रविवार, 1 फ़रवरी 2026

वंदे मातरम का गुप्त इतिहास - सीक्रेट हिस्टी ऑफ वंदे मातरम

 


आखिरकार संसद में बहस हो ही गई, बड़ी ही शानदार बहस हुई साहब, खुद महामानव ने बहस की, मतलब बहस जैसी कोई चीज़ की और सबको हक्का-बक्का छोड़ा। बंकिम दा का नाम ले लेकर जो कोसा है महामानव ने नेहरु, जो कोसा है साहब, क्या ही कहें? 



दरअसल ये बहस जरूरी थी। कांग्रेस की तरफ से कहा जा रहा है कि भई जब देश में इंडिगो ने कहर मचाया हुआ है, उधर गोवा में एक क्लब हाउस की आग में लोग मर गए, इधर रुपया गिरा जा रहा है, तब वंदे मातरम की बहस की जगह इन ज्वलंत मुद्दों पर बहस की जाए। क्योंकि कांग्रेस तुम सबसे सच छुपाना चाहती है। सुनते हैं महादेव एप के चक्कर में हीरेन जोशी भाग गए, या भगा दिए गए, जो भी हो, कांग्रेस ऐसी छोटी-मोटी बातों पर जनता का ध्यान लगाना चाहती है और देश के लिए सबसे जरूरी जो बहस है इस समय, यानी वंदे मातरम उससे लोगों का ध्यान हटाना चाहती है। आज मैं आपको बताउंगा वो सच जिसे आज तक आपसे छुपाया जाता रहा है।




तुम्हे इतिहास का वो काला चैप्टर पढ़ाया ही नहीं जाता, तुमसे छुपा लिया जाता है। मैं तुम्हें वंदे मातरम का असली सच बताउंगा, ज़रा ध्यान से सुनना। 
दोस्तों हमें जो आजादी 1947 में मिली अगर नेहरु नहीं होता तो वो आजादी हमें 1857 में ही मिल जानी थी। दोस्तों जब 1857 में डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार तिरंगा झंडा लेकर, वंदेमातरम गाते हुए लालकिले की तरफ जा रहे थे, तो इसी जवाहर लाल नेहरु ने बीच में टांग अड़ा दी थी, वरना आजादी तो हमें 1857 में ही मिल गई होती। उस वक्त हेडगेवार अकेले थे, लेकिन बाद में उन्हें महामानव का साथ मिला, तब महामानव भिक्षा मांगकर गुजारा कर रहे थे, चाय उन्होने उसके बाद बेचना शुरु किया था। खैर महामानव को तब भी वंदेमातरम पूरा याद था, हालांकि तिरंगा वो नहीं फहराते थे, लेकिन वंदेमातरम पूरा गाते थे, बिना कोई भी लाइन छोड़े गाते थे। 

आपने देखा होगा, महामानव हर भाषण से पहले और हर भाषण के बाद वंदेमातरम ही गाते हैं, बल्कि जब भी बच्चों से मिलते हैं, वंदे मातरम की हर लाइन गाते हैं, बच्चों को उसका मतलब बताते हैं और फिर ये भी बताते हैं कि बंकिमचंद्र चटर्जी को वंदे मातरम लिखने की प्रेरणा उन्होने ही दी थी। अब टाइमलाइन पे ध्यान मत दो, वरना गुरुनानक, कबीर और गोरखनाथ वाली मीटिंग की टाइमलाइन बिगड़ जाएगी। 




आर एस एस की प्रेरणा से ही महामानव के बड़े भाई बंकिम चटर्जी ने वंदेमातरम लिखा था, वहीं से महामानव ने बंकिमचंद्र चटर्जी को बंकिम दा कहना सीखा, और ये आदत आज तक भी बनी हुई है। इसीलिए महामानव संसद में बार-बार बंकिम दा का सम्बोधन दोहराया, और टोकने पर चिढ़ गए। खैर, बाद में महामानव ने ही गुरु रविन्द्रनाथ को ये गाना कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में गाने की सलाह दी थी। 1896 में जब गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर कोलकाता की गलियों से निकलते थे तो महामानव उनके साथ हो लेते थे, दोनो की तू तड़ाक वाली दोस्ती थी, अब क्योंकि महामानव भी कविताएं लिखते थे, और गुरु रविन्द्रनाथ भी छोटी-मोटी तुकबंदी कर लेते थे, तो महामानव कभी-कभी गुरु रविन्द्रनाथ की कविताओं की इस्लाह कर दिया करते थे, इस मामले में महामानव का दिल बहुत बड़ा है। आपने देखा ही होगा व ेअब भी अपनी कविताएं बहुत शर्मा कर सामने रखते हैं। जबकि महामानव की प्रेरणा से गुरु रविन्द्रनाथ की कविताओं की ऐसी धूम मची कि एक तो उन्हें नोबेल मिल गया, दूसरे पूरा बंगाल उन्हें सम्मान देता है। 



