता को क्या हो गया है, जहां संस्कारों के लिए, परिवार की इज्जत के लिए, महिलाएं बलात्कार को रिपोर्ट तक नहीं करती थीं, अब वो उंचे पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखवा रही हैं। चाहे वो पूज्यनीय धार्मिक बाबा हों, या चुनाव जीत कर मंत्री बने हुए लोग हों, इन लड़कियों की हिम्मत कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। पुलिस इनके परिवार के सदस्यों की हत्या कर देती है, इनके समर्थन में आने वाली लड़कियों को सोशल मीडिया पर टोल किया जाता है, लेकिन ये मा नही नहीं रही हैं। अब ये मौका आया है कि इनकी आवाज़ का खामोश कर दिया जाए। याद रखिए अगर उन्नाव पीड़िता को न्याय मिल गया, तो इनके हौसले बढ़ जाएंगे। कोर्ट ने हमें ये मौका दिया है कि ये दिखा दिया जाए कि कानून पीड़ित के पक्ष में हो तो भी कोई ना कोई तकनीकी कमी निकाल कर बलात्कारी को राहत दी जा सकती है। अब हमारा काम है कि इस लड़की को न्याय ना मिले, बाकी आपकी मर्जी।

ग़्ाालिब जो चचा कहलाते हैं, उन्होने इस मामले से खुद को दूर ही रखा है। लेकिन पूज्यनीय आसाराम जिन्हें बलात्कार के आरोप मे ंसज़ा झेलनी पड़ी, और बाद में उन्हें भी कोर्ट ने राहत दे ही दी, उनका कहना था।

अब आप कहेंगे, कपिल भाई, आसाराम क्यों? भई काफी रसिक रहे आसाराम, और अब तो जेल से बाहर हैं, आनंद कर रहे हैं, तो सोचा इस मामले में उनके विचार ज्यादा बेहतर लगेंगे। बाकी जल्द ही सभी बलात्कारी बाहर होंगे। जय हो भारत के कोर्ट और जजों की। नमस्कार। 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

अरावली - कहां चली




नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। लो भई, और कुछ नहीं मिला तो लगे ये प्रगतिशील शोर मचाने अरावली की पहाड़ियों के बारे में। महामानव ने एक नई सोच को जाग्रत करते हुए कहा कि भैया जो पहाड़ सौ मीटर या उससे नीचा होगा, यानी जिसकी उंचाई सौ मीटर तक नहीं पहुंचेगी उसे पहाड़ नहीं माना जाएगा। भई वाह, वाह भई वाह, क्या ही शानदार सोच है महामानव की। यानी जो सौ मीटर का नहीं है वो पहाड़ नहीं है। 




ये जो लोग शोर मचा रहे हैं कि अरावली खतम हो जाएगी, अरावली खतम हो जाएगी। वो महामानव के विज़न को नहीं देख पा रहे हैं। अरे तुम ग़रीब लोग, तुमने देखा ही क्या है। अगर हम दुनिया के नंबर वन देश बनना चाहते हैं, तो हमें कुछ सैक्रीफाइस तो करना ही पड़ेगा। ये सैक्रीफाइस ही है देश को दुनिया का नंबर वन देश बनाएगा, विश्वगुरु बनने के तिराहे पर तो हम खड़े ही हैं, अब हमें दुनिया का सबसे बढ़िया देश बनना है।

अब तुम देखोगे कि हम ये कैसे करें। इसके लिए हमें बहुत सारे बोल्ड कदम उठाने पड़ेंगे, बहुत सारे। तो सबसे पहले तो ये सोचो कि तुमने देखा होगा कि कैसे दुबई के, सउदी अरब के देश अमीर हैं, उनके यहां अमीर लोगों के पास तेल के भंडार हैं, तेल कहां से मिलता है, रेतीले रेगिस्तान से। रेत के रेगिस्तान में होती है, देश में रेगिस्तान बहुत कम है। इसलिए अरावली को हटाने की योजना है। अरावली को हटाने से रेगिस्तान फैल जाएगा, दूर-दूर तक रेगिस्तान फैल जाएगा। फिर सारी दुनिया के लोग रेगिस्तान के मज़े लेने के लिए हमारे देश में आया करेंगे। क्या ही कमाल होगा। आज जैसे मिडल ईस्ट के रेगिस्तान की वीडियो और फोटो हर जगह दिखाई देती हैं, वैसे दिल्ली की फोटो और वीडियो दिखेंगे। रेगिस्तान होने की वजह से सउदी अरब इतना इतराता है, अब महामानव की वजह से हम भी इतना ही इतराया करेंगे। हम उन्हें दिखा देंगे कि हम भी रेगिस्तान बना सकते हैं। 

दोस्तों इस रेगिस्तान के कितने फायदे हैं आप नहीं जानते। रेगिस्तान बनेगा तो क्या पता अपने यहां भी तेल के भंडार मिल जाएं। फिर उन तेल के कुआंे को अडानी, अम्बानी मैनेज करेंगे और हमारे आपके जैसे लोगों को नौकरियां मिलेंगी। फिर हमारे देश के लोगों को नौकरी के लिए सउदी अरब नहीं जाना पड़ेगा, बल्कि बाकी देशों के लोग हमारे देश में आकर नौकरी करेंगे। फिर देखना हमारा रुपया डॉलर से भी उपर हो जाएगा। अभी जो लोग रुपये की गिरावट पर शोर मचा रहे हैं, उन्हें तब पता चलेगा कि हमारा रुपया क्या कमाल दिखा सकता है। 

और तुम्हें क्या लग रहा है कि ये जो महामानव अरावली के पहाड़ों को काटेंगे तो उनका क्या करेंगे। अरे उनसे अपने देश में हम भी बुर्ज-खलीफा जैसी गगनचुंबी इमारते बनाएंगे। बुर्ज खलीफा 828 मीटर की है, तो हम 1000 मीटर उंची इमारत बनाएंगे और उसका नाम राम की लाट रखेंगे। राम की लाट बनाने के लिए दोस्तों अरावली का कटना जरूरी है, क्योंकि अरावली खतम होगी, तो ही रेगिस्तान फैलेगा, रेगिस्तान फैलेगा, तो हमें तेल मिलेगा, तेल मिलेगा तो पैसा आएगा, और तब उसी पैसे से हम राम की लाट जैसी बिल्डिंग बना पाएंगे। इसीलिए मुझे महामानव पसंद हैं उनकी सोच जो है, वो कोई आम सोच नहीं है, बल्कि दूरदृष्टि है, दूर भी नहीं, भैया उनकी बहुतदूरदृष्टि है। 

अरावली के खतम होने का दूसरा फायदा हमें ये होगा कि अभी दिल्ली में बहुत गर्मी पड़ती है, और बहुत ज्यादा सर्दी पड़ती है। दिल्ली के मौसम पर अरावली का, हिमालय का, और भी पहाड़ों का बहुत असर होता है, सभी जगह होता है। हम पहाड़ों के इस असर को खतम कर देंगे, दिल्ली में, और पूरे देश मे ंहम मौसम का एक ही तौर रखेंगे, गर्मी तो गर्मी, सर्दी तो सर्दी। अभी आप लोग दिल्ली में पानी की कमी से जूझ रहे हो, तब ऐसा नहीं होगा, होगा ये कि हिमालय में जो बर्फ पिघल रही है, वो पानी आपके पास आएगा, दूसरी तरफ रेगिस्तान के चलते, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और बहुत सारे उत्तर प्रदेश के खेत बंजर हो जाएंगे। इससे दिल्ली जो देश की राजधानी है उसमें भरपूर पानी होगा, इतना पानी होगा कि तुम्हें कभी पानी की कमी महसूस नहीं होगी। 


