गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

बुर्के पर वबाल

 




 भई यारों ये क्या किस्सा है जिसके पीछे पूरे देश में इत्ता वबाल कट रहा है। देखा कि एक राज्य के मुख्यमंत्री जी ने भरी सभा में एक महिला के चेहरे से बुर्का नोंच लिया। 



मुझे समझ नहीं आता कि आखिर ये ऐसी क्या बात है जिस पर वबाल हो सकता है। आखिर एक राज्य के मुख्यमंत्री को इतना भी अधिकार नहीं होगा कि वो नौकरी मांगने आई एक महिला के चेहरे से बुर्का उतार दे। आपको तो इसी बात पर खुश होना चाहिए कि उन्होने सिर्फ यही किया है, मेरा मतलब है, एक साहब हुए थे, भाजपा के कुलदीपक, उन्होने तो नौकरी मांगने पहुंची एक 16 साल की नाबालिग लड़की का बलात्कार कर दिया था। बताइए, ऐसे में मुख्यमंत्री द्वारा बस बुर्का खींचने जैसी हरकत पर आपको एतराज हो रहा है, ये सरासर नाजायज़ बात है भाई।

असल बात की तरफ आपका ध्यान नहीं गया भाई। असल बात ये है कि वो महिला बुर्का पहन कर एक सरकारी प्रोग्राम में गई थी, तो ये मुख्यमंत्री का कर्तव्य था कि वो उसकी सही पहचान करें। मुख्यमंत्री हमारे सबको पहचानते हैं, यही तो उनकी खासियत है। इसी सही पहचान के लिए तो उन्होने उस महिला के चेहरे से बुर्का नोचा था। देखिए किसी भी सरकारी आयोजन में अगर जाते हैं, तो ये पहचान करना कि जो व्यक्ति आपके सामने है वही सही व्यक्ति है, मुख्यमंत्री का कर्तव्य होता है, कहीं अगर वो ग़लत कैंडीडेट को नौकरी दे देते तो बताइए क्या गजब होता। 

मैं बताता हूं हुआ क्या था। दरअसल अभी कुछ ही दिन पहले राज्य में चुनाव हुआ था। उस चुनाव में हुआ क्या कि महिलाओं को दस हज़ार की राशि दी गई ताकि वो सही जगह वोट कर सकें। आखिर महिला सशक्तिकरण का मामला था। इसके बाद हुआ ये कि उसी वोट की ताकत से राज्य में अ लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी जिसके सर्वेसर्वा यही महानुभाव थे, जिन्होने अभी एक महिला के चेहरे से बुर्का नोचा है। तो हुआ ये कि अब सरकार यानी बिहार सरकार ये कह रही है कि वो जो दस हज़ार रुपये भेजे गए थे, वो ग़लत लोगों के पास चले गए थे। और अब उनकी उगाही की जा रही है, लोगों को नोटिस भेजे जा रहे हैं कि अबे पैसे वापिस करो बे।

तो ऐसे में मुख्यमंत्री को ये लगा कि अगर किसी ग़लत कैंडीडेट को नौकरी मिल गई तो नौकरी वापिस लेना तो मुश्किल होगा। इसलिए उन्होने ये जिम्मेदारी अपने हाथ में ली कि वो महिला की सही पहचान करके ही उसे नौकरी दें। और इन वामियों ने, तथाकथित प्रगतिशीलों ने, इन महिला अधिकार के रक्षकों ने इसी पर वबाल काट दिया। 

अभी कुछ ही दिन पहले एक हाई कोर्ट के जज साहब ने कहा था, कि किसी पीड़िता के स्तनों को छूना या कपड़े उतारने की कोशिश दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता है। अब आप ही सोचिए भाई, हमारे न्यायालय कितने सहिष्णु होते जा रहे है, हमारे विधायक और मुख्यमंत्री भी सहिष्णु होते जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि ऐसे कृत्यों के प्रति जनता भी सहिष्णु हो जाए, लेकिन जनता, खासतौर पर महिलाएं, सहिष्णु नहीं होना चाहतीं। अरे भई, अगर कोई आपके चेहरे से बुर्का खींच ले, या आपको देख कर सीटी मारे, या मान लीजिए की हाथ पकड़ ले, तो थोड़ा सहिष्णु बनिए, इसे इतना बड़ा मुद्दा मत बनाइए। 

ऐसे ही एक किस्सा याद आता है, जिस पर वबाल हुआ था, और सुनते हैं बड़ा भारी युद्ध हुआ था, इसी देश की बात है। 
सभा में सब स्तब्ध थे। सबकी नज़रें उन पासों पर थीं, जिन्होने दुर्योधन की जीत का निशान दिया था। एकबारगी तो दुर्योधन भी स्तब्ध था। हालांकि उसे मामा शकुनि की जुआ खेलने की कला पर पूरा यकीन था। लेकिन अपने भाग्य की वजह से वो थोड़ा असहज था। लेकिन पासों के गिरते ही पहले उसकी आंखे चौड़ी हुई, फिर आंखों ने दिमाग को बताया वो फिर से जीत गया है। अचानक कंठ से अट्टहास गूंजा जो पूरी सभा में फैल गया। इस अट्टहास ने पूरी सभा को जैसे नींद से जगा दिया था। अचानक सहस्रों कंठों से आवाज़ निकली और पूरी सभा में एक शोर गूंज गया। दुर्योधन ने पीछे मुड़ कर देखा, दुःशासन उसके कांधे पर से झांक रहा था, और उसकी हंसी साफ दिखाई दे रही थी।




”दुःशासन”, दुर्योधन ने पूरी ताकत लगाकर कहा, ताकि पूरी सभा को पता चल जाए कि वो बोल रहा है।

”जी भाई जी” दुःशासन ने कहा।

”जाओ, हमारी जीती हुई वस्तु को तत्काल सभा में ले आओ। जो वस्तु जीत ली गई हो, उसे तत्काल अपने कब्जे़ में लेना ही नीति है।”
”मैं अभी गया और अभी आया” दुःशासन ने कहा और फौरन निकल गया।
सभा में एक ओर खड़ी द्रौपदी है, दूसरी तरफ दुःशासन उसकी साड़ी खींच रहा है, और पीछे खड़ा दुर्योधन हंस रहा है, सारे कौरव हंस रहे हैं, और जिन पर द्रौपदी ने विश्वास किया था, वो सिर झुकाए मौन बैठे हैं।

जब राज्य में राजसभा में हुए इस वबाल की खबर फैली तो जनता ने इसका प्रतिकार किया। राजा अपने राज्य के मद में चूर हो सकता है, लेकिन जतना के कांधो पर तो नैतिकता की जिम्मेदारी लेती है। जनता ने कहा कि महिलाओं का अपमान नहीं सहा जाएगा। इस तरह किसी का भी अपमान नहीं सहा जाएगा, और जो राजा मद में चूर हो जाए, उसे शासन का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।

राजभवन में जनता के इस आक्रोश की खबर फैली तो थोड़ा अटका-झटकी हुई, लेकिन अनैतिकता के जिन मजबूत कंधो का सहारा लेकर दुर्योधन राजगद्दी पर बैठा था, उन्होने अपनी कुटिल चालें चलीं। असत्य, अनैतिकता, पाखंड, भ्रष्टाचार और अमानवीयता के हथियारों से लैस दुर्योधन और उसके समर्थकों ने जनता के बीच एक नये तरह का ज्ञान पेलना शुरु किया।

”वे तो महिलाओं के अधिकार के सबसे बड़े चिंतक हैं।”
”उन्होने महिलाओं के लिए काम किया है।”
”उन्होने साड़ी खींचते हुए भी महिला सम्मान किया है।”
”उनकी उम्र तो देखो, उनकी उम्र का सम्मान करो।”
”उन्होने तो मज़ाक किया था, इस बात का इतना बतंगड़ मत बनाओ।”
”उनका ये काम भी महिला अधिकार की श्रेणी में ही आना चाहिए।”

धीरे-धीरे जनता में ये बात फैलने लगी, और जनता दुर्योधन के इस घृणित कृत्य को भूल गई, बल्कि बात इस बारे में होने लगी कि किसी महिला को साड़ी पहनने का अधिकार होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए।