इधर महामानव ने चुपके से गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर के कानों में ये बात डाल दी कि ये जो गाना है वंदे मातरम इसे कोलकाता के कांग्रेस अधिवेशन में गाना है, गुरु जी ने महामानव की बात मान कर कांग्रेस के अधिवेशन में ये गाना गाया। दोस्तों, इसके बाद जो हुआ उस पर आप यक़ीन नहीं करेंगे। नेहरु ने, यानी जवाहर लाल नेहरु ने वहीं ये कह दिया कि वंदे मातरम नहीं गाना है। इस बात का कोई प्रमाण बेशक ना हो, लेकिन जैसा कि राजनाथ सिंह जी ने बताया है कि नेहरु के मन में क्या था, उसी तरह महामानव को पता है कि नेहरु के मन में क्या था। आप यकीन मानिए, महामानव को आज भी पता है कि कब-कब नेहरु के मन में क्या था। 




जब वंदे मातरम के लिए महामानव की उस योजना में फच्चर पड़ गए तो महामानव ने एक नई राह निकाली। महामानव ने आर एस एस में वंदे मातरम गाने की योजना बनाई। लेकिन क्योंकि उस वक्त देश में नेहरु की चलती थी, इसलिए नेहरु से बचने के लिए महामानव ने संघ में सीक्रेटली यानी गुप्त रूप से वंदे मातरम गाने का रिवाज शुरु किया। इसलिए जब पूरा देश वंदे मातरम गाता था, तब संघ में सदा वत्सले गाया जाता था, लेकिन एकादशी की रात को छोड़ कर बाकी हर रात को संघ में वंदे मातरम गाया जाता था। 
संघ के हर सदस्य के लिए वंदे मातरम को याद करना सदस्यता की पहली शर्त होती है। आज भी आप देखेंगे कि संघ के सदस्य बाहरी दिखावा यूं करते हैं जैसे उन्हें वंदे मातरम नहीं आता है, लेकिन असल में उन्हें पूरा वंदे मातरम कंठस्थ रहता है, और वो दूसरों को भी वंदे मातरम गाने के लिए प्रेरित करते हैं।  



वो तो गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर वाले एक ग्रुप ने वंदे मातरम की कुछ लाइनो को राष्टगीत से हटा दिया था, वरना तो यकीन करो तुम, गुरु जी यानी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर तो पूरा का पूरा वंदेमातरम गाकर ही खाना खाते थे, मेरा मतलब भोजन ग्रहण करते थे। उनकी इसी तर्ज पर आज भी संघ के सदस्य हों या भाजपा के सदस्य हों, कहीं भी खड़े-खड़े पूरा वंदे मातरम सुना देते हैं। गुरु जी ने जो कितबा लिखी थी, बैंच ऑफ थीव्ज़ उसके हर पन्ने पर गुप्त रूप से पूरा वंदे मातरम लिखा हुआ है, बस आप जैसे ही संघ के सदस्य बनते हैं, आपको ये कुंजी दे दी जाती है। पर नेहरु के डर से संघ को इस किताब का प्रकाशन भी बंद करना पड़ा।  



दोस्तों, 1947 में जो आजादी मिली थी, वो भी पूरी आजादी नहीं थी। ये भी नेहरु की एक चाल थी जिसे आज भी पूरा देश भुगत रहा है। ये आजादी हमें निनन्याबे साल की लीज़ पर मिली है। आजादी का ये काला सच हमसे हमेशा छुपाया जाता है। मैं तो कहता हूं लगे हाथ महामावन को संसद में इस पर भी गहन चर्चा या बहस जो वो ठीक समझें करवा लेना चाहिए।