ये जो लोग अभी अरावली के खतम होने का मातम मना रहे हैं, आप उनकी तरफ मत देखो। ये वो लोग हैं तो कभी विकास को नहीं पहचान पाते, इन्हें हमेशा किसानों की, मजदूरों की, ग़रीबों की पड़ी रहती है। महामानव को देखो, उनकी तरह सोचना सीखो, ज़रा सोचो क्या महामानव ने कभी ग़रीबों के बारे मे ंसोचा है। अगर महामानव कभी किसानों, दलितों, आदिवासियों के बारे में सोचते, तो क्या कभी अडानी और अम्बानी दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूचि में अपनी जगह बना सकते थे। नहीं? इसलिए ग़रीबों के बारे में सोचना छोड़ो, तुम तो ये सोचो कि देश को अमीर कैसे बनया जा सकता है।

ये जो लोग अरावली को खतम नहीं करना चाहते वो देश को अमीर नहीं बनने देना चाहते, हमारे प्रिय एंकर अद्भुत मेघा से हमें बता रहे हैं कि ये जो दिल्ली का प्रदूषण है वो अरावली की वजह से ही है और अरावली खतम होने से वो प्रदूषण भी खतम हो जाएगा। अरावली खतम होने से समझिए क्या-क्या खतम हो जाएगा। ग़रीबी, प्रदूषण, बेचारगी, कमजोरी, घात, सुन्नापन, टेढ़ापन और अन्य विशेष बिमारियों का इलाज भी अरावली खतम होने से हो जाएगा। 


दरअसल, नेहरु ने जानबूझ कर दिल्ली को कटोरी से नहीं निकाला था, ये उनकी भूल थी, ग़लती थी, साजिश थी, लेकिन अब जबकि हमारे पास एक नॉनबॉयोलोजिकल महामानव है तो ये काम भी कर ही डाला जाए। पूरी अरावली खतम करने के लिए जिस तरह की हिम्मत और जिगरा चाहिए, वो नेहरु के पास नहीं था, महामानव के पास है, इसलिए इस काम को वही करेंगे। 

और एक विशेष बात पर चर्चा करना तो मैं भूल ही गया। देश की सुरक्षा। देश की सुरक्षा बहुत जरूरी है मितरों। और इस देश की सुरक्षा में सबसे बड़ी अड़चन ये अरावली ही तो है। अरावली होने के चलते, हमें दिल्ली से सीधा पाकिस्तान बॉर्डर नहीं दिखाई देता। एक बार अरावली खतम हो जाए तो हम दिल्ली में भी स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी जैसा ही एक और स्टैच्यू बनाएंगे, फिर उस स्टैच्यू की आंख से सीधे पाकिस्तान दिखाई देगा, और जैसे ही हम देखेंगे कि पाकिस्तान कोई ग़लत हरक़त कर रहा है, सीधे उस पर हमला कर दिया जाएगा। फिर हमें राडार से छुपने के लिए खराब मौसम या बादलों की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, क्योंकि दुश्मन सीधे हमारी आंख की सीध में होगा। अभी क्या होता है ना, कि पहलगाम, या पुलवामा जैसा कायराना हमला पाकिस्तान कर ले जाता है, अब नही ंकर पाएगा। बढ़िया हो गया। 

तो कुल मिलाकर मामला सीधा बनता है साहब। वो लोग जो देश को दू......रदृष्टि से देख रहे हैं, वो तो कर रहे हैं अरावली को खतम करने की हिमायत, और जो भाई लोग इसे ग़लत बता रहे हैं, विनकी नज़र थोड़ा पास की है, यानी कमज़ोर है। अब ये जो मजदूर-किसान वगैरह हैं, वो कमज़ोर ही होते हैं, मै बताउं आपको, इनकी बात वैसे भी मानी नहीं जाती। महामानव ने डिसाइड कर लिया, सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी, एन जी टी तीर्थ यात्रा पर है। 

तो जल्द ही मेरे दोस्तों, जब अरावली खतम हो जाएगी तो हम भी रेत के टीलों पर रात को बोनफायर में ग़रीबों और आदिवासियों का नाच देख सकेंगे, इसके सपने आप लेते रहें। 

बाकी, चचा जो थे हमारे, यानी ग़ालिब, उन्होने कलकत्ते और नखलउ पर शेर लिखे, दिल्ली पर उनके जानकार कहते हैं कि शेर ना लिखे ग़ालिब ने, लेकिन ऐसा वही कहते हैं, तो जानते नहीं थे, ग़ालिब को, या उतना क़रीब से नहीं जानते थे, जितना क़रीब से मैं उन्हें जानता था। तो अरावली पर एक शेर उन्होने लिखा था। वो कुछ यूं था शेर कि....

तेरे पहाड़ नीचे, मेरे पहाड़ उंचे
तेरी ज़मीं चुरा के, मैं आसमा बना लूं
तू रहेगा 100 के नीचे, मैं रहूंगा उसके उपर
तू कुछ भी कह ले भैया, मैं खत्म कर ये डालूं

ग़ालिब, ग़ालिब थे, कुछ भी कह सकते थे, आप ध्यान रखिए ज़रा, आजकल वैसे भी राष्टद्रोही होने की रवायत चली हुई है, कहीं आप ना हो जाना। 

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

बुर्के पर वबाल

 




 भई यारों ये क्या किस्सा है जिसके पीछे पूरे देश में इत्ता वबाल कट रहा है। देखा कि एक राज्य के मुख्यमंत्री जी ने भरी सभा में एक महिला के चेहरे से बुर्का नोंच लिया। 



मुझे समझ नहीं आता कि आखिर ये ऐसी क्या बात है जिस पर वबाल हो सकता है। आखिर एक राज्य के मुख्यमंत्री को इतना भी अधिकार नहीं होगा कि वो नौकरी मांगने आई एक महिला के चेहरे से बुर्का उतार दे। आपको तो इसी बात पर खुश होना चाहिए कि उन्होने सिर्फ यही किया है, मेरा मतलब है, एक साहब हुए थे, भाजपा के कुलदीपक, उन्होने तो नौकरी मांगने पहुंची एक 16 साल की नाबालिग लड़की का बलात्कार कर दिया था। बताइए, ऐसे में मुख्यमंत्री द्वारा बस बुर्का खींचने जैसी हरकत पर आपको एतराज हो रहा है, ये सरासर नाजायज़ बात है भाई।

