जी जनाब, देश इस वक्त विद्वानों से भरा पड़ा है, भरा क्या पड़ा है भाईसाब विद्वान यूं निकल-निकल पड़ रहे हैं कि क्या कहें। लेकिन मुसीबत ये है कि देश के इन विद्वानों में से कोई भी देश के भले के लिए नहीं सोच रहा, कम से कम उतना नहीं सोच रहा जितना कि महामानव सोच रहे हैं।
महामानव की सोच और उनके कारस्तानियों से सबक लेकर ही ये देश आगे बढ़ सकता है। मतलब विकास कर सकता है और इस देश के अच्छे दिन आ सकते हैं। यू ंतो महामानव का पूरा जीवन की प्रेरणादायक है, लेकिन आज मैं उनके सिर्फ एक कांड की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कि आप महामानव के बालपन के इस कांड से सबक लें और अपना जीवन भी सार्थक करें।
दोस्तों आज मैं आपको मगरमच्छ पकड़ने की कला से रु-ब-रु कराउंगा। हालांकि अगर बचपन में पकड़ा जाए तो ये कांड सार्थक होता है, लेकिन क्योंकि आप ये मौका खो चुके हैं, इसलिए अब यानी जवानी या बुढ़ापे में भी इस काम को करने से अंजाम भले हो सकते हैं। गौर करें मैं यहा मगरमच्छ की नहीं, आपकी उम्र का जिक्र कर रहा हूं। यानी आपको अपने बचपन में ही मगरमच्छा पकड़ना था, जो आपने नहीं पकड़ा। हालांकि ये काम आसान होता है यदि मगरमच्छ का भी बचपना ही हो जब उसे पकड़ा जाए। इसलिए खैर रखिए।
तो बहुत बेसिक से शुरु करते हैं। मगरमच्छ का मासूम नाम है, लेकिन अप इससे धोखा नहीं खा सकते, ये आपने अब तक के अपने अनुभव से सीख लिया होगा, मासूम नाम के पीछे चेहरा घिनौना हो सकता है, डरावना हो सकता है, या पापी भी हो सकता है। मगरमच्छ नाम का संधि विच्छेद करने पर मगर और मच्छ मिलता है, यानी इसमें अगर-मगर करने की आदत होती है और ये मछली की तरह पानी में रहता है। लेकिन पानी में रहने के बावजूद वो जमीन पर शिकार करता है, यानी कहता कुछ और है करता इसका बिल्कुल उलटा है। इसलिए मगरमच्छ के नाम पर मत जाइए, उसे उसके चरित्र से यानी उसकी आदतों से, उसकी हवस से जानिए।
तो सबसे पहले मगरमच्छ को देखिए। देखना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि बिना देखे मगरमच्छ को नहीं पकड़ा जा सकता। देखना इसलिए भी ज़रूरी होता है क्योंकि आजकल नदियों में जो मगरमच्छ होते हैं, उनकी गुणवत्ता वैसी नहीं होती, जैसी उस जमाने में होती थी जब महामानव ने मगरमच्छ पकड़ा था। उस समय के मगरमच्छ मगरमच्छों जैसी हरक़त करते थे, आजकल मगरमच्छों की हरक़तें कुछ -कुछ, गौर कीजिए, मैं ने सारी हरक़तों की बात नहीं की है, कुछ हरक़तें इंसानों जैसी हो गई हैं। जाहिर है, मगरमच्छों के भी अच्छे दिन आए हुए हैं। महामानव के बचपन में जब नेहरु का राज था, मगरमच्छों का सही पोषण और लालन-पालन नहीं हुआ था, अक्सर कमज़ोर रहते थे, और यूं ही पकड़ में आ जाते थे, आजकल के मगरमच्छ जब तक हो सकता है खाते हैं, और फिर पकड़ाई का अंदेशा होते ही देश छोड़कर चले जाते हैं, विदेशों में ऐश करते हैं। आखिर उनके अच्छे दिन भी आ ही गए हैं।
ख़ैर, पकड़ने से पहले मगरमच्छों को देखना इसलिए भी ज़रूरी है कि ये तसल्ली करना चाहिए कि वो मगरमच्छ जिस पर आपकी नज़र है, कहीं कनेक्टिड ना हो, कहीं ऐसा ना हो कि आपको लेने-के-देने पड़ जाएं।