नेहरु ने बहुत ग़लतियां की थीं दोस्तों, आज भी उन ग़लतियों को याद करके महामानव की आखांे में आसूं आ जाते हैं, पर अभी हम सिर्फ वंदे मातरम पर बात करेंगे और इसकी सारी सच्चाई आप लोगों के सामने ले आएंगे। दोस्तों, जिन दिनों संघ में सीक्रेटली वंदे मातरम गाया जाता था, तब किसी ने जाकर नेहरु को इसकी शिकायत कर दी थी। तब नेहरु ने गृहमंत्री वल्लभ भाई पटेल से कह कर संघ पर बैन लगवा दिया था। उससे ठीक पहले संघ ने किसी बात पर मिठाई बांटी थी, और खुशियां मनाई थीं, लेकिन हम उस बात पर नहीं जाएंगे, मिठाई बांटने का तो कोई भी कारण हो सकता है। खैर तो जब वंदे मातरम गाने की वजह से संघ पर बैन लग गया तो सोचा गया कि क्या किया जाए, तो मजबूर होकर संघ को सीक्रेटली भी वंदे मातरम गाना बंद करना पड़ा। तब जाकर संघ पर से बैन हटाया गया। दोस्तों आपको अक्सर ये बताया जाता है कि महात्मा गांधी की हत्या में संघ का नाम आने की वजह से उस पर बैन लगाया गया। लेकिन ये बिल्कुल झूठ है, संघ पर बैन नेहरु ने लगाया था। हालांकि सरदार वल्लभभाई पटेल ने तो नेहरु से कहा भी था, कि बैन मत लगाओ, लेकिन नेहरु नहीं माने, नेहरु के कपड़े पेरिस में धुलकर आते थे, और उनके लिए चाय इंग्लैंड में बनाई जाती थी, जिसे स्टार टैक वाले टांसपोर्टर के ज़रिए सीधे उनकी टेबल पर पहुंचाया जाता था, वो तो ऐसे बर्ताव करते थे जैसे उनके पिता कोई बहुत अमीर रहे हों, जबकि सच ये है कि आज भी आनंद भवन का किराया 5 रुपये 95 पैसे गांधी परिवार ले रहा है, कुछ दिन रुकिए स्वामी जी इसका भी खुलासा करने वाले हैं। 

तो जब महामानव को संघ पर बैन हटने की खबर लगी तो महामानव नदी में मगरमच्छ पकड़ने गए थे, उन्होने वहीं नदी में से मगरमच्छ पकड़ कर अपनी खुशी का इज़हार किया, और फिर वे भारत के अच्छे दिन लाने की योजना पर काम करने लगे। इसके लिए उन्होने बहुत काम किया, जो कि उन्हें वैसे ही करने की आदत है। महामानव ने मगरमच्छ को पकड़ने के फौरन बाद घर छोड़ दिया, और सीधे अपने काम पर लग गए। उस वक्त भी जब वे भिक्षा मांग कर गुजारा कर रहे थे, भारत में अच्छे दिन लाने के लिए उन्होने अमेरिका के घनघोर दौरे किए, ताकि वे माई गॉड कहना सीख सकें। 




अमेरिका के इन्हीं दौरों में उनकी मुलाकात डोलांड से हो गई, जो जल्दी ही तू-तड़ाक वाली दोस्ती में बदल गई। कमाल ये है कि महामानव ने दोस्ती में सबसे पहला काम ये किया कि डोलांड को भी वंदे मातरम सिखा दिया। और राज़ की बात तो अब मैं आपको बताता हूं, अब डोलांड भी वंदे मातरम गाता है। इधर महामानव ने बी ए और एम ए की डिग्री का जुगाड़ किया और पकौड़े बेच कर रोजगार सृजन की व्यवस्थ पर विस्तार से चाय पर चर्चा की। और चाय पर चर्चा के बाद वंदे मातरम पूरा गाया। 

तो दोस्तों, ये थी वंदे मातरम की असली और सच्ची कहानी, जो कांग्रेस नहीं चाहती कि आपके सामने आए। लेकिन देशभक्त महामानव और उनकी राष्टभक्त टीम ने संसद में इस पर बहस करके ये पूरी सच्चाई जनता के सामने रखी है। बंगाल के चुनाव पास हैं, बस आप ये ध्यान रखना कि महामानव हैं, जिन्होने वंदे मातरम पर बहस की है, महामानव दोस्तों, महामानव, महामानव।

खैर, चचा जो थे हमारे, ग़ालिब वो कहा करते थे

ये कौन बहस कर रहा वंदे मातरम को लेकर
उससे कहो ज़रा वो खुद पर भी नज़र डाले
नमस्ते सदा वत्सले तो गाया बहुत है उसने
खुद मन से कभी वो वंदे मातरम भी गाले

गानों गाना वंदे मातरम है साहब, साहब ने गाया, आप भी गाइए, ग़ालिब ने नहीं गाया तो क्या हुआ, बहुत से लोगों ने नहीं गाया, लेकिन अब गाएंगे, बंगाल चुनाव हैं ना.....खैर बहस का कुछ भी हो, आप देखिए हमें तो कोई फर्क पड़ता नहीं। नमस्कार। 

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