असल बात की तरफ आपका ध्यान नहीं गया भाई। असल बात ये है कि वो महिला बुर्का पहन कर एक सरकारी प्रोग्राम में गई थी, तो ये मुख्यमंत्री का कर्तव्य था कि वो उसकी सही पहचान करें। मुख्यमंत्री हमारे सबको पहचानते हैं, यही तो उनकी खासियत है। इसी सही पहचान के लिए तो उन्होने उस महिला के चेहरे से बुर्का नोचा था। देखिए किसी भी सरकारी आयोजन में अगर जाते हैं, तो ये पहचान करना कि जो व्यक्ति आपके सामने है वही सही व्यक्ति है, मुख्यमंत्री का कर्तव्य होता है, कहीं अगर वो ग़लत कैंडीडेट को नौकरी दे देते तो बताइए क्या गजब होता। 

मैं बताता हूं हुआ क्या था। दरअसल अभी कुछ ही दिन पहले राज्य में चुनाव हुआ था। उस चुनाव में हुआ क्या कि महिलाओं को दस हज़ार की राशि दी गई ताकि वो सही जगह वोट कर सकें। आखिर महिला सशक्तिकरण का मामला था। इसके बाद हुआ ये कि उसी वोट की ताकत से राज्य में अ लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी जिसके सर्वेसर्वा यही महानुभाव थे, जिन्होने अभी एक महिला के चेहरे से बुर्का नोचा है। तो हुआ ये कि अब सरकार यानी बिहार सरकार ये कह रही है कि वो जो दस हज़ार रुपये भेजे गए थे, वो ग़लत लोगों के पास चले गए थे। और अब उनकी उगाही की जा रही है, लोगों को नोटिस भेजे जा रहे हैं कि अबे पैसे वापिस करो बे।

तो ऐसे में मुख्यमंत्री को ये लगा कि अगर किसी ग़लत कैंडीडेट को नौकरी मिल गई तो नौकरी वापिस लेना तो मुश्किल होगा। इसलिए उन्होने ये जिम्मेदारी अपने हाथ में ली कि वो महिला की सही पहचान करके ही उसे नौकरी दें। और इन वामियों ने, तथाकथित प्रगतिशीलों ने, इन महिला अधिकार के रक्षकों ने इसी पर वबाल काट दिया। 

अभी कुछ ही दिन पहले एक हाई कोर्ट के जज साहब ने कहा था, कि किसी पीड़िता के स्तनों को छूना या कपड़े उतारने की कोशिश दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता है। अब आप ही सोचिए भाई, हमारे न्यायालय कितने सहिष्णु होते जा रहे है, हमारे विधायक और मुख्यमंत्री भी सहिष्णु होते जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि ऐसे कृत्यों के प्रति जनता भी सहिष्णु हो जाए, लेकिन जनता, खासतौर पर महिलाएं, सहिष्णु नहीं होना चाहतीं। अरे भई, अगर कोई आपके चेहरे से बुर्का खींच ले, या आपको देख कर सीटी मारे, या मान लीजिए की हाथ पकड़ ले, तो थोड़ा सहिष्णु बनिए, इसे इतना बड़ा मुद्दा मत बनाइए। 

ऐसे ही एक किस्सा याद आता है, जिस पर वबाल हुआ था, और सुनते हैं बड़ा भारी युद्ध हुआ था, इसी देश की बात है। 
सभा में सब स्तब्ध थे। सबकी नज़रें उन पासों पर थीं, जिन्होने दुर्योधन की जीत का निशान दिया था। एकबारगी तो दुर्योधन भी स्तब्ध था। हालांकि उसे मामा शकुनि की जुआ खेलने की कला पर पूरा यकीन था। लेकिन अपने भाग्य की वजह से वो थोड़ा असहज था। लेकिन पासों के गिरते ही पहले उसकी आंखे चौड़ी हुई, फिर आंखों ने दिमाग को बताया वो फिर से जीत गया है। अचानक कंठ से अट्टहास गूंजा जो पूरी सभा में फैल गया। इस अट्टहास ने पूरी सभा को जैसे नींद से जगा दिया था। अचानक सहस्रों कंठों से आवाज़ निकली और पूरी सभा में एक शोर गूंज गया। दुर्योधन ने पीछे मुड़ कर देखा, दुःशासन उसके कांधे पर से झांक रहा था, और उसकी हंसी साफ दिखाई दे रही थी।




”दुःशासन”, दुर्योधन ने पूरी ताकत लगाकर कहा, ताकि पूरी सभा को पता चल जाए कि वो बोल रहा है।

”जी भाई जी” दुःशासन ने कहा।

”जाओ, हमारी जीती हुई वस्तु को तत्काल सभा में ले आओ। जो वस्तु जीत ली गई हो, उसे तत्काल अपने कब्जे़ में लेना ही नीति है।”
”मैं अभी गया और अभी आया” दुःशासन ने कहा और फौरन निकल गया।
सभा में एक ओर खड़ी द्रौपदी है, दूसरी तरफ दुःशासन उसकी साड़ी खींच रहा है, और पीछे खड़ा दुर्योधन हंस रहा है, सारे कौरव हंस रहे हैं, और जिन पर द्रौपदी ने विश्वास किया था, वो सिर झुकाए मौन बैठे हैं।

जब राज्य में राजसभा में हुए इस वबाल की खबर फैली तो जनता ने इसका प्रतिकार किया। राजा अपने राज्य के मद में चूर हो सकता है, लेकिन जतना के कांधो पर तो नैतिकता की जिम्मेदारी लेती है। जनता ने कहा कि महिलाओं का अपमान नहीं सहा जाएगा। इस तरह किसी का भी अपमान नहीं सहा जाएगा, और जो राजा मद में चूर हो जाए, उसे शासन का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।

राजभवन में जनता के इस आक्रोश की खबर फैली तो थोड़ा अटका-झटकी हुई, लेकिन अनैतिकता के जिन मजबूत कंधो का सहारा लेकर दुर्योधन राजगद्दी पर बैठा था, उन्होने अपनी कुटिल चालें चलीं। असत्य, अनैतिकता, पाखंड, भ्रष्टाचार और अमानवीयता के हथियारों से लैस दुर्योधन और उसके समर्थकों ने जनता के बीच एक नये तरह का ज्ञान पेलना शुरु किया।

”वे तो महिलाओं के अधिकार के सबसे बड़े चिंतक हैं।”
”उन्होने महिलाओं के लिए काम किया है।”
”उन्होने साड़ी खींचते हुए भी महिला सम्मान किया है।”
”उनकी उम्र तो देखो, उनकी उम्र का सम्मान करो।”
”उन्होने तो मज़ाक किया था, इस बात का इतना बतंगड़ मत बनाओ।”
”उनका ये काम भी महिला अधिकार की श्रेणी में ही आना चाहिए।”

धीरे-धीरे जनता में ये बात फैलने लगी, और जनता दुर्योधन के इस घृणित कृत्य को भूल गई, बल्कि बात इस बारे में होने लगी कि किसी महिला को साड़ी पहनने का अधिकार होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए।