2014 के बाद देश की डोर जिस धर्म और संस्कृति के ठेकेदारों ने संभाली है, वे निश्चय ही बहुत कर्मठ हैं, कुलदीप सिंह सेंगर, बृजभूषण, और अब नितीश कुमार तो मान लीजिए छोटी-मोटी हस्तियां हैं, यहां तो हालत ये है कि सुना खुद महामानव ने एक लड़की का पीछा करवाया था, और फिर जब ये बात खुली तो कोर्ट ने उनका ये तर्क भी मान लिया था कि खुद लड़की के पिता के कहने पर राज्य के गृहमंत्री ने उसका पीछा करवाया था। यानी इस देश में यदि एक बालिग लड़की का पिता राज्य के गृहमंत्री से कहेगा तो राज्य के मुख्यमंत्री के कहने पर पूरी पुलिस उस लड़की का पीछा करवा सकती है, और ये हरकत कानून सम्मत मानी जाएगी। बल्कि हमें तो इस देश में ही ये कहने वाले भी मिल चुके हैं कि 
मेदी मेरी बीवी वाला वीडियो
और जब ये सामान्य है, कोर्ट इसे मान चुका है, जनता इसे मान चुकी है तो फिर एक ग़रीब राज्य के मुख्यमंत्री की इस हरकत को ओछी हरकत मानना, उसे महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली हरकत मानना कहां की समझदारी है भई। मेरा तो मानना है कि अब इस देश में एक ऐसा कानून भी बना ही देना चाहिए कि जिसमें एक निश्चित पार्टी के सदस्यों के लिए महिलाओं के साथ किए गए व्यवहार, कारगुज़ारियों, कारस्तानियों, और कांडों को देश की सुरक्षा के नाम पर दबा दिया जाए। और अगर प्रगतिशीलता, महिला अधिकार, मानवाधिकार आदि के नाम पर कोई इन्हें मुद्दा बनाए, तो कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों को चाहिए कि वे स्वतः संज्ञान लेकर उस व्यक्ति, संस्था, पार्टी के खिलाफ यू ए पी ए, पी एम एल ए, या एन एस ए वाले कानून के तहत बिना मुकद्मा चलाए उन्हें जेल में डालने की तजवीज करें। ताकि ये देश विश्वगुरु बन सके। 
सबसे बड़ी बात ये है कि आज देश की बड़ी बहस ये होनी चाहिए कि महिलाएं कौन सा कपड़ा पहनेंगी, और कौन सा नहीं, कैसे कपड़े पहनेंगी, और कैसे कपड़े पहनने की इजाज़त उन्हें मिलनी चाहिए, वे कैसी दिखें, क्या करें, क्या ना करें, कैसा व्यवहार करें, और हम यानी पुरुष उन्हें क्या अधिकार दे सकते हैं, कैसी और कितनी आजादी देनी चाहिए, कब दे
बाकी चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, लड़कियों को पर्दे में रखने के कायल थे, इसलिए कभी महिलाओं का अपमान नहीं किये, कभी बुर्का भी नहीं खींचे किसी का, लेकिन इस मामले में कतई सनातनी पार्टी के तर्कों के कायल हो गए थे, इसीलिए तो ये लिखा

कि 

तेरे दम में है अगर तो, तू कांड कर कोई भी
तुझे हक़ है मेरे यारा, तू कांड कर कोई भी
तू बड़ा है, तू खड़ा है, तू ही जीता, तू लड़ा है
तूझे डर ही क्या बता तू, तू कांड कर कोई भी

तो चचा का मिज़ाज भी ऐसा ही था, कहते थे हम न करेंगे, बाकी जिसके पास ताकत है वो तो करेगा ही कांड। तो मेरा मानना ये है मितरों कि नितीश कुमार को, महामानव को, और भी सबको, थोड़ा बहुत भ्रष्टाचार, थोड़ा बहुत व्यभिचार करने की स्वतंत्रता और अनुमति होनी चाहिए। ठीक है ना। 

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

पैमाना बदल दूंगा






ये कौन लोग हैं जो शोर मचा रहे हैं, एक शानदार सनातनी सरकार की मुखिया के लिए ”हाय-हाय” के नारे लगा रहे हैं।  
जनाब दिल्ली की कमान हाथ में लेते ही हिंदू धर्म की रक्षा की जिम्मेदारी का गठ्ठर अपने सिर पर रखने वाली रेखा जी गुप्ता से आप लोग इतना चिढ़ते क्यों हैं। दिल्ली में क्या पहले प्रदूषण नहीं था, क्या पहले हवा खराब नहीं थी, क्या पहले सांस लेना दूभर नहीं था? जब पूरी दुनिया में दिल्ली सबसे प्रदूषित शहर की कैटेगरी में आ गया था तो उस समय रेखा जी गुप्ता की सरकार ने आपको दिवाली पर पटाखे जलाने की अनुमति दिलवाई थी। आप भूल जाएं, लेकिन धर्म उन्हें नहीं भूलेगा, पटाखे जलाकर दिल्ली की जनता को धर्म का असली मर्म रेख जी गुप्ता ने सिखलाया था, ये बात आप भले ही भूल जाएं लेकिन मनिंनदरजीत सिंह जी कभी नहीं भूलेंगे। और आप ऐसे अहसान फरामोश हैं कि स्टेडियम में खडे़ होकर ए क्यू आई का नारा लगा रहे हैं। 




ये दरअसल देशद्रोहियों की, आपियों की, वामियों की, कांगियों की, साजिश है, जिन्होने इस खराब हवा के मुद्दे को इतना बढ़ा-चढ़ा कर दुनिया के सामने रखने की हिमाकत की है। क्या है ये ए क्यू आई जिसे आप इतना बड़ा मुद्दा बना दे रहे हो? क्या ये धर्म से बड़ा है? सनातन से बड़ा है? 






ये इस देश की विडंबना है कि वो एक कर्मठ प्रधानमंत्री को, एक कर्मठ मुख्यमंत्री को पहचान नहीं पा रहा है। 



ये तो पाश्चात्य संस्कृति की साजिश है। ये ए क्यू आई कोई संस्कृत का शब्द नहीं है, ये तो हमारी संस्कृति में भी नहीं है, ये तो विदेशी मुल्कों की साजिश है जिसके ज़रिए वो इस देश को बदनाम करना चाहते हैं, और इसमें कुछ लोग जो इस देश में रहते हैं, इस देश का खाते हैं, लेकिन बाहरी मुल्कों की मदद करते हैं, वो इनका साथ दे रहे हैं। सच बात तो ये है कि रेखा जी गुप्ता जी ने ठीक ही कहा है कि ये ए क्यू आई तो सिर्फ एक टेम्परेचर है, तापमान है जिसे किसी भी इन्स्टूमेंट से पता किया जा सकता है। इसलिए जब आप थर्मामीटर इस्तेमाल करेंगे तो आपको पता चलेगा कि ए क्यू आई जो है वो 106 से उपर जाएगा ही नहीं। अब बताइए, 106 ए क्यू आई क्या गलत होगा, बल्कि अगर आपको मेरी बात का यकीन नहीं है तो अभी की अभी थर्मामीटर निकालिए और देखिए आपको दिल्ली का ए क्यू आई 21 डिग्री से ज्यादा नहीं दिखेगा, बल्कि रात मे ंतो ये 2 से 3 डिग्री तक गिर जाता है। ये विदेशी साजिश है जिसमें दिल्ली के टेम्परेचर को ए क्यू आई से अलग कर दिया गया है, इसलिए हम मांग करते हैं कि देश में यानी भारत में ए क्यू आई नापने के लिए थर्मामीटर का इस्तेमाल किया जाए।





सभी ए क्यू आई नापने वाले केन्द्रों पर थर्मामीटर लगाया जाए, जिनसे ए क्यू आई नापा जाए। ये पूरी दुनिया भारत का विकास देख कर जल रही है। अरविंद केजरीवाल की सरकार जो काम नही ंकर पाई हम वो काम करके दिखाएंगे, हम पूरी दुनिया से अलग, भारत में, खासतौर पर दिल्ली में ए क्यू आई नापने की अलग तदबीर विकसित करेंगे जिसमें हाल कैसा भी हो, ए क्यू आई कम ही दिखाया जाएगा।  



ए क्यू आई ही क्यों, हम बेरोज़गारी नापने के भी नये पैमाने बनाएंगे, जिससे देश में बढ़ती बेरोजगारी पर लगाम लगाई जा सके। इसी तरह पिछले दिनों जो रुपया नीचे गिर रहा है, उससे निपटने के लिए हम रुपये की क़ीमत आंकने के लिए भी नये पैमाने बना देंगे ताकि रुपया नीचे गिरता ना लगे, इसी तरह जब लोग कहते हैं कि हमारे देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, अपराध बढ़ रहा है, नफरत और दंगे बढ़ रहे हैं, हम उन सब पैमानों को भी बदल देंगे ताकि सब अपराध कम होता हुआ लगे और हम अपनी छप्पन इंची छाती को ठोक कर कह सके कि, अच्छे दिन आ गए। बल्कि हम अच्छे दिन की परिभाषा ही बदल देंगे ताकि बुरे दिनों को अच्छे दिन बताया जा सके। 