ग़ौर कीजिएगा, इसी लेने के देने के चक्कर में कई लोग आ गए हैं, और आज बिचारे खिसियानी हंसी हंस रहे हैं, अपने ही हालात पर। तो एक बार अच्छी तरह देख लेने के बाद, यानी जांच-परख के बाद आप मगरमच्छ को पकड़ने के लिए तैयार हो चुके हैं। मगर साहब आपने मगरमच्छ को पकड़ने की जल्दी नहीं करनी है। कतई जल्दी नहीं करनी है, आराम से सबर के साथ, पूरे इत्मिनान से मगरमच्छ को पकड़ना है। इस इत्मिनान के समय में आप अपने कई ज़रूरी काम पूरे कर सकते हैं, जैसे घुइंया छील सकते हैं, रेलवे स्टेशन पर चाय बेच सकते हैं, आपातकाल के समय जेल जा सकते हैं, बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग कर सकते हैं, और कुछ ना बने तो भिक्षा मांग कर गुजारा भी कर सकते हैं।
महामानव के जीवन में ऐसा इत्मिनान मगरमच्छ पकड़ने के बाद आया था, आप ऐसा इत्मिनान मगरमच्छ पकड़ने से पहले भी हासिल कर सकते हैं। आखिर महामानव मगरमच्छ पकड़ ही चुके हैं, इसलिए कोई जल्दबाज़ी और कोई भकभकी करने की जरूरत नहीं है।
अब आप यू ंसमझिए कि आप मगरमच्छ पकड़ने के एकदम क़रीब हैं, यानी बस कुछ ही पलों में मगरमच्छ पकड़ा जाएगा। अब आप ये सोचिए जनाब की जब आप मगरमच्छ को पकड़ने की जुगत लगा रहे होंगे तो मगरमच्छ क्या पंजे-पर-पंजा धरे खाली बैठा होगा। अरे वो भी तो कुछ जुगत लगा रहा होगा, वो भी या तो बचने के या फिर आप ही को धर दबोचने का इंतजाम सोच रहा होगा। अब मेरे मितरों आपको इससे भी बचना है। यानी अब समय पक गया है, मगरमच्छ आपको पकड़े इससे पहले आपको मगरमच्छ पकड़ लेना है।
अब आप पहले अपनी तरफ देखिए, आखिर इस मगरमच्छ को पकड़ कर आप क्या ही कर लेंगे, जिसने मगरमच्छ पकड़ा उसने जो किया वो आप देख ही रहे हैं। उपर से मगरमच्छ पकड़ने के बाद मगरमच्छ पकड़ने वाले ने ये इंतजाम कर दिया कि बाकी मगरमच्छ आराम से जिंदगी बसर कर सकें, इसलिए अब मगरमच्छ पकड़ कर उनके जीवन में हैजान पैदा करके आप पहले मगरमच्छ पकड़ने वाले को परेशान करने की जुगत कर रहे हैं। इसलिए आपसे मेरी इल्तिजा है कि आप मगरमच्छ पकड़ने का ख्याल छोड़ दीजिए और जिसने मगरमच्छ पकड़ लिया है उसी के मगरमच्छ पकड़ने के किस्से सुनिए, सुनाइए और मजे उड़ाइए। इसी में आपका भला है।
बाकी चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, वो मगरमच्छ पकड़ने के माहिर थे, हालांकि अपनी पूरी जिंदगी उन्होने मगरमच्छ ना पकड़ बिचारे किसी और ही फिराक में रहे, कहते हैं सदा रक़ीब को पकड़ने के चक्कर में क़ासिद का इंतजार करते रहे, कि खतो-किताबत ही बनी रहे किसी तरह। लेकिन मगरमच्छ पकड़ने की कला पर एक गुलुबंद शेर उन्होने लिखा है जो आपके सामने पेश है। शेर कुछ यूंह ै कि
मगर को पकड़ेगा क्या, मगर के मच्छ साहेब हैं
तू इतना जान ले बच्चे सभी के रच्छ साहेब हैं।
मच्छ का तुक मिल नहीं रहा था, इसलिए ग़ालिब ने रच्छ इस्तेमाल किया और फुटनोट में लिखा है कि इसका मतलब नॉनाबायोलॉजिकल होता है। बाकी आप खुद भी तो समझदार हैं, समझ लीजिएगा। मैं चलता हूं। नमस्ते।
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