2014 के बाद देश की डोर जिस धर्म और संस्कृति के ठेकेदारों ने संभाली है, वे निश्चय ही बहुत कर्मठ हैं, कुलदीप सिंह सेंगर, बृजभूषण, और अब नितीश कुमार तो मान लीजिए छोटी-मोटी हस्तियां हैं, यहां तो हालत ये है कि सुना खुद महामानव ने एक लड़की का पीछा करवाया था, और फिर जब ये बात खुली तो कोर्ट ने उनका ये तर्क भी मान लिया था कि खुद लड़की के पिता के कहने पर राज्य के गृहमंत्री ने उसका पीछा करवाया था। यानी इस देश में यदि एक बालिग लड़की का पिता राज्य के गृहमंत्री से कहेगा तो राज्य के मुख्यमंत्री के कहने पर पूरी पुलिस उस लड़की का पीछा करवा सकती है, और ये हरकत कानून सम्मत मानी जाएगी। बल्कि हमें तो इस देश में ही ये कहने वाले भी मिल चुके हैं कि 
मेदी मेरी बीवी वाला वीडियो
और जब ये सामान्य है, कोर्ट इसे मान चुका है, जनता इसे मान चुकी है तो फिर एक ग़रीब राज्य के मुख्यमंत्री की इस हरकत को ओछी हरकत मानना, उसे महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली हरकत मानना कहां की समझदारी है भई। मेरा तो मानना है कि अब इस देश में एक ऐसा कानून भी बना ही देना चाहिए कि जिसमें एक निश्चित पार्टी के सदस्यों के लिए महिलाओं के साथ किए गए व्यवहार, कारगुज़ारियों, कारस्तानियों, और कांडों को देश की सुरक्षा के नाम पर दबा दिया जाए। और अगर प्रगतिशीलता, महिला अधिकार, मानवाधिकार आदि के नाम पर कोई इन्हें मुद्दा बनाए, तो कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों को चाहिए कि वे स्वतः संज्ञान लेकर उस व्यक्ति, संस्था, पार्टी के खिलाफ यू ए पी ए, पी एम एल ए, या एन एस ए वाले कानून के तहत बिना मुकद्मा चलाए उन्हें जेल में डालने की तजवीज करें। ताकि ये देश विश्वगुरु बन सके। 
सबसे बड़ी बात ये है कि आज देश की बड़ी बहस ये होनी चाहिए कि महिलाएं कौन सा कपड़ा पहनेंगी, और कौन सा नहीं, कैसे कपड़े पहनेंगी, और कैसे कपड़े पहनने की इजाज़त उन्हें मिलनी चाहिए, वे कैसी दिखें, क्या करें, क्या ना करें, कैसा व्यवहार करें, और हम यानी पुरुष उन्हें क्या अधिकार दे सकते हैं, कैसी और कितनी आजादी देनी चाहिए, कब दे
बाकी चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, लड़कियों को पर्दे में रखने के कायल थे, इसलिए कभी महिलाओं का अपमान नहीं किये, कभी बुर्का भी नहीं खींचे किसी का, लेकिन इस मामले में कतई सनातनी पार्टी के तर्कों के कायल हो गए थे, इसीलिए तो ये लिखा

कि 

तेरे दम में है अगर तो, तू कांड कर कोई भी
तुझे हक़ है मेरे यारा, तू कांड कर कोई भी
तू बड़ा है, तू खड़ा है, तू ही जीता, तू लड़ा है
तूझे डर ही क्या बता तू, तू कांड कर कोई भी

तो चचा का मिज़ाज भी ऐसा ही था, कहते थे हम न करेंगे, बाकी जिसके पास ताकत है वो तो करेगा ही कांड। तो मेरा मानना ये है मितरों कि नितीश कुमार को, महामानव को, और भी सबको, थोड़ा बहुत भ्रष्टाचार, थोड़ा बहुत व्यभिचार करने की स्वतंत्रता और अनुमति होनी चाहिए। ठीक है ना। 

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

पैमाना बदल दूंगा






ये कौन लोग हैं जो शोर मचा रहे हैं, एक शानदार सनातनी सरकार की मुखिया के लिए ”हाय-हाय” के नारे लगा रहे हैं।  
जनाब दिल्ली की कमान हाथ में लेते ही हिंदू धर्म की रक्षा की जिम्मेदारी का गठ्ठर अपने सिर पर रखने वाली रेखा जी गुप्ता से आप लोग इतना चिढ़ते क्यों हैं। दिल्ली में क्या पहले प्रदूषण नहीं था, क्या पहले हवा खराब नहीं थी, क्या पहले सांस लेना दूभर नहीं था? जब पूरी दुनिया में दिल्ली सबसे प्रदूषित शहर की कैटेगरी में आ गया था तो उस समय रेखा जी गुप्ता की सरकार ने आपको दिवाली पर पटाखे जलाने की अनुमति दिलवाई थी। आप भूल जाएं, लेकिन धर्म उन्हें नहीं भूलेगा, पटाखे जलाकर दिल्ली की जनता को धर्म का असली मर्म रेख जी गुप्ता ने सिखलाया था, ये बात आप भले ही भूल जाएं लेकिन मनिंनदरजीत सिंह जी कभी नहीं भूलेंगे। और आप ऐसे अहसान फरामोश हैं कि स्टेडियम में खडे़ होकर ए क्यू आई का नारा लगा रहे हैं। 




ये दरअसल देशद्रोहियों की, आपियों की, वामियों की, कांगियों की, साजिश है, जिन्होने इस खराब हवा के मुद्दे को इतना बढ़ा-चढ़ा कर दुनिया के सामने रखने की हिमाकत की है। क्या है ये ए क्यू आई जिसे आप इतना बड़ा मुद्दा बना दे रहे हो? क्या ये धर्म से बड़ा है? सनातन से बड़ा है? 






ये इस देश की विडंबना है कि वो एक कर्मठ प्रधानमंत्री को, एक कर्मठ मुख्यमंत्री को पहचान नहीं पा रहा है। 



ये तो पाश्चात्य संस्कृति की साजिश है। ये ए क्यू आई कोई संस्कृत का शब्द नहीं है, ये तो हमारी संस्कृति में भी नहीं है, ये तो विदेशी मुल्कों की साजिश है जिसके ज़रिए वो इस देश को बदनाम करना चाहते हैं, और इसमें कुछ लोग जो इस देश में रहते हैं, इस देश का खाते हैं, लेकिन बाहरी मुल्कों की मदद करते हैं, वो इनका साथ दे रहे हैं। सच बात तो ये है कि रेखा जी गुप्ता जी ने ठीक ही कहा है कि ये ए क्यू आई तो सिर्फ एक टेम्परेचर है, तापमान है जिसे किसी भी इन्स्टूमेंट से पता किया जा सकता है। इसलिए जब आप थर्मामीटर इस्तेमाल करेंगे तो आपको पता चलेगा कि ए क्यू आई जो है वो 106 से उपर जाएगा ही नहीं। अब बताइए, 106 ए क्यू आई क्या गलत होगा, बल्कि अगर आपको मेरी बात का यकीन नहीं है तो अभी की अभी थर्मामीटर निकालिए और देखिए आपको दिल्ली का ए क्यू आई 21 डिग्री से ज्यादा नहीं दिखेगा, बल्कि रात मे ंतो ये 2 से 3 डिग्री तक गिर जाता है। ये विदेशी साजिश है जिसमें दिल्ली के टेम्परेचर को ए क्यू आई से अलग कर दिया गया है, इसलिए हम मांग करते हैं कि देश में यानी भारत में ए क्यू आई नापने के लिए थर्मामीटर का इस्तेमाल किया जाए।