ये वो लोग हैं दोस्तों जिन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही है, प्रदूषित हवा की वजह से जिनकी जान पर बन आई है। ये लोग वो लोग हैं, जिन्हें रेखा जी गुप्ता जी का सम्मान अपनी जान से बढ़ कर लगता है, ये लोग अपनी जान बचाने को दिल्ली छोड़ कर भाग रहे हैं। लगातार दिल्ली वाले प्रदूषण के लिए जो रेखा जी गुप्ता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, उसके चलते उन्होने एक क्रांतिकारी, ऐतिहासिक फैसला लिया है कि अब दिल्ली में ग्रिल और तंदूर को बैन कर दिया गया है। लेकिन सच तो ये है दोस्तों की सर्दियों में ये जो दिल्ली वाले अपनी रसोइयों में सुबह-सुबह पराठे बनाते हैं, उनसे बहुत धुआं उठता है, इस धुएं से सबसे ज्यादा प्रदूषण होता है। मैं तो रेखा जी गुप्ता से ये मांग करूंगा कि दिल्ली में पराठे बनाना, पराठे खाना बैन करना चाहिए, ताकि प्रदूषण का जो कलंक दिल्ली के माथे पर लगा है उससे छुटकारा मिले। दोस्तों, जो आपको ए क्यू आई की बात कहे, उससे कहिए कि ”जा पहले पराठे पर बैन लगा, फिर मुझसे ए क्यू आई की बात करियो”। दोस्तो, दिल्ली की हवा में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण सर्दियों में घरों में बनने वाले पराठे हैं, जिन पर बैन लगना ही चाहिए, ताकि रेखा जी गुप्ता का आई क्यू बढ़ सके और दिल्ली का ए क्यू आई कम हो सके।




मेरे मितरों अब वक्त आ गया है कि हम दुनिया को बता दें कि हम विश्वगुरु हैं, आज ही से हम संकल्प लें। आपको याद होगा जब हमने ये शुरु किया था कि हमारे मंत्री हर तीसरे दिन कूड़े के ढे़र के पास जाकर कहते थे, ”भाई तुझे जाना होगा”, अब हमारे मंत्री प्रदूषण से कहेंगे कि तुझे जाना होगा भाई, पहले इन समस्याओं को मुख्यमंत्री रेखा जी गुप्ता के प्रोत्साहन से भेज कर हम बाकी अन्य समस्याओं के पास भी मंत्रियों को भेजेंगे, ताकि उन्हें भी रेखा जी गुप्ता का ये संदेश दिया जा सके और आखिरकार जब इन सनातनी मंत्रियों के इस सदंेश को सुन कर दिल्ली और अंततः ये देश समस्याओं से मुक्त हो जाएगा।




इसमें मुझे सिर्फ एक ही बात कहनी है, ज्यादातर मामलों में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा जी गुप्ता बहुत हद तक महामानव से भी आगे निकल गई हैं, अपने आउट ऑफ द वर्ल्ड विज़डम से उन्होने देश दुनिया को भौंचक्का कर दिया है, इतिहास, विज्ञान, स्पेस टेकनॉलॉजी, भाषा, सबके साथ उन्होने लगभग वही व्यवहार किया है, जैसा महामानव ने किया था। इस मामले में वो कतई महामानव जैसी हैं। लेकिन अपने मंत्रियों से दिल्ली के कूड़े को, भाई तुझे जाना पड़ेगा” जैसा संदेश देना महामानव को कतई नहीं सूझा, और इसलिए वो कतई, लेडी महामानव के लकब की हकदार हैं। 



यूं मेरे दोस्तों हम दिल्ली के प्रदूषण को कम करने, कूड़े को कम करने, देश की बेरोज़गारी को कम करने की तरफ कदम बढ़ा सकते हैं।

चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, वो कहते थे

जो आया था ये कह के, जमाना बदल दूंगा
वो कह रहा ह ैअब के, पैमाना बदल दूंगा

सीधा सा मंत्र है मितरों, जब काम ठीक ना हो, तो परिभाषा बदल दो, सारा खेल परिभाषा का है। आप काम करने की कोशिश ही मत करो, परिभाषाएं बदलते रहो, काफी है।
बाकी आप समझदार हैं, बस ये समझ लीजिए कि दिल्ली में प्रदूषण नहीं है, ये सब सरकार को बदनाम करने की साजिश है। 

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

मगरमच्छ पकड़ने की कला



जी जनाब, देश इस वक्त विद्वानों से भरा पड़ा है, भरा क्या पड़ा है भाईसाब विद्वान यूं निकल-निकल पड़ रहे हैं कि क्या कहें। लेकिन मुसीबत ये है कि देश के इन विद्वानों में से कोई भी देश के भले के लिए नहीं सोच रहा, कम से कम उतना नहीं सोच रहा जितना कि महामानव सोच रहे हैं। 





महामानव की सोच और उनके कारस्तानियों से सबक लेकर ही ये देश आगे बढ़ सकता है। मतलब विकास कर सकता है और इस देश के अच्छे दिन आ सकते हैं। यू ंतो महामानव का पूरा जीवन की प्रेरणादायक है, लेकिन आज मैं उनके सिर्फ एक कांड की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कि आप महामानव के बालपन के इस कांड से सबक लें और अपना जीवन भी सार्थक करें।

दोस्तों आज मैं आपको मगरमच्छ पकड़ने की कला से रु-ब-रु कराउंगा। हालांकि अगर बचपन में पकड़ा जाए तो ये कांड सार्थक होता है, लेकिन क्योंकि आप ये मौका खो चुके हैं, इसलिए अब यानी जवानी या बुढ़ापे में भी इस काम को करने से अंजाम भले हो सकते हैं। गौर करें मैं यहा मगरमच्छ की नहीं, आपकी उम्र का जिक्र कर रहा हूं। यानी आपको अपने बचपन में ही मगरमच्छा पकड़ना था, जो आपने नहीं पकड़ा। हालांकि ये काम आसान होता है यदि मगरमच्छ का भी बचपना ही हो जब उसे पकड़ा जाए। इसलिए खैर रखिए।

तो बहुत बेसिक से शुरु करते हैं। मगरमच्छ का मासूम नाम है, लेकिन अप इससे धोखा नहीं खा सकते, ये आपने अब तक के अपने अनुभव से सीख लिया होगा, मासूम नाम के पीछे चेहरा घिनौना हो सकता है, डरावना हो सकता है, या पापी भी हो सकता है। मगरमच्छ नाम का संधि विच्छेद करने पर मगर और मच्छ मिलता है, यानी इसमें अगर-मगर करने की आदत होती है और ये मछली की तरह पानी में रहता है। लेकिन पानी में रहने के बावजूद वो जमीन पर शिकार करता है, यानी कहता कुछ और है करता इसका बिल्कुल उलटा है। इसलिए मगरमच्छ के नाम पर मत जाइए, उसे उसके चरित्र से यानी उसकी आदतों से, उसकी हवस से जानिए।
 
तो सबसे पहले मगरमच्छ को देखिए। देखना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि बिना देखे मगरमच्छ को नहीं पकड़ा जा सकता। देखना इसलिए भी ज़रूरी होता है क्योंकि आजकल नदियों में जो मगरमच्छ होते हैं, उनकी गुणवत्ता वैसी नहीं होती, जैसी उस जमाने में होती थी जब महामानव ने मगरमच्छ पकड़ा था। उस समय के मगरमच्छ मगरमच्छों जैसी हरक़त करते थे, आजकल मगरमच्छों की हरक़तें कुछ -कुछ, गौर कीजिए, मैं ने सारी हरक़तों की बात नहीं की है, कुछ हरक़तें इंसानों जैसी हो गई हैं। जाहिर है, मगरमच्छों के भी अच्छे दिन आए हुए हैं। महामानव के बचपन में जब नेहरु का राज था, मगरमच्छों का सही पोषण और लालन-पालन नहीं हुआ था, अक्सर कमज़ोर रहते थे, और यूं ही पकड़ में आ जाते थे, आजकल के मगरमच्छ जब तक हो सकता है खाते हैं, और फिर पकड़ाई का अंदेशा होते ही देश छोड़कर चले जाते हैं, विदेशों में ऐश करते हैं। आखिर उनके अच्छे दिन भी आ ही गए हैं।

ख़ैर, पकड़ने से पहले मगरमच्छों को देखना इसलिए भी ज़रूरी है कि ये तसल्ली करना चाहिए कि वो मगरमच्छ जिस पर आपकी नज़र है, कहीं कनेक्टिड ना हो, कहीं ऐसा ना हो कि आपको लेने-के-देने पड़ जाएं।




ग़ौर कीजिएगा, इसी लेने के देने के चक्कर में कई लोग आ गए हैं, और आज बिचारे खिसियानी हंसी हंस रहे हैं, अपने ही हालात पर। तो एक बार अच्छी तरह देख लेने के बाद, यानी जांच-परख के बाद आप मगरमच्छ को पकड़ने के लिए तैयार हो चुके हैं। मगर साहब आपने मगरमच्छ को पकड़ने की जल्दी नहीं करनी है। कतई जल्दी नहीं करनी है, आराम से सबर के साथ, पूरे इत्मिनान से मगरमच्छ को पकड़ना है। इस इत्मिनान के समय में आप अपने कई ज़रूरी काम पूरे कर सकते हैं, जैसे घुइंया छील सकते हैं, रेलवे स्टेशन पर चाय बेच सकते हैं, आपातकाल के समय जेल जा सकते हैं, बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग कर सकते हैं, और कुछ ना बने तो भिक्षा मांग कर गुजारा भी कर सकते हैं। 




महामानव के जीवन में ऐसा इत्मिनान मगरमच्छ पकड़ने के बाद आया था, आप ऐसा इत्मिनान मगरमच्छ पकड़ने से पहले भी हासिल कर सकते हैं। आखिर महामानव मगरमच्छ पकड़ ही चुके हैं, इसलिए कोई जल्दबाज़ी और कोई भकभकी करने की जरूरत नहीं है।