सभी ए क्यू आई नापने वाले केन्द्रों पर थर्मामीटर लगाया जाए, जिनसे ए क्यू आई नापा जाए। ये पूरी दुनिया भारत का विकास देख कर जल रही है। अरविंद केजरीवाल की सरकार जो काम नही ंकर पाई हम वो काम करके दिखाएंगे, हम पूरी दुनिया से अलग, भारत में, खासतौर पर दिल्ली में ए क्यू आई नापने की अलग तदबीर विकसित करेंगे जिसमें हाल कैसा भी हो, ए क्यू आई कम ही दिखाया जाएगा।  



ए क्यू आई ही क्यों, हम बेरोज़गारी नापने के भी नये पैमाने बनाएंगे, जिससे देश में बढ़ती बेरोजगारी पर लगाम लगाई जा सके। इसी तरह पिछले दिनों जो रुपया नीचे गिर रहा है, उससे निपटने के लिए हम रुपये की क़ीमत आंकने के लिए भी नये पैमाने बना देंगे ताकि रुपया नीचे गिरता ना लगे, इसी तरह जब लोग कहते हैं कि हमारे देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, अपराध बढ़ रहा है, नफरत और दंगे बढ़ रहे हैं, हम उन सब पैमानों को भी बदल देंगे ताकि सब अपराध कम होता हुआ लगे और हम अपनी छप्पन इंची छाती को ठोक कर कह सके कि, अच्छे दिन आ गए। बल्कि हम अच्छे दिन की परिभाषा ही बदल देंगे ताकि बुरे दिनों को अच्छे दिन बताया जा सके। 

ये वो लोग हैं दोस्तों जिन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही है, प्रदूषित हवा की वजह से जिनकी जान पर बन आई है। ये लोग वो लोग हैं, जिन्हें रेखा जी गुप्ता जी का सम्मान अपनी जान से बढ़ कर लगता है, ये लोग अपनी जान बचाने को दिल्ली छोड़ कर भाग रहे हैं। लगातार दिल्ली वाले प्रदूषण के लिए जो रेखा जी गुप्ता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, उसके चलते उन्होने एक क्रांतिकारी, ऐतिहासिक फैसला लिया है कि अब दिल्ली में ग्रिल और तंदूर को बैन कर दिया गया है। लेकिन सच तो ये है दोस्तों की सर्दियों में ये जो दिल्ली वाले अपनी रसोइयों में सुबह-सुबह पराठे बनाते हैं, उनसे बहुत धुआं उठता है, इस धुएं से सबसे ज्यादा प्रदूषण होता है। मैं तो रेखा जी गुप्ता से ये मांग करूंगा कि दिल्ली में पराठे बनाना, पराठे खाना बैन करना चाहिए, ताकि प्रदूषण का जो कलंक दिल्ली के माथे पर लगा है उससे छुटकारा मिले। दोस्तों, जो आपको ए क्यू आई की बात कहे, उससे कहिए कि ”जा पहले पराठे पर बैन लगा, फिर मुझसे ए क्यू आई की बात करियो”। दोस्तो, दिल्ली की हवा में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण सर्दियों में घरों में बनने वाले पराठे हैं, जिन पर बैन लगना ही चाहिए, ताकि रेखा जी गुप्ता का आई क्यू बढ़ सके और दिल्ली का ए क्यू आई कम हो सके।




मेरे मितरों अब वक्त आ गया है कि हम दुनिया को बता दें कि हम विश्वगुरु हैं, आज ही से हम संकल्प लें। आपको याद होगा जब हमने ये शुरु किया था कि हमारे मंत्री हर तीसरे दिन कूड़े के ढे़र के पास जाकर कहते थे, ”भाई तुझे जाना होगा”, अब हमारे मंत्री प्रदूषण से कहेंगे कि तुझे जाना होगा भाई, पहले इन समस्याओं को मुख्यमंत्री रेखा जी गुप्ता के प्रोत्साहन से भेज कर हम बाकी अन्य समस्याओं के पास भी मंत्रियों को भेजेंगे, ताकि उन्हें भी रेखा जी गुप्ता का ये संदेश दिया जा सके और आखिरकार जब इन सनातनी मंत्रियों के इस सदंेश को सुन कर दिल्ली और अंततः ये देश समस्याओं से मुक्त हो जाएगा।




इसमें मुझे सिर्फ एक ही बात कहनी है, ज्यादातर मामलों में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा जी गुप्ता बहुत हद तक महामानव से भी आगे निकल गई हैं, अपने आउट ऑफ द वर्ल्ड विज़डम से उन्होने देश दुनिया को भौंचक्का कर दिया है, इतिहास, विज्ञान, स्पेस टेकनॉलॉजी, भाषा, सबके साथ उन्होने लगभग वही व्यवहार किया है, जैसा महामानव ने किया था। इस मामले में वो कतई महामानव जैसी हैं। लेकिन अपने मंत्रियों से दिल्ली के कूड़े को, भाई तुझे जाना पड़ेगा” जैसा संदेश देना महामानव को कतई नहीं सूझा, और इसलिए वो कतई, लेडी महामानव के लकब की हकदार हैं। 



यूं मेरे दोस्तों हम दिल्ली के प्रदूषण को कम करने, कूड़े को कम करने, देश की बेरोज़गारी को कम करने की तरफ कदम बढ़ा सकते हैं।

चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, वो कहते थे

जो आया था ये कह के, जमाना बदल दूंगा
वो कह रहा ह ैअब के, पैमाना बदल दूंगा

सीधा सा मंत्र है मितरों, जब काम ठीक ना हो, तो परिभाषा बदल दो, सारा खेल परिभाषा का है। आप काम करने की कोशिश ही मत करो, परिभाषाएं बदलते रहो, काफी है।
बाकी आप समझदार हैं, बस ये समझ लीजिए कि दिल्ली में प्रदूषण नहीं है, ये सब सरकार को बदनाम करने की साजिश है। 

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

मगरमच्छ पकड़ने की कला



जी जनाब, देश इस वक्त विद्वानों से भरा पड़ा है, भरा क्या पड़ा है भाईसाब विद्वान यूं निकल-निकल पड़ रहे हैं कि क्या कहें। लेकिन मुसीबत ये है कि देश के इन विद्वानों में से कोई भी देश के भले के लिए नहीं सोच रहा, कम से कम उतना नहीं सोच रहा जितना कि महामानव सोच रहे हैं। 





महामानव की सोच और उनके कारस्तानियों से सबक लेकर ही ये देश आगे बढ़ सकता है। मतलब विकास कर सकता है और इस देश के अच्छे दिन आ सकते हैं। यू ंतो महामानव का पूरा जीवन की प्रेरणादायक है, लेकिन आज मैं उनके सिर्फ एक कांड की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कि आप महामानव के बालपन के इस कांड से सबक लें और अपना जीवन भी सार्थक करें।