अब आप यू ंसमझिए कि आप मगरमच्छ पकड़ने के एकदम क़रीब हैं, यानी बस कुछ ही पलों में मगरमच्छ पकड़ा जाएगा। अब आप ये सोचिए जनाब की जब आप मगरमच्छ को पकड़ने की जुगत लगा रहे होंगे तो मगरमच्छ क्या पंजे-पर-पंजा धरे खाली बैठा होगा। अरे वो भी तो कुछ जुगत लगा रहा होगा, वो भी या तो बचने के या फिर आप ही को धर दबोचने का इंतजाम सोच रहा होगा। अब मेरे मितरों आपको इससे भी बचना है। यानी अब समय पक गया है, मगरमच्छ आपको पकड़े इससे पहले आपको मगरमच्छ पकड़ लेना है। 



अब आप पहले अपनी तरफ देखिए, आखिर इस मगरमच्छ को पकड़ कर आप क्या ही कर लेंगे, जिसने मगरमच्छ पकड़ा उसने जो किया वो आप देख ही रहे हैं। उपर से मगरमच्छ पकड़ने के बाद मगरमच्छ पकड़ने वाले ने ये इंतजाम कर दिया कि बाकी मगरमच्छ आराम से जिंदगी बसर कर सकें, इसलिए अब मगरमच्छ पकड़ कर उनके जीवन में हैजान पैदा करके आप पहले मगरमच्छ पकड़ने वाले को परेशान करने की जुगत कर रहे हैं। इसलिए आपसे मेरी इल्तिजा है कि आप मगरमच्छ पकड़ने का ख्याल छोड़ दीजिए और जिसने मगरमच्छ पकड़ लिया है उसी के मगरमच्छ पकड़ने के किस्से सुनिए, सुनाइए और मजे उड़ाइए। इसी में आपका भला है।

बाकी चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, वो मगरमच्छ पकड़ने के माहिर थे, हालांकि अपनी पूरी जिंदगी उन्होने मगरमच्छ ना पकड़ बिचारे किसी और ही फिराक में रहे, कहते हैं सदा रक़ीब को पकड़ने के चक्कर में क़ासिद का इंतजार करते रहे, कि खतो-किताबत ही बनी रहे किसी तरह। लेकिन मगरमच्छ पकड़ने की कला पर एक गुलुबंद शेर उन्होने लिखा है जो आपके सामने पेश है। शेर कुछ यूंह ै कि

मगर को पकड़ेगा क्या, मगर के मच्छ साहेब हैं
तू इतना जान ले बच्चे सभी के रच्छ साहेब हैं।

मच्छ का तुक मिल नहीं रहा था, इसलिए ग़ालिब ने रच्छ इस्तेमाल किया और फुटनोट में लिखा है कि इसका मतलब नॉनाबायोलॉजिकल होता है। बाकी आप खुद भी तो समझदार हैं, समझ लीजिएगा। मैं चलता हूं। नमस्ते। 

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

वंदे मातरम का गुप्त इतिहास - सीक्रेट हिस्टी ऑफ वंदे मातरम

 


आखिरकार संसद में बहस हो ही गई, बड़ी ही शानदार बहस हुई साहब, खुद महामानव ने बहस की, मतलब बहस जैसी कोई चीज़ की और सबको हक्का-बक्का छोड़ा। बंकिम दा का नाम ले लेकर जो कोसा है महामानव ने नेहरु, जो कोसा है साहब, क्या ही कहें? 



दरअसल ये बहस जरूरी थी। कांग्रेस की तरफ से कहा जा रहा है कि भई जब देश में इंडिगो ने कहर मचाया हुआ है, उधर गोवा में एक क्लब हाउस की आग में लोग मर गए, इधर रुपया गिरा जा रहा है, तब वंदे मातरम की बहस की जगह इन ज्वलंत मुद्दों पर बहस की जाए। क्योंकि कांग्रेस तुम सबसे सच छुपाना चाहती है। सुनते हैं महादेव एप के चक्कर में हीरेन जोशी भाग गए, या भगा दिए गए, जो भी हो, कांग्रेस ऐसी छोटी-मोटी बातों पर जनता का ध्यान लगाना चाहती है और देश के लिए सबसे जरूरी जो बहस है इस समय, यानी वंदे मातरम उससे लोगों का ध्यान हटाना चाहती है। आज मैं आपको बताउंगा वो सच जिसे आज तक आपसे छुपाया जाता रहा है।




तुम्हे इतिहास का वो काला चैप्टर पढ़ाया ही नहीं जाता, तुमसे छुपा लिया जाता है। मैं तुम्हें वंदे मातरम का असली सच बताउंगा, ज़रा ध्यान से सुनना। 
दोस्तों हमें जो आजादी 1947 में मिली अगर नेहरु नहीं होता तो वो आजादी हमें 1857 में ही मिल जानी थी। दोस्तों जब 1857 में डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार तिरंगा झंडा लेकर, वंदेमातरम गाते हुए लालकिले की तरफ जा रहे थे, तो इसी जवाहर लाल नेहरु ने बीच में टांग अड़ा दी थी, वरना आजादी तो हमें 1857 में ही मिल गई होती। उस वक्त हेडगेवार अकेले थे, लेकिन बाद में उन्हें महामानव का साथ मिला, तब महामानव भिक्षा मांगकर गुजारा कर रहे थे, चाय उन्होने उसके बाद बेचना शुरु किया था। खैर महामानव को तब भी वंदेमातरम पूरा याद था, हालांकि तिरंगा वो नहीं फहराते थे, लेकिन वंदेमातरम पूरा गाते थे, बिना कोई भी लाइन छोड़े गाते थे। 

आपने देखा होगा, महामानव हर भाषण से पहले और हर भाषण के बाद वंदेमातरम ही गाते हैं, बल्कि जब भी बच्चों से मिलते हैं, वंदे मातरम की हर लाइन गाते हैं, बच्चों को उसका मतलब बताते हैं और फिर ये भी बताते हैं कि बंकिमचंद्र चटर्जी को वंदे मातरम लिखने की प्रेरणा उन्होने ही दी थी। अब टाइमलाइन पे ध्यान मत दो, वरना गुरुनानक, कबीर और गोरखनाथ वाली मीटिंग की टाइमलाइन बिगड़ जाएगी। 




आर एस एस की प्रेरणा से ही महामानव के बड़े भाई बंकिम चटर्जी ने वंदेमातरम लिखा था, वहीं से महामानव ने बंकिमचंद्र चटर्जी को बंकिम दा कहना सीखा, और ये आदत आज तक भी बनी हुई है। इसीलिए महामानव संसद में बार-बार बंकिम दा का सम्बोधन दोहराया, और टोकने पर चिढ़ गए। खैर, बाद में महामानव ने ही गुरु रविन्द्रनाथ को ये गाना कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में गाने की सलाह दी थी। 1896 में जब गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर कोलकाता की गलियों से निकलते थे तो महामानव उनके साथ हो लेते थे, दोनो की तू तड़ाक वाली दोस्ती थी, अब क्योंकि महामानव भी कविताएं लिखते थे, और गुरु रविन्द्रनाथ भी छोटी-मोटी तुकबंदी कर लेते थे, तो महामानव कभी-कभी गुरु रविन्द्रनाथ की कविताओं की इस्लाह कर दिया करते थे, इस मामले में महामानव का दिल बहुत बड़ा है। आपने देखा ही होगा व ेअब भी अपनी कविताएं बहुत शर्मा कर सामने रखते हैं। जबकि महामानव की प्रेरणा से गुरु रविन्द्रनाथ की कविताओं की ऐसी धूम मची कि एक तो उन्हें नोबेल मिल गया, दूसरे पूरा बंगाल उन्हें सम्मान देता है। 



इधर महामानव ने चुपके से गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर के कानों में ये बात डाल दी कि ये जो गाना है वंदे मातरम इसे कोलकाता के कांग्रेस अधिवेशन में गाना है, गुरु जी ने महामानव की बात मान कर कांग्रेस के अधिवेशन में ये गाना गाया। दोस्तों, इसके बाद जो हुआ उस पर आप यक़ीन नहीं करेंगे। नेहरु ने, यानी जवाहर लाल नेहरु ने वहीं ये कह दिया कि वंदे मातरम नहीं गाना है। इस बात का कोई प्रमाण बेशक ना हो, लेकिन जैसा कि राजनाथ सिंह जी ने बताया है कि नेहरु के मन में क्या था, उसी तरह महामानव को पता है कि नेहरु के मन में क्या था। आप यकीन मानिए, महामानव को आज भी पता है कि कब-कब नेहरु के मन में क्या था। 




जब वंदे मातरम के लिए महामानव की उस योजना में फच्चर पड़ गए तो महामानव ने एक नई राह निकाली। महामानव ने आर एस एस में वंदे मातरम गाने की योजना बनाई। लेकिन क्योंकि उस वक्त देश में नेहरु की चलती थी, इसलिए नेहरु से बचने के लिए महामानव ने संघ में सीक्रेटली यानी गुप्त रूप से वंदे मातरम गाने का रिवाज शुरु किया। इसलिए जब पूरा देश वंदे मातरम गाता था, तब संघ में सदा वत्सले गाया जाता था, लेकिन एकादशी की रात को छोड़ कर बाकी हर रात को संघ में वंदे मातरम गाया जाता था। 
संघ के हर सदस्य के लिए वंदे मातरम को याद करना सदस्यता की पहली शर्त होती है। आज भी आप देखेंगे कि संघ के सदस्य बाहरी दिखावा यूं करते हैं जैसे उन्हें वंदे मातरम नहीं आता है, लेकिन असल में उन्हें पूरा वंदे मातरम कंठस्थ रहता है, और वो दूसरों को भी वंदे मातरम गाने के लिए प्रेरित करते हैं।  



वो तो गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर वाले एक ग्रुप ने वंदे मातरम की कुछ लाइनो को राष्टगीत से हटा दिया था, वरना तो यकीन करो तुम, गुरु जी यानी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर तो पूरा का पूरा वंदेमातरम गाकर ही खाना खाते थे, मेरा मतलब भोजन ग्रहण करते थे। उनकी इसी तर्ज पर आज भी संघ के सदस्य हों या भाजपा के सदस्य हों, कहीं भी खड़े-खड़े पूरा वंदे मातरम सुना देते हैं। गुरु जी ने जो कितबा लिखी थी, बैंच ऑफ थीव्ज़ उसके हर पन्ने पर गुप्त रूप से पूरा वंदे मातरम लिखा हुआ है, बस आप जैसे ही संघ के सदस्य बनते हैं, आपको ये कुंजी दे दी जाती है। पर नेहरु के डर से संघ को इस किताब का प्रकाशन भी बंद करना पड़ा।  



दोस्तों, 1947 में जो आजादी मिली थी, वो भी पूरी आजादी नहीं थी। ये भी नेहरु की एक चाल थी जिसे आज भी पूरा देश भुगत रहा है। ये आजादी हमें निनन्याबे साल की लीज़ पर मिली है। आजादी का ये काला सच हमसे हमेशा छुपाया जाता है। मैं तो कहता हूं लगे हाथ महामावन को संसद में इस पर भी गहन चर्चा या बहस जो वो ठीक समझें करवा लेना चाहिए।



नेहरु ने बहुत ग़लतियां की थीं दोस्तों, आज भी उन ग़लतियों को याद करके महामानव की आखांे में आसूं आ जाते हैं, पर अभी हम सिर्फ वंदे मातरम पर बात करेंगे और इसकी सारी सच्चाई आप लोगों के सामने ले आएंगे। दोस्तों, जिन दिनों संघ में सीक्रेटली वंदे मातरम गाया जाता था, तब किसी ने जाकर नेहरु को इसकी शिकायत कर दी थी। तब नेहरु ने गृहमंत्री वल्लभ भाई पटेल से कह कर संघ पर बैन लगवा दिया था। उससे ठीक पहले संघ ने किसी बात पर मिठाई बांटी थी, और खुशियां मनाई थीं, लेकिन हम उस बात पर नहीं जाएंगे, मिठाई बांटने का तो कोई भी कारण हो सकता है। खैर तो जब वंदे मातरम गाने की वजह से संघ पर बैन लग गया तो सोचा गया कि क्या किया जाए, तो मजबूर होकर संघ को सीक्रेटली भी वंदे मातरम गाना बंद करना पड़ा। तब जाकर संघ पर से बैन हटाया गया। दोस्तों आपको अक्सर ये बताया जाता है कि महात्मा गांधी की हत्या में संघ का नाम आने की वजह से उस पर बैन लगाया गया। लेकिन ये बिल्कुल झूठ है, संघ पर बैन नेहरु ने लगाया था। हालांकि सरदार वल्लभभाई पटेल ने तो नेहरु से कहा भी था, कि बैन मत लगाओ, लेकिन नेहरु नहीं माने, नेहरु के कपड़े पेरिस में धुलकर आते थे, और उनके लिए चाय इंग्लैंड में बनाई जाती थी, जिसे स्टार टैक वाले टांसपोर्टर के ज़रिए सीधे उनकी टेबल पर पहुंचाया जाता था, वो तो ऐसे बर्ताव करते थे जैसे उनके पिता कोई बहुत अमीर रहे हों, जबकि सच ये है कि आज भी आनंद भवन का किराया 5 रुपये 95 पैसे गांधी परिवार ले रहा है, कुछ दिन रुकिए स्वामी जी इसका भी खुलासा करने वाले हैं। 

तो जब महामानव को संघ पर बैन हटने की खबर लगी तो महामानव नदी में मगरमच्छ पकड़ने गए थे, उन्होने वहीं नदी में से मगरमच्छ पकड़ कर अपनी खुशी का इज़हार किया, और फिर वे भारत के अच्छे दिन लाने की योजना पर काम करने लगे। इसके लिए उन्होने बहुत काम किया, जो कि उन्हें वैसे ही करने की आदत है। महामानव ने मगरमच्छ को पकड़ने के फौरन बाद घर छोड़ दिया, और सीधे अपने काम पर लग गए। उस वक्त भी जब वे भिक्षा मांग कर गुजारा कर रहे थे, भारत में अच्छे दिन लाने के लिए उन्होने अमेरिका के घनघोर दौरे किए, ताकि वे माई गॉड कहना सीख सकें। 




अमेरिका के इन्हीं दौरों में उनकी मुलाकात डोलांड से हो गई, जो जल्दी ही तू-तड़ाक वाली दोस्ती में बदल गई। कमाल ये है कि महामानव ने दोस्ती में सबसे पहला काम ये किया कि डोलांड को भी वंदे मातरम सिखा दिया। और राज़ की बात तो अब मैं आपको बताता हूं, अब डोलांड भी वंदे मातरम गाता है। इधर महामानव ने बी ए और एम ए की डिग्री का जुगाड़ किया और पकौड़े बेच कर रोजगार सृजन की व्यवस्थ पर विस्तार से चाय पर चर्चा की। और चाय पर चर्चा के बाद वंदे मातरम पूरा गाया। 

तो दोस्तों, ये थी वंदे मातरम की असली और सच्ची कहानी, जो कांग्रेस नहीं चाहती कि आपके सामने आए। लेकिन देशभक्त महामानव और उनकी राष्टभक्त टीम ने संसद में इस पर बहस करके ये पूरी सच्चाई जनता के सामने रखी है। बंगाल के चुनाव पास हैं, बस आप ये ध्यान रखना कि महामानव हैं, जिन्होने वंदे मातरम पर बहस की है, महामानव दोस्तों, महामानव, महामानव।

खैर, चचा जो थे हमारे, ग़ालिब वो कहा करते थे

ये कौन बहस कर रहा वंदे मातरम को लेकर
उससे कहो ज़रा वो खुद पर भी नज़र डाले
नमस्ते सदा वत्सले तो गाया बहुत है उसने
खुद मन से कभी वो वंदे मातरम भी गाले

गानों गाना वंदे मातरम है साहब, साहब ने गाया, आप भी गाइए, ग़ालिब ने नहीं गाया तो क्या हुआ, बहुत से लोगों ने नहीं गाया, लेकिन अब गाएंगे, बंगाल चुनाव हैं ना.....खैर बहस का कुछ भी हो, आप देखिए हमें तो कोई फर्क पड़ता नहीं। नमस्कार। 

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

बड़ों का माफी - छोटन को फांसी

 


बचपन में एक दोहा पढ़ा था, छिमा बड़ेन को चाहिए, छोटन को उत्पात। यहां बड़े भाई रहीम कह रहे हैं कि जो बड़ेन होते हैं, उन्हें क्षमा किया जाना चाहिए और ये जो छोटन होते हैं, उनकी जिंदगी में हमेशा उत्पात होना चाहिए। होता क्या है ना भाई कि बड़ेन की जिंदगी में ऐसे ही बहुत कुछ होता रहता है, और वो लागतार कुछ ना कुछ करते रहते हैं, जैसे मौज आई तो नोटबंदी कर दी, या यूं ही मजे मजे में बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ कर दिया, स्वच्छ भारत चला दिया, स्मार्ट सिटी शुरु कर दिया, अमृतकाल कर दिया, और कुछ ऑपरेशन कर दिया।  ये बड़ेन क्योंकि मजे मजे में बहुत कुछ करते हैं, इसलिए बहुत संभव है कि उनके बहुत सारे कामों में से कुछ काम ग़लत हो जाएं, खराब हो जाएं, तो उन्हें माफी की ज़रूरत होती है, हो सकता है बड़े भाई रहीम बहुत साल पहले से ये जानते हों, आखिर वो भी तो महमान अकबर के दरबारी थे, इसलिए वो बड़ेन को माफी देने की वकालत कर रहे हों। 