दोस्तों आज मैं आपको मगरमच्छ पकड़ने की कला से रु-ब-रु कराउंगा। हालांकि अगर बचपन में पकड़ा जाए तो ये कांड सार्थक होता है, लेकिन क्योंकि आप ये मौका खो चुके हैं, इसलिए अब यानी जवानी या बुढ़ापे में भी इस काम को करने से अंजाम भले हो सकते हैं। गौर करें मैं यहा मगरमच्छ की नहीं, आपकी उम्र का जिक्र कर रहा हूं। यानी आपको अपने बचपन में ही मगरमच्छा पकड़ना था, जो आपने नहीं पकड़ा। हालांकि ये काम आसान होता है यदि मगरमच्छ का भी बचपना ही हो जब उसे पकड़ा जाए। इसलिए खैर रखिए।

तो बहुत बेसिक से शुरु करते हैं। मगरमच्छ का मासूम नाम है, लेकिन अप इससे धोखा नहीं खा सकते, ये आपने अब तक के अपने अनुभव से सीख लिया होगा, मासूम नाम के पीछे चेहरा घिनौना हो सकता है, डरावना हो सकता है, या पापी भी हो सकता है। मगरमच्छ नाम का संधि विच्छेद करने पर मगर और मच्छ मिलता है, यानी इसमें अगर-मगर करने की आदत होती है और ये मछली की तरह पानी में रहता है। लेकिन पानी में रहने के बावजूद वो जमीन पर शिकार करता है, यानी कहता कुछ और है करता इसका बिल्कुल उलटा है। इसलिए मगरमच्छ के नाम पर मत जाइए, उसे उसके चरित्र से यानी उसकी आदतों से, उसकी हवस से जानिए।
 
तो सबसे पहले मगरमच्छ को देखिए। देखना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि बिना देखे मगरमच्छ को नहीं पकड़ा जा सकता। देखना इसलिए भी ज़रूरी होता है क्योंकि आजकल नदियों में जो मगरमच्छ होते हैं, उनकी गुणवत्ता वैसी नहीं होती, जैसी उस जमाने में होती थी जब महामानव ने मगरमच्छ पकड़ा था। उस समय के मगरमच्छ मगरमच्छों जैसी हरक़त करते थे, आजकल मगरमच्छों की हरक़तें कुछ -कुछ, गौर कीजिए, मैं ने सारी हरक़तों की बात नहीं की है, कुछ हरक़तें इंसानों जैसी हो गई हैं। जाहिर है, मगरमच्छों के भी अच्छे दिन आए हुए हैं। महामानव के बचपन में जब नेहरु का राज था, मगरमच्छों का सही पोषण और लालन-पालन नहीं हुआ था, अक्सर कमज़ोर रहते थे, और यूं ही पकड़ में आ जाते थे, आजकल के मगरमच्छ जब तक हो सकता है खाते हैं, और फिर पकड़ाई का अंदेशा होते ही देश छोड़कर चले जाते हैं, विदेशों में ऐश करते हैं। आखिर उनके अच्छे दिन भी आ ही गए हैं।

ख़ैर, पकड़ने से पहले मगरमच्छों को देखना इसलिए भी ज़रूरी है कि ये तसल्ली करना चाहिए कि वो मगरमच्छ जिस पर आपकी नज़र है, कहीं कनेक्टिड ना हो, कहीं ऐसा ना हो कि आपको लेने-के-देने पड़ जाएं।




ग़ौर कीजिएगा, इसी लेने के देने के चक्कर में कई लोग आ गए हैं, और आज बिचारे खिसियानी हंसी हंस रहे हैं, अपने ही हालात पर। तो एक बार अच्छी तरह देख लेने के बाद, यानी जांच-परख के बाद आप मगरमच्छ को पकड़ने के लिए तैयार हो चुके हैं। मगर साहब आपने मगरमच्छ को पकड़ने की जल्दी नहीं करनी है। कतई जल्दी नहीं करनी है, आराम से सबर के साथ, पूरे इत्मिनान से मगरमच्छ को पकड़ना है। इस इत्मिनान के समय में आप अपने कई ज़रूरी काम पूरे कर सकते हैं, जैसे घुइंया छील सकते हैं, रेलवे स्टेशन पर चाय बेच सकते हैं, आपातकाल के समय जेल जा सकते हैं, बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग कर सकते हैं, और कुछ ना बने तो भिक्षा मांग कर गुजारा भी कर सकते हैं। 




महामानव के जीवन में ऐसा इत्मिनान मगरमच्छ पकड़ने के बाद आया था, आप ऐसा इत्मिनान मगरमच्छ पकड़ने से पहले भी हासिल कर सकते हैं। आखिर महामानव मगरमच्छ पकड़ ही चुके हैं, इसलिए कोई जल्दबाज़ी और कोई भकभकी करने की जरूरत नहीं है।




अब आप यू ंसमझिए कि आप मगरमच्छ पकड़ने के एकदम क़रीब हैं, यानी बस कुछ ही पलों में मगरमच्छ पकड़ा जाएगा। अब आप ये सोचिए जनाब की जब आप मगरमच्छ को पकड़ने की जुगत लगा रहे होंगे तो मगरमच्छ क्या पंजे-पर-पंजा धरे खाली बैठा होगा। अरे वो भी तो कुछ जुगत लगा रहा होगा, वो भी या तो बचने के या फिर आप ही को धर दबोचने का इंतजाम सोच रहा होगा। अब मेरे मितरों आपको इससे भी बचना है। यानी अब समय पक गया है, मगरमच्छ आपको पकड़े इससे पहले आपको मगरमच्छ पकड़ लेना है। 



अब आप पहले अपनी तरफ देखिए, आखिर इस मगरमच्छ को पकड़ कर आप क्या ही कर लेंगे, जिसने मगरमच्छ पकड़ा उसने जो किया वो आप देख ही रहे हैं। उपर से मगरमच्छ पकड़ने के बाद मगरमच्छ पकड़ने वाले ने ये इंतजाम कर दिया कि बाकी मगरमच्छ आराम से जिंदगी बसर कर सकें, इसलिए अब मगरमच्छ पकड़ कर उनके जीवन में हैजान पैदा करके आप पहले मगरमच्छ पकड़ने वाले को परेशान करने की जुगत कर रहे हैं। इसलिए आपसे मेरी इल्तिजा है कि आप मगरमच्छ पकड़ने का ख्याल छोड़ दीजिए और जिसने मगरमच्छ पकड़ लिया है उसी के मगरमच्छ पकड़ने के किस्से सुनिए, सुनाइए और मजे उड़ाइए। इसी में आपका भला है।

बाकी चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, वो मगरमच्छ पकड़ने के माहिर थे, हालांकि अपनी पूरी जिंदगी उन्होने मगरमच्छ ना पकड़ बिचारे किसी और ही फिराक में रहे, कहते हैं सदा रक़ीब को पकड़ने के चक्कर में क़ासिद का इंतजार करते रहे, कि खतो-किताबत ही बनी रहे किसी तरह। लेकिन मगरमच्छ पकड़ने की कला पर एक गुलुबंद शेर उन्होने लिखा है जो आपके सामने पेश है। शेर कुछ यूंह ै कि

मगर को पकड़ेगा क्या, मगर के मच्छ साहेब हैं
तू इतना जान ले बच्चे सभी के रच्छ साहेब हैं।

मच्छ का तुक मिल नहीं रहा था, इसलिए ग़ालिब ने रच्छ इस्तेमाल किया और फुटनोट में लिखा है कि इसका मतलब नॉनाबायोलॉजिकल होता है। बाकी आप खुद भी तो समझदार हैं, समझ लीजिएगा। मैं चलता हूं। नमस्ते। 

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

वंदे मातरम का गुप्त इतिहास - सीक्रेट हिस्टी ऑफ वंदे मातरम

 


आखिरकार संसद में बहस हो ही गई, बड़ी ही शानदार बहस हुई साहब, खुद महामानव ने बहस की, मतलब बहस जैसी कोई चीज़ की और सबको हक्का-बक्का छोड़ा। बंकिम दा का नाम ले लेकर जो कोसा है महामानव ने नेहरु, जो कोसा है साहब, क्या ही कहें? 



दरअसल ये बहस जरूरी थी। कांग्रेस की तरफ से कहा जा रहा है कि भई जब देश में इंडिगो ने कहर मचाया हुआ है, उधर गोवा में एक क्लब हाउस की आग में लोग मर गए, इधर रुपया गिरा जा रहा है, तब वंदे मातरम की बहस की जगह इन ज्वलंत मुद्दों पर बहस की जाए। क्योंकि कांग्रेस तुम सबसे सच छुपाना चाहती है। सुनते हैं महादेव एप के चक्कर में हीरेन जोशी भाग गए, या भगा दिए गए, जो भी हो, कांग्रेस ऐसी छोटी-मोटी बातों पर जनता का ध्यान लगाना चाहती है और देश के लिए सबसे जरूरी जो बहस है इस समय, यानी वंदे मातरम उससे लोगों का ध्यान हटाना चाहती है। आज मैं आपको बताउंगा वो सच जिसे आज तक आपसे छुपाया जाता रहा है।




तुम्हे इतिहास का वो काला चैप्टर पढ़ाया ही नहीं जाता, तुमसे छुपा लिया जाता है। मैं तुम्हें वंदे मातरम का असली सच बताउंगा, ज़रा ध्यान से सुनना। 
दोस्तों हमें जो आजादी 1947 में मिली अगर नेहरु नहीं होता तो वो आजादी हमें 1857 में ही मिल जानी थी। दोस्तों जब 1857 में डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार तिरंगा झंडा लेकर, वंदेमातरम गाते हुए लालकिले की तरफ जा रहे थे, तो इसी जवाहर लाल नेहरु ने बीच में टांग अड़ा दी थी, वरना आजादी तो हमें 1857 में ही मिल गई होती। उस वक्त हेडगेवार अकेले थे, लेकिन बाद में उन्हें महामानव का साथ मिला, तब महामानव भिक्षा मांगकर गुजारा कर रहे थे, चाय उन्होने उसके बाद बेचना शुरु किया था। खैर महामानव को तब भी वंदेमातरम पूरा याद था, हालांकि तिरंगा वो नहीं फहराते थे, लेकिन वंदेमातरम पूरा गाते थे, बिना कोई भी लाइन छोड़े गाते थे। 

आपने देखा होगा, महामानव हर भाषण से पहले और हर भाषण के बाद वंदेमातरम ही गाते हैं, बल्कि जब भी बच्चों से मिलते हैं, वंदे मातरम की हर लाइन गाते हैं, बच्चों को उसका मतलब बताते हैं और फिर ये भी बताते हैं कि बंकिमचंद्र चटर्जी को वंदे मातरम लिखने की प्रेरणा उन्होने ही दी थी। अब टाइमलाइन पे ध्यान मत दो, वरना गुरुनानक, कबीर और गोरखनाथ वाली मीटिंग की टाइमलाइन बिगड़ जाएगी। 




आर एस एस की प्रेरणा से ही महामानव के बड़े भाई बंकिम चटर्जी ने वंदेमातरम लिखा था, वहीं से महामानव ने बंकिमचंद्र चटर्जी को बंकिम दा कहना सीखा, और ये आदत आज तक भी बनी हुई है। इसीलिए महामानव संसद में बार-बार बंकिम दा का सम्बोधन दोहराया, और टोकने पर चिढ़ गए। खैर, बाद में महामानव ने ही गुरु रविन्द्रनाथ को ये गाना कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में गाने की सलाह दी थी। 1896 में जब गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर कोलकाता की गलियों से निकलते थे तो महामानव उनके साथ हो लेते थे, दोनो की तू तड़ाक वाली दोस्ती थी, अब क्योंकि महामानव भी कविताएं लिखते थे, और गुरु रविन्द्रनाथ भी छोटी-मोटी तुकबंदी कर लेते थे, तो महामानव कभी-कभी गुरु रविन्द्रनाथ की कविताओं की इस्लाह कर दिया करते थे, इस मामले में महामानव का दिल बहुत बड़ा है। आपने देखा ही होगा व ेअब भी अपनी कविताएं बहुत शर्मा कर सामने रखते हैं। जबकि महामानव की प्रेरणा से गुरु रविन्द्रनाथ की कविताओं की ऐसी धूम मची कि एक तो उन्हें नोबेल मिल गया, दूसरे पूरा बंगाल उन्हें सम्मान देता है। 



इधर महामानव ने चुपके से गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर के कानों में ये बात डाल दी कि ये जो गाना है वंदे मातरम इसे कोलकाता के कांग्रेस अधिवेशन में गाना है, गुरु जी ने महामानव की बात मान कर कांग्रेस के अधिवेशन में ये गाना गाया। दोस्तों, इसके बाद जो हुआ उस पर आप यक़ीन नहीं करेंगे। नेहरु ने, यानी जवाहर लाल नेहरु ने वहीं ये कह दिया कि वंदे मातरम नहीं गाना है। इस बात का कोई प्रमाण बेशक ना हो, लेकिन जैसा कि राजनाथ सिंह जी ने बताया है कि नेहरु के मन में क्या था, उसी तरह महामानव को पता है कि नेहरु के मन में क्या था। आप यकीन मानिए, महामानव को आज भी पता है कि कब-कब नेहरु के मन में क्या था। 




जब वंदे मातरम के लिए महामानव की उस योजना में फच्चर पड़ गए तो महामानव ने एक नई राह निकाली। महामानव ने आर एस एस में वंदे मातरम गाने की योजना बनाई। लेकिन क्योंकि उस वक्त देश में नेहरु की चलती थी, इसलिए नेहरु से बचने के लिए महामानव ने संघ में सीक्रेटली यानी गुप्त रूप से वंदे मातरम गाने का रिवाज शुरु किया। इसलिए जब पूरा देश वंदे मातरम गाता था, तब संघ में सदा वत्सले गाया जाता था, लेकिन एकादशी की रात को छोड़ कर बाकी हर रात को संघ में वंदे मातरम गाया जाता था। 
संघ के हर सदस्य के लिए वंदे मातरम को याद करना सदस्यता की पहली शर्त होती है। आज भी आप देखेंगे कि संघ के सदस्य बाहरी दिखावा यूं करते हैं जैसे उन्हें वंदे मातरम नहीं आता है, लेकिन असल में उन्हें पूरा वंदे मातरम कंठस्थ रहता है, और वो दूसरों को भी वंदे मातरम गाने के लिए प्रेरित करते हैं।  