बड़ेन को माफी इसलिए भी लगती है कि आप यूं भी उनका कर ही क्या सकते हैं। मान लीजिए बड़ेन की किसी ग़लती की वजह से हज़ारों-लाखों की संख्या में हवाई उड़ाने रद्द हो जाती हैं। लाखों यात्रियों को माली नुक्सान होता है, लोग रोते हैं, बिलखते हैं, छटपटाते हैं। लेकिन आप बताइए क्या कर लीजिएगा, अंततः आपको बड़ेन को माफ करना ही होगा। यही व्यवस्था है, यही सिस्टम है, यही होता है। 


आपको याद है एक समय में कोविड हुआ था, श्मशान घाट के बाहर शवों की लाइन लगी हुई थी बाबा, चौबीस घंटे का वेटिंग पीरियड हो गया था। पूरा देश मुर्दाघर जैसा हो गया था, लोग हजारों किलोमीटर की यात्रा कर रहे थे कि मरें भी तो आखिर घर जाकर। लेकिन आखिरकार क्या हुआ, बड़ेन को माफी मिल गई। अब इसमें होता कुछ यूं है कि बड़े भाई रहीम के दोहे के हिसाब से बड़ेन माफी मांगता भी नहीं है, लेकिन उसे स्वाभाविक माफी मिल जाती है। ना कोई माफी मांगता है, ना कोई माफी देता है, पर मिल जाती है, माफी, क्योंकि छिमा बड़ेन को चाहिए। अगर आप किसी बड़ेन को माफी नहीं भी देंगे तो वो आपसे माफी खोंस लेगा, यानी छीन लेगा, इसके लिए भी हिन्दी में एक कहावत है, जबरा मारे और रोने भी न दे। इस कहावत में जो जबरा है, मेरे ख्याल में बडे़ भाई रहीम के दोहे में वही बड़ेन है। ये जो बड़ेन है, ये मारता है ओर रोने पर अनिष्ट भी कर सकता है। इसलिए बड़ेन ग़लती करता है, क्योंकि उसे पता है कि माफी तो मिल ही जानी है, माफी उसका अधिकार है, उसका हथियार है। वो नोटबंदी करता है और फिर तुम्हारी मुसीबत पर हंस सकता है।


और जब तुम मर जाते हो तो बड़े ही नाटकीय तौर पर सजा पाने की घोषणा कर सकता है

क्योंकि उसे पता है कि सज़ा मिलना तो क्या, उसे सज़ा देने के बारे में तुम सोच भी नहीं सकते, और अंततः तुम्हे उसे माफ करना ही पड़ेगा, क्योंकि छिमा बड़ेन का चाहिए। बड़ेन का छिमा का ये कंसेप्ट सदियों से चला आ रहा है, और आगे भी यूं ही चलता रहेगा ऐसी प्रबल संभावना है। वजह वही जो पहले बताई है कि आखिर आप क्या ही कर लेंगे बड़ेन का। 
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दूसरी तरफ छोटेन का मामला ही उल्टा है, बड़े भाई रहीम ने कहा, छोटन को उत्पात। यहां इस दोहे में उनके कहने का मतलब है कि ये जो छोटन हैं, इनके जीवन में हर समय कोई ना कोई उत्पात लगा रहना चाहिए। क्यों ? क्योंकि इनके जीवन में अगर आराम हो जाए तो इन्हें दिक्कत हो जाती है। छोटन की बड़ी दिक्कत ये है कि ये लोग संतोष के साथ जीना नहीं सीखते, जबकि संतोष को लेकर जितनी भी कहावतें बनाई गई हैं, वो इन्हीं छोटन को हद में रहने की हिदायत देती हैं। कहावतें जैसे
संतोषी सदा सुखी
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान
आदि आदि
यानी छोटन को हमेशा कहा गया है कि लला, थोड़ा संतोष में रहोगे तो फायदे में रहोगे, कम से कम जीवित रहोगे, जरा आगे की मत सोचो, जितना मिला उसमें संतोष करो और जिंदगी काट लो, वरना जो मिला है वो भी छिन जाएगा और जान से जाओगे सो अलग। छोटन का बड़ा प्रॉब्लम है कि वो इन कहावतों में भरोसा नहीं करते, और ज्यादा की मांग करने लगते हैं। जैसे अभी पता चला दिल्ली में साफ हवा मांग रहे हैं। इन्हें लगा कि इंटरनेट मिल गया, बिजली मिल गई, पानी मिल गया, तो साफ हवा तो मिलनी चाहिए। लगे इंडिया गेट पर शोर मचाने। बस बड़ेन ने फौरन धर दबोचा, अब झेल रहे हैं अपने साफ हवा के हक़ की मांग करने की सज़ा।


इतिहास गवाह है कि जब भी छोटन को भरपेट खाना मिला है, तब-तब उसने जीवन की और सुख-सुविधा के लिए नारे लगाए हैं। जैसे इस देश में लोकतंत्र आया तो उसके बाद इसी छोटन ने जमीन पर हक़ के लिए नारे लगाए, संघर्ष किया, लड़ाई लड़ी, हुआ क्या, एक पूरी पीढ़ी गायब कर दी गई, और आज तक नक्सल के नाम पर प्रो. जी एन साईबाबा, से लेकर गौतम नवलखा तक जेल की साफ हवा में सांस दिया जा रहा है, एक थे स्टेन स्वामी, भले मर गए, लेकिन किसी बड़ेन ने माफी तो दूर, उनकी हत्या की जिम्मेदारी तक ना ली अपने सिर पर, उमर खालिद समेत तमाम बच्चों को सिर्फ इसलिए जेल की उड़द दाल का स्वाद मिल रहा है कि छोटेन होकर संतोष नहीं किया। लगे आज़ादी और ग़रीबों के हक़-अधिकार की आवाज़ उठाने। लेकिन ग़लती इनकी भी नहीं है, ये चरित्र होता है छोटेन का, इन्हें शिक्षा दो तो ये हक़ मांगते हैं, भरपेट खाना दो तो वोट करने का अधिकार मांगेगे, और थोड़ा पढ़ने-लिखने दोगे तो और ज्यादा आज़ादी और अधिकार मांगेगे। इसलिए बड़े भाई रहीम ने कहा था कि छोटेन के जीवन में हमेशा कोई ना कोई उत्पात होना चाहिए, ताकि आज़ादी, प्राइवेसी, साफ हवा, के बारे में शोर नाम मचाएं। छोटन की दिक्कत ये है कि जिंदगी में आराम हो तो दिमाग शैतान का कारखाना बन जाता है। यानी छोटन को जब-जब सुविधाएं मिलती हैं, यानी जब भी उनके जीवन में उत्पात नहीं होता, वो सरकार से अजीब-अजीब मांग करने लगते हैं। 


अभी बड़ेन ने एस आई आर करवाया, एस आई आर माने, ये तय किया जाएगा कि किसे वोट करने दिया जाए और किसे नहीं, अब छोटन शोर मचा रहे हैं कि हमारा वोट का अधिकार छीना जा रहा है। ये जो कुकर्म हैं, छोटन के, इसी वजह से इनके जीवन में उत्पात की ज़रूरत बनती है। अबे वोट करके ही तुम क्या कर लोगे बे, मैं तो कहूं ये जो इन्हे मुफ्त राशन दिया जा रहा है, उसे बंद करो, जैसे ही पेट की भूख सताएगी, सब वोट-फोट भूल जाएंगे। मेरी बात का यकीन नहीं है तो इन्हें देखिए 


ज़रा पढ़-लिख गईं तो लगी बड़ेन की नाक में दम करने। अब इन्हें वो सारे हक़ चाहिएं, जो बड़ेन के पास हैं, कैसे चलेगा? इसीलिए कहता हूं कि वही पुरानी स्टाइल ठीक थी, बड़ेन के पास सबकुछ हो, और छोटन के पास जीवन पूरा करने का संघर्ष हो। इन्हें खाने को मत दो, पढ़ने मत दो, सोचने-समझने मत दो। तभी ये छोटन काबू में रहेंगे, आपको याद होगा कि किसानों ने दिल्ली को घेर लिया था, दिल्ली को, बताइए, बड़ेन की नाक में दम हो गया था। उस वक्त बड़ेन की सबसे बड़ी परेशानी थी कि ये जो छोटन हैं, किसान हैं, ये खाना कैसे खा ले रहे हैं, भूखे क्यों नहीं मर रहे, सुंदर क्यों दिख रहे हैं, और तमाम आरोप लगा दिए बड़ेन ने इनके उपर....जैसे
खालिस्तानी हैं ये लोग, किसान ही नहीं हैं, बाहरी ताकते हैं जो इन्हें उकसा रही हैं।
लेकिन असली बात किसी ने नहीं पकड़ी। असली बात ये है कि इन छोटन के जीवन में उत्पात नहीं था, मुसीबत नहीं थी, इन्हें काबू में करना है तो इनके जीवन में उत्पात होना चाहिए, वरना ये बड़ेन का परेशान करेंगे। कहेंगे कि खेत और फसल की सही क़ीमत दो, आदिवासी होंगे तो कहेंगे कि जंगल, पहाड़, नदी और ज़मीन बचानी है। इन्हें काबू में करने का सही तरीका यही है कि सुप्रीम कोर्ट में जो बड़ेन बैठे हैं, उनके सामने इन्हें खालिस्तानी और नक्सली का ठप्पा लगाकर पटक दो, साबित कुछ नहीं करना, सारा जीवन बीत जाएगा भाई साहब, ये बाहर नहीं आ पाएंगे। आखिर सुप्रीम कोर्ट में भी बड़ेन बैठे हैं, और संसद में भी, और तो और मीडिया भी असल में बड़ेन के ही पास है। कौन क्या कहेगा?


खैर साहब फिर से आते हैं अपने असली दोहे पर, यानी बड़े भाई रहीम ने लिखा था, छिमा बड़ेन का चाहिए, छोटन को उत्पात, तो ये छोटन का उत्पात ही दरअसल बड़ेन की शंाति है। बड़ेन की शांति ही दरअसल देश की शांति होती है, और देश की शांति दरअसल छोटन की मंाग और संघर्ष की खामोशी का संकेत हैं। 

खैर चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, वो भी बड़े भाई रहीम की तर्ज पर एक संुदर शोर कह गए हैं, सुनिए
बड़े बड़े लोगन के मोटरगाड़ी
और हीरो होण्डा अलग से
हम्मन गरीबन के साइकिल जुलुमवा
चलने में टायर फटे फट से

अब आप इसका तर्जुमा कीजिए कि चचा आखिर कहना क्या चाहते थे, लेकिन बड़े भाई रहीम पक्का यही कहना चाहते थे कि छोटन की जिंदगी में उत्पात मचा के रखिए ताकी देश में शांति रहे। बाकी आपकी मर्जी। 

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

महामानव की जादूई नज़रें

देखिए, नईं आप ज़रा देखिए ये विपक्षियों के डरामे को। महमानव चाहते हैं कि सरकार हर वक्त आपकी हथेलियों में रहे, इकतरफा रहे, लेकिन रहे, और ये विपक्षी मोहतरमा इसे स्नूपिंग एप बता रही हैं।
महामानव चाहते हैं कि वो हर वक्त, हर क्षण, हर घड़ी आपके साथ रहें, आपके फोन में रहें, और ये विपक्षी, ये कांगी, ये वामी चाहते हैं कि ऐसा ना हो, बताइए ये कोई बात हुई भला। जब महामानव खुद को अवतार घोषित कर चुके हैं। तो वे चौथाई या उससे ज्यादा ईश्वर तो हो ही चुके हैं। अब ईश्वर तो जनाब सर्वव्यापी होता है, सर्वज्ञानी और अंर्तयामी होता है। जैसे महामानव ईश्वर हुए हैं, वैसे ही वो सर्वज्ञानी और अंर्तयामी होना चाहते हैं, तो इन्हें इसमें भी प्रॉब्लम है। अरे इस देश में कोई है जो इस घोर कलियुग में महामानव से ईश्वर होने की जुगत लगा रहा है और ये दिलजले हैं कि इन्हें चैन नहीं पड़ता। संचार एप के ज़रिए महामानव चाहते हैं कि सरकार को आपकी इच्छाओं का, आपकी आकाक्षांओं का पता रहे, आप किससे बात कर रहे हैं, क्या बातें कर रहे हैं, क्या आपको कोई शिकायत तो नहीं है?, क्या आपकी कोई दबी, ढंकी, छुपी इच्छा तो नहीं है? महामानव को सबकुछ पता होना चाहिए। ताकि समय रहते आपको ठीक किया जा सके.....मेरा मतलब, मेरा कहने का मतलब है कि समय रहते आपकी इच्छाएं पूरी की जा सकें। आज के दौर में दोस्तों जब महामानव ईश्वर होने में पूरी ताकत लगा रहे हैं, ये विपक्षी महामानव की इत्ती सी इच्छा पूरी नहीं होने दे रहे।
ये सब आपको झूठ बता रहे हैं, अरे भई हर वक्त आप सरकार की नज़र में रहेंगे तो आपका ही तो फायदा है, आप कितना पैसा कमा रहे हैं, कितना टैक्स चुरा रहे हैं, किससे क्या बातें कर रहे हैं, ये सब तो सरकार को पता होना चाहिए। देखो यार अगर तुम ठीक हो, महामानव से खुश हो, यानी उनके बारे मे सब भला-भला बोल रहे हो, सोच रहे हो, तो सब ठीक ही ठीक है। तो तुम्हे डरने की ज़रूरत ही क्या है? डरे वो जो महामानव की आलोचना करता हो, सरकार की आलोचना करता हो, ऐसा करने वाले को तो वैसे भी जेल भेज देने की ज़रूरत है। अभी हो क्या रहा है कि लोग महामानव की आलोचना कर रहे हैं, बेकार मे ंकर रहे हैं, लेकिन कर रहे हैं। यार ये तो वैसे भी ठीक बात नहीं है कि देश मे महामानव की आलोचना की जाए। पर ज़रा सोचिए, अगर ये संचार एप आपके फोन में आ जाएगा, तो चुनाव आयोग को ये एस आई आर करने की ज़रूरत नहीं होगी, महामानव को पहले ही पता होगा कि कौन किसे वोट कर रहा है, बस इत्ती सी बात है। आप महामानव की आलोचना करने से बचेंगे, और सरकार को पहले से ही पता चल जाएगा कि कौन, किसकी, कहां, कब, कैसे आलोचना करना चाहता है। लोकचंद्र को बचाने के लिए साथियों, संचार एप जरूरी है। ये जो संचार एप का विरोध कर रहे हैं, ये लोकचंद्र के दुश्मन हैं, महामानव और उनकी टीम जो सभी मोबाइलों में संचार एप डालना चाहती है, वो लोकचंद्र को बचाना चाहती है। देखिए अभी क्या होता है कि कोई ज़रा कोई नारा लगाता है, या कहीं भाषण देता है, या कोई फेसबुक पोस्ट करता है, तब जाकर पुलिस हरक़त में आती है। लेकिन अगर संचार एप आ गया तो नारा लगाने से पहले ही पुलिस यानी सरकार आपको अरेस्ट कर लेगी, और फिर आपके नक्सली लिंक का पता लगाएगी। आपने ज़रा सरकार की आलोचना के बारे में सोचा तो पुलिस फौरन आपको अरेस्ट कर लेगी और फिर आपके नक्सली लिंक का पता लगाएगी, आपने फेसबुक पर या ट्विटर पर कुछ लिखने की सोचा, या शेयर करने की सोचा तो पुलिस फौरन आपको अरेस्ट कर लेगी और फिर आपके नक्सली लिंक का पता लगाएगी। जरा सोच के देखिए, आपके पास एक मोटरसाइकिल है, और आप अपने दोस्त से कह रहे हैं कि आप सिर्फ दो सौ रुपये का पैटोल डलवाने की सोच रहे हैं, क्योंकि पैटोल बहुत महंगा है। अब जब अपने दोस्त से ये बात कर रहे होंगे तो आपका फोन आपकी जेब में होगा, जिसमें संचार एप होगा, जिसके ज़रिए आपकी ये बात पुलिस के कानो तक पहुंचेगी। बस पुलिस फौरन आपको अरेस्ट कर लेगी, क्योंकि पैटोल की कीमतों के बारे में बात करना तो सरकार की आलोचना करना है, और सरकार की आलोचना करना तो नक्सल होना है। बस हो गए आप अर्बन नक्सल। कित्ती सीधी सी बात है। अब ज़रा सोचिए, देश की सीमा पर सैनिक लोग अपना सब कुछ निछावर करने को तैयार खड़े हैं, और आप हैं कि आपको अपनी निजता की पड़ी है, अपनी आज़ादी की पड़ी है। अरे ये मत सोचो की महामानव ने आपके लिए क्या किया, आप तो ये सोचो कि आपने महामानव के लिए क्या किया? आप ये नहीं सोचते कि संचार एप से आपकी निजता जाएगी, लेकिन महामानव की अमरता तो बनेगी। अब आप ही बताइए, आपकी दो टके की निजता के मुकाबले महामानव की अनश्वरता, उनके ईश्वर होने का दावा, ज़रूरी है या नहीं। चचा जो थे हमारे, ग़ालिब, निजता के यानी प्राइवेसी के वो बिल्कुल खिलाफ थे, प्राइवेसी के नाम से तो उन्हें कतई चिढ़ मची हुई थी, इसलिए संचार एप के लिए उन्होने एक शानदार शेर लिखा था। हर पल मेरे हर हाल पे नज़र रखें सरकार आपमें मुझे तो खुदा दिखें संचार एप डाल के मेरे मोबाइल में वो कह रहे हैं लोकचंद्र है ये चखें आलोचना नहीं होगी तो लोकचंद्र बरबाद हो जाएगा चचा भी यही मानते थे, लोकचंद्र के वो कतई खिलाफ थे, कहते थे अमां मोबाइल में डालो संचार एप और प्राइवेसी को प्राइवेटाइजेशन की जेब में डाल दो, सारे झगड़े-टंटे मिट जांगे। बस उसी पर चलाओ लोकचंद्र की सवारी, जब तक चलती हैं और फिर हंस देते थे। ये तो खैर चचा की बात है, कहां तक करेंगे। आप तो मोबाइल पे संचार एप डाल कर मजे लो तरकारी के ।हम चले, फिर मिलेंगे अगर संचार एप ना डला तो।