वो तो गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर वाले एक ग्रुप ने वंदे मातरम की कुछ लाइनो को राष्टगीत से हटा दिया था, वरना तो यकीन करो तुम, गुरु जी यानी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर तो पूरा का पूरा वंदेमातरम गाकर ही खाना खाते थे, मेरा मतलब भोजन ग्रहण करते थे। उनकी इसी तर्ज पर आज भी संघ के सदस्य हों या भाजपा के सदस्य हों, कहीं भी खड़े-खड़े पूरा वंदे मातरम सुना देते हैं। गुरु जी ने जो कितबा लिखी थी, बैंच ऑफ थीव्ज़ उसके हर पन्ने पर गुप्त रूप से पूरा वंदे मातरम लिखा हुआ है, बस आप जैसे ही संघ के सदस्य बनते हैं, आपको ये कुंजी दे दी जाती है। पर नेहरु के डर से संघ को इस किताब का प्रकाशन भी बंद करना पड़ा।  



दोस्तों, 1947 में जो आजादी मिली थी, वो भी पूरी आजादी नहीं थी। ये भी नेहरु की एक चाल थी जिसे आज भी पूरा देश भुगत रहा है। ये आजादी हमें निनन्याबे साल की लीज़ पर मिली है। आजादी का ये काला सच हमसे हमेशा छुपाया जाता है। मैं तो कहता हूं लगे हाथ महामावन को संसद में इस पर भी गहन चर्चा या बहस जो वो ठीक समझें करवा लेना चाहिए।



नेहरु ने बहुत ग़लतियां की थीं दोस्तों, आज भी उन ग़लतियों को याद करके महामानव की आखांे में आसूं आ जाते हैं, पर अभी हम सिर्फ वंदे मातरम पर बात करेंगे और इसकी सारी सच्चाई आप लोगों के सामने ले आएंगे। दोस्तों, जिन दिनों संघ में सीक्रेटली वंदे मातरम गाया जाता था, तब किसी ने जाकर नेहरु को इसकी शिकायत कर दी थी। तब नेहरु ने गृहमंत्री वल्लभ भाई पटेल से कह कर संघ पर बैन लगवा दिया था। उससे ठीक पहले संघ ने किसी बात पर मिठाई बांटी थी, और खुशियां मनाई थीं, लेकिन हम उस बात पर नहीं जाएंगे, मिठाई बांटने का तो कोई भी कारण हो सकता है। खैर तो जब वंदे मातरम गाने की वजह से संघ पर बैन लग गया तो सोचा गया कि क्या किया जाए, तो मजबूर होकर संघ को सीक्रेटली भी वंदे मातरम गाना बंद करना पड़ा। तब जाकर संघ पर से बैन हटाया गया। दोस्तों आपको अक्सर ये बताया जाता है कि महात्मा गांधी की हत्या में संघ का नाम आने की वजह से उस पर बैन लगाया गया। लेकिन ये बिल्कुल झूठ है, संघ पर बैन नेहरु ने लगाया था। हालांकि सरदार वल्लभभाई पटेल ने तो नेहरु से कहा भी था, कि बैन मत लगाओ, लेकिन नेहरु नहीं माने, नेहरु के कपड़े पेरिस में धुलकर आते थे, और उनके लिए चाय इंग्लैंड में बनाई जाती थी, जिसे स्टार टैक वाले टांसपोर्टर के ज़रिए सीधे उनकी टेबल पर पहुंचाया जाता था, वो तो ऐसे बर्ताव करते थे जैसे उनके पिता कोई बहुत अमीर रहे हों, जबकि सच ये है कि आज भी आनंद भवन का किराया 5 रुपये 95 पैसे गांधी परिवार ले रहा है, कुछ दिन रुकिए स्वामी जी इसका भी खुलासा करने वाले हैं। 

तो जब महामानव को संघ पर बैन हटने की खबर लगी तो महामानव नदी में मगरमच्छ पकड़ने गए थे, उन्होने वहीं नदी में से मगरमच्छ पकड़ कर अपनी खुशी का इज़हार किया, और फिर वे भारत के अच्छे दिन लाने की योजना पर काम करने लगे। इसके लिए उन्होने बहुत काम किया, जो कि उन्हें वैसे ही करने की आदत है। महामानव ने मगरमच्छ को पकड़ने के फौरन बाद घर छोड़ दिया, और सीधे अपने काम पर लग गए। उस वक्त भी जब वे भिक्षा मांग कर गुजारा कर रहे थे, भारत में अच्छे दिन लाने के लिए उन्होने अमेरिका के घनघोर दौरे किए, ताकि वे माई गॉड कहना सीख सकें। 




अमेरिका के इन्हीं दौरों में उनकी मुलाकात डोलांड से हो गई, जो जल्दी ही तू-तड़ाक वाली दोस्ती में बदल गई। कमाल ये है कि महामानव ने दोस्ती में सबसे पहला काम ये किया कि डोलांड को भी वंदे मातरम सिखा दिया। और राज़ की बात तो अब मैं आपको बताता हूं, अब डोलांड भी वंदे मातरम गाता है। इधर महामानव ने बी ए और एम ए की डिग्री का जुगाड़ किया और पकौड़े बेच कर रोजगार सृजन की व्यवस्थ पर विस्तार से चाय पर चर्चा की। और चाय पर चर्चा के बाद वंदे मातरम पूरा गाया। 

तो दोस्तों, ये थी वंदे मातरम की असली और सच्ची कहानी, जो कांग्रेस नहीं चाहती कि आपके सामने आए। लेकिन देशभक्त महामानव और उनकी राष्टभक्त टीम ने संसद में इस पर बहस करके ये पूरी सच्चाई जनता के सामने रखी है। बंगाल के चुनाव पास हैं, बस आप ये ध्यान रखना कि महामानव हैं, जिन्होने वंदे मातरम पर बहस की है, महामानव दोस्तों, महामानव, महामानव।

खैर, चचा जो थे हमारे, ग़ालिब वो कहा करते थे

ये कौन बहस कर रहा वंदे मातरम को लेकर
उससे कहो ज़रा वो खुद पर भी नज़र डाले
नमस्ते सदा वत्सले तो गाया बहुत है उसने
खुद मन से कभी वो वंदे मातरम भी गाले

गानों गाना वंदे मातरम है साहब, साहब ने गाया, आप भी गाइए, ग़ालिब ने नहीं गाया तो क्या हुआ, बहुत से लोगों ने नहीं गाया, लेकिन अब गाएंगे, बंगाल चुनाव हैं ना.....खैर बहस का कुछ भी हो, आप देखिए हमें तो कोई फर्क पड़ता नहीं। नमस्कार। 

सेंगर को बेल

  नमस्कार, मैं कपिल एक बार फिर आपके सामने। सुना भई सेंगर जी को बेल मिल गई। पहले उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा हुई थी, और ये सज़ा जो उन्हें मि...