बुधवार, 7 जनवरी 2026

डॉलर फिर चढ़ा

 




 सुना डॉलर फिर उपर चढ़ गया। हालांकि ये कॉमी, वामी, कांगी, और सनातन विरोधी देश और दुनिया के पत्रकार ये कहते सुने गए हैं कि रुपया नीचे आया है। लेकिन जैसा कि देश की महान अर्थ मंत्री निर्मला जी सीतारमन बता चुकी हैं कि रुपया नहीं गिरा है, डॉलर चढ़ गया है। 




अब सवाल ये है कि देश की जनता को डॉलर की इस चढ़ाई पर खुशी मनानी चइए कि नई मनानी चइए। भई जब देश में डीयर फ्रेंड डोलांड का जन्मदिन मनाया जा सकता है, डीयर फ्रेंड डोलांड की जीत के लिए नारे लगाए जा सकते हैं, तो जाहिर है डोलांड की करेंसी यानी डॉलर की चर्ढ़ाइ पर खुशियां भी मनाई जा सकती हैं। 




देश की समृद्धि इसी बात से जाहिर है कि सुना आई एम एफ नाम की एक संस्था है, इंटरनेशनल मोनेटेरी फंड जिसने रुपये की बेइज्जती की है। अब रुपये की बेइज्जती की गई तो बर्दाश्त थोड़े ही किया जाएगा, ठीक है डॉलर उपर चढ़ रहा है, हमें खुशी है कि हमारे डीयर फ्रेंड की करेंसी उपर जा रही है, लेकिन हम अपनी करेंसी की बेइज्जती नहीं सहेंगे, फौरन आर बी आई ने मोर्चा संभाला, और डॉलर की पूंछ पकड़ के थोड़ा सा नीचे गिरा दिया। हम लहुसन प्याज ना खाने वाले सनातनी हिंदू जो हैं, वो इसी तरह काम करते हैं, थोड़ा लटक-झटक कर, थोड़ा मटक-मटक कर। खैर डॉलर जो उपर जाता हुआ इतरा रहा था, उसकी तो हमने नटकन कम कर दी। हालांकि इससे भारत की करेंसी को घिसटने वाली व्यवस्था से बाहर नहीं निकाला जा सका, लेकिन जैसा कि निर्मला ताई ने कहा था।




रुपये के बारे में भ्रम फैलाने वाले सबको जेल भेजा जाएगा, कल तक अमरीका कहता था तुम क्या हो, आज जैसे ही हमने डॉलर को उपर चढ़ने से रोका हर भारतीय के, खासतौर पर सनातनी भारतीय के पेट से आवाज़ निकली





अच्छा रुपये की इस हालत से आप पर क्या फर्क पड़ा, ये सब फालतू बातें हैं, देखिए जी डी पी की ग्रोथ लगभग नौ नंबर को छू रही हैं, क्या इससे आपकी सेहत पर कोई फर्क पड़ रहा है? या फिर भारतीय अर्थव्यवस्था कदम-कदम करके पांचवे से चौथे, और चौथे से तीसरे पायदान पर चढ़ रही ह, इससे आपकी सेहत पर कोई फर्क पड़ रहा है क्या? नहीं, पैटोल वही नब्बे के उपर मिल रहा है, शायद जल्दी ही सौ पार हो जाए, दाल-चावल-आटा महंगा हो ही रहा है, लेकिन उससे भी आपकी सेहत पर तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि अभी से ही करोड़ों परिवारों को हर महीना पांच किलो राशन मिल रहा है, कुछ दिन बाद हर परिवार को इसी राशन पर जीने का विकल्प मिलेगा। हर परिवार को महामानव की तस्वीर वाला एक झोला मिलेगा जिसमें पांच किलो राशन होगा, बस तीन दिन तो काम चलेगा, बाकी हरि भजन करो। 




अब जिस जनता को महामानव पांच किलो राशन दे दें, वो क्यों तुम्हारे जी डी पी, और पी एच डी के झंझट में पड़ेगी भई। जनता के लिए सब सुखमय है, सब शानदार है, सब महामानवीय है। तुम क्यों इन वामियों की बातों में आते हो, तुम बाबा अनिरुद्धाचार्य की बातों में आओ, सनातन और भगवाए हिंद वाले बागेश्वर धाम की बातों में आओ, ज्ञानपीठ वाले पतित और नीच ब्राहमणों की सूचि निकालने वाले रामभद्राचार्य की बातों में आएं, क्यों बेकार ये जी डीपी समझने में लगे हैं। सच मानिए सब सनातन के हाथों में है तो सब शुभ ही होगा। 

अभी देखिए भारत की अर्थव्यवस्था को चरम पर पहुंचाया जाएगा, जब भारतीय अर्थव्यवस्था चरम पर पहुंच जाएगी, तो भारत विश्वगुरु बन जाएगा, अभी तो सिर्फ जापानियों को चकमा दिया गया है, अभी बाकी देश भी कतार में लगे हुए हैं।  हम धीरे-धीरे सबको नीचे कर देंगे, आप बस देखते रहो। 

खैर डॉलर के उपर जाने की, ध्यान दीजिएगा, रुपया नीचे जाने की नहीं, बल्कि डॉलर के उपर जाने के कुछ विशेष कारण हैं, कारण जैसे देश में धर्म का हड़ास हो रहा है, आप ही देखिए आज से दस-पंद्रह साल पहले तक लोग कितनी सत्यनाराण की कथा करवाते थे, लीलावती और कलावती की कथा सुनते थे, पंजीरी खाते थे, चरणामृत पीते थे, और पंडीजी को दान-दक्षिणा देते थे, अब नहीं दे रहे। इसलिए दोस्तों, इसलिए इस देश की मुद्रा का जिसे अंग्रेजी में करेंसी कहते हैं, हड़ास हुआ जा रहा है। 
लेकिन महामानव ने उसका भी उपाय निकाला है, अयोध्या में ध्वजारोहण कर दिया है, जिसकी वजह से डॉलर की थोड़ी बहुत टूटन संभव हो पाई है। लेकिन, लेकिन, लेकिन, अभी काम पूरा नहीं हुआ है, इसी वजह से मितरों, सनातन की रक्षा के लिए पदयात्रा करने वाले बागेश्वर बाबा के पैरों में छाले पड़ गए, और बिचारे को पश्चिमी दवाओं का सहारा लेना पड़ा, आफत इस कदर हो गई कि सुना उनके प्रवचनों में से रजाई-गद्दे चोरी होने लगे, बताइए धरम का ऐसा हड़ास होगा तो रुपया कैसे उपर चढ़ेगा। अब बताइए एक चमत्कार तो महामानव और निर्मला ताई के किए हो गया कि रुपया लगातार नीचे जा रहा था, लेकिन अर्थव्यवस्था लगातार उपर जाती जा रही है। अब मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं, इसलिए मेरी इल्तिजा है कि भई अगर कोई इस चमत्कार को एक्सप्लेन कर सके तो जरूर करे, कि जिस देश की करेंसी नीचे जा रही हो, उसकी अर्थव्यवस्था लगातार उपर कैसे चली जा रही है। और देखिए बेकार की तकनीकी बातें मत कीजिएगा, इस तरह बताइएगा कि कोई चौथी क्लास का बच्चा, या मान लीजिए महामानव भी समझ सकें कि ये चमत्कार हो कैसे रहा है। 

खैर जनाब, हमें तो इसी बात की खुशी है कि महामानव के होते, उनके डीयर फ्रेंड की करेंसी यानी डॉलर उपर जा रहा है, बाकी निर्मला ताई ही इस बार भी समझाएंगी कि कैसे रुपया नीचे नहीं जा रहा है, बल्कि डॉलर उपर जा रहा है, आप रुपया मत देखिए, चश्मा गिर जाएगा, आप डॉलर देखिए ताकि टोपी गिर सके, या पगड़ी जिसे अंग्रेजी में इज्जत भी कहते हैं नीचे गिरने का खतरा हो तो वो भी मत देखिए, आप तो बाबा बागेश्वरधाम के पैरों के छाले देखिए जो पदयात्रा से हो गए, और उन्हें अस्पताल भर्ती होना पड़ा।

बकी चचा जो थे हमारे वो बहुत उम्दा एक शेर कह गए हैं इस मामले में, आप भी सुन लीजिए

डॉलर उड़ा, उड़ता ही गया, उड़ता ही गया
करेंसी और भी थी आसमान में बहुत सारी
रुपये का मत पूछो मेरे हमदम हाल ओ हिसाब
वो तो बस लुढ़कने में यकीन रखता है।

वाह, वाह भई वाह, चचा ने दिल जीत लिया। खैर हमारी यही दुआ है कि आई एम एफ जैसी संस्थाओं का झूठ पकड़ा जाए, और रुपये की इज्जत सबसे नीचे जाकर भी बनी रहे, बाकी जो है सो हइये है।
नमस्कार।  

भव्य स्वागत - भयानक स्वागत

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